जनजाति कल्याण हेतु बजट 24,005.00 करोड़ से बढ़कर 31,920.00 करोड़
नई दिल्ली। वर्ष 2017 के दौरान जनजातीय मामलों के मंत्रालय ने प्रयास जनजातियो के सामाजिक- आर्थिक विकास के लिए जारी रखा। जैसे उचित शिक्षा, भवन, तथा अन्य ज़रूरी योजनाओं से एक अंतर को कम करने की कोशिश की गई।
सरकार का इस मंत्रालय को यह निर्देश देता है कि वह ‘ट्राइबल सब प्लान’ के अंतर्गत दी जाने वाली धनराशि की देखरेख करे जिसे नीति आयोग ने तैयार किया है। बेहतर सुविधाएं मुहैया कराने के प्रयास में मंत्रालय लगातार सभी योजनाओं की समीक्षा कर रहा है।
जनजातीय कार्य मंत्रालय के लिए वार्षिक बजट वर्ष 2016-17 में 4827.00 करोड़ से बढ़कर वर्ष 2017-18 में 5329.00 करोड़ कर दिया गया है। इसके अलावा सभी मंत्रालयों में जनजाति कल्याण हेतु बजट 24,005.00 करोड़ से बढ़कर 31,920.00 करोड़ देखा गया। मंत्रालय इस राशि का 70ऽ हिस्सा पहले ही जनजाति कल्याण की विभिन्न योजनाओं पर खर्च कर चुकी है। 2280.49 करोड़ की धनराशि दो विशेष क्षेत्रों के कल्याण हेतु (शिक्षा, स्वास्थ्य, आजीविका/आय बढ़ोतरी) जारी की जा चुकी है।
पब्लिक फाइनेंसियल सिस्टम को लागू करके मंत्रालय जारी धनराशि के सदुपयोग और पारदर्शिता पर धयान लगे हुए है। जनजातिकल्याण हेतु धनराशि की देखरेख : 32 केन्द्रीय मंत्रालय और विभाग ‘ट्राइबल सब प्लान’ की धनराशि को देख रहे हैं जो जनजातियों की विभिन्न 273 योजनाओं के लिए आबंटित है। सरकार का ॠएङ ने जनवरी 2016 में इस मंत्रालय को यह निर्देश दिया था कि वह‘ट्राइबल सब प्लान’ के अंतर्गत दी जाने वाली धनराशि की देखरेख करे जिसे नीति आयोग ने तैयार किया है। इसकी देखरेख के लिए एक ऑनलाइन सिस्टम भी बने गया है।
यह ढांचा जनजातियों के कल्याण की योजनाओं, प्रदर्शन, और परिणाम की भी जांच करता है। साथ ही क्षेत्र आधारित प्रदर्शन की जांच करता है जिससे जिम्मेदारी का निर्धारण किया जा सके। इसके लिए एक नोडल ऑफिसर नियुक्त किया गया है जोमंत्रालय के साथ संपर्क बनाए रहता है। इस पूरे कार्यक्रम को छमाही समीक्षा के अंतर्गत मंत्रालय और नीति आयोग देखेंगे जिसके आधार पर इसके प्रदर्शन का आकलन किया जायेगा। 15.12.2017 तक 68ऽ धनराशि विभिन्न केन्द्रीय मंत्रालयों एवं विभागों द्वारा जारी की जा चुकी है जो जनजातियों के कल्याण की विभिन्न योजनाओं जैसे – शिक्षा, स्वास्थ्य. कृषि, सिंचाई, सड़क, भवन, बिजली, रोजगार उत्पादन एवं कौशल निर्माण पर खर्च किया गया है।
एकलव्य मॉडल रेजिडेंशियल स्कूल की योजना : 51 एकलव्यमॉडल रेजिडेंशियल स्कूल पिछले तीन वर्षों में बनाए गए, लक्ष्य 190 ऐसे स्कूलों का है। 2017-18 में 14 ऐसे स्कूलों को मंजूरी दी गई जिसके लिए 322.10 करोड़ की राशि जारी की गई। अब 271 ऐसे स्कूलों की मंजूरी मंत्रालय दे चुका है। 235.48 करोड़ की धनराशि 2017-18 के दौरान राज्यों को जारी गई जिसमे 190 स्कूलों में 56000 जनजातीय विद्यार्थी प्रवेश लेते हैं जिन पर प्रति विद्यार्थी 42000 का सालाना खर्च है।
कौशल विकास : 165.00 करोड़ की धनराशि विभिन्न राज्यों को विशेष केन्द्रीय सहायता योजना के तहत जारी की जा चुकी है जो अनुच्छेद 275(1) के अंतर्गत 71 हज़ार से ज्यादा पुरुष/महिला जनजाति लाभार्थियों के कौशल विकास के लिए है। जैसे- दफ़्तर प्रबंधन, सोलर टेकनीशियन, इलेक्ट्रीशियन, ब्यूटिशियन, हस्तकारीगर, मजदूरी कार्य जैसे- प्लम्बर, मिस्त्री, फिटर, वेल्डर, बढई, फ्रिज एवं ए.सी ठीक करना, मोबाईल ठीक करना,पोषण, आयुर्वेदिक एवं ट्राइबल औषधियाँ, आई टी, डाटा एंट्री, कपड़ा, नर्सिंग, वहां चालक एवं ठीक करना, बिजली की मोटर बांधना, सुरक्षाकर्मी, गृहप्रबंधन, खुदरा दुकानदारी, हॉस्पिटैलिटी, ईको-पर्यटन एवं एडवेंचर पर्यटन।
जनजातीय स्वतंत्रता सेनानियों के लिए संग्रहालयों का निर्माण : सरकार अपनी इच्छानुसार जनजातीय संग्रहालयों का निर्माण उन राज्यों में कर रही है जहाँ ये लोग रहे, अंग्रेजों के खिलाफ़ संघर्ष किया और सर झुकाने से इनकार किया। सरकार ऐसे राज्यों में प्रतीक रूप में जनजातीय संग्रहालय बनाएगी जिससे आने वाली पीढियां यह जान सकें कि किस प्रकार हमारी ये जनजातियाँ बलिदान देने में कितनी आगे थीं।
सरकार ने यह तय किया है कि वह स्टेट ऑफ़ आर्ट ट्राइबल म्यूजियम का निर्माण गुजरात में करेगी जिसका कुल खर्च 75 करोड़ है जिसमें जनजातीय कार्य मंत्रालय 50 करोड़ देगा। इसका 25 करोड़ पहले ही राज्य को दिया जा चुका है। अति संवेदन शील जनजाति समूहों के अंतर्गत पहल : मंत्रालय अति संवेदन शील जनजाति समूहों के विकास हेतु धनराशि 270 (2016-17) करोड़ से बढाकर 340 (2017-18) करोड़ कर चुका है। राज्य सरकारों को विभिन्न स्तरों पर खर्च करने की आज़ादी दी गई है। पी.वी.टी.जी. के सर्वांगीण विकास के लिए सूक्ष्मस्तर की योजना तैयार करने पर जोर दिया जा रहा है। पी.वी.टी.जी. के पारंपरिक शिल्प, पारंपरिक औषधीय प्रक्रिया,खानपान एवं सांस्कृतिक धरोहर को सहेजने पर ध्यान दिया जा रहा है। आर्थिक सहायता 212.19करोड़ से बढ़ाकर 265.00करोड़ कर दी गई है।
जनजाति विद्यार्थियों के लिए उच्च शिक्षा हेतुराष्ट्रीय अनुदान एवं छात्रवृत्ति योजना : योजना के लिए आर्थिक सहायता 80 करोड़ से बढ़ाकर 120करोड़ कर दी गई है। छात्रवृत्ति योजना : उच्च दक्षता वाले विद्यार्थियों के आवेदन के लिए एन.एस.पी. काइस्तेमाल किया जा रहा है। ट्यूशन फीस संस्थानों को सीधा भेजी जा रही है। कुल पारिवारिक आय की सीमा 4.50 लाख से बढ़कर 6.00 लाख कर दी गई है।
आदि महोत्सव : जनजातिकार्य मंत्रालय ने ट्रिफेड (च्र्ङक्ष्क़कक़्) के सहयोग से एक राष्ट्रीय आदिवासी महोत्सव का आयोजन 16 नवम्बर 2017 से 30 नवम्बर 2017 तक किया । इस महोत्सव की शुरुआत महान आदिवासी जन नेता और स्वतंत्रता सेनानी बिरसा मुंडा के 142वें जन्मदिवस पर अखबारोंएवं सोशल मीडिया मेंएक विज्ञापन देकर श्रद्धांजलि दी गई ।
आदि महोत्सव का उदघाटन उप-राष्ट्रपति ने 16 नवम्बर के दिन किया । आदिवासी संस्कृति कला, शिल्प, खानपान और व्यवसाय का यह महोत्सव दिल्ली में 15 दिन तक लाखों दिल्लीवासियों के बीच मनाया गया । यहाँ आदिवासी कलाकारों की बेहतरीन शिल्प कला का नज़ारा दिखा । इसमें सुन्दर साड़ियाँ, ड्रेस मटिरिअल, आभूषण, बांस और सरकंडे से बनी बस्तुओं, पेंटिंग जैसी कई चीज़ें शामिल थी । 27 राज्यों से आए करीब 800 कलाकार और कारीगरों ने इसमें भाग लिया और अपने उत्पाद बेचे ।
इसी बीच आदिबासी नृत्य और लोकसंगीत की भी कई प्रस्तुतियां दी गईं लेकिन सबसे ज्यादा ध्यान 85 आदिवासी रसोइयों के हाथों बनी स्वादिष्ट व्यंजनों ने खींचा। इसमें तेलंगाना से बंजारा बिरयानी, ओडिशा से खोदियार रोटी और चिकन के साथ उत्तर पूर्व के राज्यों से कई स्वादिष्ट शाकाहारी और मासाहारी व्यंजन शामिल थे ।दिल्ली के लोगों ने इन सब चीज़ों का लुत्फ़ उठाया। 15 दिन के मेले में आदिवासी कारीगरों ने करीब 1.60 करोड़ की बिक्री की जो अब तक का सबसे बड़ा रिकॉर्ड है ।
इस महोत्सव में कुल बिक्री 4.10 करोड़ की हुई जिसे लेकर पूरा आदिवासी समूह उत्साहित था। गैर सरकारी अनुदान : मंत्रालय उन गैर सरकारी संगठनों को जो स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में अपनी सेवाएँ दे रहे हैं उन्हें विशेष अनुदान दे रहा है । इस विषय में पारदर्शिता लाने और सरकार की नीतियों का पालन करने के लिए एक एन.जी ओ ग्रांट पोर्टल शुरू किया गया है । इस तरह अब हर आवेदन इसी ऑनलाइन पोर्टल के जरिये मंगवाया जाता है ।
इसी के साथ मैरिट के आधार पर नई परियोजनाओं को अनुदान भी कई सालों बाद शुरू किया जाएगा। लघु वन उत्पाद के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य : साल 2013-14 में इस योजना की शुरुआत 10 लघु वन उत्पादों के लिए हुई थी जिसमें बाद में 31.10.16 को बदलाव किए गए साथ ही अन्य कई उपादों को इस श्रेणी में जोड़ा गया और इसे देश भर में लागू करने को स्वीकृति दी गई । इससे पहले यह योजना पांचवी अनुसूची वाले राज्यों में ही लागू थी।
इसी तरह जिन 10 वस्तुओं पर न्यूनतम समर्थन मूल्य शुरू से था ट्रिफेडने टेरी के सहयोग से किए गए शोध के बाद इन पर पुनर्विचार किया । साल के बीज, सालकी पत्तियाँ, बीज के साथ चिरौंजी पौध, रंगीनी लाख और कुसुमी लाख जैसे पांच उत्पादों के न्यूनतम समर्थन मूल्य नवम्बर 2017 में बढाए गए।



















