Thursday, 9 November 2017

बिहार कृषि रोड मैप 2017-2022 का शुभारंभ

   पटना। राष्‍ट्रपति रामनाथ कोविंद ने बिहार कृषि रोड मैप 2017-2022 का पटना में शुभारंभ किया।

     इस अवसर पर राष्‍ट्रपति ने कहा कि देश के राष्‍ट्रपति के रूप में पहली बार बिहार आना उनके लिए भावुक क्षण था।
  उन्होंने कहा कि वे बिहार के राज्यपाल के तौर पर अपने कार्यकाल के दौरान राज्य के सभी वर्गों और क्षेत्रों के लोगों से मिले सम्मान तथा स्नेह को हमेशा याद रखेंगे।
     राष्ट्रपति ने कहा कि चंपारण सत्याग्रह का शताब्दी वर्ष अप्रैल, 2017 से मनाया जा रहा है। इसलिए यह किसानों के हित में नए ‘कृषि रोड मैप’ के शुभारंभ का सही समय है। महात्मा गांधी ने सत्याग्रह के माध्यम से इस बात पर बल दिया था कि किसान भारतीय जीवन और नीति निर्माण का केंद्र हैं और यह बात आज भी प्रासंगिक है।
     राष्ट्रपति ने कहा कि बिहार सरकार ने किसानों, कृषि वैज्ञानिकों और अन्य हितधारकों के साथ विचार-विमर्श कर 2008 में पहले ‘कृषि रोड मैप’ का शुभारंभ किया था। 2017 का यह ‘रोड मैप’ तीसरा है। इसमें कृषि क्षेत्र के विकास के लिए व्यापक और समन्वित योजनाएं हैं।
   सभी विभागों को निर्देश दिया गया है कि किसानों के कल्याण को ध्यान में रखते हुए वे अपनी नीतियां बनाए। यह आधारभूत परिवर्तन है। राष्ट्रपति ने विश्वास व्यक्त किया कि आज जारी किए गए तीसरे कृषि रोड मैप से बिहार में कृषि क्षेत्र का प्रदर्शन और बढ़ेगा तथा कृषक समुदाय सशक्त बनेगा।

1.17 करोड़ युवाओं को कौशल विकास प्रशिक्षण

   नई दिल्ली। ‘हमारे देश में युवा जनसंख्‍या पूरी दुनिया में सबसे अधिक है और प्रत्‍येक युवा रोजगार चाहता है। आने वाली पीढि़यां हमे माफ नहीं करेंगी यदि रोजगार सृजन के लिए हम अविलंब कदम नहीं उठाते हैं।’ उक्‍त विचार केन्‍द्रीय श्रम व रोजगार राज्‍य मंत्री (स्‍वतंत्र प्रभार) संतोष मोहन गंगवार ने रोजगार सृजन की रणनीतियों पर चर्चा के लिए आयोजित बैठक में व्‍यक्‍त किए।

  इस बैठक का आयोजन वीवी गिरी नेशनल लेबर इंस्‍टीटयूट (वीवीजीएनएलआई) द्वारा नोएडा में किया गया था। उन्‍होंने कहा कि हमारा मंत्रालय प्रत्‍यक्ष रूप से रोजगारों का सृजन नहीं करता है, परंतु रोजगार प्रदान करने वालों और रोजगार के इच्‍छुक लोगों के लिए एक उपयुक्‍त वातावरण की सुविधा उपलब्‍ध कराता है।
   उन्‍होंने आगे कहा कि सरकार और उनका मंत्रालय कौशल विकास और रोजगार सृजन के लिए सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। उन्‍होंने ऐतिहासिक निर्णय, विमुद्रीकरण का उल्‍लेख करते हुए कहा कि इसके पिछले एक वर्ष में सुखद परिणाम सामने आये हैं। पिछले एक वर्ष में ईपीएफओ और ईएसआईसी के लाभान्वितों की संख्‍या 1 करोड़ से अधिक हो गई है।
    इस अवसर पर गंगवार ने वीवीजीएनएलआई द्वारा प्रकाशित 4 पुस्तिकाओं को जारी किया और संस्‍थान के पुनर्निर्मित सेमिनार ब्‍लॉक का भी उद्घाटन किया। श्रम और रोजगार मंत्रालय की सचिव श्रीमती साथियावती ने कहा कि रोजगार ढूंढने वाले युवाओं में प्रतिवर्ष 10 मीलियन युवा जुड जाते हैं। दुर्भाग्‍य से अनेक युवाओं में कौशल की कमी है।
     उन्‍होंने आगे कहा कि सरकार इस अंतर को समाप्‍त करने के लिए निरंतर प्रयास कर रही है। हाल के वर्षों में 1.17 करोड़ युवाओं को विभिन्‍न कौशल विकास हेतु प्रशिक्षण दिया गया है और उद्योग जगत व संस्‍थानों में नौकरी प्राप्‍त करने के लिए 920 जॉब फेयर आयोजित किये गये हैं। 
   गर्भवती महिलाओं को 26 सप्‍ताओं का मातृत्‍व अवकाश संबंधी अधिनियम का जिक्र करते हुए उन्‍होंने कहा कि अनेक रोजगार प्रदाता वेतन के साथ 26 सप्‍ताह का अवकाश देने के इच्‍छुक नहीं हैं। विशेषज्ञों को इस संबंध में सुझाव देना चाहिए।
     वीवीजीएनएलआई के महानिदेशक डॉ. एच श्रीनिवास ने आईएलओ, नीति आयोग, दिल्‍ली विश्‍वविदयालय, मानव विकास संस्‍थान, कृषि मंत्रालय, डब्‍ल्‍यूसीडी और अन्‍य संस्‍थानों से आये विशेषज्ञों का स्‍वागत करते हुए कहा कि इस प्रयास से कुछ व्‍याव‍हारिक और फलदायक सुझाव सामने आयेंगे और इसे विचार करने व लागू करने के लिए श्रम व रोजगार मंत्रालय के समक्ष रखा जाएगा।

राष्‍ट्रीय स्‍वच्‍छ गंगा मिशन : एक शाम गंगा के नाम

    नई दिल्ली। गंगा नदी देश की आबादी के 40 प्रतिशत लोगों की आजीविका का स्‍थायी स्‍त्रोत है। यह बगैर किसी शर्त के हमारी आवश्यकताओं को पूरा करने का स्‍त्रोत और आध्यात्मिकता का सार है।

  नदी के महत्व को स्वीकारने और इसकी महिमा को मनाने के लिए राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) ने नई दिल्ली में एक सांस्कृतिक संध्‍या-"एक शाम गंगा के नाम" का आयोजन किया। 2008 में आज ही के दिन गंगा को देश की राष्ट्रीय नदी घोषित किया गया था। 
    गंगा नदी के बारे में जागरूकता फैलाने के मकसद से आयोजित इस कार्यक्रम में नौकरशाहों, शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं, कलाकारों, छात्रों, शिक्षकों, जल और नदी विशेषज्ञों, इंजीनियरों, मीडिया और अन्य हितधारकों सहित समाज सभी क्षेत्रों के हजारों लोग उपस्थित थे। इस शाम का उद्देश्य गंगा के कायाकल्प के अदभुत काज के लिए सभी हितधारकों को एकजुट कर इस मकसद को आगे बढ़ाना है। 
    इस अवसर पर जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय में सचिव अमरजीत सिंह भी उपस्थित थे। एकत्रित लोगों को संबोधित करते हुए राष्‍ट्रीय स्‍वच्‍छ गंगा मिशन के महानिदेशक यू.पी सिंह ने कहा, ‘गंगा केवल जल स्रोत ही नहीं है, बल्कि यह लाखों लोगों की भावनाओं से जुड़ी हुई है।
    इस नदी को प्रदूषण से मुक्‍त करना आवश्‍यक है, जहां सरकार नदी के संरक्षण के लिए काफी परिश्रम कर रही है, वहीं लोगों की प्रतिभागिता अत्‍यधिक महत्‍वपूर्ण है।’ शाम के कार्यक्रम का मुख्‍य आकर्षण पद्म भूषण डॉ. सरोजा वैद्यनाथ द्वारा तैयार की गई नृत्‍य नाटिका ‘नमामि गंगे’ थी। भरतनाट्यम की इस प्रस्तुति में गंगा नदी की गाथा कि प्रासंगिकता को दर्शाया गया। 
   नृत्य नाटिका में नदी के धीरजता को दर्शाते हुए इसकी मौलिकता के साथ नदी के आजीवन प्रवाह को तुरन्त संरक्षित करने का आह्वान किया गया। इसमें नमामि गंगे कार्यक्रम के अन्तर्गत तेजी से आगे बढ़ रहे स्वच्छ गंगा अभियान में जन भागीदारी की आवश्यकता को खुबसूरती से दर्शाया गया। 
   गंगा नदी की गाथा का इतना सुन्दर प्रदर्शन देख कर दर्शक मंत्रमुग्ध हुए। नृत्य नाटिका के बाद गंगा पर लोकप्रिय गीत पेश किए गए। श्री पार्थ पुरूषोतम दत्ता और उनकी पत्नी श्रीमती बिनापानी दत्ता तथा उनके बैंड ने अनोखे अंदाज में अपने गीत प्रस्तुत कर दर्शकों का दिल जीत लिया। 
    कार्यक्रम का शुभारम्भ नमामि गंगे विषय पर आधारित त्रिचुर बन्धुओं द्वारा संगीतबद्ध किए और गाए गीत पर हेरिटेज पब्लिक स्कूल के छात्रों के बैले नृत्य से हुआ। इसमें भारतीय पौराणिक कथा की उस कड़ी को दर्शाया गया, जहां राजा भागीरथ ने अपने पूर्वजों की मुक्ति के लिए गंगा को पृथ्वी पर लाने के लिए तपस्या की और भागीरथ के आग्रह पर भगवान शिव ने अपनी जटा में कैद गंगा को पृथ्वी पर भेजा।
     पांचवी से नवीं कक्षा के छात्रों के बेहतरीन प्रदर्शन से दर्शक मंत्रमुग्ध हुए। अपने अन्दर कई जलीय प्रजातियों को संजोए गंगा मां लाखों लोगों की जीवन रेखा हैं और अनन्त काल से हमारे साथ है। यह सुनिश्चित करने के लिए कि खुशी और दुख के समय निर्मल तथा अविरल गंगा हमारे साथ बहती रहे, हमें अपनी भूमिका निभानी होगी। 
   नमामि गंगे कार्यक्रम के अन्तर्गत स्वच्छ गंगा का संदेश लोगों तक पहुंचाने में कोई कसर नही छोड़ी जा रही है। हालांकि गंगा नदी को स्वच्छ करने का कठिन कार्य जनता की प्रतिभागिता के बिना संभव नहीं है।

भारत परंपरागत रूप से दुनिया का सबसे बड़ा जैविक कृषि करने वाला देश

   ग्रेटर नोएडा। केन्द्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री राधा मोहन सिंह ने कहा है कि भारत परंपरागत रूप से दुनिया का सबसे बड़ा जैविक कृषि करने वाला देश है। 

    यहाँ तक कि मौजूदा भारत के बहुत बड़े भू – भाग में परंपरागत ज्ञान के आधार पर जैविक खेती की जाती है। सिंह ने यह बात इंडिया एक्सपो सेंटर, ग्रेटर नोएडा में जैविक कृषि विश्व कुम्भ 2017 का उदघाटन करते हुए कही। 
   इस आयोजन में विश्व के 110 देशों के 1400 प्रतिनिधि और 2000 भारतीय प्रतिनिधि हिस्सा ले रहे हैं। आयोजन को इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ आर्गेनिक फार्मिक मूवमेंट्स (आईफोम) और ओएफआई ने मिलकर आयोजित किया है।
     राधा मोहन सिंह ने कहा कि देश में वर्तमान में 22.5 लाख हेक्टेयर जमीन पर जैविक खेती हो रही है जिसमे परंपरागत कृषि विकास योजना से 3,60,400 किसान को लाभ पहुंचा है। इसी तरह पूर्वोत्तर राज्यों के क्षेत्रों में जैविक कृषि के अंतर्गत 50,000 हेक्टेयर क्षेत्र को कवर करने का लक्ष्य है। अब तक 45863 हेक्टेयर क्षेत्र को जैविक योग्य क्षेत्र में परिवर्तित किया जा चुका है और 2406 फार्मर इटेंरेस्ट ग्रुप (एफआईजी) का गठन कर लिया गया है, 2500 एफआईजी लक्ष्य के मुकाबले 44064 किसानों को योजना से जोड़ा जा चुका है।
    केन्द्रीय कृषि मंत्री ने कहा कि उत्तर प्रदेश में परंपरागत कृषि विकास योजना वर्ष 2015-16 से प्रारम्भ हुई और 28750 एकड़ मे 28750 किसान को लाभ पहुंचा है। किसानो के जैविक उत्पादो के विपणन के लिए राज्य सरकार 5 लाख रुपये प्रति जनपद को देकर बिक्री केंद्र खुलवा रही है। सिंह ने कहा कि दुनिया के कुछ वैज्ञानिक इसे 'डिफाल्ट ऑर्गेनिक' कहते हैं, लेकिन हमें यह समझने की जरूरत है कि जो किसान परंपरागत रूप से जैविक खेती कर रहे हैं, यह उनकी मजबूरी नहीं, उनकी पसंद है। 
    बेहद गहरी समझ के साथ वो इस रास्ते पर सदियों से चल रहे हैं। आज, वो रासायनिक खाद का इस्तेमाल नहीं करते तो यह उनकी अज्ञानता नहीं है, बल्कि उन्होंने बहुत सोचसमझ कर ऐसा न करने का फैसला किया है। इसलिए उनकी इस खेती की विधि को 'बाई डिफाल्ट' नहीं कहा जा सकता। राधा मोहन सिंह ने कहा कि भारत सरकार इस बात को स्वीकार करती है कि पिछले कुछ दशकों में खेतों में रासायनिक खाद के अंधाधुंध उपयोग ने यह सवाल पैदा कर दिया है कि इस तरह हम कितने दिन खेती कर सकेंगे? रासायनिक खाद युक्त खेती से पर्यावरण के साथ सामाजिक-आर्थिक और उत्पादन से जुड़े मुद्दे भी हैं जो हमारा ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं।
     सिंह ने कहा कि अब देश में खाद्य आपूर्ति की कोई समस्या नही है, लेकिन देश की बढ़ती जनसँख्या को सुरक्षित एवं पौष्टिक खाद्यान उपलब्ध कराने की महत्वपूर्ण चुनौती का कार्य अभी शेष है, हमारी निर्भरता रासायनिक खेती पर हो गयी है जिसमे हम रासायनिक उर्वरक, कीट-रोग नाशी एवं अन्य रासायन का प्रयोग करके उत्पादन तो बढ़ गया, लेकिन अनियंत्रित उपयोग से असुरक्षित खाद्यान उत्पन्न करने की समस्या पनप गयी है।
     केन्द्रीय कृषि मंत्री ने कहा कि यदि हम इन रासायनिक आदानो के अंधाधुंध प्रयोग द्वारा पर्यावरण पर होने वाले दुस्प्रभावों का विश्लेषण करे तो पता चलेगा कि इन सारे रासायनिक आदानो का बड़ा भाग मिट्टी,भू-जल,हवा और पौधों में समाविष्ट हो जाता है। यह छिडकाव के समय हवा के साथ दूर तक अन्य पौधों को प्रदूषित कर देते हैं। भूमि में प्रवेश करने वाले ये रसायन भू-जल में मिलकर, पानी के अन्य श्रोतो को भी प्रदूषित कर देता है।
     सिंह ने कहा कि रसायनों के दुष्प्रभाव से विश्व में जलवायु परिवर्तन और प्रकृति के पर्यावरण में असंतुलन उत्पन्न हो गया है, और मानवों पर भी गंभीर दुष्प्रभाव देखे गये हैं। धरती मां के स्वास्थ्य, सतत उत्पादन, आमजन को सुरक्षित एवं पौष्टिक खाद्यान के लिए जैविक कृषि आज राष्ट्रीय एवं वैश्विक आवश्यकता है।