Friday, 23 February 2018

राष्‍ट्रीय गंगा सफाई मिशन: करीब 4,000 करोड़ रुपए की परियोजनाओं को मंजूरी

  नई दिल्ली। राष्‍ट्रीय गंगा सफाई मिशन (एनएमसीजी) की कार्यकारी समिति की नौवीं बैठक में करीब 4,000 करोड़ रुपए की परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है।

   इसमें उत्‍तर प्रदेश में कानपुर के जाजमऊ स्थित चमड़ा शोधन कारखानों के लिए 20 एमएलडी सार्वजनिक अपशिष्‍ट जल शोधन संयंत्र शामिल है। 629 करोड़ रुपए की अनुमानित लागत वाली तीन चरणों की इस परियोजना में 380 अलग-अलग चमड़ा शोधन इकाइयों में पूर्व शोधन इकाई, एक 20 सीईटीपी होगा, जिसमें प्राकृतिक, जैविक और उन्‍नत शोधन की व्‍यवस्‍था होगी।
  इसके अलावा जीरो लिक्विड डिस्‍चार्ज (जेडएलडी) आधारित 200 केएलडी क्षमता का प्रमुख संयंत्र होगा। इस परियोजना में केन्‍द्र की हिस्‍सेदारी 472 करोड़ रुपए है। कानपुर औद्योगिक शहर से गंगा में होने वाले प्रदूषण को खत्‍म करने के लिए यह एक प्रमुख कदम है। इस परियोजना को विशेष उद्देश्‍य वाहन (एसपीवी) –जाजमऊ चमड़ा शोधन एसोसिएशन द्वारा अमल में लाया जाएगा। 
      कानपुर के जाजमऊ, बिनगवां, साजरी में सीवेज शोधन बुनियादी ढांचे के पुनर्वास और समेकन के लिए हाईब्रिड एन्‍युईटी-पीपीपी मोड के अंतर्गत 967.23 करोड़ रुपए की अनुमानित लागत वाली एक अन्‍य परियोजना को मंजूरी दी गई है।
     इस परियोजना में पंखा में 30 एमएलडी एसटीपी का निर्माण शामिल है। केंद्र सरकार पूंजीगत निवेश और 15 वर्ष संचालन तथा रख-रखाव करेगी। इलाहाबाद में नैनी, सलारी, नुमायादही, राजापुर, पोनघाट, पोडरा सीवरेज क्षेत्रों में सीवेज शोधन बुनियादी ढांचे के पुनर्वास और समेकन के लिए हाईब्रिड एन्‍युईटी-पीपीपी मोड के अंतर्गत 904 करोड़ रुपए की एक परियोजना को मंजूरी दी गई है। उपयुक्‍त कार्यान्‍वयन के लिए सभी एसटीपी और एसपीएस के लिए एक ऑन लाइन निगरानी प्रणाली को भी मंजूरी दी गई है।
     केंद्र सरकार पूंजीगत निवेश और 15 वर्ष संचालन तथा रख-रखाव करेगी। गंगा नदी में जाने वाले नालों के मूल स्‍थान/मूल स्‍थान से दूर जैव उपचारात्‍मक शोधन की एक परियोजना को भी मंजूरी दी गई है, जिस पर अनुमानत: 410 करोड़ रुपए लागत आएगी। एनएमसीजी ने सीपीसीबी और अन्‍य सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के जरिए प्रदूषण फैलाने वाले अन्‍य प्रमुख नालों की पहचान की है, जो मुख्‍य पाइप में जाकर मिल जाते हैं। यहां टेक्‍नोलॉजी सेवा प्रदाता गंगा नदी और उसकी सहायक नदियों के प्रदूषण को कम करने के लिए कंटेनराइज्‍ड मॉडयूलर शोधन संयंत्रों सहित शोधन सुविधाएं स्‍थापित करेंगे। 
     पहचान गए नालों को इसके बाद प्राथमिकता वाले नालों में वर्गीकृत किया गया है, जहां तत्‍काल हस्‍तक्षेप की जरूरत है। परियोजना के पहले चरण में शोधन के लिए 20 नालों को ध्‍यान में रखा गया है। बुनियादी ढांचे के विकास की अंतरिम अवधि के लिए नालों में प्रदूषण के दबाव का प्रबंध करने के लिए मूल स्‍थान पर/मूल स्‍थान के बाहर तेजी से, तकनीकी-आर्थिक और सतत टेक्‍नोलॉजी अपनाने तथा गंगा नदी में सीधे सीवेज छोड़े जाने के संचयी प्रभाव के प्रबंध के लिए यह कदम उठाया गया है। यह समग्र दृष्टिकोण नमामि गंगे कार्यक्रम को बढ़ावा देने के लिए अपनाया गया है, ताकि गंगा नदी में सीवेज का प्रवाह रोका जा सके।
     पश्चिम बंगाल में हाईब्रिड एन्‍युईटी मोड के अंतर्गत गार्डन रीच एसटीपी (57 एमएलडी) और केवड़ापुकुर एसटीपी (50 एमएलडी) के लिए 15 वर्ष के संचालन और रख-रखाव के साथ पुनर्वास की एक परियोजना को भी मंजूरी दी गई है। इस पर 165.16 करोड़ रुपए की अनुमानित लागत आएगी। केंद्र सरकार पूंजीगत निवेश और 15 वर्ष संचालन तथा रख-रखाव करेगी।
     बिहार में बेगुसराय, हाजीपुर और मुंगेर में तीन सीवेज बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को क्रमश: 230.06 करोड़ रुपए, 305.18 करोड़ रुपए और 294.02 करोड़ रुपए की अनुमानित लागत की संशोधित मंजूरी दी गई है। इन परियोजनाओं में केन्‍द्र की हिस्‍सेदारी क्रमश: 161.04 करोड़ रुपए, 213.63 करोड़ रुपए और 205.81 करोड़ रुपए होगी।
     केंद्र सरकार पूंजीगत निवेश और 15 वर्ष संचालन तथा रख-रखाव करेगी। बैठक की अध्‍यक्षता जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय में सचिव और एनएमसीजी महानिदेशक यू.पी. सिंह ने की। बैठक में मंत्रालय और एनएमसीजी के वरिष्‍ठ अधिकारी मौजूद थे।

गांगेय क्षेत्र अत्यधिक उपजाऊ

     पटना। केन्द्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री राधा मोहन सिंह ने कहा है कि भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना, न केवल धान, गेहूँ या दलहन, तिलहन के क्षेत्र में कार्य कर रहा है बल्कि फसल विविधीकरण, पशुधन विकास, मत्स्य प्रबंधन, जल प्रबंधन, बागवानी, कृषि-वानिकी तथा मृदा विज्ञान के क्षेत्र में भी सराहनीय कार्य कर रहा है।

  आईसीएआर-पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना का उद्धेश्य सातों पूर्वी राज्यों में टिकाऊ खेती के लिए कार्य करना है जिसका भौगोलिक क्षेत्रफल मात्र 22.5 प्रतिशत है जबकि जनसंख्या 34 प्रतिशत है। इसी प्रकार, कुल पशुधन का 31 प्रतिशत पशुधन भी इस क्षेत्र में पाया जाता है।
   राधा मोहन सिंह ने यह बात आज भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना के 18वें स्थापना दिवस के अवसर पर कही। केंद्रीय कृषि मंत्री ने कहा कि पूर्वी भूभाग पर पूरे देश की खाद्य सुरक्षा निर्भर करती है। गांगेय क्षेत्र अत्यधिक उपजाऊ होने के कारण पूरे देश की खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करने में सक्षम है। इसी क्रम में पूर्वी पठारी भूभाग दलहन, फलों, सब्जियों की पैदावार बढ़ाने में अग्रणी भूमिका निभा सकता है। 
     श्री सिंह ने कहा कि वर्तमान परिस्थितियों में पूर्वी क्षेत्र चावल, सब्जी एवं मीठे जल की मछलियों के उत्पादन में अग्रणी है। यह क्षेत्र राष्ट्रीय स्तर पर चावल, सब्जी एवं मछली उत्पादन में क्रमशः 50 प्रतिशत, 45 प्रतिशत एवं 38 प्रतिशत की भागीदारी सुनिश्चित कर रहा है। यदि इस क्षेत्र के समुचित विकास पर ध्यान दिया जाए तो यह क्षेत्र अनाज के साथ दलहन, तिलहन, फल-सब्जियों, दुग्ध एवं मत्स्य उत्पादन के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने में सक्षम है।
   केंद्रीय कृषि मंत्री ने बताया कि कृषि यांत्रिकीकरण, जलवायु परिवर्तन का खेती पर दुष्प्रभाव, आर्द्र भूमि की अधिकता, अत्यधिक जनसंख्या घनत्व, भूमिहीन किसानों की आजीविका, 100 लाख हेक्टेयर, परती भूमि का विकास एक महत्वपूर्ण चुनौती है जिसपर पूरे जोर-शोर से कार्य करने की आवश्यकता है। इसी प्रकार भूजल, जो कि पूर्वी क्षेत्रों में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है, परंतु भूजल दोहन ऊर्जा की कमी के कारण बहुत कम मात्रा में किया जा रहा है। केंद्र सरकार में उर्जा उत्पादन की बढोत्तरी तथा घरों को बिजली के अलावा खेती के लिए अलग से देश के किसानों के लिए पर्याप्त राशि की व्यवस्था के कारण इस समस्या से भी शीघ्र निदान मिलेगा। 
    श्री सिंह ने कहा कि आईसीएआर द्वारा समेकित फार्मिंग प्रणाली पर गहन शोध व तकनीकी सृजन तथा प्रसार के लिए मोतिहारी में एक नये शोध केन्द्र की स्थापना की गयी है एवं छह वैज्ञानिकों की नियुक्ति भी की गई है। पटना, पूसा, सबौर, मधेपुरा, कैमुर एवं बक्सर में समेकित कृषि प्रणाली मॉडल का विकास किया गया है। ये मॉडल खाद्य एवं पोषण सुरक्षा एवं आय बढ़ाने में सहायक होगें। राज्य में करीब 1450 किसानों ने समेकित कृषि प्रणाली को अपनाया है जिससे उनको प्रति हेक्टेयर प्रति वर्ष 1.8 से 2.5 लाख तक आमदनी हुई है।
    श्री सिंह ने कहा कि कृषि के साथ अन्य विकल्पों जैसे डेयरी, मत्स्य, मधुमक्खी, रेशम, मशरूम, फसल प्रसंस्करण व मूल्य संवर्द्धन आदि के उचित उपयोग से कृषक अतिरिक्त रोजगार दिवस व आमदनी अर्जित कर सकेंगे।
   केंद्रीय कृषि मंत्री ने कहा कि बिहार एवं झारखंड प्रदेश के लिए प्रगतिशील कृषक डेटा बेस तैयार किया गया है जिसमें कृषि के विभिन्न क्षेत्रों में कृषकों द्वारा किये गये कार्य की जानकारी दी गई है ताकि अन्य कृषक इन जानकारियों का लाभ उठा सके एवं उस कृषक से संपर्क स्थापित कर सके।

एमबीबीएस ग्रेजुएट कम से कम दो वर्ष तक ग्रामीण इलाकों में सेवा अवश्‍य करें

    चेन्‍नई। उपराष्‍ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडू ने सभी राज्‍य सरकारों से अपील की है कि वे कम से कम हाई स्‍कूल के स्‍तर तक मातृभाषा को एक अनिवार्य विषय बनाएं।

  उपराष्‍ट्रपति आज चेन्‍नई में सविता इंस्टीइट्यूट ऑफ मेडिकल एंड टेक्नीकल साइंसेज में 11वां दीक्षांत भाषण दे रहे थे। उपराष्‍ट्रपति ने कहा कि कोई भी बच्‍चा किसी अन्‍य भाषा की तुलना में अपनी मातृभाषा में ज्‍यादा अच्‍छी तरह समझ सकता है।
    उन्‍होंने कहा कि अपने पैदाइशी भाषा में वह अपने विचारों को प्रभावशाली तरीके से अभिव्‍यक्‍त कर सकता है। हम आमतौर पर अपनी मातृभाषा में अपने विचारों को बेहतर तरीके से अभिव्‍यक्‍त करते हैं। उपराष्‍ट्रपति ने कहा कि हम बहु सांस्‍कृतिक और बहुभाषी विश्‍व में रहते हैं।
   उन्‍होंने कहा चूंकि भाषा और संस्‍कृति एक दूसरे से जुड़े हुए हैं, हमें देश के अनेक जनजातीय समूहों द्वारा बोली जाने वाली अनेक भाषाओं सहित अपनी स्‍वदेशी भाषाओं को मजबूत बनाने की जरूरत है। भाषा किसी संस्‍कृति की जीवन रेखा है और एक तरीके से यह एक वृहद सामाजिक परिवेश को परिभाषित करती है, जिसमें एक समाज रहता है।
   उपराष्‍ट्रपति ने कहा कि महान व्‍यक्तियों का जीवन मेडिकल सहित सभी छात्रों के इतिहास के पाठ्यक्रम का हिस्‍सा होना चाहिए। कोई भी देश जो अपने इतिहास और संस्‍कृति को भूल जाता है, वह कभी समृद्ध नहीं हो सकता। 
   उन्‍होंने कहा कि किसी को भी अपना अतीत याद रखना चाहिए और भविष्‍य के लिए योजना बनानी चाहिए तथा उसके अनुसार आगे बढ़ना चाहिए। हमें अपनी जड़ों तक पहुंचना चाहिए, अपनी संस्‍कृति को जानना चाहिए। 
  उपराष्‍ट्रपति ने कहा कि निजी क्षेत्र को स्‍वास्‍थ्‍य के क्षेत्र के वि‍कास में बड़ी भूमिका निभानी चाहिए। उन्‍होंने कहा कि समाज ने मेडिकल के छात्रों को बहुत कुछ दिया और उन्‍हें कम से कम दो वर्ष ग्रामीण इलाकों में गांव वालों की सेवा करके समाज को कुछ न कुछ अवश्‍य देना चाहिए। 
   उन्‍होंने कहा कि ग्रामीण इलाकों में डॉक्‍टरों और स्‍वास्‍थ्‍य देखरेख सुविधाओं की भारी कमी है और सभी तक स्‍वास्‍थ्‍य देखरेख की पहुंच कायम करने के लिए जबरदस्‍त बदलाव की आवश्‍यकता है।