Friday, 9 March 2018

खाद्यान्नों का रिकॉर्ड कुल 275.68 मिलियन टन उत्पादन

   नई दिल्‍ली। केन्द्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री राधा मोहन सिंह ने कहा है कि पिछले तीन वर्षों में सरकार द्वारा उठाई गईं अनेक नीतिगत पहलों के परिणामस्‍वरूप मौजूदा वर्ष में देश में खाद्यान्‍न का रिकॉर्ड उत्‍पादन हुआ है। 

  वर्ष 2017-18 के लिए देश में कुल 275.68 मिलियन टन खाद्यान्‍न उत्‍पादन हुआ है जो कि वर्ष 2013-14 में हासिल 265.04 मिलियन टन खाद्यान्‍न उत्‍पादन की तुलना में 10.64 मिलियन टन (लगभग 4 प्रतिशत) ज्‍यादा है।
   वर्तमान वर्ष का उत्‍पादन 2011-12 से 2015-16 के औसत खाद्यान्‍न उत्‍पादन के मुकाबले लगभग 19 मिलियन टन ज्‍यादा है। बागवानी फसलें जिनका पोषणिक सुरक्षा में अहम योगदान है, का भी वर्ष 2016-17 में रिकॉर्ड उत्‍पादन हुआ है जो कि 300 के आंकडे को पार करके 305 मिलियन टन हो गया है जो कि पिछले साल के मुकाबले 4.8 प्रतिशत ज्‍यादा है। 
     फलों का उत्‍पादन 93 मिलियन टन और सब्‍जी उत्‍पादन 178 मिलियन टन के आंकडे को पार कर गया है। इस उपलब्धि को हासिल करने में कृषि विश्‍वविद्यालयों एवं आईसीएआर द्वारा विकसित उन्‍नत तकनीकों का विशेष योगदान है। 
    कृषि मंत्री ने आगे कहा कि राज्‍य कृषि विश्‍वविद्यालय और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, कृषि को  अधिक टिकाऊ और लाभप्रद बनाने के लिए बाधाओं को दूर करने के लिए तैयार हैं। कृषि मंत्री ने कहा कि अनेक चुनौतियों के बावजूद कृषि विश्‍वविद्यालय एवं आईसीएआर प्रणाली द्वारा समय समय पर अनेक उल्‍लेखनीय सफलताएं हासिल की गईं हैं जिनसे देश की कृषि व्‍यवस्‍था और कृषि उत्‍पादन को बढ़ाने में मदद मिली है। इन उपलब्धियों में मुख्‍यतया: उत्‍पादन और उत्‍पादकता में बढ़ोतरी करना शामिल है जिससे किसानों विशेषकर छोटे व सीमांत किसानों की आय में वृद्धि होना शामिल है।
     प्रधानमंत्री के विजन ''वर्ष 2022 तक किसानों की आय को दोगुना करना'' को ध्‍यान में रखते हुए इस प्रणाली द्वारा इस दिशा में अग्रणीय कदम उठाये गये हैं। वर्ष 2022 तक किसानों की आय को दोगुना करने के संकल्‍प को साकार करने की दिशा में कृषि विश्‍वविद्यालयों एवं आईसीएआर संस्‍थानों ने  विभिन्‍न राज्‍य एवं केन्‍द्रीय एजेन्सियों के साथ समन्‍वय स्‍थापित करके एक कदम आगे बढ़ाते हुए विभिन्‍न राज्‍यों के लिए ''वर्ष 2022 तक किसानों की आय को दोगुना करने हेतु रणनीति दस्‍तावेज को तैयार करके जारी किया है।
    इसकी मदद से निश्चित रूप से कृषि की प्रगति और किसानों की खुशहाली को बढ़ाने में मदद मिलेगी । इसके अतिरिक्‍त, नई तकनीकों का विकास करना, एकीकृत कृषि प्रणाली, संस्‍थान निर्माण, मानव संसाधन, कृषि का विविधीकरण, नए अवसर पैदा करना तथा जानकारी के नए स्रोतों का विकास करने पर भी विशेष बल दिया गया है।
   छोटे व सीमांत किसानों और जलवायु परिवर्तन से जुड़ी समस्‍याओं के समाधान के लिए देश के सभी 15 कृषि जलवायु क्षेत्रों को शामिल करते हुए कुल 45 एकीकृत कृषि प्रणाली मॉडल  तैयार किए गए हैं। इन मॉडलों को देशभर में फैले कृषि विज्ञान केन्‍द्रों के माध्‍यम से आगे बढ़ाया जा रहा है।
    इसके साथ ही आईसीएआर द्वारा कुल 623 जिला आकस्मिकता योजनाओं को विकसित करके उनका प्रमाणन किया गया और लगभग 40.9 लाख किसानों के लिए कौशल विकास कार्यक्रम आयोजित किए गए। भारत सरकार की पहल ''सॉयल हैल्‍थ कार्ड'' को सहयोग करने में मिट्टी की जांच के लिए एक मिनीलैब 'मृदापरीक्षक'' का विकास किया गया। 
   कृषि विश्‍वविद्यालयों एवं भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा देशभर में फैले कृषि विज्ञान केन्‍द्रों के माध्‍यम से 29 राज्‍यों में जलवायु अनुकूल तकनीकों को प्रदर्शित किया जा रहा है और उन्‍हें बढ़ावा दिया जा रहा है। अभी तक कुल 42 जैविक कृषि प्रौद्योगिकियां विकसित की गईं हैं जिनका कि परीक्षण किया गया और इनमें और सुधार किया जा रहा है।
  इसके साथ कृषि शिक्षा,कृषि अनुसंधान, कृषि विस्तार, संकल्प से सिद्धि, मेरा गांव, मेरा गौरव, अंतरराष्ट्रीय सहयोग, प्रोद्योगिकी हस्तांतरण, सूचना प्रोद्योगिकी के मोर्चे पर भी तेजी से काम किया जा रहा है।
   इस मौके पर कृषि एवं किसान कल्‍याण राज्‍य मंत्री गजेन्‍द्र सिंह शेखावत, नीति आयोग के सदस्‍य डॉ. रमेश चन्‍द, सचिव, डेयर एवं महानिदेशक, आईसीएआर डॉ. त्रिलोचन महापात्र, डेयर के विशेष सचिव सी. राउल, डेयर के वित्‍तीय सलाहकार, इंडियन एग्रीकल्‍चरल यूनिवर्सिटीज एसोसिएशन के अध्‍यक्ष, आईसीएआर में उप महानिदेशक (शिक्षा) डॉ. एन.एस. राठौड, कृषि विश्‍वविद्यालयों के कुलपति एवं संस्‍थानों के निदेशक भी मौजूद थे। 
   इस सम्मेलन में हिस्सा ले रहे राज्‍य कृषि विश्‍वविद्यालयों के कुलपति, आईसीएआर संस्‍थानों के निदेशक एवं आईसीएआर के अन्‍य वरिष्‍ठ अधिकारी कृषि अनुसंधान, शिक्षा और विस्‍तार प्रणाली में सुधार करने के तौर-तरीकों पर विचार-विमर्श करेंगे।

वृहद जल परिवहन प्रणालियों के लिए वैकल्पिक प्रौद्योगिकी समय की मांग

   नई दिल्‍ली। केन्‍द्रीय जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्री नितिन गडकरी ने कहा है कि देश में वृहद जल परिवहन प्रणाली के लिए वैकल्पिक प्रोद्योगिक का इस्‍तेमाल समय की मांग है।

   नई दिल्‍ली में आज ‘‘अधिक मोटाई वाले पाइपों के इस्‍तेमाल’’ पर एक अंतर्राष्‍ट्रीय कार्यशाला का उद्घाटन करते हुए श्री गडकरी ने पावर ग्रिड और सड़क नेटवर्क की तर्ज पर देश में जल ग्रिडों के वि‍कास की आवश्‍यकता पर जोर दिया।
  उन्‍होंने कहा कि हमारे देश में पानी की कमी नहीं है, लेकिन जल संसाधनों की उचित योजना और प्रबंधन की कमी है। उन्‍होंने कहा कि देश में 25 से 30 प्रतिशत कृषि क्षेत्र से जुड़े कामगार गांव से शहरी इलाकों की तरफ केवल इसलिए पलायन करते हैं, क्‍योंकि उन्‍हें सिंचाई और कृषि के क्षेत्र से जुड़ी अन्‍य समस्‍याओं का सामना करना पड़ता है। 
   ड्रिप सिंचाई के जरिए जल संसाधनों के प्रभावी इस्‍तेमाल के महत्‍व की चर्चा करते हुए श्री गडकरी ने मध्‍य प्रदेश का उदाहरण दिया, जिसने ड्रिप सिंचाई को बढ़ावा देकर कृषि के क्षेत्र में 23 प्रतिशत विकास दर हासिल कर ली है,जबकि राष्‍ट्रीय औसत केवल 4 प्रतिशत है। श्री गडकरी ने 8 लाख करोड़ रुपये के व्‍यय से देश में नदियों को जोड़ने की 30 प्रस्‍तावित परियोजनाओं का जिक्र किया। 
    उन्‍होंने कहा कि हमारे सामने चुनौती है कि हम उपयुक्‍त सस्‍ती, पर्यावरण अनुकूल प्रौद्योगिकी का पता लगाएं,ताकि गुणवत्‍ता से समझौता किए बिना तेजी से जल का हस्‍तांतरण हो सके। केन्‍द्रीय जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण राज्‍य मंत्री डॉ. सत्‍यपाल सिंह ने कहा कि हमारी सरकार की सर्वोच्‍च प्राथमिकता ‘हर खेत को पानी’ और ‘पर ड्रॉप मोर क्रॉप’ है, क्‍योंकि 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुना करना प्रधानमंत्री का सपना है।
  उन्‍होंने कहा कि नहरों के जरिए सिंचाई और जल परिवहन काफी महंगा है और पर्यावरण तथा वनों की निकासी तथा भूमि अधिग्रहण जैसी समस्‍याओं के कारण इसमें काफी समय लग जाता है। उन्‍होंने कहा कि मध्‍य प्रदेश और महाराष्‍ट्र में नहरों के स्‍थान पर जल परिवहन के लिए पाइपों का इस्‍तेमाल शुरू कर दिया गया है। डॉ. सिंह ने विशेषज्ञों से आग्रह किया वे ‘हर खेत को पानी’ के उद्देश्‍य पूरा करने के लिए सस्‍ते और पर्यावरण अनुकूल विकल्‍पों का पता लगाएं। 
  जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय में सचिव श्री यू.पी. सिंह ने जल परिवहन के लिए अधिक मोटाई वाले पाइपों के फायदों की जानकारी दी। उन्‍होंने कहा कि देश में कई वर्षों से अनेक नहरों का निर्माण किया जा रहा है, लेकिन वह अभी भी पूरा नहीं हुआ है। नहर प्रणाली के विपरीत पाइपों के जरिए जल परिवहन के लिए भूमि अधिग्रहण और वन की निकासी की जरूरत नहीं पड़ती। जल के दूषित होने और वाष्‍पीकरण के कारण नुकसान की समस्‍याएं काफी कम हो जाती है। 
   श्री सिंह ने कहा कि देश को सस्‍ती और पर्यावरण अनुकूल प्रौद्योगिकी की जरूरत है। उन्‍होंने आशा व्‍यक्‍त की कि कार्यशाला में विशेषज्ञ ऐसा कोई समाधान निकालेंगे और आश्‍वासन दिया कि उनका मंत्रालय इस बारे में तेजी से कार्रवाई करेगा। एकदिवसीय कार्यशाला का आयोजन जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय के तत्‍वावधान में वाप्‍कोस और राष्‍ट्रीय जल विकास एजेंसी ने किया है।
    कार्यशाला में विनिर्माण कंपनियां, जल परिसंपत्ति प्रबंधन से जुड़े संगठन, इंजीनियरिंग विशेषज्ञ, केन्‍द्र और राज्‍य सरकारों एवं निजी कंपनियों के जल संसाधन विभाग जैसे महत्‍वपूर्ण हितधारक भाग ले रहे हैं। कार्यशाला में अमरीका, ब्राजील,इटली, चीन और दक्षिण अफ्रीका के भारतीय और विदेशी विशेषज्ञ अपने पेपर प्रस्‍तुत करेंगे।