Friday, 31 March 2017

आर्थिक गलियारा विकास में लगभग 9.2 अरब डॉलर की लागत

            एशियाई विकास बैंक (एडीबी) भारत में यातायात, व्‍यापार सुविधा, ऊर्जा, सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी और आर्थिक गलियारा विकास में लगभग 9.2 अरब डॉलर की लागत वाली 46 परियोजनाओं को समर्थन दे रहा है। 

           एडीबी भारतीय कस्‍टम्‍स को कारगर तरीकों और तकनीकी विशेषज्ञता के लिए मदद दे रहा है। ये गतिविधियां दक्षिण एशिया उप-क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग (एसएएसईसी) के तहत चलाई जा रही हैं। उल्‍लेखनीय है कि एसएएसईसी विभिन्‍न परियोजनाओं के जरिए उप-क्षेत्र में ‘व्‍यापार सुविधा रणनीतिक संरचना (2014-2018)’ जैसी गतिविधियों का संचालन कर रहा है। याद रहे कि बांग्‍लादेश, भूटान, भारत और नेपाल के बीच यातायात व्‍यवस्‍था को अंतिम रूप दिया जा रहा है, जो एक महत्‍वपूर्ण कदम है। 

               इसके जरिए सीमापार वाहनों का आवागमन संभव होगा, जिन्‍हें चिह्नित गलियारों के जरिए संचालित किया जाएगा। एसएएसईसी कार्यक्रम की स्‍थापना 2001 में की गई थी। यह परियोजना आधारित साझेदारी मंच है, जिसके जरिए सीमापार संपर्कता, सदस्‍य देशों के बीच व्‍यापार में बढोतरी और क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग को मजबूत बनाकर क्षेत्रीय समृद्धि को प्रोत्‍साहित करना है। एडीबी इस कार्यक्रम का सचिवालय और वित्‍तीय सहायता देने वाला प्रमुख संगठन है।

झारखंड के देवघर में राष्‍ट्रीय कौशल प्रदर्शनी

             राष्‍ट्रपति प्रणब मुखर्जी एक राष्‍ट्रीय कौशल प्रदर्शनी तथा धनबाद और गोड्डा में दो नए विशाल वाहन चालक प्रशिक्षण संस्‍थानों एवं 31 प्रधानमंत्री कौशल केंद्रों का उद्घाटन करेंगे।

            वे देवघर और रांची में दो नए वाहन चालक प्रशिक्षण संस्‍थानों की आधारशिला भी रखेंगे। राष्‍ट्रपति इन पहलों का उद्घाटन देवघर में 2 अप्रैल को करेंगे। कौशल विकास एवं उद्यमिता राज्‍य मंत्री (स्‍वतंत्र प्रभार) राजीव प्रताप रूडी ने कहा है कि राष्‍ट्रपति ने अपने एक भाषण में यह उल्‍लेख किया था कि हमें शिक्षा और कौशल विकास में भरपूर तेजी लानी होगी। रूडी ने कहा कि उनका मंत्रालय इस दिशा में काम कर रहा है। झारखंड में वाहन और वाहन पुर्जों का उद्योग तेजी से पनप रहा है। 

              इसके मद्देनजर वाहन चालक प्रशिक्षण कौशल विकास का महत्‍वपूर्ण अंग बन गया है। झारखंड के वाहन उद्योग में लगभग 70 हजार लोगों को रोजगार मिला है और भारत के सकल घरेलू उत्‍पाद में उसका योगदान मोटे तौर पर 7 प्रतिशत है। 31 बहु-कुशलता प्रधानमंत्री कौशल केंद्रों की स्‍थापना एक ऐतिहासिक कदम है जिससे झारखंड, मध्‍य प्रदेश, बिहार, असम, पश्‍चिम बंगाल, ओडिशा, राजस्‍थान, जम्‍मू एवं कश्‍मीर, तेलंगाना, कर्नाटक, छत्‍तीसगढ़, हरियाणा और उत्‍तर प्रदेश के युवाओं की आवश्‍यकताएं पूरी होंगी।  

 

गर्मियों के मौसम के लिये ऊर्जा आपूर्ति की तैयारी

            केंद्रीय विद्युत मंत्रालय ने आगामी गर्मियों के मौसम में देश में विशेष रूप से उत्तरी क्षेत्र में बिजली आपूर्ति की स्थिति और विभिन्न सुविधाओं की तैयारी की समीक्षा की है।

         विद्युत सचिव पी.के. पुजारी की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में राज्य सरकारों, भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी), सीईए, पोसोको, विभिन्न क्षेत्रीय और राज्य लोड प्रेषण केंद्र (आरएलडीसी/एसएलडीसी) के प्रतिनिधि शामिल हुये। आईएमडी की रिपोर्ट के अनुसार मार्च से मई 2017 के दौरान तापमान सामान्य से अधिक रहने की संभावना है।

             हाल ही में आईएमडी की 27 मार्च 2017 को जारी विज्ञप्ति में कहा गया था कि मार्च के आखिरी सप्ताह में तापमान सामान्य से 4-6डिग्री अधिक था, जिस कारण कई क्षेत्रों में लू की स्थिति बनी है। प्रत्‍येक राज्‍य, क्षेत्र और अखिल भारतीय स्‍तर पर बिजली की मौजूदा मांग और भावी मांग की समीक्षा की गई। देखा गया है कि उत्‍तरी क्षेत्र में बिजली की मांग अप्रैल से सितंबर, 2017 की अवधि में 56जीडब्‍ल्‍यू तक बढ़ गई। दक्षिण क्षेत्र में बिजली की मांग 42जीडब्‍ल्‍यू तक हो चुकी है जबकि पश्‍चिमी क्षेत्र में इसने 50जीडब्‍ल्‍यू का स्‍तर छू लिया है।

             संभावना है कि अप्रैल-जून के बीच इसमें 46जीडब्‍ल्‍यू की गिरावट आएगी। पूरे भारत में गर्मी के दौरान बिजली की सर्वाधिक मांग 165जीडब्‍ल्‍यू तक पहुंचने की संभावना है। उल्‍लेखनीय है कि उत्‍पादन संबंधी संसाधन इस दौरान उचित मात्रा में उपलब्‍ध है और कोयला आधारित क्षमता देश में कारगर रही। पिछले वर्ष की तुलना में दक्षिणी क्षेत्र में भंडारण स्‍तर में गिरावट आई जिससे अद्यतन 700 एमयू ऊर्जा कटौती हो गई। कुछ राज्‍यों में पारेषण और वितरण नेटवर्क के सीमित होने के कारण अड़चनें पैदा हुईं। इससे निपटने के लिए राज्‍य सुविधा संयंत्रों को सलाह दी गई कि वे पारेषण प्रणालियों को जल्‍द पूरा कर लें। 

             उत्‍तरी क्षेत्र के राज्‍य सुविधा संयंत्रों के सामने धूल भरी आंधी और बवंडर की समस्‍या आती है, जिसके कारण अप्रैल से जून के समय के दौरान बिजली के ग्रिड में बाधा उत्‍पन्‍न होती है। इसके कारण 6-7जीडब्‍ल्‍यू की कमी आ जाती है। इन सुविधा संयंत्रों को सुझाव दिया गया है कि ऐसे मामलों में वे पैदावार की कटौती में समन्‍वय स्‍थापित करें ताकि ग्रिड की समस्‍या कम हो सके। इसके अलावा पिछली कुछ ट्रांसमिशन टावर गिरने की घटनाओं के देखते हुए इमरजेंसी रिस्टोरेशन सिस्टम (ईआरएस) तैयार रखने के लिए भी कहा गया है। सीईए विभिन्न राज्यों और पारेषण लाइसेंसधारियों के पास ईआरएस की उपलब्धता पर निगरानी रखेगी। यह भी निर्णय लिया गया था कि पोसोको और एसएलडीसी बेहतर योजना और आपूर्ति की विश्वसनीयता के लिए टेलर मेड मौसम का पूर्वानुमान/वेब आधारित मौसम की जानकारी पाने के लिए आईएमडी के साथ मिलकर काम करेंगे।

              उत्तर प्रदेश को इंट्रा स्टेट ट्रांसमिशन सिस्टम को तेजी से बढ़ाने की सलाह दी गई थी। राज्य में आवश्यक पारेषण और वितरण आधारभूत संरचना की कमी बताई गई थी। प्रधान सचिव, ऊर्जा, दिल्ली सरकार ने बताया है कि दिल्ली प्रणाली के भीतर पारेषण की कमी हल हो रही है। हालांकि बदरपुर टीपीएस में जनरेशन बनाए रखने और तब तक दिल्ली के भीतर ही गैस स्टेशनों को गैस आपूर्ति सुनिश्चित करने की आवश्यकता है। जम्मू एवं कश्मीर को भी राज्य के भीतर योजनाबद्ध सब-ट्रांसमिशन और वितरण व्यवस्था अपनाने की सलाह दी गई थी।

पूर्वी भारत व दक्षिण पूर्व एशिया के आर्थिक केंद्र के रूप में उभर रहा असम

                राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने असम के गुवाहाटी में 'नमामि ब्रह्मपुत्र' महोत्‍सव का उद्घाटन किया। इस अवसर पर राष्ट्रपति ने कहा कि असम पूर्वी भारत और दक्षिण पूर्व एशिया के आर्थिक केंद्र के रूप में उभर रहा है।

             यह प्रधानमंत्री के एक्‍ट ईस्‍ट पॉलिसी को लागू करने का गेटवे और सबसे प्रभावी स्थान है। उन्होंने कहा कि दक्षिण पूर्व एशिया भारत के निवेश और व्यापार के लिए एक महत्वपूर्ण स्थान है। भारत जल्द ही आसियान के साथ अपने सहयोग के 25 वर्षों का जश्न मनाएगा। राष्ट्रपति ने कहा कि असम के पास विशाल क्षमता है। यह प्राकृतिक संसाधनों में समृद्ध है। यहां के लोग बहुत मेहनती होते हैं। प्रभावी कार्यान्वयन के लिए सही नीतियों का होना बेहद जरूरी है। 

              असम की विविध और विशिष्ट संस्कृति का जिक्र करते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि भारत की विविधता का प्रबंधन इसकी योग्‍यता है, जिसमें विविधता में एकता बनाए रखने की क्षमता है। यह न केवल अभिजात वर्ग पर निर्भर है, बल्कि उन सामान्य लोगों पर भी निर्भर है, जो दृढ़ विश्वास, आपसी समझ और सद्भाव के लिए प्रतिबद्ध थे। उन्होंने कहा कि भारतीयों को तर्कसंगत माना जाता है, लेकिन असहिष्णु कभी नहीं माना जाता। असम के महान विद्वान और सामाजिक सुधारक शंकरदेव की शिक्षाओं सहित हमारी परंपराओं ने कभी भी असहिष्णुता की अनुमति नहीं दी। 

               राष्‍ट्रपति ने कहा कि ब्रह्मपुत्र नदी असम और इस क्षेत्र की जीवन रेखा है। इस क्षेत्र के लोगों की अर्थव्यवस्था, संस्कृति और हर दिन की दिनचर्या इसके आसपास ही घूमती है। उन्होंने असम की संस्कृति के साथ-साथ इसकी क्षमता को प्रदर्शित करने हेतु 'नमामि ब्रह्मपुत्र' जैसे वार्षिक महोत्‍सव की शुरूआत के लिए राज्य सरकार की सराहना की।

डिजिटल भुगतान को जन आंदोलन बनाने की मुहिम

              भारत को कैश-लेस अर्थव्यवस्था बनाने के लिए डिजिटल भुगतान को लेकर चलाई गई मुहिम अब एक जन आंदोलन का हिस्सा बनती जा रही है।

              डिजिटल लेनदेन को बढ़ावा देने के लिए नीति आयोग की ओर दो योजनाओं को लोगों से भारी समर्थन मिल रहा है। 25 दिसंबर 2016 को डिजिटल पेमेंट्स के लिए दो प्रोत्साहन योजनाएं लकी ग्राहक योजना और डिजिधन व्यापार योजना शुरू की गई थीं। इन योजनाओं के शुरू होने के बाद से 14 लाख लोगों और 77,000 व्यापारियों को प्रोत्साहन के तौर पर पुरस्कार धन राशि मिली है। दोनों प्रोत्साहन योजनाओं के तहत अब तक कुल 226,45,40,000 रुपए (इसमें 176,95,00,000 रुपये ग्राहकों को जबकि 49,50,00,000 रुपये व्यापारियों को) मिले हैं। 

              इन योजनाओं का लाभ लेने वालों में सभी विभिन्न आयु वर्ग, लिंग और आर्थिक स्तर के लोग शामिल हैं। बिहार में आजमगढ़ गांव के 27 वर्षीय मकैनिक देविंदर ने लकी ग्राहक योजना के तहत एक लाख रुपये जीते हैं। 12 के एक परिवार में छह भाइयों के बीच सबसे बड़े होने के नाते उन्होंने काफी लेनदेन की। अब उनका मानना है कि डिजिटल भुगतान करना बहुत आसान है। इससे पहले वह लेनदेन के लिए भाई के बैंक खाते का इस्तेमाल करते थे लेकिन अब वह जल्द ही अपना बैंक खाता खोलेंगे। महाराष्ट्र के पचवाड़ा गांव के 22 वर्षीय सुनील विश्वास चौहान एक नौजवान किसान हैं। वह स्थानीय बाजार में दूध और खेत की उपज बेचकर अपनी आजीविका चलाते हैं। सुनील बताते हैं, ‘मैं खुश हूं कि डिजिटल भुगतान का सिस्टम मुझ तक पहुंच चुका है। पहले सारा पैसा बिचौलिया खा जाता था लेकिन अब पूरा पैसा सीधे मेरे बैंक खाते में जाता है और अलर्ट मैसेज भी मिल जाता है।’

                  चालीस वर्षीय नाहिद ने कुछ ही दिन पहले अपना एक दुकान खोलीं और अपने दुकान में डिजिटल भुगतान के लिए सिस्टम लगवाया। वह बताती हैं, ‘मेरा 80 फीसदी भुगतान डिजिटल के माध्यम से होता है। इससे छुट्टा की समस्या खत्म हो गई है और मेरा मानना है कि यह सबसे सुरक्षित है।’वह कहती हैं कि वह और उनके छह कर्मचारी अपने ग्राहकों को भी इसके लिए प्रोत्साहित करते हैं। डिजिटल लेनदेन को लोकप्रिय बनाने के लिए सरकारी पहल के हिस्से के रूप में 100 दिन से ज्यादा तक 100 शहरों में डिजिधन मेला का आयोजन किया गया। 30 मार्च (90 दिन) तक 26 राज्यों और सात केंद्र शासित प्रदेशों में इस मेले का आयोजन किया गया। 

            इस मेला के जरिये 5000 वित्तीय संस्थान 15 लाख नागरिकों तक पहुंचे और कम से कम 16,000 सरकारी और निजी संस्थानों ने अपने को कैश-लेस घोषित किया। 100 दिन तक चलने वाला डिजिधन मेला मेगा ड्रा के साथ 14 अप्रैल को समाप्त होगा। शेष बचे 10 दिन में गंगटोक, इम्फाल, हरिद्वार, नेल्लोर जैसे अन्य शहरों में इस मेला को आयोजित करने की योजना है। विमुद्रीकरण की शुरुआत से यूपीआई के माध्यम से किए गए लेनदेन में 584 प्रतिशत (0.3 से 4.5 मिलियन) की वृद्धि हुई है। इसी दौरान आधार का उपयोग करने वाले भुगतानों में भी 1352 प्रतिशत (0.7 से 2.7 मिलियन) की बढ़ोतरी हुई है।

             प्रधानमंत्री द्वारा 30 दिसंबर 2016 को यूपीआई पेमेंट ऐप भीम ऐप को लांच करने के बाद से अब तक रिकॉर्ड स्तर पर अभूतपूर्व इसे 18 मिलियन बार डाउनलोड किया गया है। इसके अलावा अक्टूबर 2016 से बेची गई पीओएस मशीनों की संख्या में लगभग 13 प्रतिशत की वृद्धि बताती है कि पूरे देश में व्यापारियों की अधिक से अधिक संख्या स्वेच्छा से डिजिटल भुगतान स्वीकार कर रही है। आज लगभग 8 अरब लेनदेन डिजिटल भुगतान विधियों के माध्यम से प्रतिवर्ष होता है। सरकार इस वर्ष के अंत तक 25 अरब के लेनदेन को बढ़ाने की योजना बना रही है ताकि इस प्रणाली से बहते हुए काले धन को कम कालेधन की अर्थव्यवस्था का खात्म हो जाए।

             नीति आयोग ने प्रोत्साहित करने और डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने को लेकर 25 दिसंबर 2016 को ग्राहकों के लिए लकी ग्राहक योजना (एलजीवाई) और व्यापारियों के लिए डिजिधन व्यापार योजना (डीवीवाई) की शुरुआत की थी। यह दोनों योजनाएं 14 अप्रैल 2017 तक जारी रहेंगी। इन योजनाओं के जरिये रोजाना 15,000 विजेता बन रहे हैं जो कि कुल पुरस्कार राशि के रूप में 1.5 करोड़ रुपये उन्हें हर दिन मिल रहे हैं। 

           इसके अलावा, इसके तहत 14,000 साप्ताहिक विजेता बन रहे हैं जो प्रत्येक सप्ताह 8.3 करोड़ रुपये जीत रहे हैं। ग्राहक और व्यापारी रुपे कार्ड, भीम या यूपीआई (भारत इंटरफेस फॉर मनी या यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस),यूएसएसडी आधारित ।99# सेवा एवं आधार सक्षम भुगतान सेवा (एईपीएस) के जरिये रोजना और साप्ताहिक लकी ड्रा पुरस्कार जीत सकते हैं।

देश के 91 प्रमुख जलाशयों में दो प्रतिशत की कमी

                   देश के 91 प्रमुख जलाशयों में 52.632 बीसीएम (अरब घन मीटर) जल का संग्रहण आंका गया। यह इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 33 प्रतिशत है। यह पिछले वर्ष की इसी अवधि के कुल संग्रहण का 133 प्रतिशत तथा पिछले दस वर्षों के औसत जल संग्रहण का 102 प्रतिशत है।

            इन 91 जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता 157.799 बीसीएम है, जो समग्र रूप से देश की अनुमानित कुल जल संग्रहण क्षमता 253.388 बीसीएम का लगभग 62 प्रतिशत है। इन 91 जलाशयों में से 37 जलाशय ऐसे हैं जो 60 मेगावाट से अधिक की स्थापित क्षमता के साथ पनबिजली संबंधी लाभ देते हैं। उत्तरी क्षेत्र में हिमाचल प्रदेश, पंजाब तथा राजस्थान आते हैं।

                  इस क्षेत्र में 18.01 बीसीएम की कुल संग्रहण क्षमता वाले छह जलाशय हैं, जो केन्द्रीय जल आयोग (सीडब्यूसी) की निगरानी में हैं। इन जलाशयों में कुल उपलब्ध संग्रहण 4.13 बीसीएम है, जो इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 23 प्रतिशत है। पिछले वर्ष की इसी अवधि में इन जलाशयों की संग्रहण स्थिति 25 प्रतिशत थी। पिछले दस वर्षों का औसत संग्रहण इसी अवधि में इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 30 प्रतिशत था। इस तरह पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में चालू वर्ष में संग्रहण कमतर है। यह पिछले दस वर्षों की इसी अवधि के दौरान रहे औसत संग्रहण से भी कमतर है।
 

                 पूर्वी क्षेत्र में झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल एवं त्रिपुरा आते हैं। इस क्षेत्र में 18.83 बीसीएम की कुल संग्रहण क्षमता वाले 15 जलाशय हैं, जो सीडब्ल्यूसी की निगरानी में हैं। इन जलाशयों में कुल उपलब्धक संग्रहण 10.19 बीसीएम है, जो इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 54 प्रतिशत है। पिछले वर्ष की इसी अवधि में इन जलाशयों की संग्रहण स्थिति 36 प्रतिशत थी। पिछले दस वर्षों का औसत संग्रहण इसी अवधि में इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 40 प्रतिशत था। इस तरह पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में चालू वर्ष में संग्रहण बेहतर है। यह पिछले दस वर्षों की इसी अवधि के दौरान रहे औसत संग्रहण से भी बेहतर है।
 

               पश्चिमी क्षेत्र में गुजरात तथा महाराष्ट्र आते हैं। इस क्षेत्र में 27.07 बीसीएम की कुल संग्रहण क्षमता वाले 27 जलाशय हैं, जो सीडब्ल्यूसी की निगरानी में हैं। इन जलाशयों में कुल उपलब्ध संग्रहण 11.59 बीसीएम है, जो इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 43 प्रतिशत है। पिछले वर्ष की इसी अवधि में इन जलाशयों की संग्रहण स्थिति 22 प्रतिशत थी। पिछले दस वर्षों का औसत संग्रहण इसी अवधि में इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 42 प्रतिशत था। इस तरह पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में चालू वर्ष में संग्रहण बेहतर है। यह पिछले दस वर्षों की इसी अवधि के दौरान रहे औसत संग्रहण से भी बेहतर है।
 

                   मध्य क्षेत्र में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश तथा छत्तीसगढ़ आते हैं। इस क्षेत्र में 42.30 बीसीएम की कुल संग्रहण क्षमता वाले 12 जलाशय हैं, जो सीडब्ल्यूसी की निगरानी में हैं। इन जलाशयों में कुल उपलब्धक संग्रहण 19.54 बीसीएम है, जो इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 46 प्रतिशत है। पिछले वर्ष की इसी अवधि में इन जलाशयों की संग्रहण स्थिति 32 प्रतिशत थी। पिछले दस वर्षों का औसत संग्रहण इसी अवधि में इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 31 प्रतिशत था। इस तरह पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में चालू वर्ष में संग्रहण बेहतर है। यह पिछले दस वर्षों की इसी अवधि के दौरान रहे औसत संग्रहण से भी बेहतर है।
 

                 दक्षिणी क्षेत्र में आंध्र प्रदेश (एपी), तेलंगाना (टीजी), एपी एवं टीजी (दोनों राज्यों में दो संयुक्त परियोजनाएं), कर्नाटक, केरल एवं तमिलनाडु आते हैं। इस क्षेत्र में 51.59 बीसीएम की कुल संग्रहण क्षमता वाले 31 जलाशय हैं, जो सीडब्ल्यूसी की निगरानी में हैं। इन जलाशयों में कुल उपलब्धण संग्रहण 7.18 बीसीएम है, जो इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 14 प्रतिशत है। पिछले वर्ष की इसी अवधि में इन जलाशयों की संग्रहण स्थिति 17 प्रतिशत थी। पिछले दस वर्षों का औसत संग्रहण इसी अवधि में इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 27 प्रतिशत था। इस तरह चालू वर्ष में संग्रहण पिछले वर्ष की इसी अवधि में हुए संग्रहण से कमतर है। यह पिछले दस वर्षों की इसी अवधि के दौरान रहे औसत संग्रहण से भी कमतर है। 

            पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में जिन राज्यों में जल संग्रहण बेहतर है उनमें पंजाब, राजस्थान, झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, गुजरात, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, एपी एवं टीजी (दोनों राज्यों में दो संयुक्त परियोजनाएं), तेलंगाना शामिल हैं। इसी अवधि के लिए पिछले साल की तुलना में कम भंडारण वाले राज्य हिमाचल प्रदेश, त्रिपुरा, आंध्र प्रदेश, केरल, कर्नाटक  और तमिलनाडु हैं।

13,002 गांवों में बिजली

             दीन दयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना के तहत अब तक 13,002 गांवों में बिजली पहुंचाई गई। शेष 5450 गैर विद्युतीकृत गांवों में से 835 गांवों में बसावट नही है। शेष बचे सभी 4615 गैर विद्युतीकृत गांवों में 01 मई 2018 तक बिजली पहुंचाने का लक्ष्‍य रखा गया है।

            स्‍वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी के राष्‍ट्र को दिए संबोधन पर अमल करते हुए भारत सरकार ने 1000  दिन के भीतर यानी  01 मई, 2018 तक शेष  18,452 गैर-विद्युतीकृत गांवों में विद्युतीकरण करने का फैसला किया है। इस परियोजना को अभियान के रूप में शुरू किया गया है। विद्युतीकरण की रणनीति में कार्यान्‍वयन की अवधि 12 महीनों में सीमित करना तथा गांवों के विद्युतीकरण की प्रक्रिया को निगरानी के लिए निश्चित समयावधि सहित 12 स्‍तरों में विभाजित किया गया है। 

                  इस प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए ग्राम विद्युत अभियंता  (जीवीए) के जरिए नजदीकी से नजर रखी जा रही है। नियमित अंतराल पर कई अन्‍य कदम उठाए जा रहे हैं, जैसे आरपीएम बैठक के दौरान  मासिक आधार पर प्रगति की समीक्षा और उन गांवों की सूची को भी राज्‍य की बिजली कंपनियों से साझा किया जा है जहां विद्युतीकरण की प्रकिया जारी है। साथ ही ऐसे गांवों की भी पहचान की जाती है, जहां विद्युतीकरण की प्रक्रिया देरी से चल रही है।