Friday, 8 December 2017

भू-जल पर अंतर्राष्‍ट्रीय सम्‍मेलन

     नई दिल्‍ली। देश में भू-जल के मुद्दे पर 11 से 13 दिसंबर, 2017 तक एक अंतर्राष्‍ट्रीय सम्‍मेलन का आयोजन किया जा रहा है, जिसका शीर्षक है ‘भू-जल विजन 2030-जल सुरक्षा, चुनौतियां और जलवायु परिवर्तन अनुकूलता’। सम्‍मेलन का आयोजन राष्‍ट्रीय हाइड्रोलॉजी संस्‍थान (एनआईएच), रूड़की और केन्‍द्रीय भू-जल बोर्ड (सीजीडब्‍ल्‍यूबी) द्वारा जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय के तत्‍वाधान में किया जा रहा है।

   सम्‍मेलन में 15 देशों के प्रतिनिधियों के भाग लेने की उम्‍मीद है और 250 शोध पत्र प्रस्‍तुत किये जाएंगे, जिनमें 32 मुख्‍य सिद्धांत पर आधारित पत्र होंगे। 
   सम्‍मेलन का उद्घाटन केन्‍द्रीय जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्री नितिन गडकरी, केंद्रीय पेयजल और स्‍वच्‍छता मंत्री सुश्री उमा भारती, केन्‍द्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री डॉ. हर्षवर्धन, केन्‍द्रीय जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण राज्‍य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल और डॉ. सत्‍यपाल सिंह करेंगे। 
     सम्‍मेलन में देश में पानी के इस्‍तेमाल और बदलते जलवायु परिदृश्‍य के अंतर्गत भू-जल की वर्तमान स्थिति और उसके प्रबंधन की चुनौतियों का जायजा लिया जाएगा। सम्‍मेलन ऐसे समय में हो रहा है, जब देश में पानी का परिदृश्‍य, खासतौर से भू-जल परिदृश्‍य दिनों दिन बदल रहा है।
    पिछले दशकों के दौरान देश में भू-जल का इस्‍तेमाल कई गुना बढ़ा है और आज गांवों में 80 प्रतिशत घरेलू जरूरतें, सिंचाई के पानी की 65 प्रतिशत जरूरतें, औद्योगिक एवं शहर की 50 प्रतिशत जल की जरूरतों का स्रोत हमारे भू-जल संसाधन हैं।
      भू-जल के दोहन से पंजाब, बुंदेलखंड और राजस्‍थान सहित देश के अन्‍य प्रमुख क्षेत्रों में कृषि कार्यों के लिए खतरा पैदा हो रहा है, जिससे भविष्‍य में खाद्य सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा पैदा हो सकता है। साथ ही भारी वर्षा होने की स्थिति में देश में भू-जल के फिर से भरने की स्थिति में बदलाव आ सकता है।
     भू-जल के अत्‍याधिक दोहन के कारण अनेक इलाकों में भू-जल की गुणवत्‍ता प्रभावित होने लगी है और इसमें आर्सनिक जैसे तत्‍व पाए जाने लगे हैं। सम्‍मेलन में इन ज्‍वलंत मुद्दों पर चर्चा होगी।
       सम्‍मेलन में देश में जल संसाधनों से जुड़े विभिन्‍न क्षेत्रों के बीच सहक्रियाशील नीति विकल्‍पों पर भी गौर किया जाएगा और 2030 के विकास लक्ष्‍यों के लिए चुनौतियों को दूर करने के संबंध में एक रोड मैप तैयार किया जाएगा।

उद्योग जगत से नमामि गंगे मिशन के लिए 500 करोड़ रुपये की सहायता

     मुंबई। भारत के व्‍यापार एवं उद्योग जगत की हस्तियों ने नमामि गंगे मिशन के तहत गंगा नदी के आसपास स्थित विभिन्‍न स्‍थलों पर घाटों, नदी के मुहानों, शवदाहगृह और पार्कों जैसी विभिन्‍न सुविधाओं के विकास के लिए लगभग 500 करोड़ रुपये की सहायता देने की प्रतिबद्धता व्‍यक्‍त की है।

   जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण, सड़क परिवहन व राजमार्ग और शिपिंग मंत्री नितिन गडकरी ने मुंबई में कारोबार जगत की हस्तियों से संवाद किया और उनसे स्‍वच्‍छ गंगा मिशन में भाग लेने की अपील की।
   इस संवाद का आयोजन राष्‍ट्रीय स्‍वच्‍छ गंगा मिशन द्वारा किया गया। इस अवसर पर नितिन गडकरी ने विशेष जोर देते हुए कहा कि गंगा को स्‍वच्‍छ करने के कार्य को एक जन आंदोलन का स्‍वरूप दिया जाना चाहिए। 
    उन्‍होंने यह जानकारी दी कि विश्‍व भर के अनेक लोगों ने स्‍वच्‍छ गंगा के लिए सहायता देने का संकल्‍प व्‍यक्‍त किया है और बड़ी उदारता से दान दिया है। उन्‍होंने यह भी कहा कि गंगा नदी में प्रदूषण की रोकथाम के लिए कठोर कानून बनाए जाएंगे।
    पिछले सप्‍ताह लंदन में मिली इसी तरह की व्‍यापक सफलता के कुछ ही समय बाद मुंबई के कारोबारी समुदाय ने भी अपनी ओर से सहायता देने की प्रतिबद्धता व्‍यक्‍त की है। उल्‍लेखनीय है कि एनएमसीजी द्वारा आयोजित एक रोड शो के दौरान गडकरी के साथ संवाद के बाद लंदन में भारतीय मूल के उद्यमियों ने नमामि गंगे मिशन के लिए बड़े उत्‍साह के साथ सहायता देने की प्रतिबद्धता व्‍यक्‍त की।
      विभिन्‍न घाट, शवदाहगृह, पानी के झरने, पार्क, स्वच्छता सुविधाएं, सार्वजनिक सुविधाएं और नदी के मुहाने विकसित करने से संबंधित 2500 करोड़ रुपये से भी ज्‍यादा राशि की लागत वाली परियोजनाओं के निजी वित्‍त पोषण के लिए अनुरोध किया जा रहा है।
    इन परियोजनाओं की एक सांकेतिक सूची एक पुस्तिका के रूप में प्रकाशित की गई है और ये राष्‍ट्रीय स्‍वच्‍छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) की वेबसाइट पर भी ई-बुकलेट के रूप में उपलब्‍ध हैं। सरकार कारोबारी समुदाय से नमामि गंगे मिशन में भाग लेने की अपील कर रही है, ताकि वे अपनी पसंदीदा परियोजनाओं का वित्‍त पोषण करें और इस तरह गंगा को स्‍वच्‍छ करने का मार्ग प्रशस्‍त हो सके।
     मुंबई में उद्योग जगत की हस्तियों से संवाद के दौरान गडकरी ने गंगा नदी एवं इसकी सहायक नदियों के संरक्षण के लिए नमामि गंगे कार्यक्रम की रूपरेखा बताई, जिसे तीन स्‍तरों में विभाजित किया गया है। तत्‍काल नजर आने वाले प्रभाव के लिए जो अल्‍पकालिक गतिविधियां हैं, उनमें नदी की सतह की सफाई और घाटों एवं शवदाहगृह का आधुनिकीकरण शामिल हैं। 
   पांच वर्षों के अंदर क्रियान्वित की जाने वाली मध्‍यमकालिक गतिविधियों में नगरपालिका मलजल का प्रबंधन, जैव विविधता संरक्षण, वनीकरण, गंगा ग्राम, औद्योगिक अपशिष्‍ट का प्रबंधन, जल गुणवत्ता की निगरानी और ग्रामीण स्वच्छता शामिल हैं। 10 वर्षों के अंदर क्रियान्वित की जाने वाली दीर्घकालिक गतिविधियों में जल का पर्याप्‍त प्रवाह, सतह सिंचाई की बेहतर दक्षता एवं जल उपयोग की अधिक दक्षता शामिल हैं।
      जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण राज्‍य मंत्री सत्‍यपाल सिंह ने कहा कि भारतीयों के लिए गंगा सिर्फ एक नदी नहीं है, बल्कि यह एक बहती सभ्‍यता है। भारतीयों के लिए गंगा ने सदा ही सबसे महत्वपूर्ण पवित्र नदी का प्रतिनिधित्व किया है।
    गंगा नदी के किनारे कई धार्मिक केंद्र विकसित हुए हैं। जल एक तत्‍व के रूप में सृजन, विघटन, उर्वरता एवं सफाई के साथ प्रतीकात्मक रूप से जुड़ा हुआ है और यह व्‍यापक भारतीय सांस्कृतिक आस्था में निहित है।
   जल संसाधन मंत्रालय में सचिव यू.पी. सिंह ने कहा कि गंगा संरक्षण के विजन में सतत व प्रदूषण रहित प्रवाह और भूगर्भीय एवं पारिस्थितिक अखंडता सुनिश्चित करने के संदर्भ में नदी के स्वास्थ्य-प्रदाता स्‍वरूप को बहाल करना शामिल है।
     उन्‍होंने कहा कि 626.57 करोड़ रुपये की लागत से 113 घाटों एवं 52 शवदाहगृह का निर्माण प्रगति के विभिन्‍न चरणों में है। प्रति वर्ष पांच करोड़ रुपये की लागत से वाराणसी में 84 घाटों की सफाई की जाएगी। गंगा के निकट स्थित सभी गांवों को खुले में शौच मुक्‍त घोषित कर दिया गया है।
     भारत सरकार ने वर्ष 2014 में घोषित नमामि गंगे कार्यक्रम के जरिए लगभग 20000 करोड़ रुपये के संसाधनों का आवंटन कर इस पावन नदी के स्वास्थ्य-प्रदाता स्‍वरूप को बहाल करने पर विशेष जोर दिया है। 
     राष्‍ट्रीय स्‍वच्‍छ गंगा मिशन ने मलजल के प्रबंधन, औद्योगिक अपशिष्‍ट के प्रबंधन, जैव विविधता संरक्षण, ठोस अपशिष्ट के प्रबंधन, वनीकरण, ग्रामीण स्वच्छता, नदी के मुहाने के प्रबंधन, क्षमता निर्माण, घाटों और शवदाहगृह के विकास/पुनर्वास इत्‍यादि और इससे भी अहम गंगा संरक्षण को एक जन आंदोलन का स्‍वरूप देने हेतु संचार एवं सार्वजनिक अभियान के लिए लगभग 17 हजार करोड़ रुपये की परियोजनाओं को मंजूरी दी है।
     हालांकि गंगा नदी के संरक्षण का दायित्‍व विशेष अहमियत रखता है और सिर्फ सरकारी प्रयासों के बल पर इस मिशन को पूरा नहीं किया जा सकता है। इसके लिए उन सभी भारतीयों द्वारा खुले दिल से भागीदारी एवं सहायता प्रदान करने की जरूरत है जिनके लिए गंगा न केवल पोषण का एक अनन्त स्रोत है, बल्कि एक समृद्ध और कालातीत संस्कृति एवं परंपरा का अहम हिस्‍सा भी है।

सीमावर्ती राज्‍यों में सीमा सुरक्षा ग्रिड स्‍थापित किया जाएगा

     कोलकाता। केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने भारत-बांग्‍लादेश सीमावर्ती (आईबीबी) राज्‍यों के मुख्‍यमंत्रियों के सा‍थ कोलकाता में हुई बैठक की अध्‍यक्षता की। 

    सीमाओं की सुरक्षा को उच्‍च प्राथमिकता देते हुए गृह मंत्री ने इससे पहले भी भारत-चीन, भारत-म्‍यांमार, भारत-पाकिस्‍तान सीमाओं के लिए सीमा विशेष समीक्षा बैठकें आयोजित की थीं। 
   बैठक में गृह मंत्री ने देश की सीमाओं की सुरक्षा की आवश्‍यकता तथा उचित व्‍यापार और वाणिज्‍य की सुविधा के लिए प्रणाली तैयार करने पर जोर दिया। 
    उन्‍होंने कहा कि भारत के बांग्‍लादेश के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध है। इन सभी उपायों से सही व्‍यापार तथा लोगों के सीमा पार से वैध आवागमन की सुविधा होगी तथा उग्रवाद, अवैध प्रवास तथा पशुओं की तस्‍करी, जाली भारतीय मुद्रा तथा मादक पदार्थों, पर रोक लगाई जा सकेगी।
    उन्‍होंने अंतर्राष्‍ट्रीय सीमाओं पर अवैध प्रवासियों के प्रवेश पर रोक लगाने पर जोर दिया जिनमें से कुछ के अतिवादियों के साथ संपर्क हो सकते हैं जो राष्‍ट्र विरोधी गतिविधियों को बढ़ावा देते हैं तथा अंतर्राष्‍ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बनते हैं। 
    सीमा प्रबंध पर व्‍यापक समीक्षा बैठक में उन्‍होंने सीमा पर तीव्र अवसंरचना विकास तथा सीमा सुरक्षा को सुदृढ़ करने की आवश्‍यकता पर जोर दिया। असम, मेघालय, मिजोरम, त्रिपुरा तथा पश्चिम बंगाल सहित भारत के पांच राज्‍यों से लगती हुई भारत-बांग्‍लादेश सीमा 4096 कि.मी. लंबी है।
    अभी तक 3006 कि.मी. सीमा में सुरक्षा बाड, सड़कें, तीव्र प्रकाश तथा सीमावर्ती चौकियों की व्‍यवस्‍था की गई है। शेष 1090 कि.मी. सीमा में अभी काम शुरू किया जाना है। इसमें से 684 कि.मी. में बाड़ तथा संबद्ध अवसंरचना का निर्माण किया जाएगा और शेष 406 कि.मी. पर गैर-भौतिक अवरोधक लगाए जाऐंगे यद्यपि अधिकांश अवसंरचना पूर कर ली है या निर्माणाधीन है, कुछ भागों में भूमि अधिग्रहण की समस्‍या के कारण अभी काम शुरू किया जाना है।
     गृह मंत्री ने मुख्‍यमंत्रियों से अनुरोध किया कि वे राष्‍ट्रीय सुरक्षा के मद्देनजर भूमि अधिग्रहण में व्‍यक्तिगत रुचि लें।