बालाकोट : सदियों का युद्ध क्षेत्र
बालाकोट को आंतक एवं यौद्धिक फैक्ट्री कहा जाये तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। बालाकोट भले ही अभी अचानक दुनिया के सामने आतंकी हलचल के लिए दिखा हो लेकिन बालाकोट का इतिहास आतंक एवं युद्ध से भरा हुआ है।
बालाकोट में मारकाट, युद्ध एवं आतंक का इतिहास 200 वर्षों से भी अधिक पुराना है। भारत-पाकिस्तान के विभाजन से पहले भी इसे इस्लामिक साम्राज्य बनाने की कोशिशें की गयीं थीं।
उत्तर प्रदेश के रायबरेली के सैयद अहमद ने बालाकोट को अति सुरक्षित मान कर इस्लामिक साम्राज्य की स्थापना के लिए चुना था। सैयद अहमद ने खास तौर से अपने नाम में बरेलवी उपनाम जोड़ा था। सैयद अहमद की मंशा थी कि बरेलवी इस्लामिक साम्राज्य की स्थापना की जाए। उस समय हालात यह थे उपमहाद्वीप में कहीं मराठाओं का शासन था तो कहीं जाट एवं सिखों की हुकूूमत थी।
सैयद अहमद ने 46 वर्ष की उम्र में बालाकोट को इस्लामिक साम्राज्य बनाने की कोशिश की। सैयद की उम्मीद थी कि बालाकोट के आसपास की मुस्लिम आबादी एवं अफगानियों से इस्लामिक साम्राज्य बनाने में सहायता मिलेगी लेकिन उसके मंसूबे पूरे नहीं हो सके। सैयद अहमद के साथ शाह इस्माइल भी था। इस्लामिक साम्राज्य की स्थापना में इसे आधुनिक इतिहास का पहला जिहाद माना गया। यह 1786 से 1831 का मुकाम था।
बालाकोट को इतिहास के हर पन्ने में केवल खून-खराबा के लिए ही जाना गया। भले ही बालाकोट पर चौतरफा पर्वतीय सौन्दर्य आच्छादित हो लेकिन बालाकोट हमेशा युद्ध के लिए ही जाना गया। कभी राष्ट्रप्रेम के लिए बालाकोट में युद्ध हुआ तो कभी आंतकवाद की पनाहगाह बना। बालाकोट एक बार फिर तीन सौ कब्रागाहों का गवाह बना लेकिन इतिहास की मानें तो बालाकोट पर यह आंकड़ा 3000 से भी पार है।
पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा का हिस्सा बालाकोट कभी भी शांत नहीं रहा। इसे इंसानियत के लिए दुर्भाग्य व विसंगति ही कहा जाएगा कि प्राकृतिक सौन्दर्य से लबरेज बालाकोट रणक्षेत्र के लिए जाना गया। बालाकोट में चौतरफा मखमली घास से लदे-भरे मैदान, सीना ताने खड़े हिम शिखर, घाटियों-वादियों का अद्भुत सौन्दर्य, झीलों-झरनों एवं नदियों की विशिष्टता बेहद दर्शनीय है।
खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के जिला मानसेहरा के इस शहर ने युद्ध के साथ कई झंझावात देखे हैं। कागान घाटी पर कुनहार नदी के किनारे बसा यह शहर बालाकोट 2005 में पूरी तरह से भूकम्प के कारण नेस्तानाबूद हो गया था। वो तो पाकिस्तान को खैर मनाना चाहिए कि सऊदी अरब की आर्थिक सहायता से बालाकोट शहर एक बार फिर खड़ा हो सका।
वस्तुत: बालाकोट एक पर्वतीय क्षेत्र है। इस घाटी में ही बालाकोट शहर बसा है। बालाकोट पर कट्टरपंथियों का दबाव-प्रभाव हमेशा दिखता रहा। बालाकोट कभी तालिबानी आतंकियों का गढ़ रहा तो कभी वहाबी विचारधारा का प्रभुत्व दिखा। ब्रिाटिश हुकूमत रही हो या फिर बालाकोट पर चढ़ाई का दौर रहा हो। खास यह कि 18वीं एवं 19वीं शताब्दी बालाकोट का सबसे रक्तरंजित इतिहास रहा। वर्ष 1831 की बात है। महाराजा रणजीत सिंह लाहौर के शासक थे।
राजा हरि सिंह कश्मीर-खैबर पख्तून के गवर्नर थे। बालाकोट पर कब्जा करने को लेकर जबर्दस्त युद्ध हुआ। बड़ी तादाद में रक्त बहा। इस भीषण युद्ध में महाराजा रणजीत सिंह की सिख फौज जीत गई। खास यह कि बालाकोट को राजा-महाराजा एवं शंहशाह इस लिए भी पसंद करते थे, क्योंकि सुरम्य एवं शांत इलाका होने के साथ ही पर्वतीय इलाका है। पर्वत पर होने के कारण बालाकोट पर चढ़ाई करना किसी भी शत्रु के लिए आसान नहीं होता था।
वर्ष 1947 के बाद भी बालाकोट का इलाका हिन्दू एवं सिख बाहुल्य था। इनमें अधिसंख्य खत्री थे। विभाजन में हिन्दुओं एवं सिखों ने बालाकोट में ही रहने का फैसला किया था। शनै-शनै बालाकोट की तस्वीर एक बार फिर बदलती गयी। तीन दशक पूर्व से इस इलाके ने खास तौर से बालाकोट ने आतंक प्रशिक्षण शिविर की शक्ल अख्तियार कर ली। बेहद आश्चर्यजनक है कि बालाकोट में सदियों से आंतक की फैक्ट्री चल रही हो आैर पाकिस्तान को खबर तक न हो।
विशेषज्ञों की मानें तो कई दस्तावेजों में वैश्विक स्तर पर संकेत मिले कि बालाकोट आतंक प्रशिक्षण शिविर के तौर पर कार्य कर रहा है। इन प्रशिक्षित आतंकवादियों का लक्ष्य अमेरिका, भारत सहित दुनिया के कई देश शामिल रहे। जैश-ए-मोहम्मद जैसे आंतकी संगठन का यह मुख्य अड्डा था। बालाकोट ने किसी फाइव स्टार होटल से भी अधिक शान-ए-शौकत एवं अत्याधुनिक सुविधाओं वाला केन्द्र बन गया था। बालाकोट की यौद्धिक श्रंखला में एक बार फिर करारा-गहरा धब्बा लगा।
हालांकि यदि पाकिस्तान सरकार इस क्षेत्र को पर्यटन की दृष्टि से विकसित या प्रचारित करती तो शायद यह उसकी आर्थिक व्यवस्था को कहीं न कहीं सुद्रढ़ करता। आतंकी क्रियाकलाप ने तो बालाकोट के प्राकृतिक सौन्दर्य को ग्रहण लगाया। साथ ही पाकिस्तान की छवि पर एक बदनुमा दाग भी लगाया।
विकास की दृष्टि से सोचें तो दुनिया का कोई भी देश ऐसा नहीं होगा, जो विकास न चाहता हो। फिर पाकिस्तान ने बालाकोट को पर्यटन की दृष्टि से विकास के बारे में क्यों नहीं सोचा। दुुनिया के सामने यह एक विचारणीय प्रश्न है। हकीकत यह है कि बालाकोट को 1990 से एक बार फिर आतंकियों ने अपना गढ़ बना लिया गया था।
पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद से सटा हुआ इलाका होने के बावजूद पाक सरकार-हुक्मरानों को आतंक प्रशिक्षण शिविर होने के खबर न हो.... यह विश्वास योग्य नहीं। हकीकत तो यह रही कि सरकारी मशीनरी की छांव तले आतंक की फैक्ट्री धड़धड़ाते हुए चल रही थी। अब यह भी देखें कि आतंक की फैक्ट्री के लिए यही स्थान बालाकोट को ही क्यों चुना गया।
बालाकोट कश्मीर से करीब 45 किलोमीटर दूूर है। लिहाजा भारत की सीमा में प्रवेश के लिए आतंकियों को कोई खास मशक्कत नहीं करनी पड़ती थी। बालाकोट वस्तुत: पाक प्रशिक्षित आतंकवादियों का लांचिंग पैड बन चुका था।
भारत-पाक विभाजन के बाद जिया उल हक के शासनकाल से ही बालाकोट आतंकी संगठनों का गढ़ बन चुका था। बालाकोट आतंक की हर गतिविधि के लिए बेहद मुफीद है। घना जंगल होने के कारण हथियारों का प्रशिक्षण देने में बेहद आसानी होती है। हथियार प्रशिक्षण का यह बेस कैम्प माना जाता है।
