Sunday, 31 December 2017

जनजाति कल्याण हेतु बजट 24,005.00 करोड़ से बढ़कर 31,920.00 करोड़

    नई दिल्ली। वर्ष 2017 के दौरान जनजातीय मामलों के मंत्रालय ने प्रयास जनजातियो के सामाजिक- आर्थिक विकास के लिए जारी रखा। जैसे उचित शिक्षा, भवन, तथा अन्य ज़रूरी योजनाओं से एक अंतर को कम करने की कोशिश की गई।

  सरकार का इस मंत्रालय को यह निर्देश देता है कि वह ‘ट्राइबल सब प्लान’ के अंतर्गत दी जाने वाली धनराशि की देखरेख करे जिसे नीति आयोग ने तैयार किया है। बेहतर सुविधाएं मुहैया कराने के प्रयास में मंत्रालय लगातार सभी योजनाओं की समीक्षा कर रहा है।
     जनजातीय कार्य मंत्रालय के लिए वार्षिक बजट वर्ष 2016-17 में 4827.00 करोड़ से बढ़कर वर्ष 2017-18 में 5329.00 करोड़ कर दिया गया है। इसके अलावा सभी मंत्रालयों में जनजाति कल्याण हेतु बजट 24,005.00 करोड़ से बढ़कर 31,920.00 करोड़ देखा गया। मंत्रालय इस राशि का 70ऽ हिस्सा पहले ही जनजाति कल्याण की विभिन्न योजनाओं पर खर्च कर चुकी है। 2280.49 करोड़ की धनराशि दो विशेष क्षेत्रों के कल्याण हेतु (शिक्षा, स्वास्थ्य, आजीविका/आय बढ़ोतरी) जारी की जा चुकी है। 
    पब्लिक फाइनेंसियल सिस्टम को लागू करके मंत्रालय जारी धनराशि के सदुपयोग और पारदर्शिता पर धयान लगे हुए है। जनजातिकल्याण हेतु धनराशि की देखरेख : 32 केन्द्रीय मंत्रालय और विभाग ‘ट्राइबल सब प्लान’ की धनराशि को देख रहे हैं जो जनजातियों की विभिन्न 273 योजनाओं के लिए आबंटित है। सरकार का ॠएङ ने जनवरी 2016 में इस मंत्रालय को यह निर्देश दिया था कि वह‘ट्राइबल सब प्लान’ के अंतर्गत दी जाने वाली धनराशि की देखरेख करे जिसे नीति आयोग ने तैयार किया है। इसकी देखरेख के लिए एक ऑनलाइन सिस्टम भी बने गया है।
     यह ढांचा जनजातियों के कल्याण की योजनाओं, प्रदर्शन, और परिणाम की भी जांच करता है। साथ ही क्षेत्र आधारित प्रदर्शन की जांच करता है जिससे जिम्मेदारी का निर्धारण किया जा सके। इसके लिए एक नोडल ऑफिसर नियुक्त किया गया है जोमंत्रालय के साथ संपर्क बनाए रहता है। इस पूरे कार्यक्रम को छमाही समीक्षा के अंतर्गत मंत्रालय और नीति आयोग देखेंगे जिसके आधार पर इसके प्रदर्शन का आकलन किया जायेगा। 15.12.2017 तक 68ऽ धनराशि विभिन्न केन्द्रीय मंत्रालयों एवं विभागों द्वारा जारी की जा चुकी है जो जनजातियों के कल्याण की विभिन्न योजनाओं जैसे – शिक्षा, स्वास्थ्य. कृषि, सिंचाई, सड़क, भवन, बिजली, रोजगार उत्पादन एवं कौशल निर्माण पर खर्च किया गया है।
      एकलव्य मॉडल रेजिडेंशियल स्कूल की योजना : 51 एकलव्यमॉडल रेजिडेंशियल स्कूल पिछले तीन वर्षों में बनाए गए, लक्ष्य 190 ऐसे स्कूलों का है। 2017-18 में 14 ऐसे स्कूलों को मंजूरी दी गई जिसके लिए 322.10 करोड़ की राशि जारी की गई। अब 271 ऐसे स्कूलों की मंजूरी मंत्रालय दे चुका है। 235.48 करोड़ की धनराशि 2017-18 के दौरान राज्यों को जारी गई जिसमे 190 स्कूलों में 56000 जनजातीय विद्यार्थी प्रवेश लेते हैं जिन पर प्रति विद्यार्थी 42000 का सालाना खर्च है।
     कौशल विकास : 165.00 करोड़ की धनराशि विभिन्न राज्यों को विशेष केन्द्रीय सहायता योजना के तहत जारी की जा चुकी है जो अनुच्छेद 275(1) के अंतर्गत 71 हज़ार से ज्यादा पुरुष/महिला जनजाति लाभार्थियों के कौशल विकास के लिए है। जैसे- दफ़्तर प्रबंधन, सोलर टेकनीशियन, इलेक्ट्रीशियन, ब्यूटिशियन, हस्तकारीगर, मजदूरी कार्य जैसे- प्लम्बर, मिस्त्री, फिटर, वेल्डर, बढई, फ्रिज एवं ए.सी ठीक करना, मोबाईल ठीक करना,पोषण, आयुर्वेदिक एवं ट्राइबल औषधियाँ, आई टी, डाटा एंट्री, कपड़ा, नर्सिंग, वहां चालक एवं ठीक करना, बिजली की मोटर बांधना, सुरक्षाकर्मी, गृहप्रबंधन, खुदरा दुकानदारी, हॉस्पिटैलिटी, ईको-पर्यटन एवं एडवेंचर पर्यटन।
     जनजातीय स्वतंत्रता सेनानियों के लिए संग्रहालयों का निर्माण : सरकार अपनी इच्छानुसार जनजातीय संग्रहालयों का निर्माण उन राज्यों में कर रही है जहाँ ये लोग रहे, अंग्रेजों के खिलाफ़ संघर्ष किया और सर झुकाने से इनकार किया। सरकार ऐसे राज्यों में प्रतीक रूप में जनजातीय संग्रहालय बनाएगी जिससे आने वाली पीढियां यह जान सकें कि किस प्रकार हमारी ये जनजातियाँ बलिदान देने में कितनी आगे थीं।  
    सरकार ने यह तय किया है कि वह स्टेट ऑफ़ आर्ट ट्राइबल म्यूजियम का निर्माण गुजरात में करेगी जिसका कुल खर्च 75 करोड़ है जिसमें जनजातीय कार्य मंत्रालय 50 करोड़ देगा। इसका 25 करोड़ पहले ही राज्य को दिया जा चुका है। अति संवेदन शील जनजाति समूहों के अंतर्गत पहल : मंत्रालय अति संवेदन शील जनजाति समूहों के विकास हेतु धनराशि 270 (2016-17) करोड़ से बढाकर 340 (2017-18) करोड़ कर चुका है। राज्य सरकारों को विभिन्न स्तरों पर खर्च करने की आज़ादी दी गई है। पी.वी.टी.जी. के सर्वांगीण विकास के लिए सूक्ष्मस्तर की योजना तैयार करने पर जोर दिया जा रहा है। पी.वी.टी.जी. के पारंपरिक शिल्प, पारंपरिक औषधीय प्रक्रिया,खानपान एवं सांस्कृतिक धरोहर को सहेजने पर ध्यान दिया जा रहा है। आर्थिक सहायता 212.19करोड़ से बढ़ाकर 265.00करोड़ कर दी गई है।
     जनजाति विद्यार्थियों के लिए उच्च शिक्षा हेतुराष्ट्रीय अनुदान एवं छात्रवृत्ति योजना : योजना के लिए आर्थिक सहायता 80 करोड़ से बढ़ाकर 120करोड़ कर दी गई है। छात्रवृत्ति योजना : उच्च दक्षता वाले विद्यार्थियों के आवेदन के लिए एन.एस.पी. काइस्तेमाल किया जा रहा है। ट्यूशन फीस संस्थानों को सीधा भेजी जा रही है। कुल पारिवारिक आय की सीमा 4.50 लाख से बढ़कर 6.00 लाख कर दी गई है।
     आदि महोत्सव : जनजातिकार्य मंत्रालय ने ट्रिफेड (च्र्ङक्ष्क़कक़्) के सहयोग से एक राष्ट्रीय आदिवासी महोत्सव का आयोजन 16 नवम्बर 2017 से 30 नवम्बर 2017 तक किया । इस महोत्सव की शुरुआत महान आदिवासी जन नेता और स्वतंत्रता सेनानी बिरसा मुंडा के 142वें जन्मदिवस पर अखबारोंएवं सोशल मीडिया मेंएक विज्ञापन देकर श्रद्धांजलि दी गई ।
    आदि महोत्सव का उदघाटन उप-राष्ट्रपति ने 16 नवम्बर के दिन किया । आदिवासी संस्कृति कला, शिल्प, खानपान और व्यवसाय का यह महोत्सव दिल्ली में 15 दिन तक लाखों दिल्लीवासियों के बीच मनाया गया । यहाँ आदिवासी कलाकारों की बेहतरीन शिल्प कला का नज़ारा दिखा । इसमें सुन्दर साड़ियाँ, ड्रेस मटिरिअल, आभूषण, बांस और सरकंडे से बनी बस्तुओं, पेंटिंग जैसी कई चीज़ें शामिल थी । 27 राज्यों से आए करीब 800 कलाकार और कारीगरों ने इसमें भाग लिया और अपने उत्पाद बेचे ।
    इसी बीच आदिबासी नृत्य और लोकसंगीत की भी कई प्रस्तुतियां दी गईं लेकिन सबसे ज्यादा ध्यान 85 आदिवासी रसोइयों के हाथों बनी स्वादिष्ट व्यंजनों ने खींचा। इसमें तेलंगाना से बंजारा बिरयानी, ओडिशा से खोदियार रोटी और चिकन के साथ उत्तर पूर्व के राज्यों से कई स्वादिष्ट शाकाहारी और मासाहारी व्यंजन शामिल थे ।दिल्ली के लोगों ने इन सब चीज़ों का लुत्फ़ उठाया। 15 दिन के मेले में आदिवासी कारीगरों ने करीब 1.60 करोड़ की बिक्री की जो अब तक का सबसे बड़ा रिकॉर्ड है ।
    इस महोत्सव में कुल बिक्री 4.10 करोड़ की हुई जिसे लेकर पूरा आदिवासी समूह उत्साहित था। गैर सरकारी अनुदान : मंत्रालय उन गैर सरकारी संगठनों को जो स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में अपनी सेवाएँ दे रहे हैं उन्हें विशेष अनुदान दे रहा है । इस विषय में पारदर्शिता लाने और सरकार की नीतियों का पालन करने के लिए एक एन.जी ओ ग्रांट पोर्टल शुरू किया गया है । इस तरह अब हर आवेदन इसी ऑनलाइन पोर्टल के जरिये मंगवाया जाता है । 
    इसी के साथ मैरिट के आधार पर नई परियोजनाओं को अनुदान भी कई सालों बाद शुरू किया जाएगा। लघु वन उत्पाद के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य : साल 2013-14 में इस योजना की शुरुआत 10 लघु वन उत्पादों के लिए हुई थी जिसमें बाद में 31.10.16 को बदलाव किए गए साथ ही अन्य कई उपादों को इस श्रेणी में जोड़ा गया और इसे देश भर में लागू करने को स्वीकृति दी गई । इससे पहले यह योजना पांचवी अनुसूची वाले राज्यों में ही लागू थी। 
   इसी तरह जिन 10 वस्तुओं पर न्यूनतम समर्थन मूल्य शुरू से था ट्रिफेडने टेरी के सहयोग से किए गए शोध के बाद इन पर पुनर्विचार किया । साल के बीज, सालकी पत्तियाँ, बीज के साथ चिरौंजी पौध, रंगीनी लाख और कुसुमी लाख जैसे पांच उत्पादों के न्यूनतम समर्थन मूल्य नवम्बर 2017 में बढाए गए।

दुनिया का सबसे बड़ा सर्वे ‘स्वच्छ सर्वेक्षण 2018’ किया जाएगा

    नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि मेरे प्यारे देशवासियो, नमस्कार। ‘मन की बात’ का, इस वर्ष का यह आख़िरी कार्यक्रम है और संयोग देखिए कि आज, वर्ष 2017 का भी आख़िरी दिन है। 

   इस पूरे वर्ष बहुत सारी बाते हमने और आपने की। ‘मन की बात’ के लिए आपके ढ़ेर सारे पत्र, विचारों का ये आदान-प्रदान, मेरे लिए तो हमेशा एक नई ऊर्जा लेकर के आता है। कुछ घंटों बाद, वर्ष बदल जाएगा लेकिन हमारी बातों का यह सिलसिला आगे भी इसी तरह जारी रहेगा। आने वाले वर्ष में हम, और नयी-नयी बातें करेंगे, नये अनुभव करेंगे। आप सबको 2018 की अनेक-अनेक शुभकामनाएँ।
    अभी पिछले दिनों 25 दिसम्बर को विश्वभर में क्रिसमस का त्योहार धूमधाम से मनाया गया। भारत में भी लोगों ने काफी उत्साह से इस त्योहार को मनाया। क्रिसमस के अवसर पर हम सब ईसा मसीह की महान शिक्षाओं को याद करते हैं और ईसा मसीह ने सबसे ज़्यादा जिस बात पर बल दिया था, वह था- सेवा-भाव। सेवा की भावना का सार हम बाइबल में भी देखते हैं।
      प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि यह दिखाता है कि सेवा का माहात्म्य क्या है! विश्व की कोई भी जाति होगी, धर्म होगा, परम्परा होगी, रंग होंगे लेकिन सेवाभाव, ये मानवीय मूल्यों की एक अनमोल पहचान के रूप में है। हमारे देश में ‘निष्काम कर्म’ की बात होती है, यानी ऐसी सेवा जिसमें कोई अपेक्षा न हो। हमारे यहाँ तो कहा गया है – सेवा परमो धर्मः। ‘जीव-सेवा ही शिव-सेवा’ और गुरुदेव रामकृष्ण परमहंस तो कहते थे – शिव-भाव से जीव-सेवा करें यानी पूरे विश्व में ये सारे समान मानवीय मूल्य हैं। आइए, हम महापुरुषों का स्मरण करते हुए, पवित्र दिवसों की याद करते हुए, हमारी इस महान मूल्य परम्परा को, नयी चेतना दें, नयी ऊर्जा दें और ख़ुद भी उसे जीने का प्रयास करें। 
     प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि यह वर्ष गुरुगोविन्द सिंह जी का 350वाँ प्रकाश पर्व का भी वर्ष था। गुरुगोविन्द सिंह जी का साहस और त्याग से भरा असाधारण जीवन हम सभी के लिए प्रेरणा का स्रोत है। गुरुगोविन्द सिंह जी ने महान जीवन मूल्यों का उपदेश दिया और उन्हीं मूल्यों के आधार पर उन्होंने अपना जीवन जिया भी। एक गुरु, कवि, दार्शनिक, महान योद्धा, गुरुगोविन्द सिंह जी ने इन सभी भूमिकाओं में लोगों को प्रेरित करने का काम किया। 
    उन्होंने उत्पीड़न और अन्याय के विरुद्ध लड़ाई लड़ी। लोगों को जाति और धर्म के बंधनों को तोड़ने की शिक्षा दी। इन प्रयासों में उन्हें व्यक्तिगत रूप से बहुत कुछ गँवाना भी पड़ा। लेकिन उन्होंने कभी भी द्वेष की भावना को जगह नहीं दी। जीवन के हर-पल में प्रेम, त्याग और शांति का सन्देश - कितनी महान विशेषताओं से भरा हुआ उनका व्यक्तित्व था! ये मेरे लिए सौभाग्य की बात रही कि मैं इस वर्ष की शुरुआत में गुरुगोविन्द सिंह जी 350वीं जयन्ती के अवसर पर पटनासाहिब में आयोजित प्रकाशोत्सव में शामिल हुआ।
      प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि आइए, हम सब संकल्प लें और गुरुगोविन्द सिंह जी की महान शिक्षा और उनके प्रेरणादायी जीवन से, सीख लेते हुए जीवन को ढालने का प्रयास करें। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि वोट की शक्ति, लोकतंत्र में सबसे बड़ी शक्ति है। लाखों लोगों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए ‘वोट’ सबसे प्रभावी साधन है। आप केवल मत देने के अधिकारी नहीं बन रहे हैं। आप 21वीं सदी का भारत कैसा हो? 21वीं सदी के भारत के आपके सपने क्या हों? आप भी तो भारत की 21वीं सदी के निर्माता बन सकते हैं और इसकी शुरुआत एक जनवरी से विशेष रूप से हो रही है। और आज अपनी इस ‘मन की बात’ में, मैं 18 से 25 वर्ष के ऊर्जा और संकल्प से भरे हमारे यशस्वी युवाओं से बात करना चाहता हूँ।
      नया भारत जो ये जातिवाद, साम्प्रदायवाद, आतंकवाद, भ्रष्टाचार के ज़हर से मुक्त हो। गन्दगी और ग़रीबी से मुक्त हो। नया भारत, जहाँ शांति, एकता और सद्भावना ही हो। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि आप ये जानकर के हैरान रह जाएंगे कि 1990 में आतंकवादियों ने उनके पैतृक-घर को जला दिया था। वहाँ आतंकवाद और हिंसा इतनी अधिक थी कि उनके परिवार को अपनी पैतृक-ज़मीन को छोड़ के बाहर निकलना पड़ा। एक छोटे बच्चे के लिए उसके चारों ओर इतनी हिंसा का वातावरण, दिल में अंधकारात्मक और कड़वाहट पैदा करने के लिए काफ़ी था - पर अंजुम ने ऐसा नहीं होने दिया।
     उन्होंने कभी आशा नहीं छोड़ी। उन्होंने अपने लिए एक अलग रास्ता चुना - जनता की सेवा का रास्ता। वो विपरीत हालात से उबर कर बाहर आए और सफलता की अपनी कहानी ख़ुद लिखी। आज वो सिर्फ जम्मू और कश्मीर के ही नहीं बल्कि पूरे देश के युवाओं के लिए प्रेरणा बन गए हैं। अंजुम ने साबित कर दिया है कि हालात कितने ही ख़राब क्यों न हों, सकारात्मक कार्यों के द्वारा निराशा के बादलों को भी ध्वस्त किया जा सकता है। 
     प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि अभी पिछले हफ़्ते ही मुझे जम्मू-कश्मीर की कुछ बेटियों से मिलने का अवसर मिला। उनमें जो जज़्बा था, जो उत्साह था, जो सपने थे और जब मैं उनसे सुन रहा था, वो जीवन में कैसे-कैसे क्षेत्र में प्रगति करना चाहती हैं। और वो कितनी आशा-भरी ज़िन्दगी वाले लोग थे! उनसे मैंने बातें की, कहीं निराशा का नामोनिशान नहीं था - उत्साह था, उमंग था, ऊर्जा थी, सपने थे, संकल्प थे। उन बेटियों से, जितना समय मैंने बिताया, मुझे भी प्रेरणा मिली और ये ही तो देश की ताकत हैं, ये ही तो मेरे युवा हैं, ये ही तो मेरे देश का भविष्य हैं। 
     प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि प्यारे देशवासियो, हमारे देश के ही नहीं, जब भी कभी विश्व के प्रसिद्ध धार्मिक-स्थलों की चर्चा होती है तो केरल के सबरीमाला मंदिर की बात होनी बहुत स्वाभाविक है। विश्व-प्रसिद्ध इस मंदिर में, भगवान अय्यप्पा स्वामी का आशीर्वाद लेने के लिए हर वर्ष करोड़ों की संख्या में श्रद्धालु यहाँ आते हैं। जहाँ इतनी भारी संख्या में श्रद्धालु आते हों, जिस स्थान का इतना बड़ा माहात्म्य हो, वहाँ स्वच्छता बनाये रखना कितनी बड़ी चुनौती हो सकती है ? और विशेषकर उस जगह पर, जो पहाड़ियों और जंगलों के बीच स्थित हो। लेकिन इस समस्या को भी संस्कार में कैसे बदला जा सकता है, समस्या में से उबरने का रास्ता कैसे खोजा जा सकता है और जन-भागीदारी में इतनी क्या ताक़त होती है- ये अपने आप में सबरीमाला मंदिर एक उदाहरण के तौर पर है।
      स्वच्छता के लिए जागरूकता का एक स्वैच्छिक-अभियान शुरू किया। और एक ऐसी परम्परा बना दी कि जो भी यात्री आते हैं, उनकी यात्रा तब तक पूरी नहीं होती जब तक कि वो स्वच्छता के कार्यक्रम में कोई-न-कोई शारीरिक श्रम न करते हों। इस अभियान में न कोई बड़ा होता है, न कोई छोटा होता है। हर यात्री, भगवान की पूजा का ही भाग समझ करके कुछ-न-कुछ समय स्वच्छता के लिए करता है, काम करता है, गन्दगी हटाने के लिए काम करता है। हर सुबह यहाँ सफाई का दृश्य बड़ा ही अद्भुत होता है और सारे तीर्थयात्री इसमें जुट जाते हैं। कितना ही धनी व्यक्ति क्यों न हो, कितना ही बड़ा अफ़सर क्यों न हो, हर कोई एक सामान्य-यात्री के तौर पर इस ‘पुण्यम पुन्कवाणम’ कार्यक्रम का हिस्सा बन जाते हैं, सफाई को करके ही आगे बढ़ते हैं। हम देशवासियों के लिए ऐसे कई उदाहरण हैं।
     सबरीमाला में इतना आगे बढ़ा हुआ ये स्वच्छता - अभियान और उसमें ‘पुण्यम पुन्कवाणम’ ये हर यात्री के यात्रा का हिस्सा बन जाता है। वहाँ कठोर-व्रत के साथ स्वच्छता का कठोर-संकल्प भी साथ-साथ चलता है।
    प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि मेरे प्यारे देशवासियो, 2 अक्तूबर 2014 पूज्य बापू की जन्म जयन्ती पर हम सब ने संकल्प किया है कि पूज्य बापू का जो अधूरा काम है यानी कि ‘स्वच्छ-भारत’, ‘गन्दगी से मुक्त-भारत’। पूज्य बापू जीवन-भर इस काम के लिए जूझते रहे, कोशिश भी करते रहे। और हम सब ने तय किया कि जब पूज्य बापू की 150वीं जयंती हो तो उन्हें हम उनके सपनों का भारत, ‘स्वच्छ भारत’, देने की दिशा में कुछ-न-कुछ करें।
     स्वच्छता की दिशा में देशभर में व्यापक स्तर पर प्रयास हो रहा है। ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में व्यापक जन-भागीदारी से भी परिवर्तन नज़र आने लगा है। शहरी क्षेत्रों में स्वच्छता के स्तर की उपलब्धियों का आकलन करने के लिए आगामी 4 जनवरी से 10 मार्च 2018 के बीच दुनिया का सबसे बड़ा सर्वे ‘स्वच्छ सर्वेक्षण 2018’ किया जाएगा। ये सर्वे, चार हज़ार से भी अधिक शहरों में लगभग चालीस (40) करोड़ आबादी में किया जाएगा। इस सर्वे में जिन तथ्यों का आकलन किया जाएगा उनमें हैं – शहरों में खुले में शौच से मुक्ति, कूड़े का कलेक्शन, कूड़े को उठा कर ले जाने के लिए परिवहन की व्यवस्था, वैज्ञानिक तरीक़े से कूड़े के लिए किए जा रहे प्रयास, और स्वच्छता के लिए किये गए प्रयास और इस काम के लिए जन-भागीदारी। 
    प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि जन-जन का स्वभाव बने, शहर का स्वभाव बन जाए। स्वच्छता, सिर्फ़ सरकार करे ऐसा नहीं। हर नागरिक एवं नागरिक संगठनों की भी बहुत बड़ी ज़िम्मेवारी है। और मेरी हर नागरिक से अपील है कि वे, आने वाले दिनों में जो स्वच्छता-सर्वे होने वाला है उसमें बढ़-चढ़ करके भाग लें। और आपका शहर पीछे न रह जाए, आपका गली-मोहल्ला पीछे न रह जाए - इसका बीड़ा उठाएं। मुझे पूरा विश्वास है कि घर से सूखा-कूड़ा और गीला-कूड़ा, अलग-अलग करके नीले और हरे उपयोग, अब तो आपकी आदत बन ही गई होगी।
    प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि मेरे प्यारे देशवासियो, कुछ बातें ऐसी होती हैं जो दिखने में बहुत छोटी लगती हैं लेकिन एक समाज के रूप में हमारी पहचान पर दूर-दूर तक प्रभाव डालती रहती हैं। आज ‘मन की बात’ के इस कार्यक्रम के माध्यम से मैं आपके साथ ऐसी एक बात करना चाहता हूँ। हमारी जानकारी में एक बात आयी कि यदि कोई मुस्लिम महिला, हज-यात्रा के लिए जाना चाहती है तो वह ‘महरम’ के बिना नहीं जा सकती है। जब मैंने इसके बारे में पहली बार सुना तो मैंने सोचा कि ऐसा कैसे हो सकता है? ऐसे नियम किसने बनाए होंगें? और मैं जब उसकी गहराई में गया तो मैं हैरान हो गया - आजादी के सत्तर (70) साल के बाद भी ये लगाने वाले हम ही लोग थे। 
    दशकों से मुस्लिम महिलाओं के साथ अन्याय हो रहा था लेकिन कोई चर्चा ही नहीं थी। यहाँ तक कि कई इस्लामिक देशों में भी यह नियम नहीं है। लेकिन भारत में मुस्लिम महिलाओं को यह अधिकार प्राप्त नहीं था। और मुझे खुशी है कि हमारी सरकार ने इस पर ध्यान दिया। आवश्यक कदम भी उठाए और ये सत्तर (70) साल से चली आ रही परंपरा को नष्ट कर के इसको हमने हटा दिया। आज मुस्लिम महिलाएँ, ‘महरम’ के बिना हज के लिए जा सकती हैं और मुझे खुशी है कि इस बार लगभग तेरह सौ (1300) मुस्लिम महिलाएँ ‘महरम’ के बिना हज जाने के लिए हैं और देश के अलग-अलग भागों से- केरल से ले करके उत्तर तक महिलाओं ने बढ़-चढ़ करके हज-यात्रा करने की इच्छा ज़ाहिर की है। अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय को मैंने सुझाव दिया है कि वो यह सुनिश्चित करें कि ऐसी सभी महिलाओं को हज जाने की अनुमति हैं।
     प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि मैं पूरे विश्वास से कहता हूँ और ये मेरी दृढ़ मान्यता है कि भारत की विकास यात्रा, हमारी नारी-शक्ति के बल पर, उनकी प्रतिभा के भरोसे आगे बढ़ी है और आगे बढ़ती रहेगी। हमारा निरंतर प्रयास होना चाहिए कि हमारी महिलाओं को भी पुरुषों के बराबर समान अधिकार मिले, समान अवसर मिले ताकि वे भी प्रगति के मार्ग पर एक-साथ आगे बढ़ सकें।
       प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि मेरे प्यारे देशवासियो, 26 जनवरी हमारे लिए एक ऐतिहासिक-पर्व है। लेकिन इस वर्ष 26 जनवरी 2018 का दिन, विशेष रूप से याद रखा जाएगा। इस वर्ष गणतंत्र-दिवस समारोह के लिए सभी दस आसियान देशों के नेता मुख्य-अतिथि के रूप में भारत आएँगे। गणतंत्र-दिवस पर इस बार ‘एक’ (1) नहीं बल्कि ‘दस’ (10) मुख्य अतिथि होंगे। ऐसा भारत के इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ है। 2017, आसियान के देश और भारत,दोनों के लिए ख़ास रहा है। आसियान ने 2017 में अपने 50 वर्ष पूरे किए और 2017 में ही आसियान के साथ भारत की साझेदारी के 25 वर्ष भी पूरे हुए हैं। 26 जनवरी को विश्व के 10 देशों के इन महान नेताओं का एक साथ शरीक़ होना हम सभी भारतीयों के लिए गर्व की बात है।

संसद का इस्तेमाल राजनीतिक मतभेदों से निपटने में नहीं किया जाना चाहिए

    कोलकाता। भारत के उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू ने कहा है कि संसद को राजनीतिक विवादों का निबटारा करने का अखाड़ा नहीं बनाना चाहिए। वे आज कोलकाता में कोलकाता चैम्‍बर ऑफ कॉमर्स के 187 वें वार्षिक समारोह के अवसर पर 'भारत में संसदीय लोकतंत्र का जीर्णोद्धार' विषय पर सेमिनार को संबोधित को संबोधित कर रहे थे। 

   उपराष्‍ट्रपति ने कहा कि राजनीतिक दलों को इस बात पर गंभीर अंतर्मंथन करना चाहिए कि संसद राजनीतिक विवाद के बिन्‍दुओं का समाधान करने का मंच नहीं बनना चाहिए। 
   उन्होंने कहा कि यह सुनिश्चित करने के अलावा कोई विकल्‍प नहीं है कि संसद देश में शांति, प्रगति और खुशहाली को बढ़ावा देने में कारग़र ढंग से काम करे। उन्‍होंने हाल के दिनों में देश में संसदीय कार्यप्रणाली की विभिन्‍न हलकों में हुई आलोचना पर चिंता प्रकट की। 
   उन्‍होंने कहा कि स्‍वयं सांसदों ने भी इस प्रणाली की आलोचना की है। उन्होंने कहा कि इस आलोचना का कारण संसद और राज्‍य विधान मंडलों के कामकाज का तरीका है। इसकी वजह यह है कि हाल के वर्षों में संसदीय कार्य में मात्रात्‍मक और गुणात्‍मक दोनों ही दृष्टि से गिरावट आयी है। उपराष्‍ट्रपति ने कहा कि संसदीय सत्र के दौरान व्‍यवधान गंभीर चिंता का विषय है।
     श्री नायडू ने कहा कि वर्तमान में 'स्‍वस्‍थ बहस और विचार-विमर्श तथा संसद की विश्‍ववसनीयता' जैसे मूल्‍यों पर व्‍यवधान, टकराव और सदन को जबरन स्‍थगित कराने जैसे कुप्रवृत्तियां हावी होती जा रही हैं। उन्‍होंने कहा कि महत्वपूर्ण विषयों पर राजनीतिक पार्टियों के बीच आम सहमति बनाने की आवश्‍यकता जिससे संसद का मूल्‍यवान समय बचाया जा सकता है।
    उन्‍होंने कहा कि कोलकाता चैम्‍बर ऑफ कॉमर्स के 187 वें वार्षिक समारोह में हिस्सा लेते हुए मुझे अत्‍यन्‍त हर्ष हो रहा है। इसकी स्थापना 5 जुलाई 1830 को हुई थी और उस समय इसका नाम कोलकाता ट्रेडर्स असोसिएशन था।
   उन्‍होंने कहा कि 1977 में कोलकाता ट्रेडर्स असोसिएशन को ''कोलकाता चैम्‍बर्स ऑफ कॉमर्स'' का नाम दिया गया। मुझे खुशी है कि यह संगठन पिछले 180 से अधिक वर्षों से कोलकाता और देश के विकास में योगदान कर रहा है। मुझे यह जानकार खुशी हुई कि कोलकाता चैम्‍बर ऑफ कॉमर्स जरूरतमंद और प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को स्कॉलरशिप, वजीफे और पुरस्‍कार प्रदान करता है।
     उन्‍होंने कहा कि मैं इस फाउंडेशन की इस बात के लिए सराहना करता हूं कि वह प्रतिभाशाली पुरुष एवं महिला खिलाडि़यों को ''प्रभा खेतान पुरस्‍कार'' से सम्‍मानित करती है। मैं आपके संगठन से अपील करता हुं कि कॉर्पोरेट सामाजिक गतिविधियों के अंतर्गत अपनी गतिविधियों का विस्‍तार करें और विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में भी शहरी सुविधाएं प्रदान किए जाने में सहायता करें।
    संसदीय लोकतंत्र का जीर्णोद्धार : संसद भारत के लोकतंत्र का केन्‍द्र बिन्‍दु है और वह लोगों के हितों तथा अधिकारों की संरक्षक है। यह लोकतंत्र का मंदिर है और एक पवित्र सार्वजनिक संस्‍थान है। पिछले वर्षों में भारत का लोकतंत्र परिपक्‍व हुआ है।
   उन्‍होंने कहा कि भारत की लोकतांत्रिक राजनीति में संसद सर्वाधिक ध्रुवीय संस्थान है। हाल के दिनों में देश में संसदीय कार्यप्रणाली की विभिन्‍न हलकों में आलोचना हुई है। स्‍वयं सांसदों ने भी इस प्रणाली की आलोचना की है। इस आलोचना का कारण संसद और राज्‍य विधान मंडलों के कामकाज का तरीका है। इसकी वजह यह है कि हाल के वर्षों में संसदीय कार्य में मात्रात्‍मक और गुणात्‍मक दोनों ही दृष्टि से गिरावट आयी है।
    उन्‍होंने कहा कि मित्रों मेरा यह मानना है कि लोगों की सार्वभौम इच्‍छा का प्रतिनिधित्‍व करने वाली संसद की भूमिका को सुदृढ़ करने के लिए तत्काल सुधारों की आवश्‍यकता है। लोकतंत्र का अस्तित्‍व बनाए रखने के लिए भी यह अत्‍यन्त आवश्‍यक है कि संसद का लोगों के दिलो दिमाग पर एक सम्‍मानित स्‍थान कायम रहे।''