बिहार में नारियल खेती के लिए 50000 हेक्टेयर भूमि
बिहार में नारियल से जुड़ी योजनाओं को लागू करने के लिए 2014 से लेकर कुल 409.06 लाख रुपए नारियल विकास बोर्ड द्वारा मंजूर किए गए हैं। केन्द्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री राधा मोहन सिंह ने कहा कि किसान प्रशिक्षण केन्द्र राज्य में नारियल की खेती और उद्योग को मज़बूत बनाने में मदद करेगा।
केन्द्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री राधा मोहन सिंह ने कहा कि केन्द्र सरकार बिहार में नारियल की खेती और इससे जुड़ी गतिविधियों को आगे बढ़ाने लिए कटिबद्ध है। बिहार में नारियल से जुड़ी योजनाओं को लागू करने के लिए 2014 से लेकर कुल 409.06 लाख रुपए नारियल विकास बोर्ड द्वारा मंजूर किए गए हैं। केन्द्रीय कृषि मंत्री ने यह बात नारियल विकास बोर्ड के 37 वें स्थापना दिवस के अवसर पर पटना के वेटरेनरी कॉलेज में नारियल विकास बोर्ड के ‘किसान प्रशिक्षण केन्द्र एवं क्षेत्रीय कार्यालय भवन’ के शिलान्यास के मौके पर कही।
नारियल विकास बोर्ड की स्थापना 12 जनवरी 1981 को हुई थी। राधा मोहन सिंह ने कहा कि वर्ष 2009 में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की अध्यक्षता में गठित समिति की सिफारिश के आधार पर नारियल विकास बोर्ड का क्षेत्रीय कार्यालय पटना, बिहार से गुवाहटी, असम में अंतरित कर दिया गया। केन्द्रीय सरकार बनने के बाद बिहार की नारियल उत्पादन क्षमता को ध्यान में रखते हुए केन्द्रीय टीम गठित की गयी। इस टीम ने पटना में बोर्ड का नया एवं चौथा क्षेत्रीय कार्यालय स्थापित करने की संस्तुति की, जिस पर नारियल विकास बोर्ड ने 119 वीं बोर्ड बैठक में सहमति व्यक्त की । सिंह ने कहा कि भारत नारियल के उत्पादन और उत्पादकता में विश्व में अग्रणी देश हैं। देश में 16 राज्यों और तीन संघ शासित क्षेत्रों में 21.4 लाख हेक्टर क्षेत्र में नारियल की खेती की जाती है।
नारियल की खेती, प्रसंस्करण, विपणन और व्यापार संबंधी गतिविधियों से एक करोड से अधिक परिवार अपनी आजीविका चलाते हैं। केन्द्रीय कृषि मंत्री ने कहा कि बिहार में 14,900 हेक्टर में नारियल की खेती होती है। नारियल का उत्पादन 14.138 करोड है। केन्द्रीय कृषि मंत्री ने कहा कि उत्तर बिहार का कोसी क्षेत्र जिसमें कोसी नदी के दोनों तरफ के इलाके आते हैं, नारियल की खेती के लिए उपयुक्त है। अनुमान है कि बिहार में विशेषकर उत्तर बिहार में तकरीबन 50000 हेक्टर क्षेत्र में सिंचित स्थिति में नारियल की खेती की जा सकती है।
राधा मोहन सिंह कहा कि नारियल विकास बोर्ड का लक्ष्य है कि नारियल किसानों को नारियल के उत्पादन, प्रसंकरण, विपणन और नारियल एवं मूल्यवर्धित उत्पादों के निर्यात में सहायता देकर भारत को नारियल के उत्पादन, उत्पादकता, प्रसंस्करण एवं निर्यात में अग्रणी बनाना। बिहार नारियल की खेती के गैर पारंपरिक क्षेत्रों में आता है। राज्य में नारियल क्षेत्र के विकास को बोर्ड विशेष ध्यान देता है। केन्द्रीय कृषि मंत्री ने कहा कि पटना में क्षेत्रीय कार्यालय भवन के निर्माण के साथ ही किसान प्रशिक्षण केन्द्र की स्थापना की भी पहल की जा रही है। उन्होंने कहा कि किसान प्रशिक्षण केन्द्र किसानों को कौशल विकास दिलाने के लिए है। यह केन्द्र राज्य में नारियल की खेती और उद्योग को मज़बूत बनाने में मदद करेगा। 12.01.2017
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भारत की कृषि को उन्नत बनाएगा इजराइल !
केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री राधा मोहन सिंह से इजरायल के कृषि एवं ग्रामीण विकास मंत्री यूरी एरियल की अगुवाई वाले इजरायली प्रतिनिधिमंडल ने भेंट की। इस दौरान भारत और इजरायल के बीच कृषि क्षेत्र में द्विपक्षीय सहयोग से जुड़े मुद्दों पर विचार-विमर्श किया गया।
दोनों देशों के बीच कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रों में सहयोग की दिशा में हुई प्रगति पर संतोष व्यक्त किया। दोनों ही पक्षों ने कृषि क्षेत्र में द्विपक्षीय सहयोग को और अधिक बढ़ाने के लिए अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त की, जो इस तथ्य से साफ जाहिर होती है कि बागवानी के क्षेत्र में वर्ष 2015 से लेकर वर्ष 2018 तक की कार्य योजना के तीसरे चरण को हाल ही में दोनों देशों द्वारा अंतिम रूप दिया गया है।
इस कार्यक्रम के तहत विभिन्न फलों एवं सब्जियों की खेती के लिए 21 राज्यों में 27 उत्कृष्टता केंद्र (सीओई) स्थापित किए जा रहे हैं, जिनमें से 15 उत्कृष्टता केंद्रों की स्थापना का काम पूरा हो चुका है। यही नहीं, दोनों ही पक्षों ने यह उम्मीद जताई कि इस सहयोग को जारी रखते हुए दोनों देश अनेक नए क्षेत्रों में भी एक-दूसरे की सरकारों एवं कारोबारियों के बीच सहयोग की शुरुआत कर सकते हैं, ताकि आपसी रिश्तों को और ज्यादा प्रगाढ़ किया जा सके। 11.01.2017
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देश में 7,131.21 करोड़ का 35,04,371.13 टन कृषि उत्पादन
केंद्रीय कृषि एंव किसान कल्याण मंत्री, राधा मोहन सिंह ने कहा कि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत खरीफ 2015-16 में 309 लाख किसानों ने बीमा कराया जबकि 2016-17 के खरीफ में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत 366.64 लाख किसानों ने बीमा कराया।
स्वायल हैल्थ कार्ड के तहत मार्च 2017 तक 2.53 करोड़ स्वायल नमूना संग्रहण के लक्ष्य के सापेक्ष 27.12.2016 तक 2.33 करोड़ संग्रहित किये जा चुके हैं, जिनसे 12.82 करोड़ कार्ड बनाए जा रहे हैं। अभी तक 4.25 करोड़ कार्ड वितरित किए जा चुके हैं। राष्ट्रीय कृषि बाजार के तहत 10 राज्यों की 250 मंडियो को ई पोर्टल से जोड़ दिया गया है। देश में 7,131.21 करोड़ रूपये के 35,04,371.13 टन कृषि उत्पादन हो चुका है। प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के तहत सूक्ष्म सिंचाई योजना के तहत 2013-14 में 4.3 लाख हैक्टेयर सूक्ष्म सिंचाई के अधीन लाया गया जबकि प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के तहत 2014-16 में 12.74 लाख हैक्टेयर सूक्ष्म सिंचाई के अधीन लाया गया है जो की 200 प्रतिशत की वृद्धि हैं।
मधुमक्खी विकास के तहत 2012-14 में 1,48,450 मीट्रिक टन का उत्पादन हुआ जबकि 2014-16 में 2,63,930 मीट्रिक टन का उत्पादन हुआ है। बागवानी के तहत क्षेत्र प्रति वर्ष लगभग 2.7 प्रतिशत बढ़ा है। नारियल विकास की शुरुआत से ही भारत नारियल तेल का निर्यात मलेशिया, इंडोनेशिया और श्रीलंका को करने लगा है, जबकि हम पिछले वर्ष तक इन्हीं देशों से नारियल तेल का आयात कर रहे थे। दुनिया में भारत नारियल उत्पादन में पहले स्थान पर आ गया है। नारियल 1.97 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्रफल एवं 20,439 बिलियन नट उत्पादन है। नारियल विकास बोर्ड के पुनर्रोपण और क्षेत्र की कार्यकलापो में 33ऽ वृद्धि हुई। राष्ट्रीय आपदा अनुक्रिया कोष से 24556 करोड़ दिये गये।
नए किस्मों के बीजो की उपलब्धता के लिए आईसीएआर संस्थान, राज्य कृषि विश्वविद्यालय एवं कृषि विज्ञान केन्द्रो पर बीज हब का सृजन किया जा रहा है। इसके लिए वर्ष 2016-17 से 2017-18 के दौरान रू. 225.31 करोड़ के साथ 150 बीज केन्द्रो की स्थापना की गयी जिसमे रू. 131.74 करोड़ 2016-17 के लिए प्रस्तावित है। इससे कुल 1.50 लाख किवटल उन्नत बीजो की उपलब्धता सुनिश्चित होगी। वर्ष 2016-17 के लिए दालों का उत्पादन लक्ष्य 20.75 मिलियन मैट्रिक टन है। वर्ष 2016-17 में खरीफ दालों के 7.25 मिलियन टन के उत्पादन के लक्ष्य की आशा है। 01.01.2017
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दलहन उत्पाद बढ़ाने के लिए 'बोनस" की रणनीति
केन्द्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री राधा मोहन सिंह ने कहा है कि देश में पहली बार किसानों के लिए समर्थन मूल्यों पर दलहन फसलों की बिक्री सुनिश्चित करवाने की व्यवस्था की गई है।इस व्यवस्था के तहत जहां भी दलहन फसलों का बाजार भाव समर्थन मूल्य से कम होगा, वहाँ भारत सरकार की संस्थाएं किसानों से समर्थन मूल्य पर खरीद सुनिश्चित करेंगीं। इसके अतिरिक्त दालों का 20 लाख टन बफर स्टाक बनाए रखने का निर्णय भी लिया गया है, ताकि लोगों को दाल के मंहगे बाजार भाव से छुटकारा दिलाया जा सके। राधा मोहन सिंह ने आगरा में आयोजित अंतरराष्ट्रीय दलहन वर्ष 2016 के समापन समारोह में कही। विश्व में खाद्य एवं पोषण सुरक्षा की प्राप्ति एवं दालों के पोषण संबंधी लाभों के बारे में जन मानस में जागरूकता बढाने के उददेश्य से संयुक्त राष्ट्र महासभा ने वर्ष 2016 को अंतर्राष्ट्रीय दलहन वर्ष के रूप में मनाने की घोषणा की थी।
केन्द्रीय कृषि मंत्री ने कहा कि देश के किसानों को दलहन उत्पादन के लिए बढ़ावा देने के लिए वर्ष 2016-17 में दालों के न्यूनतम समर्थक मूल्य में सरकार ने उल्लेखनीय वृद्धि की है। सरकार ने वर्ष 2016-17 में अरहर के लिए 4625 रूपए तथा उरद के लिए 4575 रूपए व मूंग के लिए 4500 रूपए प्रति कुन्तल का न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा की है, जो अब तक का अधिकतम समर्थन मूल्य है। न्यूनतम समर्थन मूल्य के साथ-साथ दलहन उत्पादन के लिए 425 रूपए प्रति कुन्टल की दर से सरकार द्वारा अतिरिक्त बोनस भी तय किया गया है। सिंह ने कहा कि देश में दलहनी फसलों के उत्पादन और उत्पादकता में बढ़ोत्तरी के लिए कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय ने अंतर्राष्ट्रीय दलहन वर्ष 2016 में कई कदम उठाए।
इसके तहत कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय के दो विभाग- भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद और कृषि सहकारिता और किसान कल्याण विभाग ने वर्ष 2016-17 से राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन परियोजना के तहत एक व्यापक कार्य-योजना का संयुक्त रूप से क्रियान्वयन किया। इस कार्य-योजना के अंतर्गत वर्ष 2016-17 में 200 लाख टन, वर्ष 2017-18 में 210 लाख टन और वर्ष 2020-21 में 240 लाख टन उत्पादन का लक्ष्य निर्धारित किया है। सिंह ने बताया कि भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान, कानपुर के साथ 10 कृषि विश्वविद्यालयों के क्षेत्रीय केन्द्रों पर 20.39 करोड़ रू. की लागत के साथ अतिरिक्त “प्रजनक बीज” उत्पादन कार्यक्रम प्रारंभ किया गया है। इन केंद्रों द्वारा वर्ष 2016-17 के अंत तक 3717 कुन्तल अतिरिक्त प्रजनक बीज तथा वर्ष 2018-19 के अंत तक इन केन्द्रों द्वारा वर्तमान में किए जा रहे 7561 कुन्तल प्रजनक बीज के अतिरिक्त 5801 कुन्तल अतिरिक्त प्रजनक बीज उत्पादन का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
केन्द्रीय कृषि मंत्री ने कहा कि दलहनी फसलों के औपचारिक बीज तंत्र को मजबूत करने और देश में उन्नत प्रजातियों के बीजों की उपलब्धता बढाने के लिए यह कदम उठाया गया है। सिंह ने कहा कि देश के प्रमुख दलहन उत्पादक राज्यों के राज्य कृषि विश्वविद्यालयों, परिषद के संस्थानों व कृषि वैज्ञानिक केन्द्रों में ‘’दलहन सीड-हब’’ की स्थापना की जा रही है। दलहन के गुणवत्तायुक्त बीजों की उपलब्धता बढ़ाने के लिए वर्ष 2016-17 से तक कुल 150 ‘’दलहन सीड-हब’’ स्थापित करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। जिसके लिए 225.31 करोड़ रूपए का प्रावधान किया गया है। इस परियोजना के अन्तगर्त प्रति वर्ष 1.50 लाख कुन्तल अतिरिक्त बीज उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है। प्रत्येक ‘’दलहन सीड-हब’’ वर्ष 2018-19 के अंत तक दलहनी फसलों का न्यूनतम 1000 कुन्तल गुणवत्तायुक्त बीजों का प्रति वर्ष उत्पादन तथा आपूर्ति करेगा। 22.12.2016
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बिहार के 362698 किसानों के लिए 427.56 करोड़ की बीमा राशि
बिहार में राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना के तहत रबी 2014-15 मौसम में गेंहू, मक्का, मसूर, एवं आलू फसलों के लिए राज्य के 18 जिलों – औरंगाबाद, भभुआ, भोजपुर, बक्सर, दरभंगा, पूर्वी चंपारण, गोपालगंज, खगड़िया, लखीसराय, नालंदा, पटना, पुर्णिया, सारण, शिवहर, सीतामढ़ी, सिवान, सुपौल, वैशाली के 362698 लाभान्वित ऋणी किसानों के लिए 427.56 करोड़ की बीमा राशि उपलब्ध कराने के लिए एग्रीकल्चर इंश्योरेंस कम्पनी को निर्देश दिये हैं।
भारत सरकार बिहार में रबी 2014-15 में देय बीमा दावों के केन्द्रांश पहले ही एग्रीकल्चर इंश्योरेंस कम्पनी को निर्गत कर चुके है । जिसमें से लगभग.173 करोड़ दावों के भुगतान में कंपनी द्धारा उपयोग किया जायेगा। राशि 98 नोडल बैंक शाखाओं द्धारा एक सप्ताह में सभी लाभान्वित किसानों के बैंक खातों में स्थानान्तरण कर दिया जायेगा। राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना, एग्रीकल्चर इंश्योरेंस कम्पनी द्धारा चना, मसूर, मक्का, प्याज, सरसों, तोडी, अरहर, गन्ना, गेंहूँ के लिए कुल 882731 किसानों के लिए लगभग 762 करोड़ रुपये के बीमा दावों की गणना की गई है । 21.12.2016
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रबी फसलों का बुवाई रकबा बढ़ा
देश में रबी फसलों का कुल बुवाई रकबा 519.27 लाख हेक्टेयर आंका गया है,
जबकि पिछले वर्ष इसी समय यह रकबा 490.48 लाख हेक्टेयर था। गेहूं की बुवाई 256.19 लाख हेक्टेयर में, चावल 8.44 हेक्टेयर में, दलहन 131.80 लाख हेक्टेयर में, मोटे अनाज 48.53 लाख हेक्टेयर में और तिलहन की बुवाई 74.31 लाख हेक्टेयर में हुई है।
प्रकाशन तिथि 16.12.2016
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उत्पा्दकता, खाद्य सुरक्षा एवं जैविक कृषि को बढ़ावा : राधा मोहन
केन्द्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री, राधा मोहन सिंह ने कहा कि जैविक कृषि की महत्व को ध्यान में रखते हुए, सरकार सतत उत्पा्दकता, खाद्य सुरक्षा एवं मृदा स्वास्थ्य पर जोर देने के साथ जैविक कृषि को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध है।
उन्होंने यह बात जैविक खेती पर आयोजित कृषि मेले में कही। कृषि मंत्री ने कृषि मेले में जैविक खेती पर आयोजित वर्कशॉप में कहा कि भारत सरकार ने जैविक कृषि को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन के अंतर्गत परंपरागत कृषि विकास योजना (पीकेवीवाई) और पूर्वोत्तर क्षेत्रों के लिए जैविक मूल्यर श्रंखला विकास (ओवीसीडीएनईआर) योजनाओं का प्रारंभ किया है। सिंह ने कहा कि परंपरागत कृषि विकास योजना (पीकेवीवाई) पहली व्यापक योजना है जिसका कार्यान्वयन प्रति 20 हैक्टेयर के कलस्टर आधार पर राज्य सरकारों द्वारा किया जाता है।
कलस्टर के अंतर्गत किसानों को अधिकतम 1 हैक्टेयर तक की वित्तीय सहायता दी जाती है और सहायता की सीमा 3 वर्षों के रूपांतरण की अवधि के दौरान प्रति हेक्टेयर 50,000 रूपये है। 2 लाख हेक्टेयर क्षेत्र कवर करते हुए 10,000 कलस्टरों को बढ़ावा देने का लक्ष्य है। कृषि मंत्री ने कहा कि पीकेवीआई स्कीम के अधीन 29 राज्यों और 1 संघ राज्य क्षेत्र की वार्षिक कार्य योजना 7186 कलस्टर विकसित करने के लिए कुल 511.76 करोड़ रू. के कुल परिव्यय के साथ अनुमोदित किया गया है जिसमें से वर्ष 2015-16 के दौरान राज्यो को 226.00 करोड़ रू. निर्मुक्त किए गए। 2016-17 के दौरान उपयोग में लाये जाने के लिए 2814 कलस्टरों के निर्माण के लिए 10,000 कलस्टरों के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए केंद्रीय प्रोयोजित स्कीम के रूप में परम्परागत कृषि विकास योजना (पीकेवीवाई) हेतु वर्ष 2016-17 के लिए 297 रू. की राशि आवंटित की गई।
सिंह ने कहा कि पीकेवीवाई के तहत व्रर्ष 2015-16 में केन्द्र ने उत्तर प्रदेश को रु 2052.20 करोड़ की राशि दी लेकिन इसमें से खर्च सिर्फ रु 1075.692 करोड़ ही हुआ। वर्ष 2016-17 में केन्द्र अब तक इस मद में उत्तर प्रदेश को रु. 1270.64 करोड़ दे चुका है। कृषि मंत्री ने कहा कि पंडित दीन दयाल उन्नत कृषि शिक्षा योजना के तहत उत्तर प्रदेश में 23 प्रशिक्षण केन्द्रों की स्थापना की जानी है। सिंह ने बताया कि जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्रालय और कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के बीच हाल में एक समझौता हुआ है जिसके तहत उत्तराखंड में गंगा की धारा से लेकर पश्चिम बंगाल तक 1657 ग्राम पंचायतों में नमामि गंगे परियोजना के तहत परंपरागत कृषि विकास योजना के अंतर्गत 1657 कलस्टर में जैविक खेती विकसित की जाएगी। प्रकाशन तिथि 15.12.2016
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जलवायु परिवर्तन एक गम्भीर चुनौती, खाद्यान्न में चालीस प्रतिशत की हानि : राधा मोहन सिंह
केन्द्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री राधा मोहन सिंह ने कहा कृषि एवं किसान कल्याण के लिए जलवायु परिवर्तन बेहद खतरनाक है। वह “परिवर्तनशील जलवायु के तहत एक चुनौती के रूप में उभर रहे जैविक दबाव” विषयक कार्यशाला में बोल रहे थे ।
सिंह ने कहा कि जैविक दवाब का अर्थ है ऐसे रोग, कीट- नाशीजीव और खरपतवार जो की जीवों (पौधे पशु और मनुष्य) के सामान्य विकास को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करते है। जैविक दबाव के लिए परपोषी, नाशीजीव औऱ पर्यावरण के बीच हितकारी पारस्परिक संपर्क की आवश्यकता होती है। इस प्रकार के प्रतिबलो से महामारी के वर्ष में 100 प्रतिशत तक की हानि हो सकती है और इसका कटु उदाहरण 1943 में चावल में भूरा धब्बा (हैलमिनथोस्पोरियम ओरिजिए) की महामारी थी, जिसके कारण पश्चिम बंगाल, बिहार और उड़ीशा में भीषण आकाल पड़ा क्ष् इस ऐतिहासिक नुकसान से लगभग 40 लाख लोगो की भूख के कारण मृत्यु हुई क्ष् नाशीजीव और रोगजनक उभरते रहते है क्ष् यदि पर्यावरण अनुकूल हो सकता है तो उनके उदभव की दर में तेजी आती है। इस प्रकार पर्यावरण में परिवर्तन, रोगजनकों की नई प्रजातियों के उदभव का मुख्य कारण है क्ष् गौण रोग या कीटनाशीजीव मुख्य जैविक प्रतिबल बन जाते है। जलवायु परिवर्तन के लिए उत्तरदायी एक ग्रीनहाउस गैस तथा कार्बनडाइऑक्साइड, पतियो में सरल शर्करा के स्तरों को बढ़ा सकती है क्ष् नाइट्रोजन की मात्रा कम कर सकती है। ये अनेक कीटो द्वारा होने वाले नुक्सान को बड़ा सकती है जो नाइट्रोजेन की अपनी मेटाबोलिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अधिक पतियो को खायेगे। इस प्रकार कोई भी आक्रमण अधिक संक्रामक होगा। मुख्य रूप से कार्बनडाइऑक्साइड के कारण होने वाले वैश्विक उष्मण से उच्चतर तापमान का अर्थ है कि सर्दी के मौसम में अधिक सख्या में नाशीजीव जीवित रहेगे। जबकि ऐसा स्पस्ट संकेत है कि जलवायु परिवर्तन के कारण पशु और पौधों, नाशीजीव और रोगों के वितरण में परिवर्तन हो रहा है क्ष् इसके पुरे प्रभावो का अनुमान लगाना कठिन है। कृषि मंत्री ने कहा की तापमान, नमी और वायुमंडलीय गैसों में परिवर्तन से पोधो, फफूंद और कीटो की वृद्धि और प्रजनन दर बढ़ सकती है जिससे नाशजीवो उनके प्राकृतिक शत्रुओं और परपोषी के बीच पारस्परिक सम्पर्क में परिवर्तन होता है। भूमि कवर में परिवर्तन जैसे कि वनकटाई या मरुस्थल से बाकी बचे पौधे और पशु नाशीजीवों और रोगों के प्रति और अधिक संवेदनसील हो जायेगे। यदपि नए नाशीजीव और रोग पुरे इतिहास में नियमित रूप से उभरते रहे है, जलवायु परिवर्तन से इस समीकरण में अज्ञात नाशिजीवों की संख्या बढ़ जाती है। पोधो के नाशीजीव, निरंतर खाद्य और कृषि उत्पादन के लिए सबसे बड़ी बाधाओं में से एक बने हुए है। इनके कारण विश्व की खाद्य आपूर्ति में औसतन 40 प्रतिशत से भी अधिक की वार्षिक हानि होती है, और जिससे खाद्य सुरक्षा के लिए एक गंभीर खतरा उत्पन्न हो रहा है। जलवायु परिवर्तन आधारित प्रभाव से या तो नए जैविक दबाबो का उद्गमन हुआ, प्रमुख चुनौती के रूप में छोटे दबाबो में परिवर्तन हुआ या किसी अन्य देश में आक्रमणकारी नाशजीवो का बस्तीकरण व पदार्पण हुआ। जलवायु परिवर्तन से गेहू में तना रतुवे के यूजी 99 के विरुद्ध प्रतिरोधिता को निगमित करने वाली एसआर जीनो की श्रृंखला के टिकाऊपन के प्रति गंभीर चुनौती प्रस्तुत हो रही है। बड़े हुए तापमान और कार्बनडाइऑक्साइड ने गेहू के ब्लास्ट के पर्यानुकूलन के विरुद्ध, आलू की पछेती अंगमारी के उग्र पृथको, चावल के महत्वपूर्ण रोग नामतः ब्लास्ट और शीथ ब्लाइट जैसे खतरे उत्पन किये है क्ष् देश ने हाल ही में विनाशकारी नाशीजीवों और रोगों जैसे टमाटर पर साउथ अमेरिकन पिनवॉर्म, फूल पर वेस्टर्न फ्लावर थ्रिप्स, केले पर फ्यूजोरियम मुरझान, नारियल में सफेद मक्खी का बढ़ता प्रकोप आदि का अनुकूलन और उदभव देखा है। तापमान और आद्रता स्तरों में परिवर्तन के साथ इन कीटो की संख्या में उनके भैगोलिक क्षेत्र में वृद्धि हो सकती है क्ष् पशुओ और मनुष्य को ऐसे रोगों का इस प्रकार से सामना करना पड़ सकता है जिनके लिए उनके पास कोई प्राकृतिक प्रतिरक्षा नही है।
सूखे में बढ़ोतरी का परिणाम जल निकायों में कमी के रूप में सामने आ सकता है जो इसके बदले पालतू पशुधन एवं वन्य जीवन के बीच अधिक परस्पर सम्पर्को को सुगम बनाएगा और इसका परिणाम असाध्य "केटाहैरल बुखार" के प्रकोप के रूप में हो सकता है जो पशुओ की एक घातक बीमारी है क्योकि सभी जंगली पशु बुखार के विषाणु के वाहक होते है। मछलिया विशेष रूप से उभरती जलवायु-परिवर्तन के प्रति सवेदनशील होती है क्योकि उनकी परिस्थितिक प्रणाली बहुत निर्बल होती है और जल एक प्रभावी रोग वाहक है। पिछले कुछ वर्षो में भारत में पादप सुरक्षा विजयन और जैव –सुरक्षा जागरूकता में उल्लेखनीय रूप से प्रगति हुई है क्ष् हाल ही में भारत ने अनेक ऐसी आकस्मिकताओं का प्रभावकारी रूप से प्रबंधन किया है जिनसे राष्टीय आपदाएं हो सकती थी क्ष् अफ्रीका में तना रतुवे की प्रजाति यूजी 99 के उभरने के कारण भारतीय गेहूं को किसी भी प्रकार के जैव सुरक्षा खतरे कि संभावनाओं से दूर रखने के लिए भारत ने कीनिया में रोगजनक के विरूद्ध अपनी किस्मों कि स्क्रीनिंग करने में समय से पहले सक्रियता से कार्य किया इसके परिणामस्वरुप हमारे पास देश में लगाई गई अनेक यूजी 99 प्रतिरोधी किस्में हैं और हमने किसी भी महामारी के होने से रोका है क्ष् वर्ष 2015-16 के दौरान बांग्लादेश में गेहूं के ब्लास्ट रोग द्वारा नष्ट किये जाने के तुरंत बाद भारत ने दक्षिण अमेरिकी देशों में जहाँ कि यह रोग मौजूद है, गेहूं के ब्लास्ट रोग के विरूद्ध स्क्रीनिंग के लिए सिमिट संस्था को गेहूं के 40 जीन प्रारूप भेजे क्ष् घरेलू स्तर पर, डेयर -भाकृअप, डीएसी, राज्य कृषि विश्वविद्यालय और राज्य कृषि विभाग जैविक दबावों के कारण होने वाले नुकसानों से बचाने के लिए सुरक्षा तकनीकियों को कार्यान्वित करने में लगे हुए है क्ष् एनपीपीओ के सक्रीय प्रयासों के परिणामस्वरूप 2016-17 के दौरान श्वेत मक्खी के कारण कपास में होने वाले आसन्न नुकसानों का प्रभावकारी रूप से प्रबंधन किया जा सका जिसके परिणामस्वरूप उत्तर भारत में कपास का उत्पादन पिछले तीन वर्षों कि उपज से अधिक होने कि संभावना है क्ष् उचित जैव सुरक्षा और जैव प्रदूषक उपायों को अपनाने से देश में एवियन इन्फ्लुएंजा के आक्रामक एच5एन8 विभेद के हाल ही में हुए प्रकोप का प्रभावकारी रूप से प्रबंधन किया जा सका क्ष् परिवर्तनशील जैविक प्रतिबल परिदृश्य ने ऐसे मॉडलों पर भविष्य में अध्यन करने की आवश्यकता को रेखाकिंत किया है जोकि खेत की वास्तविक परिस्थितियों में मुख्य फसलों, पशुओं और मछलियों क्र रोगजनकों कि गंभीरता का अनुमान लगा सकें इसके साथ ही साथ बदल रही परिस्थितियों में टिकाऊ खाद्य उत्पादन के लिए नयी कार्यनीतियों को मिलते हुए रोग प्रबंधन कार्यनीतियों का पुनः अभिविन्यास किया जाना चाहिए।
केन्द्रीय कृषि मंत्री ने कहा कि कृषि जैव सुरक्षा को मजबूत बनाने के लिए तथा जैविक दवाबो के दक्ष प्रबन्धन को सुनुश्चित करने के लिए कुछ तत्काल क्षेत्र और कार्यनीतियों जो कि:- देशी के साथ ही साथ जंगली संसाधनों का प्रयोग करते हुए जैविक दबाव प्रतिरोधी फसलो और पशुओ की नस्लो का विकास। जैविक प्रतिबल अनुकूल जीवो के विकास की प्रक्रिया को तेज करने में लिए एमएएस, पराजीनी और जीन एडिटिंग तकनीकियों जैसे उपकरणों और आधुनिक तकनीकियों का प्रयोग बढ़ाना। संक्रमित उत्पादों को नाशीजीव मुकत क्षेत्रों/ देशों में जाने से रोकने के लिए देशी और अर्न्तराष्ट्रीय संगरोधों को मजबूत बनाना। आईपीएम एप्रोचों को आयोजित करना और जैव नियंत्रक एजेंटों की डिलीवरी की प्रभावकारी प्रणाली को मजबूत बनाना तथा प्रभावकारी नाशक जीवनाशियों के लेबल का प्रसार करना। जैव सुरक्षा से संबंधित मुद्दों पर क्षेत्रीय और वैश्विक सहयोग को विकसित करना। आक्रमण और आक्रमणकरी नाशीजीवों /रोगजनकों के प्रसार की निगरानी के लिए तथा टीकाकरण के लिए निदानकरी उपकरणों/टीकों की उपलब्धता को सुनिश्चित करने के लिए वैश्विक नेटवर्किंग। राधा मोहन सिंह ने अधिकारियों को कीट नियंत्रण, कीटनाशकों आदि पर अनुसंधान में तेजी लाने और सदस्यों द्वारा इस मुद्दे पर दिए गए सुझावों को शामिल करने का निर्देश दिया है







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