Sunday, 4 November 2018

जलकौवों से मछली का शिकार !

    खबर है कि कौये कर रहे मछलियों का शिकार। काली अंधेरी रात है और जापान के गिफू में नदी किनारे आग जल रही है। मुट्ठी भर लोग जलकौवे के सहारे मछली का शिकार करने की तैयारी में हैं।

   मछली पकड़ने की यह खास कला है जो 1300 साल से चली आ रही है। पारंपरिक कपड़ो में जापान के इन लोगों को देख कर लगता है कि किसी और युग से आए हैं। डोरी से बंधे अपने जलकौवों को ये लोग कठपुतली की तरह संभाले हुए हैं।
   इनके पेशे को स्थानीय भाषा में "उकाई" कहा जाता है। मछली पकड़ने वाले ये लोग "उशो" कहलाते हैं। उकाई के लिए असाधारण धैर्य की जरूरत होती है। मछली का शिकार सूरज डूबने के बाद शुरू होता है। उशो अपनी नावों पर मशालें जला कर चलते हैं। इनकी रोशनी छोटी ट्राउट मछलियों को पानी की सतह की तरफ आकर्षित करती है। 
   यह कला कभी यूरोप और दूसरी जगहों पर भी थी लेकिन अब केवल चीन और जापान में ही नजर आती है। खबर है कि ये जलकौवे जापान के इबाराकी प्रांत से प्रवास पर यहां आते हैं। इसी दौरान इन्हें पकड़ कर रख लिया जाता है और फिर इन्हें ट्रेनिंग दी जाती है। एक जलकौवे को तैयार करने में तीन साल का वक्त लगता है। इनके सहारे मछली का शिकार मई से लेकर अक्टूबर तक होता है लेकिन पूरे साल इनकी देखभाल एक जैसी करनी पड़ती है।
    46 साल के शुजी सुगियामा पश्चिमी जर्मनी के गिफु में सबसे युवा "उशो" हैं। वे उन नौ लोगो में शामिल हैं, जिनके पास इसका शाही लाइसेंस है। शुजी रात के शिकार की तैयारी में हैं। उन्हें यह कला अपने पिता से विरासत में मिली। पांच पीढ़ियों से उनका परिवार मछली पकड़ने की अनोखी कला के साथ जी रहा है। खबर है कि जापान और दुनिया के कई और देशों के नदी किनारे बसे गांवों और शहरों में यह बहुत आम पेशा हुआ करता था। 
   सदियां गुजरने के साथ धीरे धीरे यह घटता गया। अब तो बस सैलानियों के आकर्षण और देश की विरासत को बचाने के नाम पर इसे बड़ी कोशिशों से जिंदा रखा गया है। खबर है कि जलकौवों को आपस में रस्सी से बांध दिया जाता है और साथ ही उनकी गर्दन में भी रस्सी बंधी होती है, जो शिकार को उन्हें खाने नहीं देती। जलकौवे शिकार लेकर मालिक के पास पहुंचते हैं। वह उन्हें रख कर पक्षियों को वापस शिकार पर भेज देता है। नए जलकौवों को अनुभवी पक्षियों के साथ रख कर शिकार की ट्रेनिंग दी जाती है।
   खबर है कि मछली पकड़ने का यह तरीका सदियों पुराना है लेकिन शाही परिवार से उशो के लिए लाइसेंस देने की शुरुआत 1890 में हुई। तब तक यह लोक कला लुप्त होने लगी थी। इनमें से नौ के पास शाही लाइसेंस है। साल में आठ बार ये शाही महल के लिए शिकार करने आते हैं और इन्हें इस काम के लिए 8,000 येन यानी करीब 71 डॉलर का मासिक वेतन मिलता है।
   मछली पकड़ने का यह तरीका कारोबारी रूप से फायदेमंद नहीं है और उशो को स्थानीय प्रशासन की सब्सिडी पर निर्भर रहना पड़ता है। हर साल एक लाख से ज्यादा लोग इसे देखने आते हैं और यह संख्या बढ़ रही है। स्थानीय प्रशासन को उम्मीद है कि एक दिन इसे यूनेस्को की विश्व विरासतों में शामिल किया जाएगा।

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