Wednesday, 28 December 2016

आंध्र प्रदेश की पोलावरम समेत गुजरात और महाराष्‍ट्र के लिए 3274 करोड़ 

       केंद्रीय जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय की मंत्री उमा भारती ने घोषणा की है कि केन बेतवा नदी जोड़ो परियोजना की अंतिम अड़चन खत्‍म हो गई है। उन्‍होंने कहा कि परियोजना को वन्‍य जीव बोर्ड की मंजूरी मिल गई है। इसके वित्‍तीय प्रबंधन को अंतिम रूप देने के बाद इसका औपचारिक निर्माण कार्य शुरू होगा। मंत्री ने आंध्र प्रदेश के मुख्‍यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडु को पोलावरम सिंचाई परियोजना के लिए नाबार्ड की तरफ से जारी 1981 करोड़ रुपये की वित्‍तीय सहायता का चेक प्रदान किया। उन्‍होंने कहा कि सरकार ने इस परियोजना को राष्‍ट्रीय परियोजना का दर्जा दिया है । इस पर आने वाला सारा खर्चा केंद्र सरकार वहन करेगी। सुश्री भारती ने कहा कि पोलावरम समेत प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना और त्‍वरित सिंचाई लाभ कार्यक्रम के अंतर्गत सभी सिंचाई परियोजनाओं को 2019 तक पूरा कर लिया जाएगा। इससे देश में 80 लाख हेक्‍टेयर अतिरिक्‍त भूमि की सिंचाई की जा सकेगी। 
     
       केंद्रीय जल संसाधन मंत्री ने इस अवसर पर महाराष्‍ट्र के सिंचाई मंत्री गिरीश दत्‍तात्रेय महाजन को नाबार्ड की तरफ से जारी 830 करोड़ रुपये और गुजरात के उप मुख्‍यमंत्री और सिंचाई मंत्री नितिन भाई पटेल को 463 करोड़ रुपये की वित्‍तीय सहायता का चेक जारी किया।  इस अवसर पर सुश्री भारती ने कहा कि केंद्र सरकार त्‍वरित सिंचाई लाभ कार्यक्रम के अंतर्गत महाराष्‍ट्र की 26 परियोजनाओं को वर्ष 2018 तक पूरा कर लेगी। प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना और त्‍वरित सिंचाई लाभ कार्यक्रम के तहत परियोजनाओं के कार्यान्वयन से संबंधित मुद्दे तथा परियोजनाओं की प्राथमिकता पर विचार-विमर्श के लिए, छत्तीसगढ़ के जल संसाधन मंत्री बृजमोहन अग्रवाल की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया था क्ष् 



         समिति को संबंधित राज्यों द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी के अनुसार 99 परियोजनाओं की 2019-20 तक पूरा करने के लिए पहचान की गई है। 23 परियोजनाओं (प्राथमिकता-क्ष्) के 2016-17 तक और 31 परियोजनाओं (प्राथमिकता क्ष्क्ष्) के 2017-18 तक पूरा होने की संभावना हैक्ष् 45 परियोजनाओं (प्राथमिकता-क्ष्क्ष्क्ष्) के  दिसम्बर, 2019 तक पूरा होने का अनुमान हैं। इन परियोजनाओं पर 77595 करोड़ रूपये (48546 करोड़ रुपये परियोजना कार्य तथा 29049 करोड़ रूपये क्ॠक़् ) खर्च होने का अनुमान हैं जिसमे से 31342 करोड़ रूपये की अनुमानित केंद्रीय सहायता होगी। वर्ष 2016 के दौरान अपने बजट भाषण में, केंद्रीय वित्त मंत्री ने इन परियोजनाओं को पूरा करने के लिए नाबार्ड के साथ लंबी अवधि के सिंचाई कोष  के निर्माण की घोषणा की थी। उसके लिए 20,000 करोड़ रुपये  भी आवंटित किए। 12517 करोड़ रूपये की राशि वर्ष 2016-17 के दौरान बजटीय संसाधनों और बाजार उधारी के रूप में प्रदान की गई। पोलावरम परियोजना जो की इंदिरा सागर (पोलावरम) परियोजना के नाम से भी जानी जाती हैं वह 2.91 लाख हेक्टेयर के सिंचाई कमान क्षेत्र और 960 मेगा वाट की बिजली उत्पादन क्षमता वाली एक  बहुउद्देश्यीय परियोजना है।

 

         इस परियोजना के तहत, विशाखापत्तनम शहर एवं अन्य क्षेत्रों में पीने के पानी की आपूर्ति के रूप में कुल 23.44 सौ करोड़ घन फीट (टीएमसी) तथा  विशाखापत्तनम इस्पात संयंत्र  के लिए औद्योगिक पानी की आपूर्ति का भी प्रावधान है। इस परियोजना में कृष्णा नदी बेसिन से 80 टीएमसी पानी सालाना, अंतर बेसिन हस्तांतरण की भी परिकल्पना की गई है। इस परियोजना पर 2009 में 10,151.04 करोड़ रुपये (2005-06 के मूल्य स्तर पर) के निवेश को योजना आयोग द्वारा मंजूरी दी गयी थी। वित्त वर्ष 2010-11 के स्तर पर, इस परियोजना की  वर्तमान लागत 16010.45 करोड़ रूपये  है। इस परियोजना को त्वरित सिंचाई लाभ कार्यक्रम (एआईबीपी) के तहत केंद्रीय सहायता प्रदान की जा रही हैं। 


         इस परियोजना में दिनाक 31.03.2014. तक कुल 5135.87 करोड़ रुपये खर्च किये जा चुके हैं जिसमे से एआईबीपी के तहत 562.469 करोड़ रुपये की केन्द्रीय सहायता प्रदान की गयी हैंक्ष् वर्ष 2014 में पोलावरम को राष्ट्रीय परियोजना घोषित किए जाने के बाद, 950 करोड़ रुपये पोलावरम परियोजना प्राधिकरण को जारी किये जा चुके है। राज्य सरकार द्वारा दी गई सूचना के आधार पर चालू वर्ष के दायित्व के फलस्वरूप इस साल की  आवश्यकता को पूरा करने के लिए, 2981.54 करोड़ रुपये की  नाबार्ड से व्यवस्था की गई है। इस वर्ष की कुल केंद्रीय सहायता के दायित्व 2981.54 करोड़ रुपये में से, राज्य सरकार द्वारा किए गए व्यय के लिए 1981.54 करोड़ आज जारी किये गए।

अनुसूचित जनजाति को 55.43 लाख एकड वन भूमि  


        केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्री जुएल ओराम ने कहा कि मंत्रालय के वर्ष 2016-17 के बजट आवंटन का 70 प्रतिशत हिस्‍सा खर्च किया जा चुका है।

     कहा कि मंत्रालय ने वन अधिकार अधिनियम के समुचित कार्यान्‍वयन पर विशेष ध्‍यान दिया है। अक्तूबर, 2016 तक राज्य सरकारों से प्राप्त सूचना के अनुसार, लगभग 16.78 लाख व्यक्तिगत (वन अधिकार) अधिकार पत्र 55.43 लाख एकड़ की वन भूमि क्षेत्र के लिए दिए जा चुके हैं। इसके अतिरिक्‍त 48,192 सामुदायिक (वन अधिकार) अधिकार पत्र लगभग 47 लाख एकड़ वन भूमि क्षेत्र के लिए वितरित किए जा चुके हैं। मंत्री ने बताया कि पुदुचेरी में इरूलर (विल्‍ली और वेट्टईकरण सहित) जनजाति को अनुसूचित जनजातियों की सूची में शामिल किया गया है। असम, छत्तीसगढ़, झारखंड, तमिलनाडु और त्रिपुरा में अनुसूचित जनजातियों की सूची संशोधित करने के लिए, संविधान (अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति) आदेश (संशोधन), विधेयक 2016 संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान लोक सभा में पेश किया गया। ओराम ने कहा कि मंत्रालय जनजातीय लोगों की आवश्यकता तथा जरूरतों के अनुसार ढांचें के निर्माण के लिए कौशल विकास तथा उद्यमिता मंत्रालय के साथ सहयोग कर रहा है। 163 प्राथमिकता (जनजातीय बहुल) वाले जिलों में से प्रत्येक में एक बहु-कौशल संस्थान स्थापित करने की योजना है। अवसंरचनात्मक ढाँचे के निर्माण पर खर्च, जनजातीय कार्य मंत्रालय तथा राज्य सरकारों के बीच आधा-आधा बांटा जाएगा।  


      उन्‍होंने कहा कि ‘’वनजीवन’’ जनजाति समुदायों के सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए शोध एवं तकनीकी केन्द्र के रूप में कार्य करने हेतु जनजातीय कार्य मंत्रालय के भीतर शीर्ष कन्द्रीय संस्थान के रूप में कार्य करेगा। संसाधन केन्द्र, उद्यमशीलता तथा कौशल उन्नयन के माध्यम से जनजातीय क्षेत्रों में सतत् आजीविका केन्द्रों के विकास एवं प्रसार का पोषण करेगा। ‘’वनजीवन’’, कौशल विकास तथा उद्यमिता मंत्रालय, ग्रामीण विकास मंत्रालय, सूक्ष्म लघु एवं मध्यम उद्योग मंत्रालय आदि जैसे अन्य केन्द्रीय मंत्रालयों/विभागों के साथ कौशल निर्माण के प्रयास करेगा। लघु वन उत्पाद (एमएफपी) के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) का उल्‍लेख करते हुए जुएल ओराम ने कहा कि पिछले महीने इस योजना के कार्य क्षेत्र का विस्‍तार अनुसचूी- 5 वाले राज्‍यों से बढ़ाकर देश के सभी राज्‍यों में लागू कर दिया गया है। उन्‍होंने कहा कि एमएफपी की मौजूदा 12 वस्‍तुओं की सूची में 14 अन्‍य वस्‍तुएँ भी शामिल की गईं हैं। इसके अलावा जनजातीय कार्य मंत्रालय द्वारा निर्धारित न्यूनतम समर्थन मूल्य की दर से 10ऽ अधिक या कम न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित करने के लिए भी राज्यों को छूट दी गई है।
 

       केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्री ने कहा कि उनके मंत्रालय ने इसका प्रसार रोकने के लिए कई पहल किए हैं ताकि सिकल सेल वाहक (मरीज) की देखभाल की जा सके तथा आगे की पीढ़ियां इस बीमारी से बच सकें। इस बीमारी के प्रसार पर नियंत्रण के उद्देश्य से सिकल सेल प्रबंधन के लिए एक प्रोटोकॉल मार्च, 2015 में जारी किया गया था। ओराम ने कहा कि स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग के साथ परामर्श के बाद नवम्बर, 2016 में राज्यों को एक संशोधित प्रोटोकॉल जारी किया गया है। इसक अनुसार, बच्चों तथा युवाओं की जांच के अलावा, गर्भवती महिलाओं की भी जांच की जानी है तथा परिवार में किसी के रोगग्रस्त पाये जाने के मामले में, परिवार के अन्य सदस्यों की भी जांच की जाएगी। कार्यक्रम में सिकल सेल वाहकों को परामर्श तथा सिकल सेल के मरीज के उपचार का भी प्रावधान है।