Wednesday, 22 March 2017

385 कैंसर के मरीजों के लिए 3.5 करोड़

           स्वास्थ्य मंत्रालय के कैंसर मरीज कोष (सीएसआर) के लिए सीएसआर योजना के अंतर्गत कैंसर से पीड़ित गरीब मरीजों के उपचार के लिए सार्वजनिक क्षेत्र की इकाईयों से योगदान देने का आग्रह किया गया था। 

          इंडिया इंफ्रास्ट्रक्चर फाइनेंस कंपनी लिमिटेड (आईआईएफसीएल) ने इस दिशा में अगुवाई की। 2015-16 में 7.5 करोड़ रुपये राशि का योगदान दिया। 2016-17 के दौरान आईआईएफसीएल से प्राप्त सीएसआर योगदान से 385 कैंसर के मरीजों को लाभ हुआ है।      आईआईएफसीएल के मुख्य प्रबंध निदेशक एस.बी. नायर ने 3.50 करोड़ रुपये का चेक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री फग्गन सिंह कुलस्ते को प्रदान किया।

         इस अवसर पर स्वास्थ्य मंत्रालय में आर्थिक सलाहकार अरूण कुमार झा और आईआईएफसीएल के मुख्य महाप्रबंधक पी. आर. जयशंकर भी उपस्थित थे।     

उद्योगों को 38 लाख से ज्‍यादा ऊर्जा बचत प्रमाण पत्र

          विद्युत मंत्रालय ने ऊर्जा दक्षता ब्‍यूरो (बीईई) की सिफारिशों के आधार पर ऊर्जा बचत के संबंध में प्रदर्शन का सत्‍यापन हो जाने पर 16 फरवरी, 2017 को निष्‍पादन, प्राप्ति एवं कारोबार (पीएटी) के चक्र के नामित उपभोक्‍ताओं (डीसी) को ऊर्जा बचत प्रमाण पत्र (एस्‍सर्ट) जारी किए-खरीदने के अधिकार दिए हैं।

         पीएटी का प्रथम चक्र मार्च, 2015 में पूरा हुआ है। डीसी ने पैट के चक्र क्ष् की सफलता में अहम योगदान दिया है। इस चक्र में 8.67 मिलियन टन तेल समतुल्‍य (एमटीओई) की ऊर्जा बचत हुई है, जबकि 6.886 एमटीओई ऊर्जा बचत का लक्ष्‍य था। अत: यह लक्ष्‍य से लगभग 30 फीसदी ज्‍यादा है। इस चक्र ने उत्‍सर्जन में 31 मिलियन टन कार्बन डाई ऑक्‍साइड (सीओ2) की कमी का भी योगदान दिया है। 

              लगभग 5635 मेगावाट के सृजन को टाला है, जिससे 37,685 करोड़ रुपये की मौद्रिक बचत हुई है। इसने पीएटी के तहत डीसी द्वारा ऊर्जा दक्षता तकनीकों में किये गये 24,517 करोड़ रुपये के निवेश में भी योगदान दिया है। पीएटी एक बहु-चक्र वाली योजना है, जिसका लक्ष्‍य अर्थव्‍यवस्‍था के ज्‍यादातर ऊर्जा गहन क्षेत्रों (सेक्‍टर) को कवर करना है।

           इस संबंध में फिलहाल पीएटी के चक्र क्ष्क्ष् में 11 क्षेत्रों के 621 नामित उपभोक्‍ताओं को योजना में शामिल किया गया है। विद्युत मंत्रालय के अधीनस्‍थ ऊर्जा दक्षता ब्‍यूरो (बीईई) द्वारा पीएटी योजना क्रियान्वित की जा रही है, जो भारत में राष्‍ट्रीय विस्‍तारित ऊर्जा दक्षता मिशन (एनएमईईई) का एक घटक है।     

भारतीय रेलवे में नई जल नीति, वैकल्‍पिक ट्रेन सुविधा

          रेल मंत्री सुरेश प्रभाकर प्रभु ने भारतीय रेलवे में नई जल प्रबंधन नीति जारी की। डीजल लोकोमोटिव वर्क्स (वाराणसी), पेराम्बुर कैरेज वर्कशॉप (चेन्नई), लालागुडा कैरेज वर्कशॉप (हैदराबाद) को ग्रीनको प्रमाण पत्र प्रदान किए। 

           भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) द्वारा विकसित किया गया प्रमाण पत्र अच्‍छे हरित तौर-तरीके अपनाने के लिए दिया जाता है। सुरेश प्रभु ने अन्‍य क्षेत्रों में ‘विकल्‍प’ योजना के विस्‍तार का भी उद्घाटन किया। रेलवे बोर्ड के चेयरमैन ए.के. मित्‍तल, सदस्‍य (यातायात) मोहम्‍मद जमशेद, सदस्‍य (इंजीनियरिंग) ए के मित्‍तल, सदस्‍य (रोलिंग स्‍टॉक) रविन्‍द्र गुप्‍ता, सदस्‍य (स्टाफ) प्रदीप कुमार और रेलवे बोर्ड के अन्‍य सदस्‍य तथा वरिष्‍ठ अधिकारीगण भी इस अवसर पर उपस्‍थित थे। 

            इस अवसर पर रेल मंत्री सुरेश प्रभाकर प्रभु ने कहा कि विश्‍व जल दिवस को वर्ष में सिर्फ एक बार नहीं मनाया जाना चाहिए। केवल एक बार इसे मनाने का कोई औचित्‍य नहीं है, बल्‍कि इसके बजाय इस विश्‍व जल दिवस को और ज्‍यादा सार्थक बनाने के लिए प्रतिदिन ठोस कदम उठाए जाने चाहिए। रेलवे में भूमि का विशाल क्षेत्र उसके क्षेत्राधिकार में है। अत: इसके परिणामस्‍वरूप बड़ी संख्‍या में जल क्षेत्र उसके क्षेत्राधिकार में आते हैं। इस जल नीति के तहत जल ऑडिट, जल क्षेत्रों की बहाली और जल की रिसाइक्‍लिंग सुनिश्‍चित की जाएगी। भारतीय रेलवे की जल नीति महज एक दिन की बात नहीं है, बल्‍कि इस बारे में हमारी प्रतिबद्धता सदा के लिए है। वृक्षारोपण के लिए लक्ष्‍य तय किया गया है। तीन वर्षों में 5 करोड़ पौधे लगाए जाएंगे। इस साल के लिए 1.25 करोड़ पौधों का लक्ष्‍य रखा गया है। रेलवे बोर्ड में पर्यावरण निदेशालय स्‍थापित किया गया है। 

             ऊर्जा बिल में बचत के लिए 41000 करोड़ रुपये का एक मिशन तय किया गया है। रेलवे पर्यावरण के लिए प्रतिबद्ध है। रेलवे इसे हासिल करने के लिए यूएनईपी के साथ मिलकर काम कर रही है। उन्‍होंने कहा कि रेलवे में सुधार सुनिश्‍चित किया जा रहा है। इसके लिए एक स्‍पष्‍ट खाका तैयार किया गया है। उन्‍होंने कहा कि हम सभी को कन्‍फर्म टिकट सुनिश्‍चित करने, यात्रियों की सुरक्षा, शून्‍य दुर्घटना, रेलगाड़ियों की गति बढ़ाने और देश के दूर-दराज क्षेत्रों में रेलवे की पहुंच सुनिश्‍चित करने के लिए प्रयासरत हैं। ‘विकल्‍प’ योजना से यात्रीगण काफी लाभान्‍वित होंगे। यह एक पारदर्शी योजना है, जिसमें यात्रियों को कोई अतिरिक्‍त किराया दिए बगैर अथवा किराये में अंतर को रिफंड किए बिना ही वैकल्‍पिक ट्रेनों में कन्‍फर्म आरक्षण सुलभ कराया जाएगा। इससे यात्रियों की समस्‍याएं काफी कम हो जाएंगी। 

              भारतीय रेलवे ने अब एक जल प्रबंधन नीति को अंतिम रूप दिया है, जो जल के उपयोग, रिसाइक्‍लिंग, संरक्षण और भूजल के पुनर्भरण के सभी पहलुओं को कवर करती है। यह एक प्रगतिशील एवं रचनात्‍मक नीति है, जिसके तहत फील्‍ड यूनिटों को जल की रिसाइक्‍लिंग एवं बचत करने के लिए प्रेरित किया जाएगा। इसका उद्देश्‍य जल रिसाइक्‍लिंग संयंत्रों, जल हार्वेस्‍टिंग संयंत्रों, सीवेज प्रशोधन संयंत्रों और रेलवे की भूमि पर अपशिष्‍ट प्रशोधन संयंत्रों की स्‍थापना करके जल उपयोग की दक्षता में बेहतरी सुनिश्‍चित करना है। वैकल्‍पिक ट्रेन सुविधा योजना (एटीएएस) की परिकल्‍पना के साथ-साथ इसका शुभारंभ नवंबर, 2015 में ‘विकल्‍प’ नाम के तहत किया गया था। इसके तहत प्रतीक्षा सूची वाले यात्रियों को एक वैकल्‍पिक सुविधा दी गई जिसके तहत वे समान रूट पर विशिष्‍ट समयांतर पर चलने वाली किसी अन्‍य ट्रेन में कन्‍फर्म टिकट पा सकते हैं।

                 आरंभ में यह योजना दिल्‍ली-जम्‍मू और दिल्‍ली-लखनऊ रूटों के लिए लागू की गई। जिसके तहत केवल इंटरनेट के जरिए ई-टिकट की बुकिंग करने वाले यात्रियों को ही मेल-एक्‍सप्रेस-सुपरफास्‍ट ट्रेनों में स्‍थानांतरित करने की सुविधा दी गई। ‘विकल्‍प’ अपनाने वाले प्रतीक्षा सूची के यात्रियों को चार्ट बन जाने के बाद पीएनआर स्‍टैटस चेक करना चाहिए। वैकल्‍पिक सुविधा पाने वाला यात्री अपने मूल टिकट के आधार पर ही वैकल्‍पिक ट्रेन में सफर कर सकता है। मूल ट्रेन के प्रतीक्षा सूची वाले यात्रियों को अगर वैकल्‍पिक सुविधा दे दी जाती है तो उन्‍हें मूल ट्रेन से सफर करने की अनुमति नहीं होगी। यदि वे मूल ट्रेन से ही सफर करते पाए गए तो उन्‍हें बेटिकट मान लिया जाएगा। उसी के अनुसार उनसे चार्ज वसूला जाएगा। कन्फर्म वैकल्‍पिक सुविधा मिल जाने पर यात्री के रजिस्‍टर्ड मोबाइल फोन नंबर पर एसएमएस अलर्ट भी आएगा।

               एटीएएस को अपनाने पर वैकल्‍पिक ट्रेन सुविधा मिल जाने के बाद अगर कोई यात्री अपने टिकट को रद्द कराता है तो उसे कन्‍फर्म यात्री माना जाएगा। उस पर टिकट निरस्‍तीकरण के नियम लागू होंगे। जब किसी एटीएएस यात्री को वैकल्‍पिक सुविधा दे दी जाएगी तो उसके बाद अपनी यात्रा में बदलाव करने की इजाजत उसे नहीं होगी। यदि आवश्‍यक हुआ तो यात्री को अपना टिकट रद्द कराना होगा। संशोधित यात्रा के लिए नया टिकट लेना होगा। यदि किसी यात्री को वैकल्‍पिक ट्रेन सुविधा मुहैया करा दी जाती है। उसके बावजूद वह वैकल्‍पिक ट्रेन से सफर नहीं कर पाता है, तो वह टीडीआर अनुरोध दाखिल करके रिफंड का दावा कर सकता है। 

               इस योजना की समीक्षा की गई और अप्रैल, 2016 में पांच और मार्गों पर इसका विस्‍तार किया गया जिनमें दिल्‍ली-हावड़ा, दिल्‍ली-मुंबई, दिल्‍ली-चेन्‍नई, दिल्‍ली–बेंगलुरू और दिल्‍ली–सिकंदराबाद रूट शामिल हैं। 1 अप्रैल, 2017 से विकल्‍प-एटीएएस योजना का और विस्‍तार किया जा रहा है, जिसके तहत किसी ट्रेन के प्रतीक्षा सूची वाले यात्रियों से किराये में अंतर को वसूले अथवा रिफंड किए बगैर ही सभी श्रेणियों की ट्रेनों में स्‍थानांतरित किया जा सकेगा। अत: इस योजना को अपनाने पर किसी सामान्‍य मेल-एक्‍सप्रेस ट्रेन में सफर के लिए टिकट बुक करने वाले यात्री को किसी वैकल्‍पिक मेल-एक्‍सप्रेस, राजधानी, हमसफर, दुरंतो, शताब्‍दी, विशेष ट्रेन अथवा सुविधा ट्रेन में समान श्रेणी में स्‍थानांतरित किया जा सकेगा। 

             इस सुविधा से सभी रेलगाड़ियों में बर्थ का अधिकतम उपयोग होने, अपेक्षाकृत ज्‍यादा यात्रियों को ढोए जाने और प्रतीक्षा सूची वाले टिकटों के रिफंड में कमी होने की आशा है, जिससे रेलवे की आमदनी में बढ़ोतरी होगी। विस्‍तारित विकल्‍प योजना आरंभ में केवल ई-टिकटों पर ही लागू होगी, लेकिन बाद में इसका विस्‍तार करके इसे पीआरएस टिकटों पर भी लागू किया जाएगा।

          

राष्ट्रीय ध्वज के अपमान पर कड़ाई

           गृह मंत्रालय ने सभी राज्य सरकारों के मुख्य सचिवों-प्रशासकों और केंद्रशासित प्रदेश प्रशासनों तथा भारत सरकार के सभी मंत्रालयों-विभागों के सचिवों के लिए ‘भारतीय ध्वज संहिता, 2002’ और ‘राष्ट्रीय सम्मान अधिनियम, 1971 के अपमान को रोकने’ के प्रावधानों का कड़ाई से अनुपालन सुनिश्चित करने के बारे में परामर्श जारी किया है।

           परामर्श में निर्देश दिया गया है कि इस संबंध में जन जागरूकता कार्यक्रम चलाए जाएं। इलेक्ट्रॉनिक तथा प्रिंट मीडिया के माध्यम से विज्ञापन देकर भी व्यापक प्रचार किया जाए। परामर्श में कहा गया है कि राष्ट्रीय ध्वज हमारे देश के लोगों की आशाओं और आकांक्षाओं को दर्शाता है। इसलिए इसे सम्मान दिया जाना चाहिए। राष्ट्रीय ध्वज के प्रति व्यापक स्नेह और सम्मान तथा निष्ठा है। फिर भी आम जनता और भारत सरकार के संगठनों-एजेंसियों में जागरूकता की कमी के कारण अकसर देखा गया है कि ‘राष्ट्रीय ध्वज लगाने’ के नियम, कायदे और तरीकों की अनदेखी की जाती है। 

                 गृह मंत्रालय के संज्ञान में लाया गया है कि महत्वपूर्ण कार्यक्रमों के अवसरों पर कागज के ध्वज के स्थान पर प्लास्टिक के ध्वजों का भी उपयोग किया जा रहा है। चूंकि प्लास्टिक के झंडे लंबे समय तक विघटित नहीं हो पाते हैं। इसलिए राष्ट्रीय ध्वज के सम्मान के अनुरूप प्लास्टिक के ध्वज का उचित निपटान सुनिश्चित करना एक व्यवहारिक समस्या है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि ‘राष्ट्रीय सम्मान अधिनियम 1971 के अपमान को रोकने’ की धारा 2 के अनुसार कोई भी व्यक्ति किसी सार्वजनिक स्थल पर या सार्वजनिक दृष्टि से अन्य स्थान पर भारतीय राष्ट्रीय ध्वज या उसके किसी भी भाग को जलाता, काटता, तोड़ता-मरोड़ता, मर्यादा भंग करता, विरूपित करता, खंडित करता, रौंदता या किसी अन्य प्रकार से (शब्दों, लिखित या मौखिक अथवा अपने कार्यकलापों द्वारा ) अपमान करता है या अवमानना करता है तो उसे तीन साल तक की सज़ा या जुर्माना अथवा दोनों से दंडित किया जा सकता है।

              परामर्श में कहा गया है कि ‘भारतीय ध्वज संहिता 2002’ के प्रावधानों के अनुरूप महत्वपूर्ण राष्ट्रीय, सांस्कृतिक और खेल कार्यक्रमों में लोगों को केवल कागज से बने झंडों का उपयोग करना चाहिए। कार्यक्रम के बाद इन कागज के झंडों को मैदानों में ऐसे ही छोड़ना या फेंकना नहीं चाहिए।

             ऐसे झंडों का ध्वज की गरिमा के अनुरूप निजी तौर पर निपटान किया जाना चाहिए। इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया में विज्ञापनों के जरिए प्लास्टिक से बने राष्ट्रीय ध्वज का उपयोग नहीं करने के बारे में व्यापक प्रचार किया जाना चाहिए।

टेक्सटाइल इंडिया 2017” गुजरात में

           जूट उत्पादन के संबंध में केन्द्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री राधा मोहन सिंह और केन्द्रीय वस्त्र मंत्री, श्रीमती स्मृति ईरानी की संयुक्त बैठक कृषि भवन, नई दिल्ली में हुई। 

           इस बैठक में गत वर्षों में किए गये उपायों एवं वर्ष 2017-18 के लिए कार्ययोजना पर भी बातचीत हुई। बैठक में एस के पट्टानायक, सचिव, कृषि सहकारिता एवं किसान कल्याण विभाग एवं श्रीमती रश्मि वर्मा, सचिव, वस्त्र मंत्रालय मौजूद रहे। उनके अलावा बैठक में कृषि आयुक्त के साथ आंध्र प्रदेश, असम, बिहार, मेघालय, नागालैंड, ओडिसा, त्रिपुरा, उत्तर प्रदेश एवं पश्चिम बंगाल के प्रधान सचिवों एवं कृषि निदेशकों ने भी हिस्सा लिया। 

            अधिकारियों ने जूट उत्पादन को अधिक से अधिक प्रोत्साहित करने एवं जूट विकास कार्यक्रम पर अपनी राय रखी। निर्णय किए गए, उन्नत किस्म के बीज के उत्पादन को बढ़ाने एवं किसानों को उसकी पर्याप्त जानकारी देने के बारे में कारवाई करने का निर्णय लिया। बैठक में केवीके एवं आईसीएआर की सहायता से अप्रयुक्त धन राशि को किसानों को जानकारी प्रदान करने के लिए उपयोग किया जाने तथा केवीके को जूट की खेती के लिए नई मशीनरी मुहैया कराई जाने के बारे में निर्णय लिया गया।

             उन्नत किस्म के बीज की मांग के बारे में संबंधित बिभाग को लिखित में अग्रिम जानकारी दिए जाने के निर्देश भी दिये गए। दोनों मंत्रालयों के बीच एक हस्ताक्षर करने का भी निर्णय लिया गया। केंद्रीय वस्त्र मंत्रालय द्वारा संचालित जूट आई केयर एवं एग्रोटेक्सटाइल के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए राज्यों को अधिक से अधिक सहयोग करने के संबंध में निर्देश दिए गये।

           दोनों मंत्रालय, गांधीनगर, गुजरात में जून 2017 को संयुक्त रूप से “टेक्सटाइल इंडिया 2017” आयोजित करेंगे। इस आयोजन को सफल बनाने के लिए कृषि सहकारिता एवं किसान कल्याण विभाग एवं भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद अपना पूरा सहयोग देगा।

 

पर्यावरण मंत्रालय ने विश्‍व जल दिवस 2017 मनाया

        पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (एमओईएफसीसी) ने यहां ‘विश्‍व जल दिवस 2017’ मनाया। हर वर्ष विश्‍व जल दिवस पर ताजा जल के एक विशिष्‍ट पहलू पर प्रकाश डाला जाता है। 

         विश्‍व जल दिवस 2017 की थीम ‘अपशिष्‍ट जल’ है।  पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय में सचिव अजय नारायण झा ने इस अवसर पर एक प्रदर्शनी का उद्घाटन किया। ‘जल है तो कल है’ शीर्षक वाली यह प्रदर्शनी जल संरक्षण के बारे में जागरूकता फैलाने के उद्देश्‍य से आयोजित की गई। स्‍कूली बच्‍चों के एक समूह ने कला प्रदर्शन के जरिए इस बारे में संदेश दिया। विश्‍व जल दिवस हर वर्ष 22 मार्च को मनाया जाता है, जिसका उद्देश्‍य ताजा जल की अहमियत की ओर ध्‍यान आकर्षित करना और ताजा जल के संसाधनों के सतत प्रबंधन की वकालत करना है।

            22 मार्च 1993 को प्रथम विश्‍व जल दिवस के रूप में मनाया गया था। आज 1.8 अरब लोग पेयजल के लिए एक ऐसे स्रोत का इस्‍तेमाल करते हैं, जो मल से दूषित होता है। इस वजह से उन्‍हें हैजा, पेचिश, टाइफाइड और पोलियो होने का खतरा सदा ही बना रहता है।

             जल संरक्षण पर प्रदर्शनी पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के एक अधीनस्‍थ कार्यालय राष्ट्रीय प्राकृतिक इतिहास संग्रहालय (एनएमएनएच), केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी), केंद्रीय भूजल बोर्ड (सीजीडब्‍ल्‍यूबी), जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्रालय द्वारा संयुक्‍त रूप से आयोजित की गई। इस अवसर पर पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के वरिष्‍ठ अधिकारीगण एवं अन्‍य पदाधिकारी भी उपस्‍थित थे।

      

विकास में जल की महत्‍वपूर्ण भूमिका

       केंद्रीय जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्री सुश्री उमा भारती ने कहा है कि भारत विश्‍व की एक महत्‍वपूर्ण शक्ति बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ रहा है। 

           केंद्रीय जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्री सुश्री उमा भारती ने कहा कि आने वाले दिनों में देश के विकास में जल की भूमिका अतिमहत्‍वपूर्ण होगी। विश्‍व जल दिवस के अवसर पर नई दिल्‍ली में केंद्रीय जल आयोग की ओर से आयोजित एक संगो‍ष्‍ठी में उन्‍होंने कहा कि नेपाल और बांग्‍लादेश जैसे पडोसी देशों के साथ संबंध मजबूत करने में नदियों एवं जल की भूमिका महत्‍वपूर्ण रहेगी। सीमावर्ती क्षेत्रों की नदियों का उल्‍लेख करते हुए सुश्री भारती ने कहा कि हम इनके बारे में बहुत संवेदनशील हैं। 

           मंत्री ने विश्‍व जल दिवस के मौके पर देशवासियों को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि जल जीवन और म़त्‍यु दोनों का कारक है। यदि बाढ आए तो म़त्‍यु तथा सिंचाई में उपयोगी हो तो जीवन। उन्‍होंने कहा कि सरकार नदी जोडो परियोजना के तहत देश की नदियों को आपस में जोडकर देश में बाढ और सुखाड की समस्‍या का स्‍थायी समाधान कर जल को जल को जीवन का पर्याय बनाना चाहती है। 

             हाल ही में संसद में पेश किये गए अंतर्राज्यीय नदी जल विवाद (संशोधन) विधेयक 2017 का उल्‍लेख करते हुए सुश्री भारती ने कहा कि यह विधेयक अन्‍य मंत्रालयों के लिए भी विवाद समाधान के लिए एक आदर्श मॉडल बन सकता है। नमामी गंगे कार्यक्रम जिक्र करते हुए उन्‍होंने कहा कि इस काम में तकनीक के साथ साथ जन भागीदारी भी महत्‍वपूर्ण है। संगोष्‍ठी को  केंद्रीय जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण राज्‍यमंत्री विजय गोयल, मंत्रालय के सचिव डॉ अमरजीत सिंह और केंद्रीय जल आयोग के अध्‍यक्ष श्री नरेंद्र कुमार ने भी संबोधित किया। 

          “दूषित जल - निगरानी और प्रबंधन विषय” पर आयोजित इस राष्‍ट्रीय संगोष्‍ठी में देश भर के विर्शेषज्ञों  ने भाग लिया। दुनियाभर में दूषित जल को शोधित कर बडी मात्रा में प्रयोग किया जा रहा है। भारत में दूषित जल को शोधित कर फिर से उपयोग में लाने की संभावनाओं पर विशेषज्ञों ने संगो‍ष्‍ठी में अपने प्रपत्र प्रस्‍तुत किये।

किफायती आवासों के लिये एक लाख करोड़

            आवास और शहरी गरीबी उन्‍मूलन मंत्रालय ने प्रधानमंत्री आवास योजना-पीएमएवाई (शहरी) के तहत पुद्दुचेरी के शहरी गरीबों के लिये 3128, तेलंगाना के लिए 924 और हिमाचल प्रदेश के लिए 2655 और किफायती आवासों की मंजूरी दी है।

         मंत्रालय ने शहरी गरीबों के लिए 1,24,521 किफायती आवासों के लिए मंजूरी दी है। अब तक पीएमएवाई (शहरी) के अंतर्गत मंजूर किए गए 95,671 करोड़ रुपये के निवेश से ऐसे आवासों का निर्माण किया जा रहा है। इन आवासों के निर्माण के लिए केंद्र से 27,766 करोड़ रुपये की सहायता राशि मंजूर की गई है। शहरी क्षेत्रों में आवासीय मिशन की प्रगति को ध्यान में रखते हुए आवास और शहरी गरीबी उन्मूलन मंत्री एम. वेंकैया नायडू ने मंत्रालय के अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे सुनिश्चित करें कि शहरी गरीबों के लिए आवासों के निर्माण में संबंधित शहर और राज्य सरकारें कम समय में आवश्यक कदम उठाएं। 

             पुद्दुचेरी के लिए 47 करोड़ रुपये की केंद्रीय सहायता के साथ 131 करोड़ रुपये की कुल परियोजना लागत से पीएमएवाई (शहरी) के लाभार्थी आधारित निर्माण (बीएलसी) के अंतर्गत चार कस्बों में 3,128 आवासों के लिए मंजूरी दी गई है। इसके साथ ही पुद्दुचेरी के लिए मंजूर किए गए आवासों की कुल संख्या बढ़कर 3,848 हो गई है। पुद्दुचेरी के लिये 2093, कराइकल-592, यनाम-358 और माहे-85 आवास हैं। तेलंगाना में सिद्दीपेट के लिए 14 करोड़ रुपये की केंद्रीय सहायता के साथ कुल लगभग 14 करोड़ रुपये की लागत से बीएलसी के अंतर्गत 924 आवास और निर्मित करने की मंजूरी दी गई है।

           इसके साथ ही पीएमएवाई (शहरी) के अंतर्गत राज्य के लिए मंजूर किए गए आवासों की कुल संख्या बढ़कर 81,405 हो गई है। हिमाचल प्रदेश के 12 कस्बों के लिए 40 करोड़ रुपये की केंद्रीय सहायता के साथ 102 करोड़ रुपये की कुल परियोजना लागत से 2655 आवासों के लिए मंजूरी दी गई है। इसके साथ ही पीएमएवाई (शहरी) के अंतर्गत राज्य के लिए अब तक मंजूर किए गए आवासों की कुल संख्या बढ़कर 4,569 हो गई है। हिमाचल प्रदेश में नालागढ़ के लिए 531, नाहन-289, धर्मशाला-227, ऊना-217, मंडी-174, शिमला-61, चाबा-57, बिलासपुर-37, सोलन-27, बड्डी-25, कुल्लु-9 और परवाना-1 आवास की मंजूरी दी गई है। पीएमएवाई (शहरी) के बीएलसी के अंतर्गत प्रत्येक लाभार्थी को अपनी भूमि पर पक्का मकान बनाने या मौजूदा मकान में सुधार करने के लिए 1.50 लाख रुपये की केंद्रीय सहायता प्रदान की जाती है।

                इसके अतिरिक्त पीएमएवाई (शहरी) के अंतर्गत कर्नाटक के लिए 31424 आवास, मध्य प्रदेश-27475, बिहार-25221, झारखंड-20099, केरल-11480 और ओडीशा-2115 आवासों को मंजूरी दी गई है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा 25 जून, 2015 को प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी) का शुभारंभ किया गया था। इसका उद्देश्य सभी शहरी गरीबों के लिए आवश्यक सुविधा के साथ पक्का मकान उपलब्ध कराना है।

वर्ष 2030 तक ‘हर घर जल’ का सपना

            सरकार ने 25,000 करोड़ रुपये के परिव्‍यय के साथ मार्च 2021 तक देश में लगभग 28000 प्रभावित बस्तियों को सुरक्षित पेयजल मुहैया कराने के लिए आर्सेनिक और फ्लोराइड पर राष्‍ट्रीय जल गुणवत्‍ता उपमिशन का शुभारंभ किया।

       राज्‍यों के सहयोग से यहां मिशन का शुभारंभ करते हुए केंद्रीय ग्रामीण विकास, पेयजल एवं स्‍वच्‍छता और पंचायती राज मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि जहां एक ओर पश्‍चिम बंगाल आर्सेनिक की समस्‍या से बुरी तरह प्रभावित है, वहीं दूसरी ओर राजस्‍थान पेयजल में फ्लोराइड की मौजूदगी से जूझ रहा है। जिससे स्‍वास्‍थ्‍य को गंभीर खतरा है। उन्‍होंने कहा कि भारत में लगभग 17 लाख 14 हजार ग्रामीण बस्‍तियां हैं, जिनमें से लगभग 77 फीसदी बस्‍तियों को प्रतिदिन प्रति व्‍यक्‍ति 40 लीटर से भी ज्‍यादा सुरक्षित पेयजल मुहैया कराया जा रहा है। उधर, इनमें से लगभग 4 फीसदी बस्‍तियां जल गुणवत्‍ता की समस्‍याओं से जूझ रही हैं।

             मंत्री ने यह आश्‍वासन दिया कि पेयजल एवं स्‍वच्‍छता की दोहरी चुनौतियों से निपटने के दौरान धनराशि मुहैया कराने के मामले में किसी भी राज्‍य के साथ कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा। 12 राज्‍यों के पेयजल एवं स्‍वच्‍छता मंत्रियों ने ‘सभी के लिए जल और स्‍वच्‍छ भारत’ पर आयोजित की गई राष्‍ट्रीय कार्यशाला में भाग लिया। तोमर ने कहा कि संयुक्‍त राष्‍ट्र के सतत विकास लक्ष्‍यों के अनुरूप वर्ष 2030 तक प्रत्‍येक घर को निरंतर नल का पानी उपलब्ध कराने के लिए सरकार प्रतिबद्ध है, जिसके लिए लक्ष्‍य पूरा होने तक हर वर्ष 23000 करोड़ रुपये के केंद्रीय कोष की जरूरत पड़ेगी। 

                मंत्री ने कहा कि देश के नागरिकों की भागीदारी के बगैर ‘हर घर जल’ के सपने को साकार नहीं किया जा सकता है। उन्‍होंने कहा कि देश में लगभग 2000 ब्‍लॉक ऐसे हैं जहां सतह एवं भूमिगत जल स्रोतों की भारी किल्‍लत है। उन्‍होंने ‘मनरेगा’ जैसी योजनाओं के बीच समुचित सामंजस्‍य बैठाते हुए युद्ध स्‍तर पर जल संरक्षण के लिए आह्वान किया। तोमर ने कहा कि अक्‍टूबर, 2014 में स्‍वच्‍छ भारत मिशन (एसबीएम) के शुभारंभ के बाद से लेकर अब तक स्‍वच्‍छता कवरेज 42 फीसदी से बढ़कर 62 फीसदी के स्‍तर पर पहुंच गई है। 

            उन्‍होंने कहा कि सिक्‍किम, हिमाचल प्रदेश एवं केरल, जो ओडीएफ (खुले में शौच मुक्‍त) राज्‍य हैं, के अलावा 4-5 और राज्‍य भी अगले 6 महीनों में ओडीएफ हो सकते हैं। अब तक 119 जिले और 1.75 लाख गांव ओडीएफ हो चुके हैं। उन्‍होंने कहा कि केंद्र ने इस दिशा में समय पर प्रगति के लिए राज्‍यों को प्रोत्‍साहन देने की घोषणा की है। मंत्री  ने यह जानकारी दी कि एसबीएम के शुभारंभ से लेकर अब तक ग्रामीण क्षेत्रों में 3.6 करोड़ से ज्‍यादा शौचालयों का निर्माण किया जा चुका है।

          ‘मनरेगा’ के तहत 16.41 लाख शौचालयों का निर्माण किया गया है। तोमर के साथ-साथ पेयजल एवं स्‍वच्‍छता राज्‍य मंत्री रमेश जिगाजीनागी ने इस अवसर पर ‘वाटर एप’ लांच किया। मंत्री ने स्‍वच्‍छता एवं पेयजल के क्षेत्रों में उल्‍लेखनीय योगदान के लिए विभिन्‍न राज्‍य सरकारों को पुरस्‍कार भी प्रदान किए।