Friday, 28 December 2018

जीन में बदलाव कर बच्चों का जन्म !

    खबर तो यही कि है कि चीनी वैज्ञानिक ने जुड़वां शिशुओं के पैदा होने से पहले ही उनमें आनुवांशिक बदलाव करने का दावा किया है। उन्होंने यूट्यूब पर वीडियो डालकर अपने प्रयोग के बारे में बताया। 

   इस खबर से वैज्ञानिक स्तब्ध हैं और बहस शुरू हो गई है। खबर है कि चीन के एक वैज्ञानिक ने दावा किया है कि उन्होंने दुनिया के पहले ऐसे शिशुओं को पैदा करने में सफलता पाई है, जिनके जीन्स में बदलाव किए गए हैं।
  चीनी यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हे जियानकुई ने यूट्यूब पर नवजात जुड़वा बहनों का वीडियो डालकर दावा किया कि इनके जीन्स में बदलाव किए गए हैं, जिससे इनका एचआईवी से बचाव हो सकेगा।
   खबर है कि एचआईवी से रोकना मकसद, शेनझान के अनुसंधानकर्ता ही जियानकुई ने कहा कि उन्होंने सात दंपतियों के बांझपन के उपचार के दौरान भ्रूणों को बदला जिसमें अभी तक एक मामले में संतान के जन्म लेने में यह परिणाम सामने आया। इन जुड़वा बहनों का डीएनए सीआरआईएसपीआर तकनीक से बदला गया। उन्होंने कहा कि उनका मकसद किसी वंशानुगत बीमारी का इलाज या उसकी रोकथाम करना नहीं है, बल्कि एचआईवी, एड्स वायरस से भविष्य में संक्रमण रोकने की क्षमता इजाद करना है, जो लोगों के पास प्राकृतिक रूप से हो।
   खबर है कि जियानकई ने कहा कि इस प्रयोग में शामिल माता-पिताओं ने अपनी पहचान जाहिर करने या साक्षात्कार देने से इनकार कर दिया है। उन्होंने कहा कि वह यह भी नहीं बताएंगे कि वे कहां रहते हैं और उन्होंने यह प्रयोग कहां किया। खबर है कि ऐसे किया प्रयोग, जियानकुई के ऑनलाइन किए गए दावे के बारे में एमआईटी टेक्नॉलजी रिव्यू के इंडस्ट्री जर्नल लेख प्रकाशित हुआ है। इस वीडियो के रिलीज होने के बाद से वैज्ञानिकों में बहस छिड़ी हुई है।
   जियानकुई का कहना है कि 'लुलू' और 'नाना' नाम की इन बहनों को आईवीएफ तकनीक से पैदा किया गया और गर्भ में प्रवेश होने से पहले ही अंडाणु में बदलाव कर दिए गए थे। उनके मुताबिक, ''शुक्राणुओं के प्रवेश के बाद भ्रूणविज्ञानी ने सीआरआईएसपीआर प्रोटीन को भी प्रवेश कराया। जिसका मकसद बच्चियों को एचआईवी संक्रमण से बचाना था''। 
  खबर है कि अनुसंधानकर्ता के इस दावे की स्वतंत्र रूप से कोई पुष्टि नहीं हो सकी है और इसका प्रकाशन किसी पत्रिका में भी नहीं हुआ है, जहां अन्य विशेषज्ञों ने इस पर अपनी मुहर लगाई होध् एमआईटी टेक्नॉलजी रिव्यू ने चेतावनी दी है कि यह तकनीक नैतिक रूप से सही नहीं है क्योंकि भ्रूण में परिवर्तन भविष्य की पीढ़ियों को विरासत में मिलेगा और अंततः समूचे जीन को प्रभावित कर सकता है।
   खबर है कि डीएनए लंबी उम्र के लिए अच्छे जीन्स का होना जरूरी है। जीन्स हमें अपने माता पिता से मिलते हैं। अकसर देखा गया है कि जो मां बाप लंबा जीते हैं, उनके बच्चों की उम्र भी लंबी होती है। इसकी वजह हमारे डीएनए में छिपी है। सही जीन के होने से हमारी जीवन प्रत्याशा बढ़ सकती है। हमारी उम्र पर इनका 25 से 30 फीसदी तक असर होता है।
   खबर है कि महिलाएं आम तौर पर पुरुषों से लंबा जीती हैं। ऐसा क्यों है, इसका जवाब शायद हमारे क्रोमोजोम में छिपा है। महिलाओं में दो एक्स क्रोमोजोम होते हैं, जबकि पुरुषों में एक एक्स और एक वाय. अगर वाय में कुछ गड़बड़ी हो जाए, तो एक्स कोई मदद नहीं कर सकता। इसलिए पुरुषों में जीन डिफेक्ट अधिक देखे जाते हैं।
   खबर है कि अच्छी सेहत के लिए सही तरह का खाना बेहद जरूरी है। जैसे कि मेडिटरेनियन डाइट यानी भूमध्यसागर के इलाकों में रहने वाले लोगों का खान पान. ऑलिव ऑयल, सब्जियां और सलाद खाने वालों की उम्र लंबी होती है। साथ ही, दिन भर में कितनी कैलोरी लेते हैं, ये भी उम्र को निर्धारित करता है। सही आहार के जरिए अपने वजन पर काबू करने वाला लंबा जीता है।
   खबर है कि अमेरिका में हुए एक शोध में देखा गया कि जो लोग अपनी बढ़ती उम्र को ले कर सकारात्मक रवैया रखते हैं, वे लंबा जी पाते हैं. रिसर्च के अनुसार रिटायर होने के बाद आराम करने वालों की तुलना में वो लोग जो साठ-पैंसठ की उम्र के बाद भी खुद को व्यस्त रखते हैं, वे चार साल लंबा जीते हैं. यानी बुढ़ापे में व्यस्त रहने से उम्र लंबी होती है।
   नियमित रूप से कसरत करना और चलते फिरते रहना सेहत और उम्र दोनों के लिए अच्छा है. जो लोग जॉगिंग करते रहे हैं, उसका फायदा उन्हें तब भी मिलता है, जब वे बुढ़ापे में दौड़ना भागना बंद कर देते हैं। कसरत करने से शरीर की कोशिकाओं में ऐसे बदलाव होते हैं, जो कसरत करना छोड़ने पर भी बने रहते हैं. कसरत करने से शरीर लंबी उम्र के लिए तैयार होता है।

Sunday, 16 December 2018

इन देशों में कोई एयरपोर्ट नहीं

   सस्ती किरायों ने विमान यात्राओं को आम आदमी की पहुंच में ला लिया है और हर साल विमान से सफर करने वालों की तादाद बढ़ रही है. लेकिन अब भी कुछ ऐसे देश हैं जहां कोई एयरपोर्ट नहीं है। 

   यहां देखिए ये कौन से देश हैं। खबर तो यही कि है कि अंडोरा, बिना एयरपोर्ट वाले देशों में यह सबसे बड़ा है. यहां तीन निजी हैलीपैड हैं और सबसे नजदीकी एयरपोर्ट करीब 12 किलोमीटर दूर है।
  खबर है कि लिश्टेनश्टाइन, जर्मन भाषी लिश्टेनश्टाइन ऑस्ट्रिया और स्विट्जरलैड के बीच बसा एक छोटा सा देश है। यहां एक हैलीपोर्ट है और नजदीकी एयरपोर्ट है ज्यूरिख।
   खबर है कि मोनाको, फ्रांस की सीमा से लगते पश्चिम यूरोपीय देश मोनाको में कोई एयरपोर्ट नहीं है. इसका सबसे नजदीकी एयरपोर्ट है फ्रांस का कोट डे अजूर। खबर है कि सान मरीनो, इटैलियन प्रायद्वीप में मौजूद इस देश में भी कोई एयरपोर्ट तो नहीं लेकिन एक हेलीपोर्ट और छोटा सा एयरफील्ड जरूर है. नजदीकी एयरपोर्ट इटली में है। 
  खबर है कि वैटिकन सिटी, वैटिकन में भी कोई एयरपोर्ट नहीं है लेकिन एक हैलीपोर्ट है. वास्तव में इसकी छोटी सी जमीन पर एयरपोर्ट बनाना मुमकिन नहीं. नजदीकी एयरपोर्ट है रोम।

Saturday, 15 December 2018

अब नेपाल में नहीं चलेंगे भारतीय नोट !

   खबर तो यही कि है नेपाल की सरकार ने भारतीय मुद्रा के सौ से ऊपर के नोटों पर पाबंदी लगा दी है। मतलब नेपाल में सौ से ऊपर के भारतीय नोट नहीं चलेंगे। 

   पाबंदी के पहले तक नेपाल में स्थानीय मुद्रा के साथ भारत के सभी नोट भी चलन में थे। नेपाल की सरकार ने भारतीय मुद्रा के सौ से ऊपर के नोटों पर पाबंदी लगा दी है।
   मतलब नेपाल में सौ से ऊपर के भारतीय नोट नहीं चलेंगे। खबर है कि पाबंदी के पहले तक नेपाल में स्थानीय मुद्रा के साथ भारत के सभी नोट भी चलन में थे।
   खबर है कि आख़िर नेपाल ने अचानक से ये फ़ैसला क्यों लिया? हाल ही में नेपाल के मंत्रियों की एक बैठक हुई थी और इसी बैठक में यह फ़ैसला लेकर एक नोटिस जारी किया गया कि 200, 500 और 2,000 के भारतीय नोट नेपाल में अवैध होंगे।
   खबर है कि सबसे दिलचस्प ये है कि नेपाल ने इसकी कोई वजह नहीं बताई है। नेपाल की तरफ़ से जो आधिकारिक नोटिस जारी किया गया, उसमें भी कोई कारण नहीं बताया गया है। ऐसे में सवाल उठता है कि नेपाल को अचानक इसकी क्या ज़रूरत आन पड़ी?
  खबर है कि कहते हैं कि ये फ़ैसला क्यों लिया गया, अभी तक साफ़ नहीं है।
खबर है कि ''ज़ाहिर है इसका असर लोगों पर पड़ेगा। ख़ासकर सीमाई इलाक़ों में भारतीय व्यापारियों को समस्या होगी। नहीं लगता है कि इससे भारत को कोई नुक़सान होगा। दोनों देशों के उन कामगारों को दिक़्क़त होगी जो एक दूसरे के देश में काम या व्यापार करते हैं।
  खबर है कि नेपाल सरकार का ये फ़ैसला कितना व्यावहारिक होगा? क्या इस फ़ैसले से लोग 100 से ऊपर के नोटों से लेनदेन बंद कर देंगे? इस सवाल के जवाब में कहते हैं, ये सवाल वाक़ई अहम है कि क्या सरकार का फ़ैसला प्रभावी होगा? वो भी तब जब ये नोट न लेने वाले को दिक़्क़त है और न देने वाले को।
  हालांकि कहते हैं कि भारतीय नोट पर पाबंदी लगाने की एक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि भी है। कहते हैं, 1999 में जब भारत के यात्री विमान को आतंकियों ने हाईजैक किया था तब भारत सरकार के आग्रह पर नेपाल ने 500 के नोट को बैन कर दिया था। खबर है कि भारत ने जब नोटबंदी की तो नेपाल में भी करोड़ों के 500 और 1000 के पुराने भारतीय नोट थे। अब तक इन पुराने नोटों का कोई समाधान नहीं निकल पाया है। ज़ाहिर है भारत के नोटबंदी के फ़ैसले से नेपाल को नुक़सान हुआ। लेकिन नेपाल ने अभी जो फ़ैसला लिया है, उससे इस पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
  खबर है कि नोटबंदी के कारण नेपाल और भूटान को काफ़ी नुक़सान हुआ था। भारतीय वित्त मंत्रालय ने अब तक दोनों देशों में मौजूद पुराने नोटों पर कुछ ठोस नहीं किया है।
   कहा जा रहा है कि नेपाल ने जो अब फ़ैसला लिया है इसकी आशंका पहले से ही थी। नेपाल और भूटान से भारत का कोई औपचारिक समझौता नहीं है कि नेपाल में भारतीय मुद्रा लेन-देन के लिए वैध होगी।
   खबर है कि नेपाल के बाज़ार में पारंपरिक रूप से भारतीय नोट स्वीकार्य हैं। भारत में भी नेपाली नागरिकों के लिए नौकरी और कारोबार करने की छूट है। भारत के फ़ेमा क़ानून यानी फ़ॉरन एक्सचेंज मैनेजमेंट एक्ट के अनुसार नेपाल जाने वाला व्यक्ति अपने साथ 25 हज़ार की नक़दी लेकर जा सकता है।
    खबर है कि नेपाल में 2014 तक 500 और 1000 के नोटों के लेन-देन पर पाबंदी थी। ऐसा भारत सरकार के आग्रह पर ही किया गया था। अगस्त 2015 में ये पाबंदी हटाई गई ।.
नवंबर 2016 में जब भारत ने 500 और 1000 के नोटों पर पाबंदी लगाई तो नेपाल और भूटान के केंद्रीय बैंकों ने पुराने नोटों को बदलने के लिए कहा. इसके लिए कई चरणों में बातचीत भी हुई लेकिन कोई औपचारिक फ़ैसला नहीं लिया जा सका।
   खबर है कि समस्या ये थी कि दोनों देशों में मौजूद पुराने नोटों को अवैध नहीं कहा जा सकता था और वैध क़रार देने के लिए कोई ठोस आधार भी नहीं था क्योंकि भारतीय नोटों के चलन को लेकर कोई औपचारिक समझौता नहीं था।

Friday, 14 December 2018

दुनिया का तीसरा रेल विश्वविद्यालय भारत में खुला

  देश के केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल आैर गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी शनिवार को देश के प्रथम रेल विश्वविद्यालय देश को समर्पित करेंगे। रूस आैर चीन के बाद यह दुनिया का ऐसा तीसरा विश्वविद्यालय है जो रेल के कामकाज से जुड़े अध्ययन में संलग्न है।

 खबर है कि रेल मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने यह जानकारी दी। खबर है कि गुजरात के वडोदरा में बने राष्ट्रीय रेल आैर परिवहन संस्थान (एनआरटीआई) ने इस साल सितंबर में दो पूर्ण आवासीय स्नातक पाठ्यक्रमों में 20 राज्यों के 103 छात्रों के पहले बैच को प्रवेश दिया था।
   खबर है कि विश्वविद्यालय ने दो स्नातक कार्यक्रम ट्रांसपोर्टेशन टेक्नोलॉजी में बीएससी आैर ट्रांसपोर्टेशन मैनेजमेंट में बीबीए शुरू किया है। विश्वविद्यालय का उद्देश्य ट्रांसपोर्ट एडं सिस्टम डिजाइन, ट्रांसपोर्ट सिस्टम्स इंजीनियरिंग, ट्रांसपोर्ट पॉलिसी एडं इकोनॉमिक्स जैसे क्षेत्रों में 2019-20 के शैक्षणिक सत्र से स्नातकोत्तर पाठयक्रम शुरू करना है।
   खबर है कि अधिकारी ने कहा, यह बहुत गर्व का विषय है कि इस तरह का एक अद्वितीय संस्थान, इस तरह के विविध पाठ्यक्रमों को लेकर 15 दिसंबर को देश को समर्पित किया जायेगा। 
  खबर है कि विश्वविद्यालय परिसर में 17 छात्राएं आैर 86 छात्र हैं। ये देश के 20 राज्यों से आये हैं। बीबीए- ट्रांसपोर्ट मैनेजमेंट में 41 आैर बीएससी- ट्रांसपोर्ट टेक्नोलॉजी 62 छात्र अध्ययनरत हैं।
   खबर है कि रेल मंत्रालय ने अगले पांच वर्षों तक इस परियोजना के लिए 421 करोड़ रूपये मंजूर किए हैं।

Wednesday, 12 December 2018

जब एक फल के चलते विमान से उतर गए यात्री...

   खबर है कि कभी सुना है कि विमान में बैठे यात्रियों ने विमान में जाकर यात्रा करने से मना कर दिया हो. जी हां, इंडोनेशिया में एक ऐसा ही वाकया हुआ जब यात्रियों ने एक फल से आ रही गंध के चलते यात्रा करने से मना कर दिया।

   यह मामला है इंडोनेशिया में सुमात्रा से जकार्ता जाने वाले श्री विजया एयरलाइंस के विमान का। इस विमान के कार्गो में ड्यूरिन नाम का फल लादा गया था।
   इस फल की गंध इतनी तेज थी कि यात्रियों ने फल से लदे विमान में यात्रा करने से ही मना कर दिया। खबर है कि दक्षिणपूर्व एशिया में ड्यूरिन एक मशहूर फल है। कुछ इलाकों में इसे "फलों का राजा" भी कहा जाता है।
   इस फल को पसंद करने वाले इसकी खुशबू और इसके क्रीमी स्वाद को पसंद करते हैं, वहीं कुछ लोगों की इसकी गंध नाली और गंदे जुर्राबों जैसे लगती है।

Tuesday, 11 December 2018

युगांडा में लोग पी रहे ऊंट का पेशाब !

  अफ्रीकी देश युगांडा के कारामोजा इलाके में लोग अलग अलग कारणों से ऊंट पालते हैं। ऊंटों से उन्हें सिर्फ दूध और मांस नहीं मिलता बल्कि इसके पेशाब को भी वो बहुत गुणकारी मानते हैं। 

  खबर है कि कारामोजा के लोगों का कहना है कि ऊंट का पेशाब न सिर्फ स्वस्थ रहने में मदद करता है बल्कि इसे पीने से एचआईवी एड्स जैसी बीमारियों का भी इलाज किया जा सकता है।
  हालांकि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने लोगों से ऊंट के पेशाब से दूर रहने को कहा है। उसके मुताबिक इससे कोई बीमारी ठीक नहीं होती, बल्कि उल्टा बीमारियां लगने का खतरा है। लेकिन अफ्रीका न्यूज की रिपोर्ट के मुताबिक कारामोजा में बहुत से लोग इसे दवाई के तौर पर ही देखते हैं। 
  खबर है कि एक स्थानीय निवासी ने कहा, इस मूत्र को आप दिन में तीन बार पीजिए. सुबह को, दोपहर को और शाम को। अगर फिर भी (एड्स) के लक्षण दिखाई देते हैं तो चार महीने तक इसे लेते रहिए। फिर डॉक्टर के पास जाइए। अगर आपको मुंह में दर्द होता है। चिंता मत करिए वो जल्द ही चला जाएगा।
   खबर है कि दूसरी तरफ डब्ल्यूएचओ का कहना है कि ऊंट का मूत्र पीने से सांस संबंध बीमारी मर्स हो सकती है। इसलिए इसे किसी भी हालत में नहीं पीना चाहिए। खबर है कि हालांकि युगांडा की सरकार की तरफ से इस बारे में कुछ नहीं कहा गया है। ऐसे में, सस्ता इलाज चाहने वाले लोगों को इसमें कहीं न कहीं एक उम्मीद दिखाई देती है।
   खबर है कि सऊदी अरब में भी 2015 में अधिकारियों ने ऊंट का पेशाब बेचने वाली एक दुकान को बंद कराया था। अधिकारियों को पता चला कि व्यक्ति ऊंट का नहीं बल्कि अपना पेशाब ही बोतलों में भर कर बेच रहा था। 
   खबर है कि सऊदी शहर अलकुनफुदा में जब अधिकारियों को उसकी दुकान पर छापा मारा तो वहां से पेशाब की 70 बोलतें मिलीं। 
  खबर है कि ऊंट का पेशाब पीने की परंपरा की शुरुआत इस्लामी धार्मिक किताब हदीस में एक उल्लेख से मानी जाती है। खबर है कि इसमें लिखा गया है, उल्क यानी उरैना कबीले के कुछ लोग मदीना आए तो यहां की जलवायु उन्हें रास नहीं आई।
 इसलिए उनसे (दूध वाले) ऊंटों के झुंड में जाने और उनका दूध और (दवाई के रूप में) पेशाब पीने को कहा। खबर है कि ऐसे ऊंट के पेशाब के गुणकारी होने की बात को जहां कई मुस्लिम विद्वान मानते हैं, वहीं इस पर सवाल उठाने वालों की भी कमी नहीं है।

Sunday, 9 December 2018

अब इंसान के शरीर में धड़केगा सुअर का दिल !

   मेडिकल साइंस अंग प्रत्यर्पण के लिए पूरी तरह से अंगदाताओं पर निर्भर करता है। शोध एवं खबर तो यही कहती है कि एक जर्मन सर्जन ने सूअर के दिल को लंगूर में सफलतापूर्वक प्रत्यर्पित कर जल्द ही सुअरों का दिल इंसानों में धड़काने की संभावना भी जगा दी है।

   शोध एवं खबर है कि जर्मन सर्जन ब्रूनो राइषार्ट ने लंगूर के शरीर में सूअर के दिल का सफलतापूर्वक प्रत्यर्पण किया है। अब यह उम्मीद जतायी जा रही है कि ऐसा प्रयोग इंसान के साथ भी आजमाया जाएगा, इंसान के शरीर में सूअर का दिल धड़कने की कितनी संभावना है। 
  खबर है कि पहली बार लंगूर के शरीर में सूअर के दिल का प्रत्यर्पण उम्मीद जगाता है कि यह इंसान के साथ भी संभव हो सकेगा. सवाल है कि जानवरों में सूअर को ही डोनर के रूप में क्यों चुना गया?
   खबर है कि यहां नैतिकता अहम है. हम सुअरों को लंबे समय से खा रहे हैं। इन्हें मारने को लेकर समाज में स्वीकार्यता भी है। एक सूअर हर चार महीने में बच्चे पैदा करने की स्थिति में होता है। इतना ही नहीं जन्म के छह महीने बाद ही सूअर प्रजनन के लिए पूरी तरह तैयार हो जाते हैं, वहीं सूअर का दिल इंसान के दिल से काफी मिलता-जुलता है।
   खबर है कि वैसे भी पिछले 40 सालों से इंसानों के शरीर में सूअर के हृदय के वॉल्व का इस्तेमाल तो हो ही रहा है। इस प्रक्रिया अंग लेने वाले के रूप में लंगूर को ही क्यों चुना गया? ये प्रशासन की मांग थी. उनका कहना था कि प्रत्यर्पण सूअर या कुत्ते के शरीर में नहीं किया जाना चाहिए। इसके बजाय किसी ऐसे को चुना जाना चाहिए जो जैविक रूप से इंसानों के करीब हो ताकि यह समझा जा सके कि इस तरह की प्रक्रिया इंसानों के साथ कितनी सफल होगी। 
  खबर है कि क्या इस प्रक्रिया में किसी भी साधारण सूअर को बतौर डोनर चुना जा सकता है? सूअर का दिल इंसान स्वीकार करें, इसके लिए पहले डोनर के अंग को इसके अनुकूल बनाना होगा. यही कारण है कि प्रत्यर्पण से पहले सूअर के दिल में अनुवांशिक रूप से बदलाव किया जाता है। इस तरह के प्रत्यर्पण से क्या फायदा होगा? 
   खबर है कि सबसे बड़ी बात तो यह है कि इससे अंगदाताओं की भारी कमी की समस्या में लाभ मिलेगा। क्या इसे सफलता का क्षण कहा जा सकता है? खबर है कि कुछ और भी सफलताएं मिलनी चाहिए. मुझे डर भी है। दरअसल अब हमें पैसा चाहिए, क्योंकि इस तरह के प्रयोग महंगे हैं। खबर है कि  हमें निवेशक चाहिए, और यूरोप में निवेशक खोज पाना बहुत मुश्किल है।
   जर्मन रिसर्च फाउंडेशन ने अब तक काफी वित्तीय सहायता दी है, लेकिन आगे की पायलट स्टडी के लिए हमें अतिरिक्त धन, साधन के साथ-साथ अस्पताल भी चाहिए। आपको कैसे इतना भरोसा है कि यह काम करेगा? आपको हमेशा खुद को अज्ञात चीजों की ओर ले जाना होता है. ऐसी आशंकाएं कम हैं कि यह काम नहीं करेगा।

Sunday, 4 November 2018

जलकौवों से मछली का शिकार !

    खबर है कि कौये कर रहे मछलियों का शिकार। काली अंधेरी रात है और जापान के गिफू में नदी किनारे आग जल रही है। मुट्ठी भर लोग जलकौवे के सहारे मछली का शिकार करने की तैयारी में हैं।

   मछली पकड़ने की यह खास कला है जो 1300 साल से चली आ रही है। पारंपरिक कपड़ो में जापान के इन लोगों को देख कर लगता है कि किसी और युग से आए हैं। डोरी से बंधे अपने जलकौवों को ये लोग कठपुतली की तरह संभाले हुए हैं।
   इनके पेशे को स्थानीय भाषा में "उकाई" कहा जाता है। मछली पकड़ने वाले ये लोग "उशो" कहलाते हैं। उकाई के लिए असाधारण धैर्य की जरूरत होती है। मछली का शिकार सूरज डूबने के बाद शुरू होता है। उशो अपनी नावों पर मशालें जला कर चलते हैं। इनकी रोशनी छोटी ट्राउट मछलियों को पानी की सतह की तरफ आकर्षित करती है। 
   यह कला कभी यूरोप और दूसरी जगहों पर भी थी लेकिन अब केवल चीन और जापान में ही नजर आती है। खबर है कि ये जलकौवे जापान के इबाराकी प्रांत से प्रवास पर यहां आते हैं। इसी दौरान इन्हें पकड़ कर रख लिया जाता है और फिर इन्हें ट्रेनिंग दी जाती है। एक जलकौवे को तैयार करने में तीन साल का वक्त लगता है। इनके सहारे मछली का शिकार मई से लेकर अक्टूबर तक होता है लेकिन पूरे साल इनकी देखभाल एक जैसी करनी पड़ती है।
    46 साल के शुजी सुगियामा पश्चिमी जर्मनी के गिफु में सबसे युवा "उशो" हैं। वे उन नौ लोगो में शामिल हैं, जिनके पास इसका शाही लाइसेंस है। शुजी रात के शिकार की तैयारी में हैं। उन्हें यह कला अपने पिता से विरासत में मिली। पांच पीढ़ियों से उनका परिवार मछली पकड़ने की अनोखी कला के साथ जी रहा है। खबर है कि जापान और दुनिया के कई और देशों के नदी किनारे बसे गांवों और शहरों में यह बहुत आम पेशा हुआ करता था। 
   सदियां गुजरने के साथ धीरे धीरे यह घटता गया। अब तो बस सैलानियों के आकर्षण और देश की विरासत को बचाने के नाम पर इसे बड़ी कोशिशों से जिंदा रखा गया है। खबर है कि जलकौवों को आपस में रस्सी से बांध दिया जाता है और साथ ही उनकी गर्दन में भी रस्सी बंधी होती है, जो शिकार को उन्हें खाने नहीं देती। जलकौवे शिकार लेकर मालिक के पास पहुंचते हैं। वह उन्हें रख कर पक्षियों को वापस शिकार पर भेज देता है। नए जलकौवों को अनुभवी पक्षियों के साथ रख कर शिकार की ट्रेनिंग दी जाती है।
   खबर है कि मछली पकड़ने का यह तरीका सदियों पुराना है लेकिन शाही परिवार से उशो के लिए लाइसेंस देने की शुरुआत 1890 में हुई। तब तक यह लोक कला लुप्त होने लगी थी। इनमें से नौ के पास शाही लाइसेंस है। साल में आठ बार ये शाही महल के लिए शिकार करने आते हैं और इन्हें इस काम के लिए 8,000 येन यानी करीब 71 डॉलर का मासिक वेतन मिलता है।
   मछली पकड़ने का यह तरीका कारोबारी रूप से फायदेमंद नहीं है और उशो को स्थानीय प्रशासन की सब्सिडी पर निर्भर रहना पड़ता है। हर साल एक लाख से ज्यादा लोग इसे देखने आते हैं और यह संख्या बढ़ रही है। स्थानीय प्रशासन को उम्मीद है कि एक दिन इसे यूनेस्को की विश्व विरासतों में शामिल किया जाएगा।

Friday, 26 October 2018

अब डाक्टर नहीं, संगीत से करें इलाज !

   संगीत की ताकत को पहचानें। जी हां, संगीत की अपार क्षमताओं को समय के साथ जानना-पहचानना आवश्यक है। 

   अब डाक्टर नहीं, संगीत से करें इलाज! जी हां, कम से कम शोध एवं अध्ययन तो इसी तरफ इशारा कर रहे हैं। गुजरे जमानें को देखें तो लोरी सुन कर बच्चे सो जाते थे। विदेशों में गर्भवती महिलाओं को सॉफ्ट म्यूजिक सुनने की हिदायत दी जाती है, ताकि कोख में भी बच्चे को आराम मिल सके।
  . संगीत के इस असर को अब समय से पहले जन्मे बच्चों के इलाज में भी इस्तेमाल किया जा रहा है। खबर है कि ज्यूरिख की यूनिवर्सिटी में तय समय से तीन महीने पहले पैदा हुई एक बच्ची मथिल्डा पर रिसर्च चल रही हैं।
   रिसर्चर जानना चाहते हैं कि क्या संगीत उसके विकास में मदद कर सकता है. हफ्ते में तीन बार फ्रीडरिके हास्लेबेक मथिल्डा के कान में गुनगुनाती हैं. वह जानना चाहती हैं कि क्या समय से पहले जन्मे बच्चों के दिमाग के विकास पर संगीत का असर सकारात्मक होता है।
   खबर है कि फ्रीडरिके हास्लेबेक रिसर्च के बारे में बताती हैं, "हमारी थ्योरी बहुत से अध्ययनों पर आधारित हैं जो दिखाते हैं कि संगीत कैसे हमारे मस्तिष्क के कई हिस्सों को एक साथ उत्तेजित करता है। इसे म्यूजिकल लर्निंग कहा जाता है जो जन्म से पहले ही शुरू हो जाती है। इसलिए प्रीमैच्योर बच्चों पर इसका असर होना चाहिए।
    खबर है कि जब फ्रीडरिके गुनगुनाती हैं तो दिखता है कि इससे बच्ची को सुकून मिलता है, वह हाथ उठाती है, और आंखें खोलती है। खबर है कि रिसर्चर अपनी थ्योरी को 60 बच्चों पर परख रहे हैं। 30 बच्चों के साथ म्यूजिक थेरेपी और 30 बच्चों के साथ बिना म्यूजिक वाली थेरेपी।
    खबर है कि एक और बच्चे के सामने भी फ्रीडरिके हास्लेबेक नियमित रूप से गाती और गुनगुनाती हैं। एमआरटी स्कैन से रिसर्चर देख सकते हैं कि समय से पहले जन्मे बच्चे के मस्तिष्क का विकास कैसे हो रहा है। शुरुआती नतीजे दिखाते हैं कि शिशुओं के मस्तिष्क विकास पर संगीत का असर होता है, लेकिन यह काम कैसे करता है? न्यूरोसाइंटिस्ट लुत्स यैंके बीते 25 साल से इस विषय पर काम कर रहे हैं। वह बताते हैं, "मेरी दिलचस्पी इसमें है कि समय के साथ मस्तिष्क की गतिविधि इतनी तेजी से कैसे विकसित होती है और किस हद तक संगीत को लेकर हमारा निजी अनुभव इस गतिविधि को बदल देता है। उम्मीद है हमें कुछ ऐसी जानकारियां मिलेंगी जो आगे चल कर बीमारियों के इलाज में काम आएंगी."।
   खबर है कि रिसर्च के दौरान दिमाग में चलने वाली गतिविधि को मॉनी़टर पर देखा जा सकता है। साउंड प्रूफ कैबिन में एक महिला को संगीतकार विवाल्दी की धुन फोर सीजंस सुनाई गई। इस धुन को सुनकर लुत्स यैंके को बॉस्टन में गुजारे अपने पतझड़ के दिन याद आ गए। जंगल में लंबी सैर पर उन्हें यह धुन सुननी पसंद है। वह देखना चाहते हैं कि जिन लोगों का इस धुन के साथ भावनात्मक रिश्ता नहीं है, उन पर यह कैसा असर करती है।
    खबर है कि रिकॉर्ड किए गए इलेक्ट्रिक सिग्नल के आधार पर यैंके मॉनीटर में मस्तिष्क की गतिविधि को देख सकते हैं। खबर है कि यैंके ने बताया, "अगर मैं इसकी तुलना अपने दिमाग की गतिविधि से करूं तो कुछ समानताएं हैं, लेकिन कुछ अंतर भी हैं। मिसाल के तौर पर, दोनों ही मामलों में न सिर्फ ऑडिटोरी कॉरटेक्स यानी श्रवण संबंधी हिस्से सक्रिय हैं, बल्कि वे हिस्से भी सक्रिय हैं जिनकी आम तौर पर ध्वनि को समझने में भूमिका नहीं होती, लेकिन मेरे मामले में यह ज्यादा स्पष्ट है."।
   संगीत सुनने का हमारे दिमाग पर स्पष्ट असर होता है तो फिर संगीत बजाने का क्या असर होगा। यैंके संगीतकारों पर किए अपने एक शोध में इसका सवाल का जवाब तलाश चुके हैं और उन्होंने पाया कि साज बजाने से हमारी जानने समझने की क्षमता बेहतर होती है।

Sunday, 14 October 2018

यहां सिर्फ महिलाएं ही भर सकती हैं कश

   बर्लिन में सिर्फ महिलाओं को आजादी हासिल है! जी हां, चौकिए मत। जर्मनी की राजधानी बर्लिन का एक रेस्टोरेंट- हुक्का बार ऐसा है, जहां सिर्फ महिलाओं को ही प्रवेश मिलता है।

    पुरुषों का प्रवेश प्रतिबंधित है। सख्ती भी गजब की है। क्या मजाल कि कोई पुरुष यहां पा जाए। इस रेस्टोरेंट- हुक्का बार के मालिक को भी प्रवेश की इजाजत नहीं है।
   जर्मनी की राजधानी बर्लिन में एक हुक्का बार ऐसा भी है, जहां पुरुषों की एंट्री ही बैन है।
   इस हुक्का बार में सिर्फ महिलाओं को कश लगाने की इजाजत है। नियम इतना कड़ा है कि बार मालिक भी अंदर नहीं जाता। पूरा मैनेजमेंट बाहर से वॉकी-टॉकी पर संभाला जाता है।

Tuesday, 9 October 2018

बड़ा खतरनाक यह प्लास्टिक कचरा

   विशेषज्ञों की मानें तो पांच मिलीमीटर से कम परिधि वाले प्लास्टिक के कणों को माइक्रोप्लास्टिक कहा जाता है। 

  खबर है कि प्लास्टिक के ये बारीक कण हर जगह मौजूद हैं। सुबह सुबह टूथपेस्ट के साथ ही माइक्रोप्लास्टिक सीधे इंसान के मुंह में पहुंचता है।
   विशेषज्ञों की मानें तो कॉस्मेटिक्स में.... मेकअप के सामान, क्रीम, क्लीनजिंग मिल्क और टोनर में भी माइक्रोप्लास्टिक मौजूद होता है। घर के सीवेज सिस्टम से बहता हुआ यह माइक्रोप्लास्टिक नदियों और सागरों तक पहुंचता है। 
   विशेषज्ञों की मानें तो मछलियों में....पानी में घुला माइक्रोप्लास्टिक मछलियों के पेट तक पहुंचता है। मछलियों के साथ ही दूसरे सी खाने में भी माइक्रोप्लास्टिक मिल रहा है। खबर है कि 2017 की एक रिपोर्ट के मुताबिक इंडोनेशिया और कैलिफोर्निया की 25 फीसदी समुद्री मछलियों में प्लास्टिक मिला। आहार चक्र के जरिए यह इंसान तक पहुंचता है।
   विशेषज्ञों की मानें तो नमक में.... दुनिया में ज्यादातर नमक की सप्लाई समुद्री पानी से होती है। समुद्रों में बुरी तरह प्लास्टिक घुल चुका है। हर साल 1.2 करोड़ टन प्लास्टिक महासागरों तक पहुंच रहा है। नमक के साथ यह माइक्रोप्लास्टिक हर किसी की रसोई तक पहुंचता है।
    विशेषज्ञों की मानें तो पीने के पानी में.... दुनिया भर में नल के जरिए सप्लाई होने वाले पीने के पानी के 80 फीसदी नमूनों में माइक्रोप्लास्टिक मिला है। वैज्ञानिकों के मुताबिक नल के पानी में प्लास्टिक का इस कदर मिलना बताता है कि प्लास्टिक हर जगह घुस चुका है। खबर है कि इसी पानी का इस्तेमाल खाना बनाने और मवेशियों की प्यास बुझाने के लिए भी किया जाता है।
   विशेषज्ञों की मानें तो कपड़ों में.... सिथेंटिक टेक्सटाइल से बने कपड़ों को जब भी धोया जाता है, तब उनसे काफी ज्यादा माइक्रोप्लास्टिक निकलता है। रिसर्च में पता चला है कि छह किलोग्राम कपड़ों को धोने पर 7,00,000 से ज्यादा माइक्रोप्लास्टिक फाइबर निकलते हैं। महासागरों में 35 फीसदी माइक्रोप्लास्टिक सिथेंटिक टेक्साटाइल से ही पहुंचता है।
   विशेषज्ञों की मानें तो शहद में भी... पानी और जलीय जीवों के साथ ही वैज्ञानिकों को शहद जैसी चीजों में भी माइक्रोप्लास्टिक मिला है। हाल ही यूरोपीय संघ के प्लास्टिक के खिलाफ बनाई गई रणनीति में यह बात साफ कही गई कि शहद में माइक्रोप्लास्टिक की अच्छी खासी मात्रा मौजूद है।
   विशेषज्ञों की मानें तो टायर बने मुसीबत.... पर्यावरण में सबसे ज्यादा माइक्रोप्लास्टिक टायरों के जरिये घुलता है। सड़क पर घिसते टायर बहुत ही बारीक माइक्रोप्लास्टिक छोड़ते हैं। पानी और हवा के संपर्क में आते ही यह हर जगह पहुंच जाता है।

Friday, 5 October 2018

अब बिना ड्राइवर के चलेंगी फ्रांस की ट्रेनें !

   फ्रांस में अब ड्राइवर लेस ट्रेनें चलेंगी। जी हां, फ्रांस इस दिशा में तेजी से काम कर रहा है। क्या आप जानते हैं कि पेरिस की मेट्रो ट्रेनें बिना ड्राइवर के चलती हैं? अब फ्रांस पूरे रेल नेटवर्क को ड्राइवर फ्री करने जा रहा है। अगले दशक में पश्चिमी यूरोप का रेल नेटवर्क भी पूरी तरह ड्राइवरलेस हो सकता है।

   फ्रांस की सरकारी रेलवे कंपनी एसएनसीएफ ने लंबी दूरी की यात्री व मालगाड़ियों को चालक रहित बनाने का एलान किया है। कंपनी का कहना है कि 2023 तक रेल नेटवर्क को ड्राइवर फ्री बना दिया जाएगा।
  इसके लिए 5.7 करोड़ यूरो का बजट तय किया गया है। पहले चरण में खुद चलने वाली मालगाड़ियों को उतारा जाएगा. इस प्रोजेक्ट में विमान निर्माता कंपनी एयरबस और जापानी इलेक्ट्रॉनिक कंपनी हिटाची भी शामिल हैं। 
  खबर है कि दूसरे चरण में पैसेंजर ट्रेनों को ड्राइवरलेस बनाया जाएगा। यह प्रोजेक्ट बमबार्डियर, बॉश और थालिस जैसी कंपनियों के साथ चलेगा। एसएनसीएफ के मुताबिक पूरे प्रोजेक्ट को लेकर जर्मनी की रेलवे कंपनी डॉयचे बान से भी बातचीत की जा रही है। इस बातचीत के जरिए पूरे यूरोप में चालक रहित ट्रेनों का नेटवर्क तैयार करने के लिए जरूरी मानकों पर चर्चा हो रही है।
  खबर है कि पूरी तरह स्वचालित ट्रेनों के प्रोजेक्ट के डायरेक्टर लुक लारोशे के मुताबिक, "इंसान और तकनीक से जुड़े मुद्दों पर ध्यान दिया जा रहा है। हमारे पार्टनर तमाम क्षेत्रों से आते हैं और उनके साथ सामूहिक बुद्धि और दक्षता के जरिए हम आगे बढ़ेंगे."।
  जर्मनी कंपनी बॉश की फ्रांसीसी शाखा बॉश फ्रांस के प्रेसिडेंट हाइको कारी ने भी प्रोजेक्ट की पुष्टि की है, "मोबिलिटी के क्षेत्र में अच्छे समाधानों का नेतृत्व करने वाला बॉश ग्रुप इस समूह का हिस्सा बनकर काफी खुश है, हम अपना योगदान देंगे, तकनीक की बदौलत हम स्वचालित ट्रेनों के नए और अहम चरण में दाखिल हो रहे हैं."।
   एसएनसीएफ का दावा है कि ड्राइवर रहित ट्रेनों से पूरे रेल नेटवर्क को फायदा होगा. कंपनी के मुताबिक इस सिस्टम से ट्रेनें समय से चलेंगी, रेलवे ट्रैफिक ज्यादा स्मार्ट बनेगा और ईंधन की खपत भी कम होगी। ड्राइवरों के शिफ्ट में काम करने की वजह से यूरोप के रेल नेटवर्क को कई बार देरी का सामना करना पड़ता है।
   फ्रांसीसी रेलवे कंपनी के पास इस वक्त 17,000 ट्रेनें हैं। इनका इस्तेमाल हर दिन 40 लाख यात्री करते हैं. लेकिन एसएनसीएफ को हर साल तीन अरब यूरो का घाटा हो रहा है। 2017 और 2018 में 1,48,000 कर्मचारियों वाली कंपनी ने कई बार हड़तालों का सामना किया।
   खबर है कि बदलावों को फ्रांस सरकार की हरी झंडी मिली हुई है। फ्रांस के वित्त मंत्री ब्रुनो ले मैर पहले ही कह चुके हैं, "तीस साल तक हमने एसएनसीएफ को जरूरी बदलावों से बचाए रखा और इन्हीं तीस बरसों में हमने इसकी सेवाओं को लगातार खराब होते देखा हम इस तरह नहीं चल सकते। हम दीवार से टकराने जा रहे हैं."। इस वक्त फ्रांस की सरकार एसएनसीएफ को हर साल 14 अरब यूरो की सब्सिडी देती है। नई योजना के मुताबिक 2020 में पहली सेमी ऑटोमैटिक ट्रेन चलेगी और तीन साल बाद पूरी तरह स्वचालित ट्रेनें चलने लगेंगी।

Tuesday, 2 October 2018

नशा : भारत छोड़ो, अब बर्दास्त नहीं

  नई दिल्ली। नशा मुक्त भारत का संकल्प...। जी हां, गायत्री परिवार के सदस्यों ने भारत को नशा मुक्त करने-कराने के संकल्प के साथ मंगलवार को नई दिल्ली के जंतर-मंतर, पार्लियामेंट स्ट्रीट पर संकल्पित आवाज बुलंद की।

   नशा मुक्त भारत की कल्पना लेकर मंगलवार को नशा भारत छोड़ो अभियान का देश व्यापी अभियान प्रारम्भ किया गया। खास यह कि देश के 400 जिलों में मंगलवार को 600 स्थानों पर व्यसन मुक्त भारत के लिए जनजागरण अभियान के तहत कार्यक्रम आयोजित किये गये।

Sunday, 30 September 2018

खुद तय करें अपनी लम्बी उम्र !

   अगर आप लंबी उम्र की कामना करते हैं, तो जानिए कि वे कौन से कारण हैं, जो तय करते हैं कि आप का जीवन काल क्या होगा। रिसर्च इन पांच कारणों के बारे में बताती है। अध्ययन एवं शोध है कि... 

   डीएनए : डीएनए लंबी उम्र के लिए अच्छे जीन्स का होना जरूरी है। जीन्स हमें अपने माता पिता से मिलते हैं। अकसर देखा गया है कि जो मां बाप लंबा जीते हैं। उनके बच्चों की उम्र भी लंबी होती है। इसकी वजह हमारे डीएनए में छिपी है। सही जीन के होने से हमारी जीवन प्रत्याशा बढ़ सकती है। हमारी उम्र पर इनका 25 से 30 फीसदी तक असर होता है।
   लिंग: महिलाएं आम तौर पर पुरुषों से लंबा जीती हैं। ऐसा क्यों है, इसका जवाब शायद हमारे क्रोमोजोम में छिपा है। महिलाओं में दो एक्स क्रोमोजोम होते हैं। जबकि पुरुषों में एक एक्स और एक वाय। अगर वाय में कुछ गड़बड़ी हो जाए, तो एक्स कोई मदद नहीं कर सकता। इसलिए पुरुषों में जीन डिफेक्ट अधिक देखे जाते हैं।
   खान पान: अच्छी सेहत के लिए सही तरह का खाना बेहद जरूरी है। जैसे कि मेडिटरेनियन डाइट यानी भूमध्यसागर के इलाकों में रहने वाले लोगों का खान पान. ऑलिव ऑयल, सब्जियां और सलाद खाने वालों की उम्र लंबी होती है। साथ ही, दिन भर में कितनी कैलोरी लेते हैं, ये भी उम्र को निर्धारित करता है। सही आहार के जरिए अपने वजन पर काबू करने वाला लंबा जीता है।
   रवैया: अमेरिका में हुए एक शोध में देखा गया कि जो लोग अपनी बढ़ती उम्र को ले कर सकारात्मक रवैया रखते हैं, वे लंबा जी पाते हैं। रिसर्च के अनुसार रिटायर होने के बाद आराम करने वालों की तुलना में वो लोग जो साठ-पैंसठ की उम्र के बाद भी खुद को व्यस्त रखते हैं, वे चार साल लंबा जीते हैं। यानी बुढ़ापे में व्यस्त रहने से उम्र लंबी होती है।
   कसरत: नियमित रूप से कसरत करना और चलते फिरते रहना सेहत और उम्र दोनों के लिए अच्छा है, जो लोग जॉगिंग करते रहे हैं। उसका फायदा उन्हें तब भी मिलता है, जब वे बुढ़ापे में दौड़ना भागना बंद कर देते हैं। कसरत करने से शरीर की कोशिकाओं में ऐसे बदलाव होते हैं, जो कसरत करना छोड़ने पर भी बने रहते हैं। कसरत करने से शरीर लंबी उम्र के लिए तैयार होता है।

Friday, 28 September 2018

नीदरलैण्ड में इंसान से कहीं अधिक साइकिल !

   नीदरलैण्ड में इंसानों से कहीं अधिक साइकलें हैं। जिससे कई बार कानून व्यवस्था का संकट खड़ा हो जाता है। खास यह कि अमीर व्यक्ति भी शानदार कारों की श्रंखला रखने के बजाय बेहतरीन साइकिल रखने की लालसा रखता है। खास तौर से नीदरलैण्ड साइकिल की अधिकता से होने वाली दिक्कतों से जूझ रहा है। 

   नीदरलैण्ड का एम्सटर्डम एक ऐसा शहर है जहां इंसान से ज्यादा साइकिलें हैं। नीदरलैंड्स की राजधानी में सात लाख की आबादी है लेकिन साइकिलों की संख्या दस लाख है। साइकिल खड़ी करने की जगहें भरी हुईं हैं। सड़कें गैरकानूनी ढंग से खड़ी साइकिलों से पटी पड़ी हैं। साइकिल चोरी आम बात है।
   खबर है कि एम्सटर्डम में साइकिल खड़ी करना सिरदर्द साबित हो सकता है। रास्ते संकरे हैं साथ ही साथ साइकिल पार्किंग की जगह भी सीमित है। एम्स्टर्डम सेंट्रल स्टेशन के बाहर साइकिल पड़ाव में 2500 साइकिलें निशुल्क खड़ी की जा सकती हैं, लेकिन दफ्तर और कॉलेज जाने के समय ये पड़ाव कुछ मिनटों में ही भर जाता है। तीन मंजिल वाली इस पार्किंग में साइकिल सवार को पार्किंग के लिए कभी ऊपर तो कभी नीचे भागना पड़ता है।
   खबर है कि आधिकारिक पड़ाव में नहीं खड़ी की गईं साइकिलें हटाई जा सकती हैं. साइकिल डिपो के मैनेजर पीटर बरखोउट कहते हैं, अगर आप साइकिल नहीं हटाते हैं तो शहर में जाम लग सकता है। शहर आने-जाने लायक नहीं रहेगा. साल 2012 में साइकिल डिपो में 65 हजार से ज्यादा साइकिलें खड़ी की गई थी।
   खबर है कि साइकिल डिपो के कर्मचारी गैरकानूनी तरीके से खड़ी की गईं साइकिलों को मुख्य स्टेशन वाले इलाके से हटाते हैं। गैरकानूनी तरीके से खड़ी की गईं साइकिलों के ताले तोड़े जाते हैं और फिर उन्हें डिपो में लाया जाता है। इस डिपो में एक समय में 12 हजार से लेकर 17 हजार तक साइकिलें होती हैं।
   खबर है कि इन साइकिलों को छांटने के बाद कंप्यूटर में इनकी जानकारी दर्ज की जाएगी। साइकिलों के रंग, साइकिल की कंपनी का नाम, सीरियल नंबर और साइकिल कहां से हटाई गई जैसी अहम जानकारियां होती है। साइकिल को हटाए जाने वाले दिन के हिसाब से उन पर एक स्टीकर लगाया जाता है जिसमें एक खास नंबर होता है।
    खबर है कि लिग्हार्ट कहती हैं, "साइकिल की चोरी बहुत परेशान करने वाली थी। साइकिल खड़ी करने की जगह नहीं थी। लिग्हार्ट ने डिपो की हॉटलाइन सेवा को फोन किया और अपनी साइकिल खोजने में कामयाब हुई। डिपो साइकिल मालिकों से मामूली फीस वसूल करता है। फिलीप बोंके कहते हैं उनकी साइकिल जब हटाई गई थी तो उनका दिन खराब हो गया था। बोंके के मुताबिक गैरकानूनी तरीके से लगी साइकिलों को हटाना एक अच्छा काम है। इससे कुछ और लोगों के लिए पार्किंग की जगह बन जाती है।
    खबर है कि साइकिल डिपो के मैनेजर बरखोउत कहते हैं, "हम साइकिल को उसके मालिक को वापस करना चाहते हैं। ये हमारा मुख्य व्यापार है. यहां तीन महीने तक साइकिलें रखी जाती हैं। जिन साइकिलों पर दावा नहीं होता, उन्हें नीलाम कर दिया जाता है। एम्स्टर्डम साइकिल चोरी के लिए कुख्यात है।

Thursday, 27 September 2018

अब विदेशियों के लिए जर्मनी में नौकरी पाना आसान

   खबर है कि जर्मन सरकार एक नए इमिग्रेशन कानून पर काम कर रही है ताकि देश में काम करने वाले लोगों की किल्लत से निपटा जा सके।

  खबर है कि नए कानून का मकसद यूरोपीय संघ के बाहर के देशों से दक्ष कामगारों को आकर्षित करना है। खबर है कि जर्मनी की अर्थव्यवस्था मजबूत है। बेरोजगारी दर 3.5 प्रतिशत से भी कम है लेकिन देश में कई उद्योग कामगारों की कमी से जूझ रहे हैं। कारखानों में काम करने के लिए लोग नहीं है। ऐसे में विदेशों से कामगार बुलाने की मांग उठ रही है।
   खबर है कि कामगारों की किल्लत को देखते हुए सरकार ऐसा कानून बनाना चाहती है जिसमें कंपनियों से यह नहीं कहा जाएगा कि वे नियुक्तियां करते वक्त जर्मन नागरिकों को प्राथमिकता दें। यानी जर्मन कंपनी यूरोप के बाहर के देशों के लोगों को आराम से नौकरी पर रख पाएंगी।
  खबर है कि जर्मनी के सत्ताधारी गठबंधन में शामिल पार्टियों सीडीयू, सीएसयू और एसपीडी के बीच नए कानून को लेकर एक दस्तावेज पर सहमति हुई है। इसके लिए जर्मनी के श्रम, अर्थव्यवस्था और गृह मंत्रालयों से भी हरी झंडी ले ली गई है।
   खबर है कि जिन विदेशी स्नातकों और कामगारों के पास पेशेवर ट्रेनिंग होगी, उन्हें कुछ समय के लिए जर्मनी आने की अनुमति दी जाएगी ताकि वे अपने लिए काम तलाश सकें. लेकिन इसके लिए कुछ योग्यताओं और भाषा संबंधी जरूरतों को पूरा करना होगा।
   खबर है कि दस्तावेज के अनुसार इन लोगों को इस अवधि के दौरान सामाजिक कल्याण भत्ता नहीं मिलेगा, लेकिन उन्हें ऐसी नौकरियां करने की भी इजाजत दी जाएगी, जिनके लिए वे ओवर क्लालिफाइड हैं। ताकि वे कुछ पैसे कमा सकें।
   खबर है कि जर्मनी में क्वालिफिकेशन के मूल्यांकन की प्रक्रिया को तेज और आसान बनाया जाएगा। सहमति पत्र कहता है कि कुछ चुनिंदा देशों में खास तौर से मुहिम चलाए जाने की योजना है। ताकि वहां से युवा और दक्ष कामगारों को जर्मनी की तरफ आकर्षित किया जा सके।
   खबर है कि वैसे जर्मनी में मौजूदा इमिग्रेशन सिस्टम भी सबसे उदार सिस्टमों में से एक माना जाता है। खबर है कि ओईसीडी संगठन के मुताबिक, अमेरिका के बाद जर्मनी विदेशियों के लिए सबसे लोकप्रिय देश है। यूरोपीय संघ के कामगार तो यहां आसानी से रह और काम कर सकते हैं।
   खबर है कि जर्मनी में ब्लू कार्ड सिस्टम है जो कम से कम 50,800 यूरो के सालाना वेतन पर विदेशों से अकादमिक और पेशेवर क्षेत्र से जुड़े लोगों को भर्ती की प्रक्रिया को आसान बनाता है। अब वेतन की इस सीमा को और नीचे लाने की कोशिश हो रही है।

Tuesday, 18 September 2018

गायों की सौंदर्य प्रतियोगिता

   खूबसूरत दिखने के लिए मेकअप सिर्फ इंसानों के लिए रिजर्व नहीं है। जर्मनी में गायों की भी सौंदर्य प्रतियोगिता होती है। 

   खबर है कि जर्मनी में 'मिस काउ' चुनी जाती है। जर्मनी में 42 लाख दुधारू गायें हैं। इनमें से 60 फीसदी होल्स्टाइन प्रजाति की है। जर्मनी में गायों की भी 'मिस काउ' प्रतियोगिता होती है। इस गौ सुंदरी को शूटिंग से पहले आइना दिखाया जाता है। 
   प्रतियोगिता के लिये गायों को साफ सुथरा रखना पड़ता है। एटेंडेंट गायों को प्रतियोगिता में भेजने से पहले उनकी साफ सफाई करती हैं।
   बारीकी से सफाई के अलावा उनके लिये हेयर ड्रेसर भी होते हैं। कंटेस्टेंट गायें अपने अपने केयरटेकरों के साथ खड़ी होती है। जज बहुत ही बारीकी से हर पहलू की जांच करते हैं। मिस प्रतियोगिता में जीत की खुशी होती है।

महिला कर्मचारियों को सैनिटरी पैड

   महिला स्वास्थ्य एवं स्वच्छता के लिए अपनी पहल के माध्यम से ‘स्त्री स्वाभिमान’ नामक सामान्य सेवा केंद्र ग्रामीण इलाकों में किशोर महिलाओं और लड़कियों के घरों के पास सस्ती और सुलभ सैनिटरी उत्पादों को उपलब्ध कराने के लिए एक टिकाऊ मॉडल बनाने का प्रयास कर रहा है।

   यह पहल जागरूकता और उन महिला उद्यमियों द्वारा व्यक्तिगत स्तर पर चलाया जा रहा है जो स्वयं सैनिटरी नैपकिन का उत्पादन और विपणन करती हैं। यह पहल महिलाओं और लड़कियों को विकास के अवसरों तक पहुंचने में लिंग-भेद को कम करने में अपनी भूमिका निभाना चाहता है जो अफसोसजनक तरीके से शिक्षा, स्वास्थ्य और कार्यबल में भागीदारी को हासिल करने में बाधक है।
   महिलाओं के स्वास्थ्य एवं स्वच्छता के लिए ‘स्त्री स्वाभिमान’ पहल के तहत महिला उद्यमी अपने समुदायों में महिलाओं एवं लड़कियों के सशक्तिकरण के प्रतीक बन चुकी हैं। अब तक इन महिला उद्यमियों द्वारा 278 सैनिटरी नैपकिन लघु विनिर्माण इकाइयों को सफलतापूर्वक स्थापित किया गया है। 
  इन इकाइयों द्वारा उत्पादित सैनिटरी नैपकिन न केवल कम आय वाले समुदायों की आवश्यकताओं के अनुरूप हैं बल्कि स्वाभाविक तरीके से नष्ट होने वाले और पर्यावरण के अनुकूल हैं। इसके अलावा ये ग्रामीण समुदायों के लिए आसानी से उपलब्ध हैं।
    महिलाओं के स्वास्थ्य और स्वच्छता को बढ़ावा देने के अलावा यह पहल ग्रामीण महिलाओं को रोजगार के अवसर भी प्रदान करती है क्योंकि प्रत्येक इकाई में 5 से 7 महिलाओं को रोजगार मिलता है। महिलाओं के स्वास्थ्य और स्वच्छता के उद्देश्य सीएससी एसपीवी ने इलेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के महिला विश्रामशाला में सैनिटरी नैपकिन बिक्री मशीनें लगाई हैं।
   इससे मंत्रालय की महिला कर्मचारियों को सैनिटरी पैड उपलब्ध हो सकेगा। इस पहल की सफलता और सबक के आधार पर अन्य सार्वजनिक और निजी संस्थानों में भी इसी तरह की सैनिटरी नैपकिन मशीनें लगाई जाएंगी।

Monday, 17 September 2018

खटमलों को खोज रहे कुत्ते

   खबर है कि खटमल की समस्या जर्मनी में भी है, पर इसे लाते हैं छुट्टी बिताकर यात्रा से लौटने वाले लोग. इसलिए 2018 से फ्रैंकफर्ट के हवाई अड्डे पर अब कुत्ते लोगों के सामान जांच रहे हैं ताकि पता चले कि कहीं उसमें खटमल तो नहीं.

   खबर है कि फ्रैंकफर्ट एयरपोर्ट चलाने वाली कंपनी फ्रापोर्ट की इस टीम में चार पुरुष, एक महिला और कई कुत्ते हैं. वे सुबह साढ़े छह बजे से रात दस बजे तक काम करते हैं. इसी समय में फ्रैंकफर्ट हवाईअड्डे पर विमान उतरते हैं. 
   खबर है कि हानसेन कहते हैं कि हर तीसरी या चौथी ड्यूटी में सामान में खटमल मिल जाता है. ऐसा नहीं है कि लोगों पर सामान चेक करवाने के लिए दबाव डाला जाता हो. मन हो तो जांच करवाइए, नहीं है तो कोई बात नहीं. इसके लिए ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन करानी होती है. पहले तीन बैग के लिए 105 यूरो की फीस लगती है और हर अगले नग के लिए 30 यूरो.

अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर स्मार्ट बाड़

   केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने जम्मू में भारत-पाक अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर स्मार्ट बाड़ के लिए दो प्रायोगिक परियोजनाओं का उद्घाटन किया।

   इस अवसर पर राजनाथ सिंह ने कहा कि सरकार ने देश की सीमाओं की और अधिक सुरक्षा के लिए कई कदम उठाए हैं। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार सीमा की सुरक्षा-व्यवस्था को और मजबूत एवं प्रभावी बनाने के लिए तकनीकी का अधिकतम इस्तेमाल करती रही है।
  उन्होंने कहा कि सीमावर्ती राज्यों की सुरक्षा से जुड़े मुद्दों से निपटने के लिए सीमा पर स्मार्ट बाड़ एक तकनीकी समाधान है। जम्मू में भारत-पाक अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर प्रायोगिक आधार पर दो परियोजनाएं स्थापित की गई है।
   उन्होंने कहा कि इस स्मार्ट बाड़ से सीमा पर शहीद हो रहे हमारे जवानों की संख्या में कमी आएगी और जवानों में तनाव का स्तर भी बहुत हद तक कम होगा। केंद्रीय गृहमंत्री ने कहा कि डिजिटल स्मार्ट बाड़ से हमारी सीमाएं बिल्कुल सुरक्षित होंगी क्योंकि आतंकवादियों के लिए इसका अतिक्रमण करना और सीमा पार से घुसपैठ करना असंभव होगा।
     इस अवसर पर पूर्वोत्तर राज्य विकास राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार), प्रधानमंत्री कार्यालय, कार्मिक, लोक शिकायत एवं पेंशन, परमाणु ऊर्जा एवं अंतरिक्ष राज्यमंत्री डॉ. जितेन्द्र सिंह, सीमा सुरक्षा बल के महानिदेशक के. के. शर्मा और अन्य वरिष्ठ अधिकारी मौजूद थे। राजनाथ सिंह ने कहा कि सीमा की सुरक्षा को पुख्ता करना सरकार की प्राथमिकता है।
    उन्होंने कहा कि 2026 किलोमीटर लंबी सीमा अतिसंवेदनशील है और सीमा पर ऐसे क्षेत्रों की रक्षा के लिए डिजिटल बाड़ प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल किया जाएगा। उन्होंने कहा कि स्मार्ट सीमा बाड़ की मदद से हमारी सीमाएं सुरक्षित होंगी और जवानों द्वारा पैट्रोलिंग पर निर्भरता कम होगी। समग्र एकीकृत सीमा प्रबंधन व्यवस्था (सीआईबीएमएस) कार्यक्रम के तहत स्मार्ट सीमा बाड़ परियोजना देश में अपनी तरह की पहली परियोजना है।
    सीमा पर 5.5 किलोमीटर लंबी दूरी की दो सीमा बाड़ परियोजनाओं की निगरानी व्यवस्था तकनीक तौर पर काफी उन्नत है जिससे भूमि, जल और यहां तक की हवा में भी अदृश्य इलेक्ट्रॉनिक बाधाएं लगी हैं। इससे काफी कठिन क्षेत्रों में भी बीएसएफ को खतरे की पहचान करने और घुसपैठ की कोशिशों को रोकने में मदद मिलेगी।
   सीआईबीएमएस निगरानी, संचार और डाटा संग्रहण में बड़ी संख्या में अलग-अलग यंत्रों का इस्तेमाल करता है। बीएसएफ इससे सीमा पर 24 घंटे निगरानी करने में सक्षम होगा चाहे मौसम आंधी-तूफान, कोहरा या बारिश का ही क्यों न हो। जम्मू यात्रा के दौरान गृहमंत्री स्वच्छ भारत अभियान में भी शामिल हुए और बीएसएफ अधिकारियों और जवानों को स्वच्छता की शपथ दिलाई।

मातृभूमि को कभी नहीं भूलें: उपराष्ट्रपति

   उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू ने कहा है कि विदेशों में रहने वाले भारतीय समुदाय के लोग देश का गौरव बढ़ा रहे हैं और प्रवासी देश तथा अपनी मातृभूमि दोनों के प्रति अपार योगदान कर रहे हैं।

   उपराष्ट्रपति कल रात भारत के उच्चायुक्त द्वारा माल्टा की राजधानी वैलेटा में आयोजित भारतीय समुदाय के स्वागत समारोह को संबोधित कर रहे थे। इस अवसर पर वित्त राज्य मंत्री शिव प्रताप शुक्ल और माल्टा में भारतीय उच्चायुक्त राजेश वैष्णव तथा अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।
   उपराष्ट्रपति ने कहा कि उभरता भारत हमेशा भारतीय मूल के लोगों के साथ रहेगा। उन्होंने भारतीय मूल के लोगों से आग्रह किया कि वे पालन-पोषण करने वाली मातृभूमि को कभी न भूलें। उन्होंने कहा कि भारत की कला, संस्कृति, मूल्यों और परम्पराओं का संदेश विश्व में पहुंचाने में भारतीय समुदाय के लोगों की भूमिका महत्वपूर्ण है। भारत-माल्टा संबंधों को मजबूत बनाने की आवश्यकता पर बल देते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि माल्टा ने छोटा देश होने के बावजूद काफी प्रगति की है और भारत और माल्टा के संबंध दीर्घकालिक होंगे। 
    उन्होंने कहा कि देश का आकार महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि विकास महत्वपूर्ण है। उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारतीय आबादी सभी क्षेत्रों में अच्छा कार्य कर सकती है और विश्व के समाजों के साथ एकीकृत हो सकती है। उन्होंने कहा कि भौगोलिक सीमाएं भारत और माल्टा को अलग नहीं करती हैं। भारत की विकास गाथा का उल्लेख करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि देश में स्थायी रूप से विकास हो रहा है और देश आगे बढ़ रहा है। प्रणालीगत सरकारी सुधारों से समाज समावेशी बन रहा है और भारत को औपचारिक अर्थव्यवस्था बनाने के लिए तेजी से प्रयास किए जा रहे है।
    उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारत परिवर्तन के शिखर पर है और यह परिवर्तन अप्रत्याशित है। उन्होंने कहा कि अर्थव्यवस्था के डिजिटीकरण, वित्तीय समावेशन, जीएसटी तथा जन धन से भारतीय आर्थिक परिदृश्य में क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ है। सड़क और दूरसंचार नेटवर्क ने भारत को बदल दिया है और भारत जैसे विशाल देश में संचार प्रणाली क्रांतिकारी हो गई है।
   उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा किए गए कार्यों की याद दिलायी। उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारतीय कला योग और आयुर्वेद पूरे विश्व में लोकप्रिय हो रहे है। उन्होंने कहा कि भारत स्वास्थ्य के मामले में गंतव्य देश हो गया है और शीघ्र लॉन्च किए जाने वाले आयुष्मान भारत कार्यक्रम से भारत में स्वास्थ्य सेवा प्रणाली बदल जाएगी।

Sunday, 16 September 2018

भारत-सर्बिया के संबंधों की जड़ें इतिहास में काफी गहरी

   मार्शल टिटो-पंडित नेहरु के युग की गर्मजोशी एवं सहयोग की भावना को पुनर्जीवित करने को चिन्हित करते हुए उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडु को कल रात बेलग्रेड में एक दुर्लभ सम्मान के प्रतीक में सर्बिया गणराज्य के संसद के विशेष सत्र को संबोधित करने के लिए आमंत्रित किया गया।

   यह सर्बिया की नेशनल असेंबली का वही विशाल सभागार था जहां पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने युगोस्लाविया के विख्यात नेता मार्शल टिटो के साथ गुट निरपेक्ष आंदोलन आरंभ करते हुए विश्व के नेताओं को संबोधित किया था।
  मेजबान देश के विधि निर्माताओं को संबोधित अपने एक घंटे के भाषण के दौरान श्री नायडु ने उस घनिष्ठ संबंध और साझा विजन को याद किया जिसमें दोनों देशों के नेताओं ने निर्गुट आंदोलन (एनएएम) को आरंभ करने में मुख्य भूमिका निभाई थी। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के संबंधों की जड़ें इतिहास में काफी गहरी हैं। 
   कल अंतरराष्ट्रीय लोकतंत्र दिवस पर को उद्धृत करते हुए श्री नायडु ने भारत में संसदीय लोकतंत्र के सतत विकास एवं संघटन की विस्तारपूर्वक जानकारी दी। प्रतिभागी विकास के लिए लोकतंत्र के महत्व को रंखांकित करते हुए, उन्होंने 1961 में इसी स्थान पर पंडित नेहरु द्वारा दिए गए भाषण का समरण किया और कहा कि नेहरु ने हमारे देशों में ऐसे समाज का निर्माण करने की अपील की थी जहां स्वतंत्रता वास्तविक है। सर्बिया संसद के सभापति ने श्री नायडु का स्वागत किया एवं उन्हें पीठिका ले गए एवं सदन के सदस्यों से उनका परिचय कराया।
    उपराष्ट्रपति के लिए कई बार तालियां बजाई गई और विशेष रूप से जब उन्होंने कहा कि जब वह (उपराष्ट्रपति) स्कूल में पढ़ते थे, उस वक्त मार्शल टिटो का नाम भारत में काफी लोकप्रिय था। सर्बिया के कानून निर्माताओं ने उपराष्ट्रपति के संबोधन की समाप्ति पर उनका खड़े होकर सम्मान किया। श्री नायडु ने राष्ट्रपति अलेक्जेंडर वुकिक, प्रधानमंत्री सुश्री अना ब्रनाबिक एवं सर्बिया की नेशनल असेंबली की सभापति सुश्री माजा गोजकोविक के साथ कई द्विपक्षीय एवं बहुपक्षीय मुद्वों पर विस्तार से चर्चा की तथा एक बिजनेस फोरम को भी संबोधित किया।
   श्री नायडु के साथ संयुक्त रूप से मीडिया को संबोधित करते हुए सर्बिया के राष्ट्रपति अलेक्जेंडर वुकिक ने शानदार आर्थिक प्रगति के लिए भारत के राजनीतिक नेतृत्व की सराहना की। उन्होंने सर्बिया की क्षेत्रीय अखंडता को मान्यता देने के लिए भारत को धन्यवाद भी दिया। उन्होंने जोर देकर कहा कि सर्बिया भारत के साथ कृषि, फार्मेसी, आईटी एवं जेनरिक दवाओं के क्षेत्र में भारत के साथ सहयोग का इच्छुक है। उन्होंने रक्षा सहयोग के प्रति भी दिलचस्पी प्रदर्शित की।
    उपराष्ट्रपति ने नोट किया कि हाल के इतिहास में दोनों देशों का समय काफी कठिन था लेकिन वे इन संकटों से और अधिक मजबूत बन कर उभरे हैं क्योंकि उनमें सुधार करने का साहस है। उन्होंने कहा कि, भारत और सर्बिया में 1990 के दशक के आर्थिक सुधारों ने प्रभावी रूप से कुछ बड़ी चुनौतियों को अवसरों के रूप में परिवर्तित कर दिया। दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंधों की स्थापना के 70 वर्ष पूरे हो जाने के अवसर पर सर्बिया पोस्ट एवं इंडिया पोस्ट ने सर्बिया के विख्यात भौतिक विज्ञानी एवं नवोन्मेषक निकोला टेस्ला तथा स्वामी विवेकानंद पर स्मारक टिकट जारी किया।
   सर्बिया के राष्ट्रपति एवं भारतीय उपराष्ट्रपति की उपस्थिति में दोनों देशों ने दो समझौतों पर हस्ताक्षर किए। पादप सुरक्षा एवं क्वारान्टाइन पर समझौते में फलों, सब्जियों एवं प्रसंस्कृत, खाद्य वस्तुओं में व्यापार बढ़ाने पर जोर दिया गया है जबकि वायु सेवा समझौते का उद्वेश्य दोनों देशों के बीच सीधा वायु संपर्क सहित व्यापार एवं पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए कनेक्टिविटी बढ़ाना है।

कानून कोई कैरियर नहीं, राष्ट्र निर्माण का एक तंत्र

  राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने कर्नाटक के बेलागवी में कर्नाटक लॉ सोसाइटी एवं राजा लखमगौडा विधि महाविद्यालय के प्लैटिनम जुबली समारोहों में भाग लिया तथा उन्हें संबोधित किया।

  इस अवसर पर राष्ट्रपति ने कहा कि कानून कोई कैरियर नहीं है, यह एक आह्वान (कॉलिंग) है। यह न्याय के प्रयोजन में सहायता करने का, समाज के गरीब से गरीब व्यक्ति की मदद करने का तथा नियमों, परंपराओं एवं निष्पक्षता के अनुपालन के जरिये परिभाषित समाज एवं राष्ट्र का निर्माण करने का एक तंत्र है। आधारभूत विश्लेषण में अधिवक्ता और न्यायाधीश सच्चाई के ही अन्वेषक हैं। 
  राष्ट्रपति ने कहा कि हम प्रौद्योगिकी एवं उद्यमशीलता के युग में रहते हैं। चौथी औद्योगिक क्रांति हमारे करीब है। यह हमारे जीने और काम करने के ढंग में बदलाव ला रहा है। यह हमारे युवाओं की आकांक्षाओं को बदल रहा है। हमारे शैक्षणिक संस्थानों को नवोन्मेषण एवं उत्कृष्टता की इस खोज के साथ सुसंगत होना पड़ेगा। उन्हें 21वीं सदी के अनुकूल बनना पड़ेगा। 
  राष्ट्रपति ने कहा कि तेज प्रौद्योगिकीय विकास के बीच कानून की पढ़ाई, कानून का विकास बेहद महत्वपूर्ण है। किसी नवोन्मेषण के होने एवं समाज में इसके व्यापक अनुप्रयोग के बीच की समय अवधि बड़ी तेजी से घट रही है।
  यह जेनेटिक इंजीनियरिंग, बायोइथिक्स एवं आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस जैसे क्षेत्रों में -कानून के लिए अनिगिनत चुनौतियां पेश करेगी। कानूनी व्यवसाय को तेजी से इसका प्रत्युत्तर देना पड़ेगा। उन्होंने विश्वास जताया कि हमारे अग्रणी कानूनी विशेषज्ञ ऐसे मामलों पर चिंतन करेंगे।

Friday, 9 March 2018

खाद्यान्नों का रिकॉर्ड कुल 275.68 मिलियन टन उत्पादन

   नई दिल्‍ली। केन्द्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री राधा मोहन सिंह ने कहा है कि पिछले तीन वर्षों में सरकार द्वारा उठाई गईं अनेक नीतिगत पहलों के परिणामस्‍वरूप मौजूदा वर्ष में देश में खाद्यान्‍न का रिकॉर्ड उत्‍पादन हुआ है। 

  वर्ष 2017-18 के लिए देश में कुल 275.68 मिलियन टन खाद्यान्‍न उत्‍पादन हुआ है जो कि वर्ष 2013-14 में हासिल 265.04 मिलियन टन खाद्यान्‍न उत्‍पादन की तुलना में 10.64 मिलियन टन (लगभग 4 प्रतिशत) ज्‍यादा है।
   वर्तमान वर्ष का उत्‍पादन 2011-12 से 2015-16 के औसत खाद्यान्‍न उत्‍पादन के मुकाबले लगभग 19 मिलियन टन ज्‍यादा है। बागवानी फसलें जिनका पोषणिक सुरक्षा में अहम योगदान है, का भी वर्ष 2016-17 में रिकॉर्ड उत्‍पादन हुआ है जो कि 300 के आंकडे को पार करके 305 मिलियन टन हो गया है जो कि पिछले साल के मुकाबले 4.8 प्रतिशत ज्‍यादा है। 
     फलों का उत्‍पादन 93 मिलियन टन और सब्‍जी उत्‍पादन 178 मिलियन टन के आंकडे को पार कर गया है। इस उपलब्धि को हासिल करने में कृषि विश्‍वविद्यालयों एवं आईसीएआर द्वारा विकसित उन्‍नत तकनीकों का विशेष योगदान है। 
    कृषि मंत्री ने आगे कहा कि राज्‍य कृषि विश्‍वविद्यालय और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, कृषि को  अधिक टिकाऊ और लाभप्रद बनाने के लिए बाधाओं को दूर करने के लिए तैयार हैं। कृषि मंत्री ने कहा कि अनेक चुनौतियों के बावजूद कृषि विश्‍वविद्यालय एवं आईसीएआर प्रणाली द्वारा समय समय पर अनेक उल्‍लेखनीय सफलताएं हासिल की गईं हैं जिनसे देश की कृषि व्‍यवस्‍था और कृषि उत्‍पादन को बढ़ाने में मदद मिली है। इन उपलब्धियों में मुख्‍यतया: उत्‍पादन और उत्‍पादकता में बढ़ोतरी करना शामिल है जिससे किसानों विशेषकर छोटे व सीमांत किसानों की आय में वृद्धि होना शामिल है।
     प्रधानमंत्री के विजन ''वर्ष 2022 तक किसानों की आय को दोगुना करना'' को ध्‍यान में रखते हुए इस प्रणाली द्वारा इस दिशा में अग्रणीय कदम उठाये गये हैं। वर्ष 2022 तक किसानों की आय को दोगुना करने के संकल्‍प को साकार करने की दिशा में कृषि विश्‍वविद्यालयों एवं आईसीएआर संस्‍थानों ने  विभिन्‍न राज्‍य एवं केन्‍द्रीय एजेन्सियों के साथ समन्‍वय स्‍थापित करके एक कदम आगे बढ़ाते हुए विभिन्‍न राज्‍यों के लिए ''वर्ष 2022 तक किसानों की आय को दोगुना करने हेतु रणनीति दस्‍तावेज को तैयार करके जारी किया है।
    इसकी मदद से निश्चित रूप से कृषि की प्रगति और किसानों की खुशहाली को बढ़ाने में मदद मिलेगी । इसके अतिरिक्‍त, नई तकनीकों का विकास करना, एकीकृत कृषि प्रणाली, संस्‍थान निर्माण, मानव संसाधन, कृषि का विविधीकरण, नए अवसर पैदा करना तथा जानकारी के नए स्रोतों का विकास करने पर भी विशेष बल दिया गया है।
   छोटे व सीमांत किसानों और जलवायु परिवर्तन से जुड़ी समस्‍याओं के समाधान के लिए देश के सभी 15 कृषि जलवायु क्षेत्रों को शामिल करते हुए कुल 45 एकीकृत कृषि प्रणाली मॉडल  तैयार किए गए हैं। इन मॉडलों को देशभर में फैले कृषि विज्ञान केन्‍द्रों के माध्‍यम से आगे बढ़ाया जा रहा है।
    इसके साथ ही आईसीएआर द्वारा कुल 623 जिला आकस्मिकता योजनाओं को विकसित करके उनका प्रमाणन किया गया और लगभग 40.9 लाख किसानों के लिए कौशल विकास कार्यक्रम आयोजित किए गए। भारत सरकार की पहल ''सॉयल हैल्‍थ कार्ड'' को सहयोग करने में मिट्टी की जांच के लिए एक मिनीलैब 'मृदापरीक्षक'' का विकास किया गया। 
   कृषि विश्‍वविद्यालयों एवं भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा देशभर में फैले कृषि विज्ञान केन्‍द्रों के माध्‍यम से 29 राज्‍यों में जलवायु अनुकूल तकनीकों को प्रदर्शित किया जा रहा है और उन्‍हें बढ़ावा दिया जा रहा है। अभी तक कुल 42 जैविक कृषि प्रौद्योगिकियां विकसित की गईं हैं जिनका कि परीक्षण किया गया और इनमें और सुधार किया जा रहा है।
  इसके साथ कृषि शिक्षा,कृषि अनुसंधान, कृषि विस्तार, संकल्प से सिद्धि, मेरा गांव, मेरा गौरव, अंतरराष्ट्रीय सहयोग, प्रोद्योगिकी हस्तांतरण, सूचना प्रोद्योगिकी के मोर्चे पर भी तेजी से काम किया जा रहा है।
   इस मौके पर कृषि एवं किसान कल्‍याण राज्‍य मंत्री गजेन्‍द्र सिंह शेखावत, नीति आयोग के सदस्‍य डॉ. रमेश चन्‍द, सचिव, डेयर एवं महानिदेशक, आईसीएआर डॉ. त्रिलोचन महापात्र, डेयर के विशेष सचिव सी. राउल, डेयर के वित्‍तीय सलाहकार, इंडियन एग्रीकल्‍चरल यूनिवर्सिटीज एसोसिएशन के अध्‍यक्ष, आईसीएआर में उप महानिदेशक (शिक्षा) डॉ. एन.एस. राठौड, कृषि विश्‍वविद्यालयों के कुलपति एवं संस्‍थानों के निदेशक भी मौजूद थे। 
   इस सम्मेलन में हिस्सा ले रहे राज्‍य कृषि विश्‍वविद्यालयों के कुलपति, आईसीएआर संस्‍थानों के निदेशक एवं आईसीएआर के अन्‍य वरिष्‍ठ अधिकारी कृषि अनुसंधान, शिक्षा और विस्‍तार प्रणाली में सुधार करने के तौर-तरीकों पर विचार-विमर्श करेंगे।

वृहद जल परिवहन प्रणालियों के लिए वैकल्पिक प्रौद्योगिकी समय की मांग

   नई दिल्‍ली। केन्‍द्रीय जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्री नितिन गडकरी ने कहा है कि देश में वृहद जल परिवहन प्रणाली के लिए वैकल्पिक प्रोद्योगिक का इस्‍तेमाल समय की मांग है।

   नई दिल्‍ली में आज ‘‘अधिक मोटाई वाले पाइपों के इस्‍तेमाल’’ पर एक अंतर्राष्‍ट्रीय कार्यशाला का उद्घाटन करते हुए श्री गडकरी ने पावर ग्रिड और सड़क नेटवर्क की तर्ज पर देश में जल ग्रिडों के वि‍कास की आवश्‍यकता पर जोर दिया।
  उन्‍होंने कहा कि हमारे देश में पानी की कमी नहीं है, लेकिन जल संसाधनों की उचित योजना और प्रबंधन की कमी है। उन्‍होंने कहा कि देश में 25 से 30 प्रतिशत कृषि क्षेत्र से जुड़े कामगार गांव से शहरी इलाकों की तरफ केवल इसलिए पलायन करते हैं, क्‍योंकि उन्‍हें सिंचाई और कृषि के क्षेत्र से जुड़ी अन्‍य समस्‍याओं का सामना करना पड़ता है। 
   ड्रिप सिंचाई के जरिए जल संसाधनों के प्रभावी इस्‍तेमाल के महत्‍व की चर्चा करते हुए श्री गडकरी ने मध्‍य प्रदेश का उदाहरण दिया, जिसने ड्रिप सिंचाई को बढ़ावा देकर कृषि के क्षेत्र में 23 प्रतिशत विकास दर हासिल कर ली है,जबकि राष्‍ट्रीय औसत केवल 4 प्रतिशत है। श्री गडकरी ने 8 लाख करोड़ रुपये के व्‍यय से देश में नदियों को जोड़ने की 30 प्रस्‍तावित परियोजनाओं का जिक्र किया। 
    उन्‍होंने कहा कि हमारे सामने चुनौती है कि हम उपयुक्‍त सस्‍ती, पर्यावरण अनुकूल प्रौद्योगिकी का पता लगाएं,ताकि गुणवत्‍ता से समझौता किए बिना तेजी से जल का हस्‍तांतरण हो सके। केन्‍द्रीय जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण राज्‍य मंत्री डॉ. सत्‍यपाल सिंह ने कहा कि हमारी सरकार की सर्वोच्‍च प्राथमिकता ‘हर खेत को पानी’ और ‘पर ड्रॉप मोर क्रॉप’ है, क्‍योंकि 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुना करना प्रधानमंत्री का सपना है।
  उन्‍होंने कहा कि नहरों के जरिए सिंचाई और जल परिवहन काफी महंगा है और पर्यावरण तथा वनों की निकासी तथा भूमि अधिग्रहण जैसी समस्‍याओं के कारण इसमें काफी समय लग जाता है। उन्‍होंने कहा कि मध्‍य प्रदेश और महाराष्‍ट्र में नहरों के स्‍थान पर जल परिवहन के लिए पाइपों का इस्‍तेमाल शुरू कर दिया गया है। डॉ. सिंह ने विशेषज्ञों से आग्रह किया वे ‘हर खेत को पानी’ के उद्देश्‍य पूरा करने के लिए सस्‍ते और पर्यावरण अनुकूल विकल्‍पों का पता लगाएं। 
  जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय में सचिव श्री यू.पी. सिंह ने जल परिवहन के लिए अधिक मोटाई वाले पाइपों के फायदों की जानकारी दी। उन्‍होंने कहा कि देश में कई वर्षों से अनेक नहरों का निर्माण किया जा रहा है, लेकिन वह अभी भी पूरा नहीं हुआ है। नहर प्रणाली के विपरीत पाइपों के जरिए जल परिवहन के लिए भूमि अधिग्रहण और वन की निकासी की जरूरत नहीं पड़ती। जल के दूषित होने और वाष्‍पीकरण के कारण नुकसान की समस्‍याएं काफी कम हो जाती है। 
   श्री सिंह ने कहा कि देश को सस्‍ती और पर्यावरण अनुकूल प्रौद्योगिकी की जरूरत है। उन्‍होंने आशा व्‍यक्‍त की कि कार्यशाला में विशेषज्ञ ऐसा कोई समाधान निकालेंगे और आश्‍वासन दिया कि उनका मंत्रालय इस बारे में तेजी से कार्रवाई करेगा। एकदिवसीय कार्यशाला का आयोजन जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय के तत्‍वावधान में वाप्‍कोस और राष्‍ट्रीय जल विकास एजेंसी ने किया है।
    कार्यशाला में विनिर्माण कंपनियां, जल परिसंपत्ति प्रबंधन से जुड़े संगठन, इंजीनियरिंग विशेषज्ञ, केन्‍द्र और राज्‍य सरकारों एवं निजी कंपनियों के जल संसाधन विभाग जैसे महत्‍वपूर्ण हितधारक भाग ले रहे हैं। कार्यशाला में अमरीका, ब्राजील,इटली, चीन और दक्षिण अफ्रीका के भारतीय और विदेशी विशेषज्ञ अपने पेपर प्रस्‍तुत करेंगे।

Thursday, 8 March 2018

महिला उद्यमियों के लिए उद्यम सखी पोर्टल का शुभारंभ

   नई दिल्ली। अंतर्राष्‍ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर सूक्ष्‍म,लघु और मध्‍यम उद्यम मंत्रालय एमएसएमई की ओर से आज भारतीय महिला उद्यमियों के लिए एक पोर्टल शुरु किया गया।

   एमएसएमई राज्‍य मंत्री गिरिराज सिंह ने आज यहां एक कार्यक्रम मे पोर्टल का शुभारंभ किया। श्री सिंह ने इस अवसर पर कहा कि‍ देश में इस समय 80 लाख ऐसी महिलाएं हैं जिन्‍होंने अपना कारेाबार शुरु किया है सफलातपूर्व उसे चला रही हैं।
   उन्‍होंने कहा कि‍ एमएसएमई मंत्रालय का मानना है कि भारतीय महिलाएं देश की आर्थिक प्रगति में अहम भूमिका निभा सकती हैं।
  पोर्टल के जरिए एक ऐसा नेटवर्क बनाने का प्रयास किया गया है जिसके जरिए उद्यमशीलता को बढावा दिया जा सके और साथ ही महिलाओं को स्‍वालंबी और सशक्‍त बनाने के लिए कम लागत वाली सेवाओं और उत्‍पादों के लिए कारोबार के नए मॉडल तैयार किए जा सकें। पोर्टल के जरिए महिला उद्यमि‍यों को कारोबार शुरु करने के लिए आवश्‍यक प्रशिक्षण,निवशेकों से सीधे संपर्क,बाजार सर्वेक्षण सुविधा तथा तकनीकी सहयोग जैसी मदद उपलब्‍ध करायी गयी है।
     मंत्रालय में सचिव डाक्‍टर अरुण कुमार पांडा ने इस मौके पर महिला उदृयमि‍यों को संबोधित करते हुए कहा कि‍ मंत्रालय खादी,ग्रामीण तथा कॅयर उद्योग सहित पूरे एमएसएमई क्षेत्र के विकास के लिए हर संभव प्रयास कर रहा है।
   इस काम में अन्‍य मंत्रालयों,राज्‍य सरकारों और सभी हितधारकों से मदद ली जा रही है। इस अवसर पर मत्रालय की संयुक्‍त सचिव अल्‍का अरोड़ा तथा अतिरिक्‍त विकास आयुक्‍त अनंत शेरखाने भी उपस्थित थे।

वीएलई की संख्‍या दोगुनी होकर 47 हजार से एक लाख हो जाएगी

   नई दिल्ली। केंद्रीय इलेक्ट्रानिक्स,सूचना प्रौद्योगिकी और विधि तथा न्‍याय मंत्री रवि शंकर प्रसाद और सूचना एवं प्रसारण तथा कपडा मंत्री श्रीमती जुबिन ईरानी ने आज अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर "स्त्री स्वाभिमान- महिलाओं के स्वास्थ्य और स्वच्छता के लिए सामान्य सेवा केंद्रों (सीएससी) की एक पहल पर आज एक कार्यशाला" का उद्घाटन किया।

   कार्यशाला में सीएससी के माध्यम से महिला ग्रामीण उद्यमियों द्वारा देश की गरीब और वंचित महिलाओं के बीच स्‍वास्‍थ्‍य और स्‍वच्छता को बढ़ावा देने के लिए किए गए कार्यों की प्रगति और प्रभाव को दर्शाया गया।
   श्री प्रसाद ने ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं के सशक्तिकरण के साथ ही उनके स्‍वास्‍थ्‍य और स्‍वच्‍छता को बढावा देने के लिए स्‍त्री स्‍वाभिमान परियोजना के तहत सैनिटेरी नैपकीन बनाने वाली इकाईयां लगाने के ग्रामीण महिला उद्मियों के प्रयासो की सराहना की। स्‍वच्‍छ भारत अभियान तथा डिजी धन अभियान जैसे सरकारी अभियानो के साथ बडे पैमाने पर लोगों को जोड़ने की वीएलई की ताकत का जिक्र करते हुए श्री रविशंकर ने कहा कि आज देश में ऐसी महिलाओं की संख्‍या 47 हजार है। मैं चाहता हूं कि देश में इनकी संख्‍या बढकर एक लाख से ज्‍यादा हो जाए। 
  मंत्री ने कहा, "डिजिटल इंडिया" अभियान में महिलाओं के लिए अग्रिम स्‍थान सुनिश्‍चित करने से एक नया सामाजिक बदलाव आएगा जहां वे भेदभाव से मुक्त समाज के निमार्ण का वाहन बनेंगी। डिजिटल रूप से सशक्त महिलाएं ग्रामीण समुदायों को सशक्‍त बनाने की भूमिका निभा सकेंगी। कार्यशाला में देश भर से आयी लगभग 700 वीएलई जिनमें से कई ने सैनिटरी नैपकिन इकाइयां स्थापित की हैं के अलावा इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के कयी वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद थे।
     सूचना और प्रसारण मंत्री श्रीमती ईरानी ने अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर महिला ग्रामीण उद्यमियों को बधाई देते हुए कहा,"मेरा मानना है कि हर दिन महिला दिवस है। महिला सशक्तिकरण, खासकर ग्रामीण भारत में रहने वाली महिलाओं का सशक्तिकरण, हमारी सरकार का प्रमुख उद्देश्‍य है। सरकार ने देश में मासिक धर्म के दौरान महिलाओं के लिए स्वच्छता से जुड़े दिशानिर्देश तैयार किए हैं। 
   उन्‍हेंने इस अवसर पर बंजारा समुदाय की महिलाओं के बीच "वीएलई" स्नेहलता देवी की पहल चुप्‍पी तोड़ो, सयानी बनो "का उल्लेख करते हुए कहा, "महिला वीएलई शासन का पहला पाठ पढ़ा रही हैं।" उन्होंने कहा, "पिछले तीन सालों में, 16 करोड़ से अधिक महिलाएं जन धन योजना के माध्यम से बैंक खाते खोल चुकी हैं। इसी तरह, हमारी सरकार द्वारा शुरू की गई मुद्रा योजना से, 7.80 करोड़ महिला उद्यमी तैयार हुयी हैं।
     श्रीमती ईरानी ने "परिवर्तन का वाहक बनी महिला वीएलई के साथ एकजुटता का प्रदर्शन करते हुए इस महीने 11 तारीख को बेंगलूर के पास एक महिला वीएलई द्वारा चलाया गये सामान्‍य सेवा केन्‍द्रका का दौरा करने का वादा किया। उन्‍होंने कहा, "मुझे आपके केन्‍द्र पर आकर एक कप चाय पीने से खुशी मिलेगी।"

राजस्थान के झुंझुनू में राष्ट्रीय पोषण मिशन तथा बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान

   झुंझुनू। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर राजस्थान के झुंझुनू में आज राष्ट्रीय पोषण मिशन का शुभारंभ किया और साथ ही राष्ट्रीय स्तर पर बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान के विस्तार की शुरूआत भी की। 

   प्रधानमंत्री ने इस अवसर पर कहा कि प्रौद्योगिकी के जरिये पूरा देश आज झुंझुनू से जुड़ गया है। उन्होंने बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान के विस्तार के लिए झुंझुनू जिला प्रशासन द्वारा किये गए कार्यों की सराहना की और इस अभियान से जुड़ने के इच्छुक जिलों के अधिकारियों से मुलाकात भी की।
   उन्होंने अभियान की सफलता के लिए उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले जिलों को प्रमाण पत्र प्रदान किये। प्रधानमंत्री ने इस अवसर पर कार्यक्रम की लाभार्थी माताओं और बालिकाओं से बातचीत भी की। 
    प्रधानमंत्री ने कहा कि लड़के और लड़कियों के बीच किसी तरह के भेद भाव का कोई प्रश्न ही नहीं उठता है। उन्होंने लड़को के समान ही लड़कियों के लिए भी गुणवत्ता युक्त शिक्षा की पहुंच पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि बेटियां बोझ नहीं हैं वे हमारे देश के लिए गौरव और समृद्धि का जरिया बन रही हैं। समाज के विभिन्न क्षेत्रों में उन्होंने उत्कृष्ट प्रदर्शन किया है।
    प्रधानमंत्री ने इस अवसर पर बच्चों को पोषक आहार दिये जाने के महत्व पर बल दिया। उन्होंने कहा कि ‘मिशन इंद्रधनुष’ के जरिये महिलाओं और बच्चों के जीवन में बड़ा सकारात्मक बदलाव आया है। राजस्थान की मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे सिंधिया ने इस अवसर पर कहा कि एक महती योजना का शुभारंभ करने तथा दूसरी योजना के विस्तार के लिए प्रधानमंत्री द्वारा राजस्थान का चुनाव किये जाने से उन्हें बेहद खुशी हुई है। 
   उन्होंने कहा कि महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए प्रधानमंत्री के प्रयासों का राजस्थान सरकार हमेशा समर्थन करती रहेगी।

Wednesday, 7 March 2018

भारत 21वीं सदी के अशांत विश्व में आशा की किरण साबित होगा

    अलीगढ़। राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने आज उत्तर प्रदेश में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के वार्षिक दीक्षांत समारोह को संबोधित किया। 

   इस अवसर पर राष्ट्रपति ने कहा कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय ने भारत की विकास यात्रा में विशेष भूमिका निभाई है और यह 2020 में अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूरे करने जा रहा है।
    राष्ट्रपति ने कहा कि विश्वविद्यालय के छात्रों ने सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व और खासतौर से एशिया और अफ्रीका में अपनी छाप छोड़ी है। उन्होंने इस अवसर पर 2017 की अपनी इथोपिया यात्रा का स्मरण करते हुए कहा कि उन्हें तब यह जानकर बहुत खुशी हुई थी कि इथोपिया के प्रधानमंत्री की पत्नी अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की पूर्व छात्रा रह चुकी हैं। 
     श्री कोविंद ने कहा कि विश्वविद्यालय के प्रतिष्ठित छात्रों की लंबी सूची है। इन छात्रों ने राजनीति, प्रशासन, शिक्षा, कानून, विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी, साहित्य, कला तथा खेल के क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया है। उन्होंने कहा कि भारत रत्न से सम्मानित खान अब्दुल गफ्फार खान, रंगभेद के खिलाफ संघर्ष करने वाले कार्यकर्ता युसूफ मोहम्मद दादू और देश के पूर्व राष्ट्रपति डॉ जाकिर हुसैन, इस विश्वविद्यालय के छात्र रह चुके हैं।
    उन्होंने इस अवसर पर आधुनिक विज्ञान के क्षेत्र में डॉ. सैय्यद ज़हुर कासिम, प्रोफेसर ए. सलाहुद्दीन और डॉ. शाहिद जमील के योगदान का भी उल्लेख किया। राष्ट्रपति ने कहा कि इस्मत चुगताई और मुमताज़ जहां जैसी प्रगतिशील विचारों वाल महिलाओं ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के साथ ही पूरे भारतीय समाज का सम्मान बढ़ाया है।
    उन्होंने इसरो के चंद्रयान अभियान में अहम भूमिका निभाने वाली अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की पूर्व छात्रा खुशबू मिर्ज़ा का उल्लेख करते हुए कहा कि उसके जैसी महिलाएं 21वीं सदी में अन्य महिलाओं के लिए एक रोल मॉडल हैं।
     राष्ट्रपति ने इस बात पर प्रसन्नता व्यक्त की कि विश्वविद्यालय में विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में किए गए कार्य समाज की जरूरतों के अनुरूप रहे हैं। उन्होंने कहा कि इस तरह के प्रयास विश्वविद्यालय के अन्य विभागों में भी होने चाहिए, ताकि ज्ञान और नवाचार समाज में हो रहे परिवर्तन के अनुरूप बने रहें। उन्होंने कहा कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी के साथ ही प्रगतिशील सोच भी जरूरी है, जिससे समाज के सभी वर्ग बराबरी और भाईचारे के साथ आगे बढ़ सकें।
   श्री कोविंद ने कहा कि ज्ञान की खोज और मानव गरिमा की ललक एक दूसरे से गहरे जुड़े हैं। ये भारतीय लोकाचार और हमारी सभ्यता के केंद्र में रहे हैं। इन्होंने हमारी विविधता में योगदान दिया है, जो हमारे खुले दृष्टिकोण के साथ ही हमारी बड़ी ताकत भी है। एक दूसरे को सम्मान देना, एक दूसरे से सीखना, एक दूसरे के साथ विचारों को साझा करना तथा सोच और जीवन के वैकल्पिक तरीकों की स्वीकृति हमारे समाज के सिर्फ कोरे नारे नहीं हैं बल्कि ये भारतीय जीवन शैली के प्राकृतिक गुण हैं। 
    उन्होंने समाज और समुदायों को गहरे जोड़कर रखा है। इस भावना को लगातार मजबूत बनाए रखना जरूरी है। राष्ट्रपति ने कहा कि हम आज वैश्विकरण के युग में जी रहे हैं। हमें एक ऐसे विश्व का निर्माण करना है, जिसमें सबके लिए स्थान भी हो तथा विविधता का सम्मान भी किया जा सके।
     आधुनिक विज्ञान और समाज की समृद्ध सांस्कृतिक परम्पराओं के जरिए हमें अपने सपनों के भारत का निर्माण करना है। ऐसा भारत प्रत्येक भारतीय के लिए लाभकर होगा। ऐसे भारत में बिना किसी भेदभाव और पृष्ठभूमि की भिन्नता के हर लड़का और लड़की अपनी क्षमताओं का पूरा इस्तेमाल कर सकेंगे। ऐसा भारत 21वीं सदी के अशांत विश्व में आशा की किरण साबित होगा। 
     श्री कोविंद ने कहा कि उम्मीद की जाती है कि आज के दौर में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के छात्र सिर्फ देश ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में अपनी जगह बनाएंगे। आज का समय गतिशीलता का दौर है। हम सभी एक ऐसे ज्ञान समाज का हिस्सा हैं जिसका स्वरूप वैश्विक है। ऐसे गतिशील माहौल में ज्ञान का दायरा बढ़ाने के लिए छात्रों और अध्यापकों का दूसरी शिक्षण संस्थाओं के साथ संपर्क बढ़ाना लाभप्रद होगा।

खाद्य सब्सिडी में 17,500 करोड़ रूपये प्रति वर्ष की बचत

   नई दिल्ली। राम विलास पासवान, केन्द्रीय उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्री ने कहा है कि केंद्र सरकार सार्वजनिक वितरण प्रणालीकी पोर्टेबिलिटी पर काम कर रही है और यह धीरे-धीरे विस्तारित होगा। 

   श्री पासवान ने आज राज्यों /केंद्र शासित प्रदेशों से खाद्य आयोग के अध्यक्षों की पहली बैठक को संबोधित करते हुए कहा कि सार्वजनिक वितरण की पोर्टेबिलिटी लागू हो जाने के बाद लाभार्थी किसी विशेष उचित दर दुकान से राशन लेने के लिये बाध्य नहीं रहेंगे, वह अपनी हकदारी का राशन किसी भी उचित दर दुकान से लेने के लिय स्वतंत्र होंगे।
   यह व्यवस्था आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, हरियाणा, गुजरात और दिल्ली में पहले से ही चल रहा है। श्री पासवान ने कहा कि देश भर से 82 प्रतिशत राशन कार्ड आधार से जुड़े हैं और राशन की दुकानों पर 2.95 लाख मशीन स्थापित की गई हैं ताकि राशन प्रक्रिया को सुचारु रूप से स्थापित किया जा सके और चोरी को रोका जा सके। 
    करीब 2.75 करोड़ नकली और अवैध राशन कार्ड हटा दिए गए हैं, जिसके परिणामस्वरूप खाद्य सब्सिडी में रूपये 17,500 करोड़ प्रति वर्ष की बचत होगीप्र् केंद्रीय मंत्री ने कहा कि इस धनराशि का इस्तेमाल नए लोगों को सब्सिडी प्रदान करने के लाभ के लिए किया जाएगा। 
   श्री पासवान ने कहा कि जहां राज्य खाद्य आयोग का गठन नहीं किया गया है या आंशिक रूप से गठन किया गया है वहउन राज्यों / केंद्र शासितक्षेत्रों के मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखेंगे । केंद्रीय मंत्री ने जानकारी दी कि अब तक 20 राज्यों / केंद्र शासित राज्य क्षेत्रों में राज्य खाद्य आयोग की स्थापना की गई है। श्री पासवान ने कहा कि राज्यों को राज्य खाद्य आयोग की स्थापना और इसके कार्य करने के लिए पर्याप्त आजादी देने की जिम्मेदारी लेनी चाहिए।
   केंद्रीय मंत्री ने आश्वासन दिया कि यदि आवश्यक हो तो केंद्र सरकार,राज्य / केंद्र शासित राज्यक्षेत्रों में आवश्यक सहयोग का विस्तार करेगा। उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय और राज्य / केंद्र शासित राज्य क्षेत्रों के खाद्य आयोग के अध्यक्ष के बीच यह पहली राष्ट्रीय स्तर की बैठक थी। श्री पासवान ने बताया कि राज्य / केंद्र शासित राज्य क्षेत्र के खाद्य आयोग की राष्ट्रीय / राज्य स्तर की बैठक हर तीन महीने में होनी चाहिए।

सुखद यात्रा एप तथा राजमार्ग पर यात्रा करने वालों के लिए आपात फोन नंबर

   नई दिल्ली। केन्द्रीय सड़क परिवहन व राजमार्ग, पोत परिवहन, जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्री नितिन गडकरी ने घोषणा की है कि जल्द ही देश में भारी वाहनों के चालकों को लाइसेंस देने की पूरी प्रक्रिया पूर्ण रूप से कम्प्यूटरीकृत कर दी जाएगी। 

   इस पूरी प्रक्रिया में मानव हस्तक्षेप नहीं होगा। आज नई दिल्ली में जिला वाहन चालक प्रशिक्षण केन्द्र का उद्घाटन करते हुए उन्होंने कहा कि इस प्रकार के ड्राइविंग लाइसेंस प्रदान करने की पूरी प्रक्रिया पूर्ण रूप से कम्प्यूटरीकृत कर दी जाएगी।
  इससे जाली लाइसेंसों की संख्या में कमी आएगी तथा इसके परिणामस्वरूप सड़क दुर्घटनाओं की संख्या में भी कमी आएगी। केन्द्रीय पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस, कौशल विकास तथा उद्यमिता मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के साथ मंत्री ने एक मोबाइल एप तथा राजमार्ग पर यात्रा करने वालों के लिए टोल फ्री आपात फोन नंबर का भी शुभारंभ किया।
   नितिन गडकरी ने कहा कि सुखद यात्रा मोबाइल एप के माध्यम से राजमार्ग पर यात्रा करने वाले टोल प्लाजा पहुंचने के पूर्व टोल-दरों की जानकारी प्राप्त कर सकेंगे। इस एप की एक मुख्य विशेषता यह है कि यात्री किसी दुर्घटना, सड़क गुणवत्ता तथा किसी गड्डे की जानकारी एप पर अपलोड कर सकेंगे। यात्रियों को टोल प्लाजा पर लगने वाले समय की भी जानकारी मिलेगी। 
    इसके अतिरिक्त राजमार्ग नेस्ट/नेस्ट मिनी की जानकारी भी यह एप उपलब्ध कराएगा। इस एप की सहायता से उपयोगकर्ता फास्टटैग भी खरीद सकेंगे। श्री गडकरी ने कहा कि टोल फ्री नंबर 1033 की सहायता से उपयोगकर्ता किसी आपात स्थिति की जानकारी दे सकेंगे तथा राजमार्ग के अनुभव को साझा कर सकेंगे। इस सेवा को एम्बुलेंस तथा खराब व दुर्घटनाग्रस्त वाहनों को ले जाने वाली सेवा के साथ भी जोड़ा गया है। यह सेवा कई भाषाओं में उपलब्ध है। इस सेवा में उपयोगकर्ता की अवस्थिति की जानकारी स्वतः उपलब्ध होगी इसलिए उन्हें त्वरित और सटीक सहायता मिलेगी।
    मंत्री ने कहा कि राज्य/केन्द्र शासित प्रदेश के प्रत्येक जिले में कम से कम एक आदर्श वाहन प्रशिक्षण केन्द्र का निर्माण किया जाएगा। मंत्रालय एक करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता प्रदान करेगा। एजेंसी भी इस योजना में समान राशि निवेश करेगी।
    इस योजना का उद्देश्य रोजगार निर्माण करना है तथा देश के भारी व हल्के वाहन चालकों की जरूरतों को पूरा करना है। जो चालक खतरनाक/जोखिम वाले वाहन चलाते है उन्हें भी प्रशिक्षण दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि इस योजना के तहत पांच लाख रुपये की सहायता राशि उन स्वयंसेवी संस्थाओं/ट्रस्टों/सहकारी समितियों को दी जाएगी, जो सड़क सुरक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करेंगी। प्रत्येक राज्य/केन्द्र शासित प्रदेश में पांच लाख रुपये, दो लाख रुपये तथा एक लाख रुपये के तीन पुरस्कार दिए जाएंगे।
   केन्द्रीय पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस, कौशल विकास तथा उद्यमिता मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने सड़क सुरक्षा के इस पहल की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि वाहन चालकों के प्रशिक्षण से प्रति वर्ष दस हजार करोड़ रुपये तक की धनराशि की बचत की जा सकेगी।
    श्री प्रधान ने सुझाव देते हुए कहा कि पेट्रोलियम तथा सड़क परिवहन क्षेत्रों की सभी सेवाओं को राष्ट्रीय राजमार्ग के टोल प्लाजाओं पर उपलब्ध कराया जाना चाहिए। उन्होंने आगे कहा कि एक वर्ष में 100 ऐसे केन्द्रों का निर्माण किया जा सकता है।