Friday, 19 May 2017

गंगा के लिए चितले समिति के उपाय

           गंगा से गाद निकालने के लिए चितले समिति ने कई उपायों की सिफारिश की है, जिनमें गाद हटाने के कार्य के लिए वार्षिक गाद बजट से सबसे अधिक गाद हटाने की प्रक्रिया का अध्‍ययन करना, पहले हटाई गई तलछट/गाद के बारे में बताते हुए वार्षिक रिपोर्ट(रेत पंजीयन) तैयार करना और तलछट बजट बनाने का कार्य एक तकनीकी संस्‍थान को सौंपा जा सकता है, आकृति और बाढ़ प्रवाह का अध्‍ययन जिसमें सबसे अधिक गाद वाले स्‍थान से गाद हटाने की आवश्‍यकता का निरीक्षण और पुष्टि करने पर विचार किया जाना शामिल है। 

            जल संसाधन नदी विकास और गंगा पुनरोद्धार मंत्रालय ने भीमगौड़ा (उत्‍तराखंड) से फरक्‍का(पश्चिम बंगाल) तक गंगा नदी की गाद निकालने के लिए दिशा निर्देश तैयार करने के वास्‍ते जुलाई 2016 में इस समिति का गठन किया था। राष्ट्रीय गंगा नदी घाटी प्राधिकरण (एनजीआरबीए) के विशेष सदस्‍य माधव चितले को समिति का अध्‍यक्ष नियुक्‍त किया गया था। समिति के अन्‍य सदस्‍य जल संसाधन, नदी विकास और गंगा पुनरोद्धार मंत्रालय में सचिव, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय में सचिव और केन्‍द्रीय जल तथा विद्युत अनुसंधान स्‍टेशन, पुणे के निदेशक डॉक्‍टर मुकेश सिन्‍हा थे। 

                  समिति से गाद और रेत खनन के बीच अंतर करने तथा पारिस्थितिकी और गंगा नदी के ई-प्रवाह के लिए गाद हटाने की आवश्‍यकता के बारे में बताने को कहा गया था। समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि भूमि कटाव, तलछट की सफाई और गाद अति जटिल घटनाएं हैं। तलछट प्रबंधन और नियंत्रण के लिए ‘सभी के लिए एक प्रकार’ का रूख अपनाया नहीं जा सकता, क्‍योंकि यह मामले अधिकतर क्षेत्र विशेष से जुड़े होते हैं। भौगोलिक, नदी नियंत्रण संरचनाएं, मृदा और जल संरक्षण उपाय, वृक्षों की संख्‍या, नदी के तट की भूमि का उपयोग या उसमें फेरबदल (उदाहरण के लिए कृषि, खनन आदि) जैसे स्‍थानीय कारकों का नदी के तलछटी के भार पर काफी प्रभाव पड़ता है।

             नदी नियंत्रण संरचनाओं  (जैसे जलाशयों), मृदा संरक्षण उपायों और तलछट नियंत्रण कार्यक्रमों से गाद कम जमा हो सकती है, जबकि भूमि उपयोग में फेरबदल (उदाहरणार्थ वनस्‍पतियों की सफाई) या खेती जैसी गतिविधि‍यों से गाद बढ़ सकती है।

जलाशयों से 60 मेगावाट पनबिजली

           देश के 91 प्रमुख जलाशयों में 35.622 बीसीएम (अरब घन मीटर) जल का संग्रहण आंका गया। यह इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 23 प्रतिशत है। यह पिछले वर्ष की इसी अवधि के कुल संग्रहण का 123 प्रतिशत तथा पिछले दस वर्षों के औसत जल संग्रहण का 104 प्रतिशत है। 11 मई को समाप्त हुए सप्ताह के अंत में यह 24 प्रतिशत थी। 

       इन 91 जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता 157.799 बीसीएम है, जो समग्र रूप से देश की अनुमानित कुल जल संग्रहण क्षमता 253.388 बीसीएम का लगभग 62 प्रतिशत है। इन 91 जलाशयों में से 37 जलाशय ऐसे हैं जो 60 मेगावाट से अधिक की स्थापित क्षमता के साथ पनबिजली संबंधी लाभ देते हैं।

                  उत्तरी क्षेत्र में हिमाचल प्रदेश, पंजाब तथा राजस्थान आते हैं। इस क्षेत्र में 18.01 बीसीएम की कुल संग्रहण क्षमता वाले छह जलाशय हैं, जो केन्द्रीय जल आयोग (सीडब्यूसी) की निगरानी में हैं। इन जलाशयों में कुल उपलब्ध संग्रहण 4.25 बीसीएम है, जो इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 24 प्रतिशत है। पिछले वर्ष की इसी अवधि में इन जलाशयों की संग्रहण स्थिति 21 प्रतिशत थी। पिछले दस वर्षों का औसत संग्रहण इसी अवधि में इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 28 प्रतिशत था। इस तरह पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में चालू वर्ष में संग्रहण बेहतर है, लेकिन पिछले दस वर्षों की इसी अवधि के दौरान रहे औसत संग्रहण से यह कमतर है। 

               पूर्वी क्षेत्र में झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल एवं त्रिपुरा आते हैं। इस क्षेत्र में 18.83 बीसीएम की कुल संग्रहण क्षमता वाले 15 जलाशय हैं, जो सीडब्ल्यूसी की निगरानी में हैं। इन जलाशयों में कुल उपलब्ध संग्रहण 5.88 बीसीएम है, जो इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 31 प्रतिशत है। पिछले वर्ष की इसी अवधि में इन जलाशयों की संग्रहण स्थिति 25 प्रतिशत थी। पिछले दस वर्षों का औसत संग्रहण इसी अवधि में इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 20 प्रतिशत था। इस तरह पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में चालू वर्ष में संग्रहण बेहतर है और यह पिछले दस वर्षों की इसी अवधि के दौरान रहे औसत संग्रहण से भी बेहतर है। 

            पश्चिमी क्षेत्र में गुजरात तथा महाराष्ट्र आते हैं। इस क्षेत्र में 27.07 बीसीएम की कुल संग्रहण क्षमता वाले 27 जलाशय हैं, जो सीडब्ल्यूसी की निगरानी में हैं। इन जलाशयों में कुल उपलब्ध संग्रहण 7.19 बीसीएम है, जो इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 27 प्रतिशत है। पिछले वर्ष की इसी अवधि में इन जलाशयों की संग्रहण स्थिति 15 प्रतिशत थी। पिछले दस वर्षों का औसत संग्रहण इसी अवधि में इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 27 प्रतिशत था। इस तरह पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में चालू वर्ष में संग्रहण बेहतर है और यह पिछले दस वर्षों की इसी अवधि के दौरान रहे औसत संग्रहण के बराबर है। 

            मध्य क्षेत्र में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश तथा छत्तीसगढ़ आते हैं। इस क्षेत्र में 42.30 बीसीएम की कुल संग्रहण क्षमता वाले 12 जलाशय हैं, जो सीडब्ल्यूसी की निगरानी में हैं। इन जलाशयों में कुल उपलब्ध संग्रहण 14.27 बीसीएम है, जो इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 34 प्रतिशत है। पिछले वर्ष की इसी अवधि में इन जलाशयों की संग्रहण स्थिति 26 प्रतिशत थी। पिछले दस वर्षों का औसत संग्रहण इसी अवधि में इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 21 प्रतिशत था। इस तरह पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में चालू वर्ष में संग्रहण बेहतर है और यह पिछले दस वर्षों की इसी अवधि के दौरान रहे औसत संग्रहण से भी बेहतर है।
 

             दक्षिणी क्षेत्र में आंध्र प्रदेश (एपी), तेलंगाना (टीजी), एपी एवं टीजी (दोनों राज्यों में दो संयुक्त परियोजनाएं), कर्नाटक, केरल एवं तमिलनाडु आते हैं। इस क्षेत्र में 51.59 बीसीएम की कुल संग्रहण क्षमता वाले 31 जलाशय हैं, जो सीडब्ल्यूसी की निगरानी में हैं। इन जलाशयों में कुल उपलब्ध संग्रहण 4.04 बीसीएम है, जो इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 8 प्रतिशत है। पिछले वर्ष की इसी अवधि में इन जलाशयों की संग्रहण स्थिति 11 प्रतिशत थी। पिछले दस वर्षों का औसत संग्रहण इसी अवधि में इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 18 प्रतिशत था। इस तरह चालू वर्ष में संग्रहण पिछले वर्ष की इसी अवधि में हुए संग्रहण से कमतर है, और यह पिछले दस वर्षों की इसी अवधि के दौरान रहे औसत संग्रहण से भी कमतर है।

             पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में जिन राज्यों में जल संग्रहण बेहतर है उनमें पंजाब, राजस्थान, झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा, गुजरात, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना शामिल हैं। पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में जिन राज्यों में जल संग्रहण बराबर है, उनमें एपी एवं टीजी (दोनों राज्यों में दो संयुक्त परियोजनाएं) शामिल हैं। इसी अवधि के लिए पिछले साल की तुलना में कम संग्रहण करने वाले राज्यों में हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु शामिल हैं।

13,469 गांवों का बिजलीकरण, 7965.87 करोड़ का अनुदान

                     पंडित दीन दयाल उपाध्याय के अंत्योदय (अंतिम व्यक्ति की सेवा) दर्शन के अनुरूप 20 नवबंर 2014 को भारत सरकार ने दीन दयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना (डीडीयूजीजेवाई) को स्वीकृति दी। यह एकीकृतयोजना है जिसमें ग्रामीण बिजली वितरण के सभी पक्ष यानी फीडर का अलगाव, प्रणाली सुदृढीकरण तथा मीटरिंग शामिल हैं। 

          प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 15 अगस्त 2015 को स्वतंतत्रा दिवस के अवसर पर राष्ट्र को संबोधित करते हुए 1000 दिनों के अंदर बिजली से वंचित सभी गांव को बिजली प्रदान करने का संकल्प व्यक्त किया था। इसलिए, भारत सरकार ने ग्रामीण बिजलीकरण कार्यक्रम को मिशन मोड में लिया। मई 2018 तक बिजलीकरण का काम पूरा करने का लक्ष्य निर्धारित किया। 15 मई 2017 तक बिजली सुविधा से वंचित 18,452 गांव में से 13,469 गांव में बिजली पहुंचा दी गयी है। पूर्ववर्ती योजना के शेष ग्रामीण बिजलीकरण कार्य डीडीयूजीजेवाई में समाहित किये गये हैं। योजना की परिव्यय राशि 43,033 करोड़ रुपये है। इसमें 3345 करोड़ रुपये भारत सरकार का अनुदान है। पुराने ग्रामीण कार्य कोसमाहित करने के साथ समग्र परिव्यय राशि भारत सरकार की अनुदान राशि 63,027 करोड़ रुपये सहित 75,893 करोड़ रुपये है। नई डीडीयूजीजेवाई योजना के अंतर्गत परियोजना लागत की 60 प्रतिशत (विशेष श्रेणी के राज्यों के लिए 85 प्रतिशत) की दर से भारत सरकार अनुदान देती है। 

             निर्धारित मानदंडों को पूरा करने पर 15 प्रतिशत की दर से अतिरिक्त अनुदान (विशेष श्रेणी के राज्यों के लिए 5 प्रतिशत) दिया जाता है। इस योजना के अंतर्गत 32 राज्यों/केन्द्रशासित प्रदेशों के लिए 42,553.17 करोड़ रुपये की परियोजनाएं मंजूर की गयी हैं। इनमें फीडर अलगाव के लिए (15572.99 करोड़ रुपये), प्रणाली सुदृढीकरण तथा ग्रामीण घरों से जोड़ने के लिए (19706.59 करोड़ रुपये), मीटरिंग (3874.48 करोड़ रुपये), ग्रामीण बिजलीकरण (2792.57 करोड़ रुपये) तथा सासंद आदर्श ग्राम योजना (398.54करोड़ रुपये) शामिल है। ग्रामीण बिजलीकरण कार्य की प्रगति की निगरानी के लिए फील्ड में 350 से अधिक ग्राम विद्युत अभियंता (जीवीए) तैनात किये गये हैं। बिजली सुविधा से वंचित 18,452 गांवों में बिजलीकरण की प्रगति की निगरानी केलिए जीएआरवी मोबाइल एप विकसित किया गया। 

                  जीएआरवी एप में जीवीए फील्ड फोटोग्राफ, डाटा तथा अन्य सूचना अपडेट करते हैं। सभी 5.97 लाख गांवों में घरों के बिजलीकरण की निगरानी के लिए 20 दिसंबर 2016 को अद्यतन जीएआरवी एप को लांच किया गया। अद्यतन जीएआरवी में संवाद-पारदर्शिता और दायित्त स्थापित करने में नागरिकों को शामिल करना। योजना से ग्रामीणों की जीवनशैली बदलने तथा ग्रामीण क्षेत्रों में समग्र सामाजिक आर्थिक विकास होने की आशा है। कृषि में उत्पादकता वृद्धि। महिलाओं के लिए निरसता कम करना। बच्चों की शिक्षा में सुधार। सभी गांवों तथा घरों से संपर्क, ग्रामीण क्षेत्रों में विश्वसनीय बिजली सेवा। स्वास्थ्य और शिक्षा सेवाएं देने में सुधार। संचार साधनों (रेडियो, टेलीफोन, टेलीविजन, मोबाइल) तक पहुंच में सुधार। 

              बिजली व्यवस्था से जनसुरक्षा में सुधार। योजना में राज्यों की स्थानीय आवश्यकता/प्राथमिकता के अनुसार कार्य चुनने में लचीलापन है। जनसंख्या मानक को समाप्त कर दिया है और जनसंख्या प्रतिबंध के बिना सभी गांवों/मोहल्लों को योजना के अंतर्गत पात्रमाना गया है। डीपीआर तैयार करते समय राज्य जिला बिजली समिति (बीईसी) से परामर्श करेंगे और योजना में सांसदों के सांसद आदर्श ग्राम योजना (एसएजीवाई) के प्रस्तावों को आवश्यक रूप से शामिल करना होगा।

            योजना की अन्य विशेषताओं में अनिवार्य ई-निविदा, मानक निविदा दस्तावेज का परिपालन शामिल है। निजि बिजली वितरण कंपनियां तथा आरई कोआपरेटिव सोसाइटी भी योजना के अंतर्गत पात्र हैं। योजना की समीक्षा दिशा (जिलाविकास समन्वय तथा निगरानी समिति) द्वारा की जा रही है। भारत सरकार ग्रामीण जनता की जिंदगी में परिवर्तन लाने और सभी के लिए 24ज्र्7 बिजली देने के लिए संकल्पबद्ध है।