Sunday, 26 March 2017

कृषि विश्वविद्यालयों के लिए 40 प्रतिशत अतिरिक्त धन

             कृषि शिक्षा में गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए केंद्र सरकार ने केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालयों की स्थापना के बारे में दिशा निर्देश तैयार किए हैं।

             कृषि और कृषक कल्याण मंत्री राधा मोहन सिंह ने कहा है कि खेती के क्षेत्र में खुशहाली लाने की दिशा में सबसे बड़ी चुनौतियों में छोटी जोतों का उत्पादन बढ़ाना, खेती की लागत में कमी लाना और उत्पादकता बनाए रखना शामिल है। वे नई दिल्ली में विद्यार्थी कल्याण न्यास, भोपाल और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, पूसा, नई दिल्ली द्वारा आयोजित एक सेमीनार को संबोधित कर रहे थे। इस अवसर पर डा. त्रिलोचन महापात्र, निदेशक आईएआरआई-कृषि जागरण, डा. एके सिंह, उप महानिदेशक (कृषि विस्तार), डा. जे कुमार, डीन कालेज आफ अग्रीकल्चर, पंत नगर, एनसी गौतम, कुलपति एनजीसीजीवी, चित्रकूट और प्रोफेसर एएमएल पाठक, कुलपति डीयूवीएएसयू, मथुरा उपस्थित थे। 

              कृषि और कृषक कल्याण मंत्री ने कहा कि खेती के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती छोटी जोतों को लाभकारी बनाना और ग्रामीण युवाओं को खेती कार्यों में संलग्न करने की है। उन्होंने कहा कि यह कार्य कठिन है, लेकिन असंभव नहीं है। सिंह ने कहा कि मृदा स्वास्थ्य कार्ड कार्यक्रम को समुचित रूप से लागू करना अत्यंत महत्वपूर्ण है। हमें उर्वरकों के सही इस्तेमाल के बारे में किसानों को जागरूक बनाने की आवश्यकता है, ताकि वे भूमि की उर्वरता बनाए रखते हुए उत्पादन में वृद्धि कर सकें। उन्होंने कहा कि 11 करोड़ मृदा कार्ड वितरित करने का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन अभी तक हम केवल 6 करोड़ मदा कार्ड जारी कर पाए हैं। उन्होंने कहा कि सरकार ने 2015 में प्रत्येक खेत तक पानी पहुंचाने और प्रति बूंद अधिक जल इस्तेमाल में सुधार लाने के लिए प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना प्रारंभ की थी।

                 उन्होंने कहा कि किसानों की आय दोगुना करने में वर्षा जल के प्रबंधन और जल संरक्षण से मदद मिलेगी। उन्होंने कहा कि हम समेकित खेती प्रणाली को बढ़ावा दे रहे हैं, ताकि बागवानी, पशुपालन, कृषि वानिकी और अन्य मिश्रित खेती प्रणालियों के जरिए किसानों की आय में बढ़ोतरी की जा सके। उन्होंने कहा कि पांचवीं डीन समिति की की सिफारिशों के अनुसार कृषि पाठ्यक्रमों में सुधार किया गया है। 

           उन्होंने कहा कि खेती व्यापार में युवाओं को संलग्न करने के लिए विद्यार्थी रेडी (ग्रामीण उद्यमशीलता जागरूकता विकास योजना)  कार्यक्रम शुरू किया गया है। इसके अंतर्गत दी जाने वाली स्कालरशिप  एक हजार रुपये प्रतिमाह से बढ़ा कर 3000 रुपये प्रति माह कर दी गई है। इन सभी प्रयासों के फलस्वरूप आईसीएआर के अंतर्गत कालेजों में दाखिलों में 17 प्रतिशत वृद्धि हुई है।

स्वच्छ भारत हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता : योगी

          उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने घोषणा की कि स्वच्छ भारत मिशन के उद्देश्य और लक्ष्य राज्य में नई सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता होंगे। 

           उन्होंने यह बात उस समय कही, जब पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय के सचिव  परमेश्वरन अय्यर के नेतृत्व में एक केंद्रीय दल ने लखनऊ में उनसे भेंट की। इससे पहले, इस सप्ताह मुख्यमंत्री ने घोषणा की थी कि राज्य में 30 जिलों को दिसम्बर 2017 तक खुले में शौच जाने से मुक्त बनाया जाएगा। सचिव, अय्यर ने मुख्यमंत्री को बताया कि राज्य में खुले में शौच जाने से मुक्ति का लक्ष्य हासिल करने के लिए राज्य सरकार को केंद्र की तरफ से मदद दी जाएगी। इस मदद के अंतर्गत एक युवा व्यवसायी की नियुक्ति शामिल है, जो उत्तर प्रदेश के 75 जिलों में से प्रत्येक जिले में जिला स्वच्छ भारत प्रेरक के रूप में की जाएगी।

             राज्य को वरीयता के अनुसार धन आवंटित किया जाएगा और पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय द्वारा निरंतर तकनीकी सहायता, प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण में जिलों की सहायता की जाएगी।मुख्य रूप से राज्य के चार जिलों – वाराणसी, ऐटा, सोनभद्र और आगरा को इस वर्ष के अंत तक खुले में शौच जाने से मुक्त बनाया जाएगा। इन जिलों ने स्वेच्छा से यह लक्ष्य हासिल करने की घोषणा की है। मुख्यमंत्री द्वारा घोषित 30 जिलों को मिलाकर 2017 के अंत तक उत्तर प्रदेश के कुल 34 जिले खुले में शौच जाने के मुक्त बन जाएंगे।

दूषित पर्यावरण का वैश्विक बोझ करीब 24 प्रतिशत

                 भारत के राष्ट्रपति ने ‘‘विश्व पर्यावरण सम्मेलन’’ का उद्घाटन किया। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने नई दिल्ली में राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण द्वारा आयोजित विश्व पर्यावरण सम्मेलन का उद्घाटन किया।

            इस अवसर पर राष्ट्रपति ने इस तथ्य का स्वागत किया कि पर्यावरण संरक्षण अब समावेशी और साझा कार्यक्रम बन गया है। लोगों में सामान्य जागरूकता बढ़ने और विश्वभर की सरकारों की सुदृढ़ राजनीतिक इच्छा शक्ति के चलते पिछले वर्षों में यह परिवर्तन संभव हुआ है। उन्होंने महात्मा गांधी के उस कथन का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि ‘‘पृथ्वी प्रत्येक व्यक्ति की जरूरतें पूरी करने के लिए पर्याप्त देती है, लेकिन हर व्यक्ति का लालच पूरा नहीं कर सकती।’’ राष्ट्रपति ने कहा कि हाल के अध्ययनों और सिलसिलेवार समीक्षाओं से पता चलता है कि स्वस्थ जीवन के वर्षों के संदर्भ में दूषित पर्यावरण का वैश्विक बोझ करीब 24 प्रतिशत है और कुल मौतों में दूषित पर्यावरण का योगदान 23 प्रतिशत है। दूषित पर्यावरण से होने वाली बीमारियों का सबसे बुरा प्रभाव बच्चों पर पड़ता है, जिनकी मृत्यु पेचिस, मलेरिया और सांस से होने वाली बीमारियों के कारण होती है। ये सभी रोग पर्यावरण विषयक हैं। अंधाधुंध उद्योगीकरण से उत्पन्न कार्सेनेजन्स के कारण विश्वभर में कैंसर से 19 प्रतिशत मौतें होती हैं। 

                राष्ट्रपति ने कहा कि अब समय आ गया है कि हमें अपने से यह सवाल करना चाहिए कि हम पर्यावरण से होने वाली कितनी क्षति सहन कर सकते हैं। राष्ट्रपति ने राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण को इस बात के लिए बधाई दी कि भारत के इस प्रमुख पर्यावरण नियंत्रक संगठन ने वैश्विक दृष्टि से महत्वपूर्ण पर्यावरणीय मुद्दों पर विचार विमर्श के लिए एक व्यापक मंच प्रदान किया। राष्ट्रपति ने पर्यावरणविद् वेंडेल बैरी का कथन उद्धृत किया जिसमें उन्होंने कहा था कि ‘‘धरती हम सब की साझा संपत्ति है। 

                वैश्विक विकास इस ग्रह के जिम्मेदारीपूर्ण प्रबंधन के अधीन है’’। उन्होंने इस बात पर प्रसन्नता व्यक्त की कि पिछले एक दशक में पर्यावरण के मुद्दों पर विश्वभर में आम सहमति बनी है। उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र के जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क कन्वेंशन के तत्वावधान में हुआ पेरिस समझौता इसी आम सहमति का परिणाम है।

जलवायु परिवर्तन एक प्रमुख वैश्विक चुनौती

         राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण ने नई दिल्ली में ‘विश्व पर्यावरण सम्मेलन’ का आयोजन किया। गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने सम्मेलन को संबोधित किया। 

     गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने  कहा, मुझे आज महात्मागांधी के वे स्वर्णिम शब्द याद आ रहे हैं, जिनमें उन्होंने कहा था, ‘‘धरती के पास हर किसी की जरूरत पूरी करने के लिए पर्याप्त है, लेकिन वह किसी का लालच पूरा नहीं कर सकती’’। मानवता की खुशहाली, पर्यावरण और अर्थव्यवस्था की कार्य प्रणाली, अंततः इस धरती पर उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों के युक्तिसंगत और जिम्मेदारीपूर्ण प्रबंधन पर निर्भर करती है। मानवता उससे अधिक प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल नहीं कर सकती, जितना कि धरती मां हमें स्थिरतापूर्वक प्रदान कर सकती है।
 

           गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने  कहा,  मानवता को आज जिस संकट का सामना करना पड़ रहा है, उसने हमें मानव-प्रकृति के समूचे संबंधों की समीक्षा करने के लिए बाध्य कर दिया है। यह बात पिछले 5 दशकों में हुई घटनाओं और तदनुरूप विकास की भावी कार्यनीति के संदर्भ में अधिक महत्वपूर्ण है। भारत के लोगों का हमेशा यह विश्वास रहा है कि प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण संबंध बनाए रखा जाए और हम उसे मां के रूप में देखते हैं। हम प्रकृति के बिना नहीं रह सकते हैं। प्रकृति का शोषण नहीं किया जाना चाहिए बल्कि मानव मात्र की खुशहाली के लिए उसका संरक्षण जरूरी है। प्रकृति के साथ संतुलन की स्थिति में हमारा जीवन और जगत जिसमें हम रहते हैं, के बीच एक संतुलन बना रहता है।

              हमारे प्राचीन धर्मग्रंथों में हमेशा मानव और प्रकृति के बीच एक स्वस्थ और स्थायी संबंध बनाए रखने की आवश्यकता पर प्रकाश डाला गया है। अथर्व वेद में यह परम कर्तव्य बताया गया है कि हमें धरती की रक्षा अवश्य करनी है, ताकि जीवन की निरंतरता बनी रहे। धरती के साथ अपने संबंध को हमने ‘माता भूमि पुत्रो अह्म पृथ्व्या’ के रूप में परिभाषित किया है। गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने  कहा, भारत के संविधान में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि राज्यों का यह दायित्व है कि वे पर्यावरण की संरक्षा और उसमें सुधार लाएं और देश के वनों और वन्यजीवों को सुरक्षा प्रदान करें। भारत के नागरिक होने के नाते वनों, झीलों, नदियों और वन्यजीवों सहित प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा करना हमारा परम दायित्व है। राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांतों में भी पर्यावरण को शामिल किया गया है। 

            जीवन के मूलभूत अधिकार की व्याख्या में भी पर्यावरण समाहित है। स्वच्छ और स्वस्थ पर्यावरण, जैसा कि उच्चतम न्यायालय ने भी व्यवस्था दी है, किसी भी सभ्य समाज के बुनियादी सिद्धांतों में से एक है। प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन हमारे वर्तमान पर बुरा असर डाल रहे है और हमारे भविष्य पर भी इनका गंभीर दुष्प्रभाव पड़ने जा रहा है। यह अनुमान लगाया गया है कि यदि खपत और उत्पादन का वर्तमान पैटर्न जारी रहा, तो 2050 तक दुनिया की आबादी 9.6 अरब हो जाएगी। ऐसा होने पर हमें अपनी जीवन पद्धतियों और खपत को स्थिरता प्रदान करने के लिए तीन ग्रहों की आवश्यकता पड़ेगी। गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने  कहा, आज जलवायु परिवर्तन को एक प्रमुख वैश्विक चुनौती के रूप में स्वीकार किया गया है। 

                  भारत में हमारा विश्वास है कि जलवायु परिवर्तन ग्रीन हाउस गैस उत्सृजन का परिणाम है और नतीजतन जो धरती का तापमान बढ़ रहा है, उसका कारण विकसित राष्ट्रों में हुई औद्योगिक प्रगति है, जो जीवाष्म ईंधन की खपत से संचालित है। एक विकासशील देश के नाते भारत का इस धारणा से कुछ अधिक सरोकार नहीं है, लेकिन उसके दुष्परिणाम उसे भुगतने पड़ रहे हैं। जलवायु परिवर्तन हमारे करोड़ों किसानों के लिए एक गंभीर खतरा है, चूंकि इससे मौसम पद्धतियों में परिवर्तन हो रहा है और प्राकृतिक आपदाओं की आवृत्ति बढ़ रही है। दोनों ध्रुवों पर बर्फ पिघलने से बढ़ते समुद्र हमारी चिंता का कारण हैं। आर्कटिक और अंटार्कटिक में इस वर्ष बर्फ में रिकार्ड कमी दर्ज हुई है और पिघलते ध्रुव प्रदेश हमारी तट रेखाओं के प्रति गंभीर खतरा हैं। हमें भारत में इस बात की भी चिंता है कि हिमालय के ग्लेशियर घट रहे हैं, जो हमारी नदियों को पानी देते हैं और हमारी सभ्यता का पोषण करते हैं।
 

               उन्होंने कहा, पेरिस समझौते के अंतर्गत दुनिया की सरकारों ने संकल्प व्यक्त किया है कि वे ग्लोबल वार्मिंग को दो डिग्री सेंटिग्रेड से कम रखने के लिए अपने कार्बन उत्सर्जनों में भारी कमी लाएंगे। इस समझौते पर हस्ताक्षर करने वाले अधिकतर देशों ने लक्ष्य हासिल करने के लिए पहले ही राष्ट्रीय कार्य योजनाएं तैयार कर ली हैं और मुझे उम्मीद है कि ये योजनाएं हमारे युग के प्रति अधिक प्रतिबद्ध होंगी। भारत वैश्विक खतरों के प्रति संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा है। भारत सरकार ने हाल ही में यह लक्ष्य निर्धारित किया है कि 2022 तक 175 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा पैदा की जाएगी। 2030 तक हमारी संस्थापित विद्युत क्षमता का 40 प्रतिशत गैर-जीवाष्म ईंधन पर आधारित होगा।

               भारत सरकार आटोमोबाइल्स के लिए ईंधन के मानदंड बढ़ा रही है और भारत विश्व के उन गिने चुने देशों में से एक है, जिन्होंने कोयले पर कर लगाया है। हमने पैट्रोलियम उत्पादों पर सब्सिडी भी कम की है। यहां तक कि नवीकरणीय ऊर्जा के लिए हमने कर मुक्त बांड भी शुरू किए हैं। हमने अपने वन आच्छादित क्षेत्र का विस्तार करने और जैव विविधता की संरक्षा करने की भी योजना बनाई है। मुझे उम्मीद है कि इस सम्मेलन में विचार विमर्श से जो निष्कर्ष निकलेंगे और जो अनुशंसाएं की जाएंगी वे पर्यावरण के विधान और विचारधारा में वास्तविक प्रगति लाने में सहायक सिद्ध होंगी।’’

सवा-सौ करोड़ देशवासियों के मन के अन्दर एक आशा, एक उमंग, एक संकल्प, एक चाह : प्रधानमंत्री

            प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आकाशवाणी के मन की बात में कहा कि आज 26 मार्च है, 26 मार्च बांग्लादेश का स्वतंत्रता का दिवस है। अन्याय के ख़िलाफ़ एक ऐतिहासिक लड़ाई, बंग-बन्धु के नेतृत्व में बांग्लादेश की जनता की अभूतपूर्व विजय। इस महत्वपूर्ण दिवस पर मैं बांग्लादेश के नागरिक भाइयों-बहनों को स्वतंत्रता दिवस की बहुत-बहुत शुभकामनायें देता हूँ। 

          प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आकाशवाणी के मन की बात में कहा कि यह कामना करता हूँ कि बांग्लादेश आगे बढ़े, विकास करे और बांग्लादेशवासियों को भी मैं विश्वास दिलाता हूँ कि भारत बांग्लादेश का एक मज़बूत साथी है, एक अच्छा मित्र है और हम कंधे-से-कंधा मिला करके इस पूरे क्षेत्र के अन्दर शांति, सुरक्षा और विकास में अपना योगदान देते रहेंगे। हम सबको इस बात का गर्व है कि रवीन्द्रनाथ टैगोर, उनकी यादें, हमारी एक साझी विरासत है। बांग्लादेश का राष्ट्रगान भी गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की रचना है। गुरुदेव टैगोर के बारे में एक बात यह है कि 1913 में वे न केवल नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने वाले पहले एशियाई व्यक्ति थे, बल्कि उन्हें अंग्रेज़ों ने उपाधि दी थी। और जब 1919 में जलियांवाला बाग़ पर अंग्रेज़ों ने क़त्ले-आम किया, तो रवीन्द्रनाथ टैगोर उन महापुरुषों में थे, जिन्होंने अपनी आवाज़ बुलंद की थी और यही कालखंड था; जब 12 साल के एक बच्चे के मन पर इस घटना का गहरा प्रभाव हुआ था। किशोर-अवस्था में खेत-खलिहान में हँसते-कूदते उस बालक को जलियांवाला बाग़ के नृशंस हत्याकांड ने जीवन की एक नयी प्रेरणा दे दी थी। और 1919 में 12 साल का वो बालक भगत हम सबके प्रिय, हम सबकी प्रेरणा - शहीद भगतसिंह, आज से तीन दिन पूर्व, 23 मार्च को भगतसिंह जी को और उनके साथी, सुखदेव और राजगुरु को अंग्रेज़ों ने फांसी पर लटका दिया था। और हम सब जानते हैं 23 मार्च की वो घटना - भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरु के चेहरे पर माँ-भारती की सेवा करने का संतोष - मृत्यु का भय नहीं था; जीवन के सारे सपने, माँ-भारती की आज़ादी के लिए समाहित कर दिए थे। और ये तीनों वीर आज भी हम सबकी प्रेरणा हैं। भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु के बलिदान की गाथा को हम शब्दों में अलंकृत भी नहीं कर पाएँगे। और पूरी ब्रिटिश सल्तनत इन तीनों युवकों से डरती थी। जेल में बंद थे, फांसी तय थी, लेकिन इनके साथ कैसे आगे बढ़ा जाये, इसकी चिंता ब्रिटिशों को लगी रहती थी। और तभी तो 24 मार्च को फांसी देनी थी, लेकिन 23 मार्च को ही दे दी गयी थी; चोरी-छिपे से किया गया था, जो आम तौर पर नहीं किया जाता। और बाद में उनके शरीर को आज के पंजाब में ला करके, अंग्रेजों ने चुपचाप जला दिया था। कई वर्षों पूर्व जब पहली बार मुझे वहाँ जाने का मौका मिला था, उस धरती में एक प्रकार के अनुभव करता था। और मैं देश के नौजवानों को ज़रूर कहूंगा - जब भी मौका मिले तो, पंजाब जब जाएँ, तो भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरु, भगतसिंह की माताजी और बटुकेश्वर दत्त की समाधि के स्थान पर अवश्य जाएँ।

                  प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मन की बात में कहा कि  यही तो कालखंड था, जब आज़ादी की ललक, उसकी तीव्रता, उसका व्याप बढ़ता ही चला जा रहा था। एक तरफ़ भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरु जैसे वीरों ने सशस्त्र क्रांति के लिये युवकों को प्रेरणा दी थी। तो आज से ठीक सौ साल पहले, 10 अप्रैल, 1917 - महात्मा गाँधी ने चंपारण सत्याग्रह किया था। यह चंपारण सत्याग्रह की शताब्दी का वर्ष है। भारत की आज़ादी के आन्दोलन में, गाँधी विचार और गाँधी शैली, इसका प्रकट रूप पहली बार चंपारण में नज़र आया। आज़ादी की पूरी आंदोलन यात्रा में यह एक, ख़ास करके संघर्ष के तौर-तरीक़े की दृष्टि से। यही वो कालखंड था, चंपारण का सत्याग्रह, खेड़ा सत्याग्रह, अहमदाबाद में मिल-मज़दूरों की हड़ताल, और इन सबमें महात्मा गाँधी की विचार और कार्यशैली का गहरा प्रभाव नज़र आता था। 1915 में गाँधी विदेश से वापस आए और 1917 में बिहार के एक छोटे से गाँव में जाकर के उन्होंने देश को नई प्रेरणा दी।

            आज हमारे मन में महात्मा गाँधी की जो छवि है, उस छवि के आधार पर हम चंपारण सत्याग्रह का मूल्यांकन नहीं कर सकते हैं। कल्पना कीजिए कि एक इंसान, जो 1915 में हिन्दुस्तान वापस आए, सिर्फ़ दो साल का कार्यकाल। न देश उनको जानता था, न उनका प्रभाव था, अभी तो शुरुआत थी। उस समय उनको कितना कष्ट झेलना पडा होगा, कितनी मेहनत करनी पड़ी होगी, इसका हम अंदाज़ कर सकते हैं। और चंपारण सत्याग्रह ऐसा था कि जिसमें महात्मा गाँधी के संगठन कौशल, महात्मा गाँधी की भारतीय समाज की नब्ज़ को जानने की शक्ति, महात्मा गाँधी अपने व्यवहार से अंग्रेज सल्तनत के सामने ग़रीब से ग़रीब, अनपढ़ से अनपढ़ व्यक्ति को संघर्ष के लिये संगठित करना, प्रेरित करना, संघर्ष के लिये मैदान में लाना, ये अद्भुत शक्ति के दर्शन कराता है। और इसलिये जिस रूप में हम महात्मा गाँधी की विराटता को अनुभव करते हैं। लेकिन अगर सौ साल पहले के गाँधी को सोचें, उस चंपारण सत्याग्रह वाले गाँधी को, तो सार्वजनिक जीवन की शुरुआत करने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए चंपारण सत्याग्रह एक बहुत ही अध्ययन का विषय है। सार्वजनिक जीवन की शुरुआत कैसे की जा सकती है, ख़ुद कितना परिश्रम करना होता है और गाँधी ने कैसे किया था, यह हम उनसे सीख सकते हैं। और वो समय था, जितने बड़े-बड़े दिग्गज नेताओं के हम नाम सुनते हैं, गाँधी ने उस समय राजेंद्र बाबू हों, आचार्य कृपलानी जी हों; सबको गाँवों में भेजा था। लोगों के साथ जुड़ करके, लोग जो काम कर रहे हैं, उसी को आज़ादी के रंग से रंग देना - इसके तरीक़े सिखाए थे। और अंग्रेज़ लोग समझ ही नहीं पाए कि ये गाँधी का तौर-तरीका क्या है। संघर्ष भी चले, सृजन भी चले और दोनों एक साथ चले। गाँधी ने जैसे एक सिक्के के दो पहलू बना दिए थे, एक सिक्के का एक पहलू संघर्ष, तो दूसरा पहलू सृजन। एक तरफ़ जेल भर देना, तो दूसरी तरफ़ रचनात्मक कार्यों में अपने आप को खपा देना। एक बड़ा अद्भुत, गाँधी की कार्य-शैली में था। सत्याग्रह शब्द क्या होता है, असहमति क्या हो सकती है, इतनी बड़ी सल्तनत के सामने असहयोग क्या होता है - एक पूरी नई विभावना गाँधी ने शब्दों के द्वारा नहीं; एक सफल प्रयोग के द्वारा प्रस्थापित कर दी थी।  आज जब देश चंपारण सत्याग्रह की शताब्दी मना रहा है, तब भारत के सामान्य मानव की शक्ति कितनी अपार है, उस अपार शक्ति को आज़ादी के आन्दोलन की तरह, स्वराज से सुराज की यात्रा भी, सवा-सौ करोड़ देशवासियों की संकल्प शक्ति, परिश्रम की पराकाष्ठा, ‘सर्वजन हिताय – सर्वजन सुखाय’ इस मूल मन्त्र को ले करके, देश के लिये, समाज के लिये, कुछ कर-गुज़रने का अखंड प्रयास ही आज़ादी के लिये मर-मिटने वाले उन महापुरुषों के सपनों को साकार करेगा। आज जब हम 21वीं सदी में जी रहे हैं, तब कौन हिन्दुस्तानी ऐसा होगा, जो भारत को बदलना नहीं चाहता होगा; कौन हिन्दुस्तानी होगा, जो देश में बदलाव के लिये हिस्सेदार बनना नहीं चाहता हो। 

            सवा-सौ करोड़ देशवासियों की ये बदलाव की चाह, ये बदलाव का प्रयास, यही तो है, जो नये भारत, इसकी मज़बूत नींव डालेगा। यही भाव है कि सवा-सौ करोड़ देशवासी मिलकर के कैसा भव्य भारत बनाना चाहते हैं। सवा-सौ करोड़ देशवासियों के मन के अन्दर एक आशा है, एक उमंग है, एक संकल्प है, एक चाह है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मन की बात में कहा कि  मेरे प्यारे देशवासियो, अगर हम थोड़ा सा अपनी निजी ज़िन्दगी से हट करके संवेदना-सभर (संवेदना से भरी) नज़र से समाज में चल रही गतिविधियों को देखेंगें, हमारे अगल-बगल में क्या हो रहा है, उसको जानने-समझने का प्रयास करेंगे, तो हम हैरान हो जाएँगे कि लक्षावधि लोग निस्वार्थ भाव से अपनी निजी ज़िम्मेवारियों के अतिरिक्त समाज के लिये, शोषित-पीड़ित-वंचितों के लिये, ग़रीबों के लिये, दुखियारों के लिये कुछ-न-कुछ करते हुए नज़र आते हैं। और वे भी एक मूक सेवक की तरह जैसे तपस्या करते हों, साधना करते हों, वो करते रहते हैं। कई लोग होते हैं, जो नित्य अस्पताल जाते हैं, मरीज़ों की मदद करते हैं; अनेक लोग होते हैं, पता चलते ही रक्तदान के लिए दौड़ जाते हैं; अनेक लोग होते हैं, कोई भूखा है, तो उसके भोजन की चिंता करते हैं। हमारा देश बहुरत्ना वसुन्धरा है। जन-सेवा ही प्रभु-सेवा, यह हमारी रगों में है। अगर एक बार हम उसको सामूहिकता के रूप में देखें, संगठित रूप में देखें, तो ये कितनी बड़ी शक्ति है। 

          प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मन की बात में कहा कि  आइए, 2022 - भारत की आज़ादी के 75 साल होने जा रहे हैं। भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु को याद करते हैं, चंपारण के सत्याग्रह को याद करते हैं; तो क्यों न हम भी ‘स्वराज से सुराज’ की इस यात्रा में अपने जीवन को अनुशासित करके, संकल्पबद्ध करके क्यों न जोड़ें। मैं आपको निमंत्रण देता हूँ – आइए। मेरे प्यारे देशवासियो, मैं आज आपका आभार भी व्यक्त करना चाहता हूँ। पिछले कुछ महीनों में हमारे देश में एक ऐसा माहौल बना, बहुत बड़ी मात्रा में लोग डिजिधन आंदोलन में शरीक़ हुए। बिना नक़द कैसे लेन-देन की जा सकती है, उसकी जिज्ञासा भी बढ़ी है, ग़रीब से ग़रीब भी सीखने का प्रयास कर रहा है और धीरे-धीरे लोग भी बिना नक़द कारोबार कैसे करना, उसकी ओर आगे बढ़ रहे हैं। मेरे प्यारे देशवासियो, काले धन, भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ लड़ाई को हमें आगे बढ़ाना है। सवा-सौ करोड़ देशवासी इस एक वर्ष में ढाई हज़ार करोड़ लेन-देन का काम करने का संकल्प कर सकते हैं क्या? हमने बजट में घोषणा की है। सवा-सौ करोड़ देशवासियों के लिये ये काम अगर वो चाहें, तो एक साल का इंतज़ार करने की ज़रूरत नहीं, छः महीने में कर सकते हैं।

            प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मन की बात में कहा कि  रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में ये कर सकते हैं हम। आपको कल्पना नहीं है, लेकिन इससे आप देश की बहुत बड़ी सेवा कर सकते हैं और काले धन, भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ लड़ाई के आप एक वीर सैनिक बन सकते हैं। पिछले दिनों लोक-शिक्षा के लिये, लोक-जागृति के लिये डिजिधन मेला के कई कार्यक्रम हुए हैं। देश भर में 100 कार्यक्रम करने का संकल्प है।80-85 कार्यक्रम हो चुके हैं। उसमें इनाम योजना भी थी। 

            क़रीब साढ़े बारह लाख लोगों ने उपभोक्ता वाला ये इनाम प्राप्त किया है; 70 हज़ार लोगों ने व्यापारियों के लिये जो इनाम था, वो प्राप्त हुआ है। और हर किसी ने इस काम को आगे बढ़ाने का संकल्प भी किया है।14 अप्रैल डॉ. बाबा साहेब अम्बेडकर की जन्म-जयंती है। और बहुत पहले से जैसे तय हुआ था, 14 अप्रैल को बाबा साहेब अम्बेडकर की जन्म-जयंती पर इस डिजि-मेला का समापन होने वाला है। मेरे प्यारे देशवासियो, मुझे ख़ुशी है कि मुझे हर बार, जब भी ‘मन की बात’ के लिये लोगों से सुझाव माँगता हूँ, अनेक-अनेक प्रकार के सुझाव आते हैं। लेकिन ये मैंने देखा है कि स्वच्छता के विषय में हर बार आग्रह रहता ही रहता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मन की बात में कहा कि देखिए भाइयो-बहनो, 11वीं कक्षा की एक बेटी की कितनी पीड़ा है। उस नदी में कूड़ा-कचरा देख कर के उसको कितना गुस्सा आ रहा है। मैं इसे अच्छी निशानी मानता हूँ। मैं यही तो चाहता हूँ, सवा-सौ करोड़ देशवासियों के मन में गन्दगी के प्रति गुस्सा पैदा हो। एक बार गुस्सा पैदा होगा, नाराज़गी पैदा होगी, उसके प्रति रोष पैदा होगा, हम ही गन्दगी के खिलाफ़ कुछ-न-कुछ करने लग जाएँगे। और अच्छी बात है कि गायत्री स्वयं अपना गुस्सा भी प्रकट कर रही है, मुझे सुझाव भी दे रही है, लेकिन साथ-साथ ख़ुद ये भी कह रही है कि उसने काफ़ी प्रयास किए; लेकिन विफलता मिली। जब से स्वच्छता के आन्दोलन की शुरुआत हुई है, जागरूकता आई है। हर कोई उसमें सकारात्मक रूप से जुड़ता चला गया है। उसने एक आंदोलन का रूप भी लिया है।गन्दगी के प्रति नफ़रत भी बढ़ती चली जा रही है। जागरूकता हो, सक्रिय भागीदारी हो, आंदोलन हो, इसका अपना महत्व है ही है। लेकिन स्वच्छता आंदोलन से ज़्यादा आदत से जुड़ी हुई होती है। ये आंदोलन आदत बदलने का आंदोलन है, ये आंदोलन स्वच्छता की आदत पैदा करने का आंदोलन है, आंदोलन सामूहिक रूप से हो सकता है। काम कठिन है, लेकिन करना है। मुझे विश्वास है कि देश की नयी पीढ़ी में, बालकों में, विद्यार्थियों में, युवकों में, ये जो भाव जगा है, ये अपने-आप में अच्छे परिणाम के संकेत देता हैक्ष् आज की मेरी ‘मन की बात’ में गायत्री की बात जो भी सुन रहे हैं, मैं सारे देशवासियों को कहूँगा कि गायत्री का संदेश हम सब के लिये संदेश बनना चाहिए। 

                प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मन की बात में कहा कि  मेरे प्यारे देशवासियो, जब से मैं ‘मन की बात’ कार्यक्रम को कर रहा हूँ, प्रारंभ से ही एक बात पर कई सुझाव मुझे मिलते रहे हैं और वो ज़्यादातर लोगों ने चिंता जताई है। हम जानते हैं कि हम परिवार में भी और सामूहिक भोजन समारोह में भी ज़रूरत से ज़्यादा ले लेते हैं। जितनी चीज़ें दिखाई दे, सब सारी की सारी भर देते हैं और फिर खा नहीं पाते हैं। और फिर वहीं छोड़ कर निकल जाते हैं। आपने कभी सोचा है कि हम जो ये जूठन छोड़ देते हैं, उससे हम कितनी बर्बादी करते हैं; क्या कभी सोचा है कि अगर जूठन न छोड़ें, तो ये कितने ग़रीबों का पेट भर सकता है। ये विषय ऐसा नहीं है कि जो समझाना पड़े। वैसे हमारे परिवार में छोटे बालकों को जब माँ परोसती है, तो कहती है कि बेटा, जितना खा सकते हो, उतना ही लो। कुछ-न-कुछ तो प्रयास होता रहता है, लेकिन फिर भी इस विषय पर उदासीनता एक समाजद्रोह है, ग़रीबों के साथ अन्याय है। दूसरा, अगर बचत होगी, तो परिवार का भी तो आर्थिक लाभ है। समाज के लिये सोचें, अच्छी बात है, लेकिन ये विषय ऐसा है कि परिवार का भी लाभ है। मैं इस विषय पर ज़्यादा आग्रह नहीं कर रहा हूँ, लेकिन मैं चाहूँगा कि ये जागरूकता बढ़नी चाहिए।
 

            देखिए, बदलाव के लिये यही तो रास्ते होते हैं। और जो लोग शरीर स्वास्थ्य के संबंध में जागरूक होते हैं, वो तो हमेशा कहते हैं - पेट भी थोड़ा ख़ाली रखो, प्लेट भी थोड़ी ख़ाली रखो। और जब स्वास्थ्य की बात आई है, तो 7 अप्रैल को विश्व स्वास्थ्य दिवस है, संयुक्त राष्ट्र ने 2030 तक सबको स्वास्थ्य का लक्ष्य तय किया है।  प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आकाशवाणी के मन की बात में कहा कि  वैसे योग भी अपने मन को स्वस्थ रखने के लिये एक अच्छा मार्ग है। तनाव से मुक्ति, दबाव से मुक्ति, प्रसन्न चित्त की ओर प्रयाण - योग बहुत मदद करता है। 21 जून अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस है, ये तीसरा वर्ष होगा। आप भी अभी से तैयारी कीजिए और लाखों की तादाद में सामूहिक योग उत्सव मनाना चाहिए। आपके मन में तीसरे अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस के संबंध में अगर कोई सुझाव है, तो आप सुझाव मुझे ज़रूर भेजें, मार्गदर्शन करें। योग के संबंध में जितने गीत, काव्यमय रचनायें आप तैयार कर सकते हैं, वो करनी चाहिए, ताकि वो सहज रूप से लोगों को समझ आ जाता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आकाशवाणी के मन की बात में कहा कि  कामकाजी वर्ग में जो हमारी महिलायें हैं और दिनों-दिन उनकी संख्या भी बढ़ रही है, उनकी भागीदारी बढ़ रही है और ये स्वागत योग्य है, लेकिन साथ-साथ, महिलाओं के पास विशेष ज़िम्मेवारियाँ भी हैं। परिवार की ज़िम्मेवारियाँ वो संभालती हैं, घर की आर्थिक ज़िम्मेवारियाँ भी उसकी भागीदारी भी उसको करनी पड़ती है और उसके कारण कभी-कभी नवजात शिशु के साथ अन्याय हो जाता है।  

           भारत सरकार ने एक बहुत बड़ा फ़ैसला किया है। ये जो कामकाजी वर्ग की महिलायें हैं, उनको प्रसूति के समय, जो पहले 12 सप्ताह मिलती थी, अब 26 सप्ताह दी जाएगी। दुनिया में शायद दो या तीन ही देश हैं, जो हम से आगे हैं। भारत ने एक बहुत बड़ा महत्वपूर्ण फ़ैसला हमारी इन बहनों के लिये किया है। और उसका मूल उद्देश्य उस नवजात शिशु की देखभाल, भारत का भावी नागरिक, जन्म के प्रारम्भिक काल में उसकी सही देखभाल हो, माँ का उसको भरपूर प्यार मिले; तो हमारे ये बालक बड़े हो करके देश की अमानत बनेंगे। माताओं का स्वास्थ्य भी अच्छा रहेगा और इसलिये ये बहुत बड़ा महत्वपूर्ण निर्णय है। और इसके कारण काम करने वाली क़रीब 18 लाख महिलाओं को इसका फ़ायदा मिलेगा। 

               प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आकाशवाणी के मन की बात में कहा कि मेरे प्यारे देशवासियो, 5 अप्रैल को रामनवमी का पावन पर्व है, 9 अप्रैल को महावीर जयंती है, 14 अप्रैल को बाबा साहब अम्बेडकर की जन्म-जयंती है; ये सभी महापुरुषों का जीवन हमें प्रेरणा देता रहे, संकल्प करने की ताक़त दे। दो दिन के बाद चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, वर्ष प्रतिपदा, नव संवत्सर, इस नववर्ष के लिये आपको बहुत-बहुत शुभकामनायें। वसन्त ऋतु के बाद फ़सल पकने के प्रारंभ और किसानों को उनकी मेहनत का फल मिलने का ये ही समय है। हमारे देश के अलग-अलग कोने में इस नववर्ष को अलग-अलग रूप में मनाया जाता है। महाराष्ट्र में गुड़ी-पड़वा, आंध्र-कर्नाटक में नववर्ष के तौर पर उगादी, सिन्धी चेटी-चांद, कश्मीरी नवरेह, अवध के क्षेत्र में संवत्सर पूजा, बिहार के मिथिला में जुड़-शीतल और मगध में सतुवानी का त्योहार नववर्ष पर होता है। अनगिनत, भारत इतनी विविधताओं से भरा हुआ देश है। आपको भी इस नववर्ष की मेरी तरफ़ से बहुत-बहुत शुभकामनायें। बहुत-बहुत धन्यवाद।

94 शहरों को स्मार्ट सिटीज़ के रूप में स्थानीय निकायों की क्रेडिट रेटिंग 

          शहरों और कस्बों की क्रेडिट रेटिंग की कवायद के जोर पकड़ते स्मार्ट सिटी मिशन और अटल मिशन फार रिजुवेनेशन एंड अर्बन ट्रांसफार्मेशन (अमृत) में शामिल 500 शहरों में से 94 को ऐसी रेटिंग प्राप्त हुई है, जो संसाधन जुटाने के लिए म्युनिसिपल बांड जारी करने हेतु अनिवार्य है।

         शहरी विकास मंत्री एम. वेंकैया नायडू द्वारा शुरू की गई क्रेडिट रेटिंग कवायद की प्रगति की समीक्षा के दौरान पता चला कि इन में से 55 शहरों को ‘निवेश ग्रेड’ की रेटिंग प्राप्त हुई है। नायडू ने बताया कि 55 प्रतिशत शहरों को निवेश ग्रेडिंग रेटिंग के रूप में मूल्यांकित किया गया है। देश में शहरी स्थानीय निकायों की वित्तीय स्थिति के बारे में जैसा सोचा जा रहा था, उससे उनकी रेटिंग बेहतर रही है। क्रेडिट रेटिंग प्रदान किए गए 94 शहर 14 राज्यों में फैले हैं। शहरी विकास मंत्रालय 5 परिवर्तनकारी सुधारों में से एक के रूप में शहरों की क्रेडिट रेटिंग को बढ़ावा दे रहा है, जिसके अंतर्गत इस वर्ष के दौरान करीब 500 शहरों और कस्बों को क्रेडिट रेटिंग प्रदान की जानी है। 

            इन शहरों में देश की कुल शहरी आबादी का करीब 65 प्रतिशत हिस्सा रहता है। एएए से डी तक कुल 20 रेटिंग्स में से बीबीबी- रेटिंग को ‘निवेश ग्रेड रेटिंग’ समझा गया है। बीबीबी- से नीचे रेटिंग वाले शहरों को म्युनिसिपल बांड जारी करने के लिए अपेक्षित रेटिंग हासिल करने के प्रयास करने होंगे और अपनी रेटिंग में सुधार लाना होगा। क्रेडिट रेटिंग स्थानीय शहरी निकायों की परिसम्पत्तियों और देयताओं, राजस्व स्रोतों, पूंजी निवेश के लिए उपलब्ध संसाधनों, डबल एंट्री अकाउंटिंग प्रैक्टिस और अन्य शासन पद्धतियों के आधार पर दी जाती हैं। शहरी स्थानीय निकायों की क्रेडिट रेटिंग के अलावा उन परियोजनाओं की अलग अलग रेटिंग भी ऐसे बांड जारी करने के लिए महत्व रखती है, जिनके लिए म्युनिसिपल बांड के जरिए संसाधन जुटाए जाने हैं। 

           म्युनिसिपल काउंसिल (एनडीएमसी), नवी मुम्बई और पुणे, अहमदबाद, विशाखापट्टनम और ग्रेटर हैदराबाद म्युनिसिपल कार्पोरेशन, सूरत, नाशिक, ठाणे और पिम्परी चिंचवाड़, इंदौर, किशनगंज (राजस्थान), कोलकाता, वडोदरा (गुजरात) और वारंगल (तेलंगाना), अलवर, भिवाड़ी, ब्यावर, जयपुर (राजस्थान), भोपाल, जबलपुर (मध्य प्रदेश), मीरा भायंदर (महाराष्ट्र) और न्यू टाउन राजारहाट (पश्चिम बंगाल), अजमेर, कोटा और उदयपुर (राजस्थान), लुधियाना (पंजाब) और जामनगर (गुजरात), काकीनाडा, अनंतपुर, कुरनूल और तिरुपति (आंध्र प्रदेश), दावणगेरे और हुबली-धारवाड़ (कर्नाटक), कोच्चि और तिरुवनंतपुरम (केरल), पणजी (गोआ), कोल्हापुर और नागपुर (महाराष्ट्र), जोधपुर, नागौर और टोंक (राजस्थान), अमरावती (महाराष्ट्र), बेलगावी (कर्नाटक), भड़ूच और भावनगर (गुजरात), भरतपुर, भीलवाड़ा, बीकानेर और हनुमानगढ़ (राजस्थान), चित्तूर और कड़प्पा (आंध्र प्रदेश), कटक (ओडिसा), रांची (झारखंड), प्रोद्दातूर, नांदियाल और नेल्लौर (आंध्र प्रदेश). कोल्लम और कोझिकोड (केरल), कलोल, नडियाड और नवसारी (गुजरात), नांदेड़, शोलापुर (महाराष्ट्र), गंगापुर सिटी, धौरपुर, पाली और सवाई माधोपुर (राजस्थान), अडोनी और टाडीपत्री (आंध्र प्रदेश), द्वारका (गुजरात), आयजोल (मिजोरम), त्रिशूर (केरल). बहरामपुर, राउरकेला और संभलपुर (ओडिसा), बूंदी, चुरू, चितौड़गढ़, हिंदौन, जोधपुर और सुजानगढ़ (राजस्थान), आदित्यपुर, चास, देवघर और गिरिडिह (झारखंड), मोरी (गुजरात), बारन और झालावाड़ (राजस्थान), बारीपदा और पुरी (ओडिसा) और हजारीबाग (झारखंड), भद्रक (ओडिसा) क्रेडिट रेटिंग  में है।