Friday, 28 December 2018

जीन में बदलाव कर बच्चों का जन्म !

    खबर तो यही कि है कि चीनी वैज्ञानिक ने जुड़वां शिशुओं के पैदा होने से पहले ही उनमें आनुवांशिक बदलाव करने का दावा किया है। उन्होंने यूट्यूब पर वीडियो डालकर अपने प्रयोग के बारे में बताया। 

   इस खबर से वैज्ञानिक स्तब्ध हैं और बहस शुरू हो गई है। खबर है कि चीन के एक वैज्ञानिक ने दावा किया है कि उन्होंने दुनिया के पहले ऐसे शिशुओं को पैदा करने में सफलता पाई है, जिनके जीन्स में बदलाव किए गए हैं।
  चीनी यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हे जियानकुई ने यूट्यूब पर नवजात जुड़वा बहनों का वीडियो डालकर दावा किया कि इनके जीन्स में बदलाव किए गए हैं, जिससे इनका एचआईवी से बचाव हो सकेगा।
   खबर है कि एचआईवी से रोकना मकसद, शेनझान के अनुसंधानकर्ता ही जियानकुई ने कहा कि उन्होंने सात दंपतियों के बांझपन के उपचार के दौरान भ्रूणों को बदला जिसमें अभी तक एक मामले में संतान के जन्म लेने में यह परिणाम सामने आया। इन जुड़वा बहनों का डीएनए सीआरआईएसपीआर तकनीक से बदला गया। उन्होंने कहा कि उनका मकसद किसी वंशानुगत बीमारी का इलाज या उसकी रोकथाम करना नहीं है, बल्कि एचआईवी, एड्स वायरस से भविष्य में संक्रमण रोकने की क्षमता इजाद करना है, जो लोगों के पास प्राकृतिक रूप से हो।
   खबर है कि जियानकई ने कहा कि इस प्रयोग में शामिल माता-पिताओं ने अपनी पहचान जाहिर करने या साक्षात्कार देने से इनकार कर दिया है। उन्होंने कहा कि वह यह भी नहीं बताएंगे कि वे कहां रहते हैं और उन्होंने यह प्रयोग कहां किया। खबर है कि ऐसे किया प्रयोग, जियानकुई के ऑनलाइन किए गए दावे के बारे में एमआईटी टेक्नॉलजी रिव्यू के इंडस्ट्री जर्नल लेख प्रकाशित हुआ है। इस वीडियो के रिलीज होने के बाद से वैज्ञानिकों में बहस छिड़ी हुई है।
   जियानकुई का कहना है कि 'लुलू' और 'नाना' नाम की इन बहनों को आईवीएफ तकनीक से पैदा किया गया और गर्भ में प्रवेश होने से पहले ही अंडाणु में बदलाव कर दिए गए थे। उनके मुताबिक, ''शुक्राणुओं के प्रवेश के बाद भ्रूणविज्ञानी ने सीआरआईएसपीआर प्रोटीन को भी प्रवेश कराया। जिसका मकसद बच्चियों को एचआईवी संक्रमण से बचाना था''। 
  खबर है कि अनुसंधानकर्ता के इस दावे की स्वतंत्र रूप से कोई पुष्टि नहीं हो सकी है और इसका प्रकाशन किसी पत्रिका में भी नहीं हुआ है, जहां अन्य विशेषज्ञों ने इस पर अपनी मुहर लगाई होध् एमआईटी टेक्नॉलजी रिव्यू ने चेतावनी दी है कि यह तकनीक नैतिक रूप से सही नहीं है क्योंकि भ्रूण में परिवर्तन भविष्य की पीढ़ियों को विरासत में मिलेगा और अंततः समूचे जीन को प्रभावित कर सकता है।
   खबर है कि डीएनए लंबी उम्र के लिए अच्छे जीन्स का होना जरूरी है। जीन्स हमें अपने माता पिता से मिलते हैं। अकसर देखा गया है कि जो मां बाप लंबा जीते हैं, उनके बच्चों की उम्र भी लंबी होती है। इसकी वजह हमारे डीएनए में छिपी है। सही जीन के होने से हमारी जीवन प्रत्याशा बढ़ सकती है। हमारी उम्र पर इनका 25 से 30 फीसदी तक असर होता है।
   खबर है कि महिलाएं आम तौर पर पुरुषों से लंबा जीती हैं। ऐसा क्यों है, इसका जवाब शायद हमारे क्रोमोजोम में छिपा है। महिलाओं में दो एक्स क्रोमोजोम होते हैं, जबकि पुरुषों में एक एक्स और एक वाय. अगर वाय में कुछ गड़बड़ी हो जाए, तो एक्स कोई मदद नहीं कर सकता। इसलिए पुरुषों में जीन डिफेक्ट अधिक देखे जाते हैं।
   खबर है कि अच्छी सेहत के लिए सही तरह का खाना बेहद जरूरी है। जैसे कि मेडिटरेनियन डाइट यानी भूमध्यसागर के इलाकों में रहने वाले लोगों का खान पान. ऑलिव ऑयल, सब्जियां और सलाद खाने वालों की उम्र लंबी होती है। साथ ही, दिन भर में कितनी कैलोरी लेते हैं, ये भी उम्र को निर्धारित करता है। सही आहार के जरिए अपने वजन पर काबू करने वाला लंबा जीता है।
   खबर है कि अमेरिका में हुए एक शोध में देखा गया कि जो लोग अपनी बढ़ती उम्र को ले कर सकारात्मक रवैया रखते हैं, वे लंबा जी पाते हैं. रिसर्च के अनुसार रिटायर होने के बाद आराम करने वालों की तुलना में वो लोग जो साठ-पैंसठ की उम्र के बाद भी खुद को व्यस्त रखते हैं, वे चार साल लंबा जीते हैं. यानी बुढ़ापे में व्यस्त रहने से उम्र लंबी होती है।
   नियमित रूप से कसरत करना और चलते फिरते रहना सेहत और उम्र दोनों के लिए अच्छा है. जो लोग जॉगिंग करते रहे हैं, उसका फायदा उन्हें तब भी मिलता है, जब वे बुढ़ापे में दौड़ना भागना बंद कर देते हैं। कसरत करने से शरीर की कोशिकाओं में ऐसे बदलाव होते हैं, जो कसरत करना छोड़ने पर भी बने रहते हैं. कसरत करने से शरीर लंबी उम्र के लिए तैयार होता है।

Sunday, 16 December 2018

इन देशों में कोई एयरपोर्ट नहीं

   सस्ती किरायों ने विमान यात्राओं को आम आदमी की पहुंच में ला लिया है और हर साल विमान से सफर करने वालों की तादाद बढ़ रही है. लेकिन अब भी कुछ ऐसे देश हैं जहां कोई एयरपोर्ट नहीं है। 

   यहां देखिए ये कौन से देश हैं। खबर तो यही कि है कि अंडोरा, बिना एयरपोर्ट वाले देशों में यह सबसे बड़ा है. यहां तीन निजी हैलीपैड हैं और सबसे नजदीकी एयरपोर्ट करीब 12 किलोमीटर दूर है।
  खबर है कि लिश्टेनश्टाइन, जर्मन भाषी लिश्टेनश्टाइन ऑस्ट्रिया और स्विट्जरलैड के बीच बसा एक छोटा सा देश है। यहां एक हैलीपोर्ट है और नजदीकी एयरपोर्ट है ज्यूरिख।
   खबर है कि मोनाको, फ्रांस की सीमा से लगते पश्चिम यूरोपीय देश मोनाको में कोई एयरपोर्ट नहीं है. इसका सबसे नजदीकी एयरपोर्ट है फ्रांस का कोट डे अजूर। खबर है कि सान मरीनो, इटैलियन प्रायद्वीप में मौजूद इस देश में भी कोई एयरपोर्ट तो नहीं लेकिन एक हेलीपोर्ट और छोटा सा एयरफील्ड जरूर है. नजदीकी एयरपोर्ट इटली में है। 
  खबर है कि वैटिकन सिटी, वैटिकन में भी कोई एयरपोर्ट नहीं है लेकिन एक हैलीपोर्ट है. वास्तव में इसकी छोटी सी जमीन पर एयरपोर्ट बनाना मुमकिन नहीं. नजदीकी एयरपोर्ट है रोम।

Saturday, 15 December 2018

अब नेपाल में नहीं चलेंगे भारतीय नोट !

   खबर तो यही कि है नेपाल की सरकार ने भारतीय मुद्रा के सौ से ऊपर के नोटों पर पाबंदी लगा दी है। मतलब नेपाल में सौ से ऊपर के भारतीय नोट नहीं चलेंगे। 

   पाबंदी के पहले तक नेपाल में स्थानीय मुद्रा के साथ भारत के सभी नोट भी चलन में थे। नेपाल की सरकार ने भारतीय मुद्रा के सौ से ऊपर के नोटों पर पाबंदी लगा दी है।
   मतलब नेपाल में सौ से ऊपर के भारतीय नोट नहीं चलेंगे। खबर है कि पाबंदी के पहले तक नेपाल में स्थानीय मुद्रा के साथ भारत के सभी नोट भी चलन में थे।
   खबर है कि आख़िर नेपाल ने अचानक से ये फ़ैसला क्यों लिया? हाल ही में नेपाल के मंत्रियों की एक बैठक हुई थी और इसी बैठक में यह फ़ैसला लेकर एक नोटिस जारी किया गया कि 200, 500 और 2,000 के भारतीय नोट नेपाल में अवैध होंगे।
   खबर है कि सबसे दिलचस्प ये है कि नेपाल ने इसकी कोई वजह नहीं बताई है। नेपाल की तरफ़ से जो आधिकारिक नोटिस जारी किया गया, उसमें भी कोई कारण नहीं बताया गया है। ऐसे में सवाल उठता है कि नेपाल को अचानक इसकी क्या ज़रूरत आन पड़ी?
  खबर है कि कहते हैं कि ये फ़ैसला क्यों लिया गया, अभी तक साफ़ नहीं है।
खबर है कि ''ज़ाहिर है इसका असर लोगों पर पड़ेगा। ख़ासकर सीमाई इलाक़ों में भारतीय व्यापारियों को समस्या होगी। नहीं लगता है कि इससे भारत को कोई नुक़सान होगा। दोनों देशों के उन कामगारों को दिक़्क़त होगी जो एक दूसरे के देश में काम या व्यापार करते हैं।
  खबर है कि नेपाल सरकार का ये फ़ैसला कितना व्यावहारिक होगा? क्या इस फ़ैसले से लोग 100 से ऊपर के नोटों से लेनदेन बंद कर देंगे? इस सवाल के जवाब में कहते हैं, ये सवाल वाक़ई अहम है कि क्या सरकार का फ़ैसला प्रभावी होगा? वो भी तब जब ये नोट न लेने वाले को दिक़्क़त है और न देने वाले को।
  हालांकि कहते हैं कि भारतीय नोट पर पाबंदी लगाने की एक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि भी है। कहते हैं, 1999 में जब भारत के यात्री विमान को आतंकियों ने हाईजैक किया था तब भारत सरकार के आग्रह पर नेपाल ने 500 के नोट को बैन कर दिया था। खबर है कि भारत ने जब नोटबंदी की तो नेपाल में भी करोड़ों के 500 और 1000 के पुराने भारतीय नोट थे। अब तक इन पुराने नोटों का कोई समाधान नहीं निकल पाया है। ज़ाहिर है भारत के नोटबंदी के फ़ैसले से नेपाल को नुक़सान हुआ। लेकिन नेपाल ने अभी जो फ़ैसला लिया है, उससे इस पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
  खबर है कि नोटबंदी के कारण नेपाल और भूटान को काफ़ी नुक़सान हुआ था। भारतीय वित्त मंत्रालय ने अब तक दोनों देशों में मौजूद पुराने नोटों पर कुछ ठोस नहीं किया है।
   कहा जा रहा है कि नेपाल ने जो अब फ़ैसला लिया है इसकी आशंका पहले से ही थी। नेपाल और भूटान से भारत का कोई औपचारिक समझौता नहीं है कि नेपाल में भारतीय मुद्रा लेन-देन के लिए वैध होगी।
   खबर है कि नेपाल के बाज़ार में पारंपरिक रूप से भारतीय नोट स्वीकार्य हैं। भारत में भी नेपाली नागरिकों के लिए नौकरी और कारोबार करने की छूट है। भारत के फ़ेमा क़ानून यानी फ़ॉरन एक्सचेंज मैनेजमेंट एक्ट के अनुसार नेपाल जाने वाला व्यक्ति अपने साथ 25 हज़ार की नक़दी लेकर जा सकता है।
    खबर है कि नेपाल में 2014 तक 500 और 1000 के नोटों के लेन-देन पर पाबंदी थी। ऐसा भारत सरकार के आग्रह पर ही किया गया था। अगस्त 2015 में ये पाबंदी हटाई गई ।.
नवंबर 2016 में जब भारत ने 500 और 1000 के नोटों पर पाबंदी लगाई तो नेपाल और भूटान के केंद्रीय बैंकों ने पुराने नोटों को बदलने के लिए कहा. इसके लिए कई चरणों में बातचीत भी हुई लेकिन कोई औपचारिक फ़ैसला नहीं लिया जा सका।
   खबर है कि समस्या ये थी कि दोनों देशों में मौजूद पुराने नोटों को अवैध नहीं कहा जा सकता था और वैध क़रार देने के लिए कोई ठोस आधार भी नहीं था क्योंकि भारतीय नोटों के चलन को लेकर कोई औपचारिक समझौता नहीं था।

Friday, 14 December 2018

दुनिया का तीसरा रेल विश्वविद्यालय भारत में खुला

  देश के केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल आैर गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी शनिवार को देश के प्रथम रेल विश्वविद्यालय देश को समर्पित करेंगे। रूस आैर चीन के बाद यह दुनिया का ऐसा तीसरा विश्वविद्यालय है जो रेल के कामकाज से जुड़े अध्ययन में संलग्न है।

 खबर है कि रेल मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने यह जानकारी दी। खबर है कि गुजरात के वडोदरा में बने राष्ट्रीय रेल आैर परिवहन संस्थान (एनआरटीआई) ने इस साल सितंबर में दो पूर्ण आवासीय स्नातक पाठ्यक्रमों में 20 राज्यों के 103 छात्रों के पहले बैच को प्रवेश दिया था।
   खबर है कि विश्वविद्यालय ने दो स्नातक कार्यक्रम ट्रांसपोर्टेशन टेक्नोलॉजी में बीएससी आैर ट्रांसपोर्टेशन मैनेजमेंट में बीबीए शुरू किया है। विश्वविद्यालय का उद्देश्य ट्रांसपोर्ट एडं सिस्टम डिजाइन, ट्रांसपोर्ट सिस्टम्स इंजीनियरिंग, ट्रांसपोर्ट पॉलिसी एडं इकोनॉमिक्स जैसे क्षेत्रों में 2019-20 के शैक्षणिक सत्र से स्नातकोत्तर पाठयक्रम शुरू करना है।
   खबर है कि अधिकारी ने कहा, यह बहुत गर्व का विषय है कि इस तरह का एक अद्वितीय संस्थान, इस तरह के विविध पाठ्यक्रमों को लेकर 15 दिसंबर को देश को समर्पित किया जायेगा। 
  खबर है कि विश्वविद्यालय परिसर में 17 छात्राएं आैर 86 छात्र हैं। ये देश के 20 राज्यों से आये हैं। बीबीए- ट्रांसपोर्ट मैनेजमेंट में 41 आैर बीएससी- ट्रांसपोर्ट टेक्नोलॉजी 62 छात्र अध्ययनरत हैं।
   खबर है कि रेल मंत्रालय ने अगले पांच वर्षों तक इस परियोजना के लिए 421 करोड़ रूपये मंजूर किए हैं।

Wednesday, 12 December 2018

जब एक फल के चलते विमान से उतर गए यात्री...

   खबर है कि कभी सुना है कि विमान में बैठे यात्रियों ने विमान में जाकर यात्रा करने से मना कर दिया हो. जी हां, इंडोनेशिया में एक ऐसा ही वाकया हुआ जब यात्रियों ने एक फल से आ रही गंध के चलते यात्रा करने से मना कर दिया।

   यह मामला है इंडोनेशिया में सुमात्रा से जकार्ता जाने वाले श्री विजया एयरलाइंस के विमान का। इस विमान के कार्गो में ड्यूरिन नाम का फल लादा गया था।
   इस फल की गंध इतनी तेज थी कि यात्रियों ने फल से लदे विमान में यात्रा करने से ही मना कर दिया। खबर है कि दक्षिणपूर्व एशिया में ड्यूरिन एक मशहूर फल है। कुछ इलाकों में इसे "फलों का राजा" भी कहा जाता है।
   इस फल को पसंद करने वाले इसकी खुशबू और इसके क्रीमी स्वाद को पसंद करते हैं, वहीं कुछ लोगों की इसकी गंध नाली और गंदे जुर्राबों जैसे लगती है।

Tuesday, 11 December 2018

युगांडा में लोग पी रहे ऊंट का पेशाब !

  अफ्रीकी देश युगांडा के कारामोजा इलाके में लोग अलग अलग कारणों से ऊंट पालते हैं। ऊंटों से उन्हें सिर्फ दूध और मांस नहीं मिलता बल्कि इसके पेशाब को भी वो बहुत गुणकारी मानते हैं। 

  खबर है कि कारामोजा के लोगों का कहना है कि ऊंट का पेशाब न सिर्फ स्वस्थ रहने में मदद करता है बल्कि इसे पीने से एचआईवी एड्स जैसी बीमारियों का भी इलाज किया जा सकता है।
  हालांकि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने लोगों से ऊंट के पेशाब से दूर रहने को कहा है। उसके मुताबिक इससे कोई बीमारी ठीक नहीं होती, बल्कि उल्टा बीमारियां लगने का खतरा है। लेकिन अफ्रीका न्यूज की रिपोर्ट के मुताबिक कारामोजा में बहुत से लोग इसे दवाई के तौर पर ही देखते हैं। 
  खबर है कि एक स्थानीय निवासी ने कहा, इस मूत्र को आप दिन में तीन बार पीजिए. सुबह को, दोपहर को और शाम को। अगर फिर भी (एड्स) के लक्षण दिखाई देते हैं तो चार महीने तक इसे लेते रहिए। फिर डॉक्टर के पास जाइए। अगर आपको मुंह में दर्द होता है। चिंता मत करिए वो जल्द ही चला जाएगा।
   खबर है कि दूसरी तरफ डब्ल्यूएचओ का कहना है कि ऊंट का मूत्र पीने से सांस संबंध बीमारी मर्स हो सकती है। इसलिए इसे किसी भी हालत में नहीं पीना चाहिए। खबर है कि हालांकि युगांडा की सरकार की तरफ से इस बारे में कुछ नहीं कहा गया है। ऐसे में, सस्ता इलाज चाहने वाले लोगों को इसमें कहीं न कहीं एक उम्मीद दिखाई देती है।
   खबर है कि सऊदी अरब में भी 2015 में अधिकारियों ने ऊंट का पेशाब बेचने वाली एक दुकान को बंद कराया था। अधिकारियों को पता चला कि व्यक्ति ऊंट का नहीं बल्कि अपना पेशाब ही बोतलों में भर कर बेच रहा था। 
   खबर है कि सऊदी शहर अलकुनफुदा में जब अधिकारियों को उसकी दुकान पर छापा मारा तो वहां से पेशाब की 70 बोलतें मिलीं। 
  खबर है कि ऊंट का पेशाब पीने की परंपरा की शुरुआत इस्लामी धार्मिक किताब हदीस में एक उल्लेख से मानी जाती है। खबर है कि इसमें लिखा गया है, उल्क यानी उरैना कबीले के कुछ लोग मदीना आए तो यहां की जलवायु उन्हें रास नहीं आई।
 इसलिए उनसे (दूध वाले) ऊंटों के झुंड में जाने और उनका दूध और (दवाई के रूप में) पेशाब पीने को कहा। खबर है कि ऐसे ऊंट के पेशाब के गुणकारी होने की बात को जहां कई मुस्लिम विद्वान मानते हैं, वहीं इस पर सवाल उठाने वालों की भी कमी नहीं है।

Sunday, 9 December 2018

अब इंसान के शरीर में धड़केगा सुअर का दिल !

   मेडिकल साइंस अंग प्रत्यर्पण के लिए पूरी तरह से अंगदाताओं पर निर्भर करता है। शोध एवं खबर तो यही कहती है कि एक जर्मन सर्जन ने सूअर के दिल को लंगूर में सफलतापूर्वक प्रत्यर्पित कर जल्द ही सुअरों का दिल इंसानों में धड़काने की संभावना भी जगा दी है।

   शोध एवं खबर है कि जर्मन सर्जन ब्रूनो राइषार्ट ने लंगूर के शरीर में सूअर के दिल का सफलतापूर्वक प्रत्यर्पण किया है। अब यह उम्मीद जतायी जा रही है कि ऐसा प्रयोग इंसान के साथ भी आजमाया जाएगा, इंसान के शरीर में सूअर का दिल धड़कने की कितनी संभावना है। 
  खबर है कि पहली बार लंगूर के शरीर में सूअर के दिल का प्रत्यर्पण उम्मीद जगाता है कि यह इंसान के साथ भी संभव हो सकेगा. सवाल है कि जानवरों में सूअर को ही डोनर के रूप में क्यों चुना गया?
   खबर है कि यहां नैतिकता अहम है. हम सुअरों को लंबे समय से खा रहे हैं। इन्हें मारने को लेकर समाज में स्वीकार्यता भी है। एक सूअर हर चार महीने में बच्चे पैदा करने की स्थिति में होता है। इतना ही नहीं जन्म के छह महीने बाद ही सूअर प्रजनन के लिए पूरी तरह तैयार हो जाते हैं, वहीं सूअर का दिल इंसान के दिल से काफी मिलता-जुलता है।
   खबर है कि वैसे भी पिछले 40 सालों से इंसानों के शरीर में सूअर के हृदय के वॉल्व का इस्तेमाल तो हो ही रहा है। इस प्रक्रिया अंग लेने वाले के रूप में लंगूर को ही क्यों चुना गया? ये प्रशासन की मांग थी. उनका कहना था कि प्रत्यर्पण सूअर या कुत्ते के शरीर में नहीं किया जाना चाहिए। इसके बजाय किसी ऐसे को चुना जाना चाहिए जो जैविक रूप से इंसानों के करीब हो ताकि यह समझा जा सके कि इस तरह की प्रक्रिया इंसानों के साथ कितनी सफल होगी। 
  खबर है कि क्या इस प्रक्रिया में किसी भी साधारण सूअर को बतौर डोनर चुना जा सकता है? सूअर का दिल इंसान स्वीकार करें, इसके लिए पहले डोनर के अंग को इसके अनुकूल बनाना होगा. यही कारण है कि प्रत्यर्पण से पहले सूअर के दिल में अनुवांशिक रूप से बदलाव किया जाता है। इस तरह के प्रत्यर्पण से क्या फायदा होगा? 
   खबर है कि सबसे बड़ी बात तो यह है कि इससे अंगदाताओं की भारी कमी की समस्या में लाभ मिलेगा। क्या इसे सफलता का क्षण कहा जा सकता है? खबर है कि कुछ और भी सफलताएं मिलनी चाहिए. मुझे डर भी है। दरअसल अब हमें पैसा चाहिए, क्योंकि इस तरह के प्रयोग महंगे हैं। खबर है कि  हमें निवेशक चाहिए, और यूरोप में निवेशक खोज पाना बहुत मुश्किल है।
   जर्मन रिसर्च फाउंडेशन ने अब तक काफी वित्तीय सहायता दी है, लेकिन आगे की पायलट स्टडी के लिए हमें अतिरिक्त धन, साधन के साथ-साथ अस्पताल भी चाहिए। आपको कैसे इतना भरोसा है कि यह काम करेगा? आपको हमेशा खुद को अज्ञात चीजों की ओर ले जाना होता है. ऐसी आशंकाएं कम हैं कि यह काम नहीं करेगा।