Friday, 7 April 2017

भारत व ब्रिटेन में ऊर्जा, जलवायु परिवर्तन क्षेत्र में घनिष्‍ठता

                 केन्‍द्रीय विद्युत, कोयला नवीन और  नवीकरणीय ऊर्जा एवं खान राज्‍य मंत्री (स्‍वतंत्र प्रभार) पीयूष गोयल और ब्रिटेन के व्‍यवसाय, ऊर्जा तथा औद्योगिक रण्‍नीति मंत्री ग्रेग क्‍लार्क ने साझा रूप में भारत-ब्रिटेन संवाद विकास के लिए ऊर्जा की अध्‍यक्षता की।

              यह संवाद दोनों देशों की विकास साझेदारी के लिए ऊर्जा को आगे बढ़ाने के भारत के प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र और ब्रिटेन की प्रधानमंत्री सुश्री थेरेसा मे के संकल्‍प को आगे ले जाता है। गोयल व क्‍लार्क ने भारत की ऊर्जा क्षेत्र में ब्रिटेन की जारी वचनबद्धता का स्‍वागत किया। दोनों देशों ने संयुक्‍त कोष में 120 मिलियन पाउन्‍ड के निवेश की पुष्टि की थी। इसका उद्देश्‍य 500 मिलियन पाउन्‍ड जुटाना है। यह घोषणा की गई थी कि कोष का फोकस भारत के तेजी से बढ़ रहे ऊर्जा और नवीकरणी ऊर्जा बाजार में निवेश पर होगा।

                   भारत व ब्रिटेन ने जलवायु परिवर्तन से मुकाबले के महत्‍व को स्‍वीकार किया। विभिन्‍न स्रोतों से वित्‍त एकत्रित करने तथा जलवायु परिवर्तन के दुष्‍प्रभाव को मिटाने के महत्‍व को स्‍वीकार किया। दोनों देशों ने जी-20 ग्रीन फाइनेंस स्‍टडी ग्रुप के कार्य का स्‍वागत किया। यह ग्रुप ग्रीन फाइनेंस को प्रोत्‍साहित करता है। ग्रीन फाइनेंस के अन्‍य रूपों में ग्रीन बांड जारी करने को प्रोत्‍साहन देता है। 

                दोनों मंत्रियों ने एनर्जी इफिशियंसी सर्विसिज लिमिटेड (ईईएसएल) के कदमों की सराहना की। ईईएसएल ने 7 मिलियन पाउन्‍ड के निवेश से 7 ऊर्जा बचत करने वाली परियोजनाओं में संचालन शुरू किया। परियोजनाएं पिछले दो साल से अधिक समय से चल रही हैं। लाभ प्राप्‍त हो रहा है। दोनों देशों के मंत्रियों ने सफल एलईडी व्‍यवसाय मॉडल (एलईडी उपलब्‍ध कराकर उजाला-उन्‍नत ज्‍योति) के भारत के सफल मॉडल को ब्रिटेन में उतरने में दिलचस्‍पी दिखाई।

भारत की 5.2 प्रतिशत आबादी अवसाद ग्रस्‍त

           राष्‍टप्रति प्रणब मुखर्जी ने नई दिल्‍ली में निमकेयर (एनआईएमसीएआरई) विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य सम्‍मेलन 2017 का उद्घाटन किया। 

         इस अवसर पर राष्‍ट्रपति ने कहा कि उन्‍हें इस बात की खुशी है कि विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य दिवस के अवसर पर निमकेयर ने इस सम्‍मेलन के आयोजन के लिए अग्रणी भूमिका निभाई है। प्रथम निमकेयर विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य दिवस सम्‍मेलन का मूल-वाक्‍य ‘मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य के लिए एक हों’ है। उन्‍होंने कहा कि मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य सुविधा के अभाव में पूरे विश्‍व में विकलांगता पैदा होती है। मनुष्‍य की उद्पादकता में किसी भी प्रकार का मानसिक विकार होने के कारण कमी आ जाती है तथा कार्यस्‍थलों में या परिवार में परिस्थितियां प्रभावित हो जाती हैं। मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य के विकार का दायरा बहुत विशाल है, जिसमें साधारण से लेकर जटिल समस्‍याएं शामिल हैं। अक्‍सर देखा गया है कि अगर साधारण विकारों को समय रहते ठीक नहीं किया गया तो मरीज की हालत जटिल हो जाती है। इस तरह के मरीज़ परिवारों पर बोझ बन जाते हैं।

               राष्‍ट्रपति ने कहा कि सभी प्रकार के मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य विकारों में संभवत: अवसाद बहुत आम है। अवसाद में सभी देशों के हर उम्र के लोग पीडि़त हो सकते हैं। निमहांस (एनआईएमएचएएनएस) द्वारा किये गये राष्‍ट्रीय मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य सर्वेक्षण 2015-16 के अनुसार भारत की 5.2 प्रतिशत व्‍यस्‍क आबादी किसी न किसी प्रकार के अवसाद से ग्रस्‍त है। अवसाद की समस्‍याओं पर प्राय: ध्‍यान नहीं दिया जाता, क्‍योंकि परिवार के सदस्‍य इसे ठीक से समझ नहीं पाते। मानसिक विकार के साथ सामाजिक कलंक भी जुड़ जाता है, चाहे उसका आसान उपचार क्‍यों न उपलब्‍ध हो। भारत में यह बड़ी समस्‍या है। बहरहाल, लोग इस समस्‍या के प्रति जागरूक होते जा रहे हैं। 

              राष्‍ट्रपति ने कहा कि पारम्‍परिक मूल्‍यों वाली हमारी पारिवारिक प्रणाली मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य विकारों को दूर करने में बहुत कारगर है। उन्‍होंने चिकित्‍सक समुदाय से आग्रह किया कि वे सामाजिक सहायता प्रणा‍लियों, आध्‍यात्मिक विश्‍वासों और अभ्‍यासों पर ध्‍यान दें। इनके साथ लोगों को स्‍वस्‍थ जीवन प्रदान करने के लिए योग प्रणाली का भी इस्‍तेमाल करें। राष्‍ट्रपति ने कहा कि देश में मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य प्रोफेशनलों की भारी कमी है और इस कमी को टेली-मेडीसन के जरिये प्रभावशाली तरीके से दूर किया जा सकता है। 

           मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य सलाहकारों की आवश्‍यकताओं के मद्देनज़र ग्रामीण और शहरी आबादी के लिए ई-केप एंड एसओएल टेली-साईकियेट्री एप्लिकेशन की शुरूआत करके विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य दिवस सम्‍मेलन ने सही दिशा में काम उठाया है। उन्‍होंने सभी से आग्रह किया कि अवसाद के बारे में जागरूकता पैदा करने में तेजी लाई जाये और स्‍वास्‍थ्‍य सुविधा आपूर्ति प्रणालियों को और मजबूत बनाया जाये।

परियोजनाओं की निगरानी के लिए एमआईएस लांच

           केन्‍द्रीय जल संसाधन, नदी विकास तथा गंगा संरक्षण मंत्री सुश्री उमा भारती ने नई दिल्‍ली में पीएमकेएसवाई परियोजना की निगरानी के लिए एमआईएस लांच किया।

          इस अवसर पर उन्‍होंने कहा कि एमआईएस से पीएमकेएसवाई परियोजनाओं की शीघ्र निगरानी हो सकेगी। विभिन्‍न पीएमकेएसवाई परियोजनाओं के क्रियान्‍वयन पर संतोष व्‍यक्‍त करते हुए सुश्री उमा भारती ने कहा कि 5.22 लाख हेक्‍टेयर सिंचाई क्षमताकी 21 परियोजनाएं इस वर्ष जून तक पूरी हो जाएंगी। 

            उन्‍होंने कहा कि अन्‍य 33 परियोजनाएं 2017-18 (12.95 लाख हेक्‍टेयर संभावित उपयोग) तक पूरी होंगी और शेष चिन्हित 45 परियोजनाएं मार्च, 2019 तक (48.54 लाख हेक्‍टेयर संभावित उपयोग) पूरी होंगी। जल संसाधन मंत्री ने कहा कि महाराष्‍ट्र की गोसीखुर्द जैसी अनेक परियोजनाओं के मामले में गति‍रोध बना हुआ था और अब इसे ठीक कर दिया गया है, ताकि मार्च 2019 के लक्ष्‍य को पूरा किया जा सके। इस परियोजना से 2.50 लाख हेक्‍टेयर की सिंचाई क्षमता का सृजन होगा। 

           इसी तरह पोलावरम परियोजना को फास्‍ट ट्रैक दिया गया है। इसके पूरा होने से 2.9 लाख हेक्‍टेयर सिंचाई क्षमता की प्राप्ति होगी। सुश्री भारती ने कहा कि महाराष्‍ट्र जैसे अनेक राज्‍यों ने, नये-नये कदम उठाए हैं, इन कदमों मे इन परियोजना के समय पर पूरा करने के लिए भूमि अधिग्रण की कठिनाई दूर करने के लिए भूमिगत दबाव वाली पाइप लाइनें बिछाने का काम शामिल है। नई एमआईएस के अंतर्गत परियोजना की भौतिक और वित्‍तीय प्रगति की जानकारी के लिए परियोजनावार नोडल अधिकारी नामित किये गये हैं। एमआईएस को पब्लिक डोमेन में रखा गया है। एमआईएस में परियोजनावार।/प्राथमिकता अनुसार/राज्‍यवार भौतिक/वित्‍तीय ब्‍योरे/टेबल/ग्राफ रूप में उपलब्‍ध हैं। इसमें तिमाही तौर पर परियोजना की प्रगति की तुलना की जा सकती है और परियोजना को प्रभावित करने वाली बाधाओं का विस्‍तृत वर्णन भी है। 

            जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय ने पीएमकेएसवाई के अंतर्गत 99 प्राथमिकता वाली अधूरी बड़ी और मझौले स्‍तर की सिंचाई परियोजनाओं के पूरा करने का कार्य लिया है। इन 99 चिन्हित परियोजनाओं को पूरा करनेके लिए 77595 करोड़ रुपये की अनुमानित राशि लगेगी। इसमें परियोजना कार्यों के लिए 48546 करोड़ रुपये और कमान क्षेत्र विकास कार्यों के लिए 29049 करोड़ रुपये शामिल हैं। 31342 करोड़ रुपये की केन्‍द्रीय सहायता अनुमानित है। 

             इन परियोजनाओं से 76.03 लाख हेक्‍टेयर क्षेत्र का संभावित उपयोग होगा। 2016-17 के दौरान एआईबीपी के अंतर्गत परियोजनाओं के लिए 3308 करोड़ रुपये की केन्‍द्रीय सहायता जारी की गई। सीएडी तथा डब्‍ल्‍यूएम के अंतर्गत आने वाली परियोजनाओं के लिए 854 करोड़ रुपये की केन्‍द्रीय सहायता जारी की गई। 6 राज्‍यों के लिए नाबार्ड के जरिए राज्‍य हिस्‍से के रूप में 3334 करोड़ रुपये की राशि जारी की गई है। इसके अतिरिक्‍त आंध्र प्रदेश की पोलावरम परियोजना के लिए 2514 करोड़ रुपये जारी किए गए हैं।

बांध परियोजनाओं के साथ पर्यावरण को बचाना भी महत्‍वपूर्ण

            केंद्रीय जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्री सुश्री उमा भारती ने कहा है कि भीषण गर्मी के चलते देश के किसी भी भाग में सूखे एवं पेजयल की समस्‍या उत्‍पन्‍न होती है तो उससे निपटने के लिए उनका मंत्रालय पूरी तरह तैयार है। 

            सुश्री भारती ने नई दिल्‍ली में कहा कि हाल ही में उनके मंत्रालय ने 15 राज्‍यों के उच्‍च अधिकारियों के साथ वीडियो कॉन्‍फ्रेसिंग के माध्‍यम से आने वाले स्थितियों का आंकलन किया। उससे निपटने के लिए मंत्रालय तैयार है। उन्‍होंने बताया कि मराठावाडा, बुंदेलखंड एवं अन्‍य सूखा आशंकित क्षेत्रों के जल स्रोतों के रखरखाव, संरक्षण एवं उन्‍हें पुनर्जीवित करने के साथ सिंचाई योजनाओं के लिए उनके मंत्रालय ने 300 करोड रूपए आवंटित हैं। इस पर जल्‍द ही काम शुरू होगा। केंद्रीय मंत्री ने कहा कि झारखंड में उत्‍तरी कोयल नदी पर करीब 40 वर्षों से अधूरे पड़े बांधों के निर्माण का कार्य भी जल्‍द पूरा किया जायेगा।

                 उन्‍होंने कहा कि यदि ये बांध समय पर बन जाते तो झारखंड के एक बडे भू भाग को सिंचाई के लिए जल की समस्या से नहीं जूझना पड़ता। उन्‍होंने कहा कि प्रधानमंत्री जी ने इस कार्य को प्राथमिकता से पूरा करने को कहा है। केंद्र सरकार ने इसके लिए 1600 करोड रूपए की योजना तैयार की है जिस पर जल्‍द ही काम शुरू किया जायेगा। असम में ब्रह्मपुत्र नदी के मांजुली द्वीप का जिक्र करते हुए मंत्री ने कहा कि द्वीप में होने वाले कटाव को रोकने के लिए पर्याप्‍त अनुसंधान एवं विचार विमर्श के बाद वहां जल्‍द कार्य शुरू किया जाएगा। इस परियोजना के लिए सरकार ने 230 करोड़ रूपये आवंटित कर दिए हैं इसमें से 166 करोड़ रूपये 27 किलोमीटर लंबे तटबंध को मजबूत करने के लिए खर्च किए जाएंगे।

              चालू वित्‍त वर्ष में इस पर 100 करोड़ रूपये खर्च किए जाएंगे। परियोजना को तीन साल में पूरा कर लिया जाएगा। इस परियोजना में तट के कटाव को रोकने के लिए पारंपरिक उपायों के साथ-साथ जन सहयोग भी लिया जाएगा। सुश्री भारती ने कहा कि विगत कुछ समय से पहाड़ी इलाकों के पारंपरिक जल स्‍त्रोतों को प्राकृतिक आपदाओं एवं जलवायु परिवर्तन से नुकसान पहुंचा है। इससे पहाड़ों में रहने वाले लोग पेयजल की समस्‍या एवं अन्‍य कारणों से पठारी क्षेत्रों की ओर पलायन करने लगे हैं। इस मामले की गंभीरता को देखते हुए उन्‍होंने केंद्रीय भूजल बोर्ड को निर्देशित किया है कि हिमालय की जलधाराओं एवं झरनों को पुन‍र्जीवित करने के लिए विस्‍तृत परियोजना तैयार करें।

             उन्‍होंने कहा कि इस परियोजना में जम्‍मू कश्‍मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्‍तराखंड समेत उत्‍तर पूर्व के राज्‍यों को शामिल कर जल्‍द कार्य प्रारंभ किया जायेगा। केंद्रीय जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्री ने कहा कि आने वाले दिनों में बांधों का डिजाइन इस प्रकार तैयार किया जाएगा कि नदी का बहाव पूरी तरह बंद न हो और बारह मास नदियां बहती रहे। उन्‍होंने कहा कि बांध परियोजनाओं के साथ पर्यावरण को बचाना भी उतना ही महत्‍वपूर्ण है। जल के बिना पर्यावरण का संरक्षण संभव नहीं है। सुश्री भारती ने कहा कि नेपाल और बांग्‍लादेश के साथ संबंधों में जल की महत्वपूर्ण भूमिका है।

              उन्‍होंने कहा, ‘भारत और नेपाल के साथ हमारे संबंध नदियों के प्रवाह जैसे हैं। नदियों का पानी हमेशा मीठा होता है और देनों देशों के साथ हमारे संबंध भी मधुर ही होंगे और इसमें जल की भूमिका अहम होगी।’ पंचेश्‍वर बांध परियोजना की चर्चा करते हुए उन्‍होंने कहा कि इस परियोजना पर तेजी से कार्य चल रहा है। इस परियोजना से 5600 मैगावाट प्रतिवर्ष विघुत उत्‍पादन होगा। साथ ही, प्रोजेक्‍ट को इस तरह डिजाइन किया जायेगा कि वह पर्यटकों को भी आकर्षित कर सके।

            सुश्री भारती ने इससे पूर्व प्रधानमंत्री कषि सिंचाई योजना तथा एआईबीपी परियोजनाओं की ऑनलाइन निगरानी प्रणाली को लॉन्‍च किया। उन्‍होंने कहा कि उनका मंत्रालय परियोजनाओं को समय पर पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध है और यह निगरानी प्रणाली इसमें और मदद करेगी। उन्‍होंने कहा कि एआईबीपी की 99 में से 23 परियोजनाओं को इस वर्ष जून तक पूरा कर लिया जाएगा।

मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य पर अधिक ध्‍यान

           स्‍वास्‍थ्‍य एवं परिवार कल्‍याण मंत्री जे.पी. नड्डा ने कहा है कि विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य दिवस अतीत को परखने, मौजूदा परिस्थितियों का जायजा लेने, भविष्‍य की योजना और रणनीति बनाने का दिन है। वे यहां ‘विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य दिवस’ के अवसर पर बोल रहे थे। 

         स्‍वास्‍थ्‍य एवं परिवार कल्‍याण मंत्री जे.पी. नड्डा ने कहा कि उनके मंत्रालय का उद्देश्‍य मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य नीति को पूरी तरह कार्यान्‍वयन में लाने पर केन्द्रित है। इस संबंध में निमहांस (एनएमएचएएनएस) जैसे अधिक से अधिक संस्‍थान कायम किये जाएंगे। स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री ने बताया कि मंत्रालय 100 जिलों में हाईपरटेंशन, मधुमेह और ब्रेस्‍ट, सरवाइकल और ओरल कैंसरों की जांच के लिए स्‍वास्‍थ्‍य कार्यक्रम चला रहा है। उन्‍होंने बताया कि स्‍वास्‍थ्‍य मंत्रालय ने नि:शुल्‍क दवाएं और निदान कार्यक्रम शुरू किये हैं, ताकि गरीब लोगों को स्‍वास्‍थ्‍य सुविधा उपलब्‍ध हो सके। नड्डा ने बताया कि लोकसभा में मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य सुविधा विधेयक को पारित कर दिया गया है। समारोह में जे.पी. नड्डा ने निमहांस में स्‍वास्‍थ्‍य केन्‍द्र से संबंधित रिपोर्ट, ईसीटी प्रशासनिक पुस्तिका के दूसरे संस्‍करण, विकलांगों के लिए मनोवैज्ञानिक- सामाजिक सुविधा किट, योग एवं अवसाद, आशा के लिए मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य संसाधन मार्गदर्शिका, मनोवैज्ञानिकों के लिए प्रशिक्षण पुस्तिका एवं जीवन कौशल शिक्षा, तनाव प्रबंधन एवं आत्‍मघात निरोधक निर्देशिका भी जारी की। 

              इस अवसर पर स्‍वास्‍थ्‍य एवं परिवार कल्‍याण राज्‍य मंत्री फग्‍गन सिंह कुलस्‍ते ने कहा कि मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य संबंधी समस्‍याओं का सामना करने वाले व्‍यक्तियों को समाज की मुख्‍य धारा में लाने के लिए सहायता की जानी चाहिए। स्‍वास्‍थ्‍य एवं परिवार कल्‍याण राज्‍य मंत्री श्रीमती अनुप्रिया पटेल ने कहा कि हमारे पास अपार क्षमता है कि हम अवसाद से निपटने में सफल हो सकते हैं। उन्‍होंने कहा कि अवसाद को विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन ने भी गंभीर समस्‍या माना है। डीएचआर की सचिव एवं आईसीएमआर की महानिदेशक डॉ. सौम्‍या स्‍वामीनाथन ने कहा कि संसद द्वारा मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य सुविधा विधेयक, 2016 का पारित होना भारत के लिए महत्‍वपूर्ण कदम है। 

             उन्‍होंने कहा कि 20-40 आयु वर्ग के युवा लोगों में आत्‍महत्‍या की घटनाएं अधिक होती हैं, जिनमें 15 से 19 वर्ष के किशोर भी शामिल हैं। भारत में विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन के प्रतिनिधि डॉ. हेंक बेकेडम ने कहा कि पिछले दस वर्षों के दौरान अवसाद के मामलों में 20 प्रतिशत का इजाफा हुआ है। उन्‍होंने कहा कि अवसाद को रोकने के लिए बच्‍चों में शारीरिक गतिविधियों को बढ़ावा देना बहुत महत्‍वपूर्ण है। इस अवसर पर स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं के महानिदेशक डॉ. जगदीश प्रसाद, अवर सचिव एवं मिशन निदेशक डॉ. ए.के. पांडा सहित स्‍वास्‍थ्‍य मंत्रालय के वरिष्‍ठ अधिकारी, विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन के प्रतिनिधि और अन्‍य विशिष्‍ट जन उपस्थित थे।

सोलर ट्रांसमिशन में सुधार के लिए 175 मिलियन डॉलर का ऋण समझौता

              भारत सरकार और एशियाई विकास बैंक (एडीबी) ने यहां अंतर्राज्यीय ग्रिड के लिए नए मेगा सोलर पार्कों द्वारा उत्पादित विद्युत को निकालने को लेकर उच्च वोलटेज ट्रांसमिशन प्रणाली के निर्माण को प्रोत्साहन देने और राष्ट्रीय ग्रिड प्रणाली की विश्वसनीयता में सुधार के लिए 175 मिलियन अमेरिकी डॉलर के ऋण समझौते पर हस्ताक्षर किए है।

            ऋण पावर ग्रिड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (पावरग्रिड) को दिया जाएगा। इसमें देश के विभिन्न स्थानों की उप-परियोजनाओं को सम्मिलित किया जाएगा। देश की किसी विशिष्ट परियोजना को लेकर एडीबी की यह पहली सफलता होगी। वित्त मंत्रालय में आर्थिक मामलों के विभाग में संयुक्त सचिव (बहुपक्षीय संस्थान) राज कुमार ने भारत सरकार की ओर से समझौते पर हस्ताक्षर किए जबकि एशियाई विकास बैंक की ओर से एडीबी इंडिया रेजिडेंट मिशन के निदेशक केनिची योकोयामा ने हस्ताक्षर किए। इस अवसर पर संयुक्त सचिव राज कुमार ने कहा कि मेगा सोलर पावर प्रोजेक्ट के लिए अंतर्राज्यीय ट्रांसमिशन प्रणाली के निर्माण को प्रोत्साहन देकर अधिशेष विद्युत वाले राज्यों से अधिशेष सौर ऊर्जा को विद्युत घाटे वाले राज्यों को भेजा जा सकेगा। 

               ऋण समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद भारत में एडीबी के निदेशक केनिची योकोयामा ने कहा कि इस परियोजना से भारत सरकारी के लक्ष्यों की ओर बढ़ते हुए भारत में सौर ऊर्जा के विस्तार को प्रोत्साहन मिलेगा। साथ ही इससे स्वच्छ ऊर्जा की भागीदारी भी बढ़ेगी। 

          उन्होंने कहा कि पावरग्रिड के सुरक्षा और खरीद प्रणाली को अपनाने से इसके परिचालन में लचीलापन आएगा। स्वायत्तता में सुधार होगा। साथ ही इससे परियोजना के पूरे होने व लागू होने में लगने वाला समय कम होगा। एडीबी के 175 मिलियन अमेरिकी डॉलर के ऋण के अतिरिक्त परियोजना में क्लीन टेक्नोलॉजी फंड (सीटीएफ) की ओर से को-फाइनेंस 50 मिलियन अमेरिकी डॉलर भी शामिल है। 

             सीटीएफ जलवायु निवेश निधि का एक 5.8 बिलियन अमेरिकी डॉलर का घटक है जिसका उद्देश्य विकासशील देशों को कम कार्बन उत्सर्जित करने वाली प्रौद्योगिकियों, स्वच्छ व नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों के उपयोग में संसाधन उपलब्ध कराना है। परियोजना से अंतर्राज्यीय ट्रांसमिशन नेटवर्क की क्षमता और दक्षता में सुधार होगा।

देश के 91 प्रमुख जलाशयों में एक प्रतिशत की कमी

             देश के 91 प्रमुख जलाशयों में 50.632 बीसीएम (अरब घन मीटर) जल का संग्रहण आंका गया। यह इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 32 प्रतिशत है। यह पिछले वर्ष की इसी अवधि के कुल संग्रहण का 129 प्रतिशत तथा पिछले दस वर्षों के औसत जल संग्रहण का 105 प्रतिशत है।

            इन 91 जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता 157.799 बीसीएम है, जो समग्र रूप से देश की अनुमानित कुल जल संग्रहण क्षमता 253.388 बीसीएम का लगभग 62 प्रतिशत है। इन 91 जलाशयों में से 37 जलाशय ऐसे हैं जो 60 मेगावाट से अधिक की स्थापित क्षमता के साथ पनबिजली संबंधी लाभ देते हैं। उत्तरी क्षेत्र में हिमाचल प्रदेश, पंजाब तथा राजस्थान आते हैं। इस क्षेत्र में 18.01 बीसीएम की कुल संग्रहण क्षमता वाले छह जलाशय हैं, जो केन्द्रीय जल आयोग (सीडब्यूसी) की निगरानी में हैं। इन जलाशयों में कुल उपलब्ध संग्रहण 4.28 बीसीएम है, जो इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 24 प्रतिशत है।

                  पिछले वर्ष की इसी अवधि में इन जलाशयों की संग्रहण स्थिति 24 प्रतिशत थी। पिछले दस वर्षों का औसत संग्रहण इसी अवधि में इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 29 प्रतिशत था। इस तरह पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में चालू वर्ष में संग्रहण बराबर है। यह पिछले दस वर्षों की इसी अवधि के दौरान रहे औसत संग्रहण से कमतर है। 

             पूर्वी क्षेत्र में झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल एवं त्रिपुरा आते हैं। इस क्षेत्र में 18.83 बीसीएम की कुल संग्रहण क्षमता वाले 15 जलाशय हैं, जो सीडब्ल्यूसी की निगरानी में हैं। इन जलाशयों में कुल उपलब्धक संग्रहण 9.74 बीसीएम है, जो इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 52 प्रतिशत है। पिछले वर्ष की इसी अवधि में इन जलाशयों की संग्रहण स्थिति 42 प्रतिशत थी। पिछले दस वर्षों का औसत संग्रहण इसी अवधि में इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 37 प्रतिशत था। इस तरह पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में चालू वर्ष में संग्रहण बेहतर है। यह पिछले दस वर्षों की इसी अवधि के दौरान रहे औसत संग्रहण से भी बेहतर है। 

                 पश्चिमी क्षेत्र में गुजरात तथा महाराष्ट्र आते हैं। इस क्षेत्र में 27.07 बीसीएम की कुल संग्रहण क्षमता वाले 27 जलाशय हैं, जो सीडब्ल्यूसी की निगरानी में हैं। इन जलाशयों में कुल उपलब्ध संग्रहण 11.07 बीसीएम है, जो इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता 41 प्रतिशत है। पिछले वर्ष की इसी अवधि में इन जलाशयों की संग्रहण स्थिति 21 प्रतिशत थी। पिछले दस वर्षों का औसत संग्रहण इसी अवधि में इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 40 प्रतिशत था। इस तरह पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में चालू वर्ष में संग्रहण बेहतर है। यह पिछले दस वर्षों की इसी अवधि के दौरान रहे औसत संग्रहण से भी बेहतर है। 

             मध्य क्षेत्र में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश तथा छत्तीसगढ़ आते हैं। इस क्षेत्र में 42.30 बीसीएम की कुल संग्रहण क्षमता वाले 12 जलाशय हैं, जो सीडब्ल्यूसी की निगरानी में हैं। इन जलाशयों में कुल उपलब्धक संग्रहण 18.76 बीसीएम है, जो इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 44 प्रतिशत है। पिछले वर्ष की इसी अवधि में इन जलाशयों की संग्रहण स्थिति 31 प्रतिशत थी। पिछले दस वर्षों का औसत संग्रहण इसी अवधि में इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 28 प्रतिशत था। इस तरह पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में चालू वर्ष में संग्रहण बेहतर है। यह पिछले दस वर्षों की इसी अवधि के दौरान रहे औसत संग्रहण से भी बेहतर है।

             दक्षिणी क्षेत्र में आंध्र प्रदेश (एपी), तेलंगाना (टीजी), एपी एवं टीजी (दोनों राज्यों में दो संयुक्त परियोजनाएं), कर्नाटक, केरल एवं तमिलनाडु आते हैं। इस क्षेत्र में 51.59 बीसीएम की कुल संग्रहण क्षमता वाले 31 जलाशय हैं, जो सीडब्ल्यूसी की निगरानी में हैं। इन जलाशयों में कुल उपलब्धण संग्रहण 6.58 बीसीएम है, जो इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 13 प्रतिशत है। पिछले वर्ष की इसी अवधि में इन जलाशयों की संग्रहण स्थिति 16 प्रतिशत थी। पिछले दस वर्षों का औसत संग्रहण इसी अवधि में इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 25 प्रतिशत था। इस तरह चालू वर्ष में संग्रहण पिछले वर्ष की इसी अवधि में हुए संग्रहण से कमतर है। यह पिछले दस वर्षों की इसी अवधि के दौरान रहे औसत संग्रहण से भी कमतर है। 

         पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में जिन राज्यों में जल संग्रहण बेहतर है उनमें पंजाब, राजस्थान, झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, गुजरात, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, तेलंगाना। पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में जल भंडारण बराबर रहने वाले राज्‍य त्रिपुरा, आंध्र प्रदेश, एपी एवं टीजी (दोनों राज्यों में दो संयुक्त परियोजनाएं) हैं। पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में कम भंडारण होने वाले राज्य हिमाचल प्रदेश, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु हैं।

प्रधानमंत्री आवास योजना में 44 लाख घरों को मंजूरी

            प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 20 नवंबर, 2016 को प्रधान मंत्री आवास योजना-ग्रामीण (पीएमए-जी) का शुभारंभ किया था।

             नई ग्रामीण आवास योजना कार्यक्रम को परिवारों की जरूरतों और आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए तैयार किया गया है। यह योजना स्थानीय सामग्री और स्‍थानीय घरों के डिजाइनों का उपयोग करके घरों का निर्माण करने की अनुमति देती है। इन घरों में खाना पकाने के क्षेत्र, शौचालय, एलपीजी कनेक्शन, बिजली कनेक्शन और जल की आपूर्ति समन्‍वय के माध्यम से होगी। इसके अलावा लाभार्थी अपनी जरूरत के मुताबिक अपने घरों की योजना बना सकते हैं। इन मकानों के गुणवत्तायुक्‍त निर्माण के लिए महत्वपूर्ण कौशल की जरूरत है। उसे पूरा करने के लिए गांवों के राजमिस्त्रियों के प्रशिक्षण का कार्यक्रम शुरू किया गया है।

                लाभार्थियों का चयन बेघर या कच्‍ची छत्‍त वाले एक या दो कच्‍चे कमरों में रहने वाले लोगों की सामाजिक, आर्थिक जनगणना (एसईसीसी) के डाटा का उपयोग करके एक कठोर प्रक्रिया के माध्यम से किया गया है। इसमें किसी प्रकार की त्रुटियों का समावेश न हो, यह सुनिश्चित करने के लिए अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी मान्यता के आधार पर ग्राम सभा द्वारा एसईसीसी डाटा को विधिमान्य किया गया है। सीएजी की कार्य निष्पादन लेखापरीक्षा रिपोर्ट 2014 में अपात्र लाभार्थियों के इंदिरा आवास योजना (आईएवाई) के अंतर्गत आने की समस्या पर प्रकाश डाला गया था। पीएमए-जी के चयन में 3 स्‍तरीय चयन प्रक्रिया के माध्यम से, पूरी तरह सावधानी बरती गई है। वर्ष 2016-17 के लिए कुल मिलाकर 44 लाख घरों को मंजूरी दी गई थी। 

                  ग्रामीण विकास मंत्रालय दिसंबर 2017 तक इन घरों का निर्माण करने के लिए कड़ी मेहनत कर रहा है। पीएमए-जी में 6 से 12 महीनों की कार्य समाप्‍त अवधि का पालन किया जा रहा है। वर्ष 2016-17 के दौरान पीएमए-जी में लाभार्थियों के चयन, आईटी/डीबीटी मंच, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी उपयोग, ग्रामीण राजमिस्त्रियों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम, आवास डिजाइन आदि को अंतिम रूप देने संबंधी सभी कार्यों को पूरा करने का लक्ष्‍य रखा गया था। अन्य मुख्‍य उद्देश्‍य लगभग 36 लाख अधूरे बने इंदिरा आवास योजना के घरों को पूरा करना था, जो 1 से 4 साल की अवधि से लंबित पड़े थे। राज्यों से प्राप्त रिपोर्टों के अनुसार वर्ष 2016-17 में कुल 32.14 लाख मकानों का निर्माण हुआ है। 

               आवाससॉफ्ट एमआईएस पर नेटवर्क और आईटी से संबंधित मुद्दों के कारण अभी तक आवाससॉफ्ट पर केवल 24.81 लाख पूरी तरह बने घरों को ही अपलोड किया गया है। वर्ष 2016-17 में पूरी तरह बने घरों की संख्‍या पहले के वर्षों की तुलना में बने घरों से 2 से 3 गुना अधिक है। शेष मकान भी अपलोड किए जाने की प्रक्रिया में हैं। आवाससॉफ्ट एमआईएस और आईटी/ डीबीटी प्रणाली का शत प्रतिशत उपयोग सुनिश्चित किया किया गया है। शासन सुधार के एक हिस्से के रूप में पहले ग्रामीण आवास कार्यक्रम के लिए प्रत्येक जिले में 2 से 20 बैंक खातें थे। अब राज्य स्तर पर एक एकल नोडल खाता है जहां से अब धन इलेक्ट्रॉनिक रूप से आवाससॉफ्ट-पीएफएमएस प्लेटफार्म पर सीधे ही लाभार्थी के खाते में हस्‍तांतरित किया जाता है। 

               पीएमएवाई के तहत वर्ष 2022 तक लाभार्थियों का चयन प्राथमिकता के आधार पर पारदर्शी तरीके से किया गया है। तीन स्‍तरीय चयन में यह सुनिश्चित किया है कि केवल वास्तविक रूप से गरीब बेघर और टूटे-फूटे घरों में रहने वाले लोगों का ही चयन किया जाए। अधिकांश परिवार कमजोर समूहों से संबंध रखते है। इनमें भी अधिकांश संख्या में महिलाओं को लाभार्थी के रूप में चुना गया है। आवास डिजाइन रूपों में आपदा लचीलापन वाली विशेषताओं को अंतिम रूप दिया गया है जिन्हें राज्य सरकारें इस कार्यक्रम के तहत उपयोग कर रही है। 

            राष्ट्रीय कौशल विकास निगम (एनएसडीसी) द्वारा अनुमोदित योग्यता के अनुसार ग्रामीण मिस्त्रियों को प्रशिक्षण देकर तथा उनके मूल्यांकन और प्रमाणीकरण को सुनिश्चित करके उनकी कारीगरी और रोजगार में सुधार किया जा रहा है। मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, कर्नाटक और असम जैसे राज्य पीएमए-जी के कार्यान्वयन में शीर्ष पर हैं। बिहार, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, असम, झारखंड, राजस्थान और महाराष्ट्र जैसे राज्य बहुत बड़ी संख्‍या में अधूरे पड़े इंदिरा आवास योजना के मकानों को पूरा करने में बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। 

           ग्रामीण विकास विभाग वर्ष 2017-18 में 51 लाख मकानों को पूरा करने की योजना बना रहा है। वर्ष 2017-18 में 33 लाख अतिरिक्त मकान मंजूर किए जाएंगे। वर्ष 2018-19 इतनी ही संख्या मकान पूरा करने का प्रस्ताव है। इस प्रकार वर्ष 2016-2019 की अवधि के दौरान 1.35 करोड़ मकानों का निर्माण पूरा हो जाएगा। इससे वर्ष 2022 तक सभी को मकान उपलब्‍ध कराने का मार्ग प्रशस्‍त होगा।

सिनेमा संचार का एक सशक्‍त माध्‍यम 

              सूचना एवं प्रसारण मंत्री एम. वेंकैया नायडू ने कहा कि राष्‍ट्रीय फिल्‍म पुरस्‍कारों से सिनेमा के माध्‍यम से भारत की समग्र एवं समृद्ध संस्‍कृति को दर्शाने के लिए एक उत्‍कृष्‍ट प्‍लेटफॉर्म सुलभ होता है।

          फिल्‍मों की फीचर और गैर फीचर श्रेणियों हेतु रिपोर्ट पेश करने के लिए 64वें राष्‍ट्रीय फिल्‍म पुरस्‍कारों के ज्‍यूरी सदस्‍यों का धन्‍यवाद करते हुए मंत्री ने कहा कि राष्‍ट्रीय फिल्‍म पुरस्‍कारों ने फिल्‍म उद्योग की सर्वाधिक प्रतिभाशाली हस्तियों को सम्‍मानित करने के साथ-साथ देश में खुद को प्रमुख फिल्‍म पुरस्‍कारों के रूप में स्‍थापित कर लिया है। नायडू ने सिनेमा की भूमिका पर टिप्‍पणी करते हुए इसे संचार का एक सशक्‍त माध्‍यम बताया। नायडू ने कहा कि सिनेमा में लोगों की जिन्‍दगी में असाधारण बदलाव लाने की असीम क्षमता है।

विशाखापत्तनम संयंत्र : इस्पात का कारोबार 4 प्रतिशत बढ़कर 12781 करोड़

            विशाखापत्तनम इस्पात संयंत्र ने परिचालन एवं बिक्री पर उल्लेखनीय प्रदर्शन किया है। आरआईएनएल के सीएमडी मधुसूदन ने विशाखापत्तनम में कहा कि आने वाले वर्ष में इस्पात की मांग बढ़ेगी।

 इस्पात मंत्री बीरेन्द्र सिंह ने भी आरआईएनएल के प्रदर्शन की सराहना की, जो इस्पात मंत्रालय का एक सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम है। वर्ष 2016-17 को दौरान तप्त धातु, द्रव इस्पात, तैयार इस्पात और बिक्री योग्य इस्पात के उत्पादन में क्रमश: 11, 10, 16 और 10 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की। एक अन्य उपलब्धि यह रही है कि वायर रॉड मिल-2 से हुए उत्पादन में 43 प्रतिशत की उल्लेखनीय वृद्धि की गई है।

              धातुमल (सिंटर) का सकल उत्पादन 6 मिलियन टन के स्तर पर पहुंच गया, जो 5 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाता है। आरआईएनएल के सीएमडी पी. मधुसूदन ने उपलब्धियों के लिए वीएसपी संगठन की सराहना की और यह विश्वास जताया कि चालू वित्त वर्ष में विस्तार इकाइयों सहित कुल उत्पादन में अच्छी-खासी वृद्धि होगी। मधुसूदन ने कहा कि आम बजट 2017-18 में इस्पात क्षेत्र के लिए अनुकूल मांग परिदृश्य होने का उल्लेख किया गया है।

               इसके साथ ही सरकार बुनियादी ढांचे एवं किफायती मकानों पर विशेष जोर दे रही है जिससे देश में इस्पात की खपत के मद्देनजर इसकी मांग बढ़ेगी। बुनियादी ढांचागत क्षेत्र के साथ-साथ निर्माण क्षेत्र में भी सुस्ती होने के बावजूद आरआईएनएल का कारोबार 4 प्रतिशत बढ़कर 12781 करोड़ रुपये के स्तर पर पहुंच गया। वर्ष 2016-17 के इस आंकड़े में 1048 करोड़ रुपये का निर्यात भी शामिल है।

            वर्ष 2016-17 के दौरान सभी विपणन क्षेत्रों में वृद्धि आंकी गई। आरआईएनएल ने मार्च ’17 के दौरान 5.77 लाख टन की बिक्री की, जो 27 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाता है। इसी तरह इस दौरान आरआईएनएल का कारोबार 2205 करोड़ रुपये आंका गया जो मार्च ’16 की तुलना में 44 प्रतिशत अधिक है।