Friday, 26 October 2018

अब डाक्टर नहीं, संगीत से करें इलाज !

   संगीत की ताकत को पहचानें। जी हां, संगीत की अपार क्षमताओं को समय के साथ जानना-पहचानना आवश्यक है। 

   अब डाक्टर नहीं, संगीत से करें इलाज! जी हां, कम से कम शोध एवं अध्ययन तो इसी तरफ इशारा कर रहे हैं। गुजरे जमानें को देखें तो लोरी सुन कर बच्चे सो जाते थे। विदेशों में गर्भवती महिलाओं को सॉफ्ट म्यूजिक सुनने की हिदायत दी जाती है, ताकि कोख में भी बच्चे को आराम मिल सके।
  . संगीत के इस असर को अब समय से पहले जन्मे बच्चों के इलाज में भी इस्तेमाल किया जा रहा है। खबर है कि ज्यूरिख की यूनिवर्सिटी में तय समय से तीन महीने पहले पैदा हुई एक बच्ची मथिल्डा पर रिसर्च चल रही हैं।
   रिसर्चर जानना चाहते हैं कि क्या संगीत उसके विकास में मदद कर सकता है. हफ्ते में तीन बार फ्रीडरिके हास्लेबेक मथिल्डा के कान में गुनगुनाती हैं. वह जानना चाहती हैं कि क्या समय से पहले जन्मे बच्चों के दिमाग के विकास पर संगीत का असर सकारात्मक होता है।
   खबर है कि फ्रीडरिके हास्लेबेक रिसर्च के बारे में बताती हैं, "हमारी थ्योरी बहुत से अध्ययनों पर आधारित हैं जो दिखाते हैं कि संगीत कैसे हमारे मस्तिष्क के कई हिस्सों को एक साथ उत्तेजित करता है। इसे म्यूजिकल लर्निंग कहा जाता है जो जन्म से पहले ही शुरू हो जाती है। इसलिए प्रीमैच्योर बच्चों पर इसका असर होना चाहिए।
    खबर है कि जब फ्रीडरिके गुनगुनाती हैं तो दिखता है कि इससे बच्ची को सुकून मिलता है, वह हाथ उठाती है, और आंखें खोलती है। खबर है कि रिसर्चर अपनी थ्योरी को 60 बच्चों पर परख रहे हैं। 30 बच्चों के साथ म्यूजिक थेरेपी और 30 बच्चों के साथ बिना म्यूजिक वाली थेरेपी।
    खबर है कि एक और बच्चे के सामने भी फ्रीडरिके हास्लेबेक नियमित रूप से गाती और गुनगुनाती हैं। एमआरटी स्कैन से रिसर्चर देख सकते हैं कि समय से पहले जन्मे बच्चे के मस्तिष्क का विकास कैसे हो रहा है। शुरुआती नतीजे दिखाते हैं कि शिशुओं के मस्तिष्क विकास पर संगीत का असर होता है, लेकिन यह काम कैसे करता है? न्यूरोसाइंटिस्ट लुत्स यैंके बीते 25 साल से इस विषय पर काम कर रहे हैं। वह बताते हैं, "मेरी दिलचस्पी इसमें है कि समय के साथ मस्तिष्क की गतिविधि इतनी तेजी से कैसे विकसित होती है और किस हद तक संगीत को लेकर हमारा निजी अनुभव इस गतिविधि को बदल देता है। उम्मीद है हमें कुछ ऐसी जानकारियां मिलेंगी जो आगे चल कर बीमारियों के इलाज में काम आएंगी."।
   खबर है कि रिसर्च के दौरान दिमाग में चलने वाली गतिविधि को मॉनी़टर पर देखा जा सकता है। साउंड प्रूफ कैबिन में एक महिला को संगीतकार विवाल्दी की धुन फोर सीजंस सुनाई गई। इस धुन को सुनकर लुत्स यैंके को बॉस्टन में गुजारे अपने पतझड़ के दिन याद आ गए। जंगल में लंबी सैर पर उन्हें यह धुन सुननी पसंद है। वह देखना चाहते हैं कि जिन लोगों का इस धुन के साथ भावनात्मक रिश्ता नहीं है, उन पर यह कैसा असर करती है।
    खबर है कि रिकॉर्ड किए गए इलेक्ट्रिक सिग्नल के आधार पर यैंके मॉनीटर में मस्तिष्क की गतिविधि को देख सकते हैं। खबर है कि यैंके ने बताया, "अगर मैं इसकी तुलना अपने दिमाग की गतिविधि से करूं तो कुछ समानताएं हैं, लेकिन कुछ अंतर भी हैं। मिसाल के तौर पर, दोनों ही मामलों में न सिर्फ ऑडिटोरी कॉरटेक्स यानी श्रवण संबंधी हिस्से सक्रिय हैं, बल्कि वे हिस्से भी सक्रिय हैं जिनकी आम तौर पर ध्वनि को समझने में भूमिका नहीं होती, लेकिन मेरे मामले में यह ज्यादा स्पष्ट है."।
   संगीत सुनने का हमारे दिमाग पर स्पष्ट असर होता है तो फिर संगीत बजाने का क्या असर होगा। यैंके संगीतकारों पर किए अपने एक शोध में इसका सवाल का जवाब तलाश चुके हैं और उन्होंने पाया कि साज बजाने से हमारी जानने समझने की क्षमता बेहतर होती है।

Sunday, 14 October 2018

यहां सिर्फ महिलाएं ही भर सकती हैं कश

   बर्लिन में सिर्फ महिलाओं को आजादी हासिल है! जी हां, चौकिए मत। जर्मनी की राजधानी बर्लिन का एक रेस्टोरेंट- हुक्का बार ऐसा है, जहां सिर्फ महिलाओं को ही प्रवेश मिलता है।

    पुरुषों का प्रवेश प्रतिबंधित है। सख्ती भी गजब की है। क्या मजाल कि कोई पुरुष यहां पा जाए। इस रेस्टोरेंट- हुक्का बार के मालिक को भी प्रवेश की इजाजत नहीं है।
   जर्मनी की राजधानी बर्लिन में एक हुक्का बार ऐसा भी है, जहां पुरुषों की एंट्री ही बैन है।
   इस हुक्का बार में सिर्फ महिलाओं को कश लगाने की इजाजत है। नियम इतना कड़ा है कि बार मालिक भी अंदर नहीं जाता। पूरा मैनेजमेंट बाहर से वॉकी-टॉकी पर संभाला जाता है।

Tuesday, 9 October 2018

बड़ा खतरनाक यह प्लास्टिक कचरा

   विशेषज्ञों की मानें तो पांच मिलीमीटर से कम परिधि वाले प्लास्टिक के कणों को माइक्रोप्लास्टिक कहा जाता है। 

  खबर है कि प्लास्टिक के ये बारीक कण हर जगह मौजूद हैं। सुबह सुबह टूथपेस्ट के साथ ही माइक्रोप्लास्टिक सीधे इंसान के मुंह में पहुंचता है।
   विशेषज्ञों की मानें तो कॉस्मेटिक्स में.... मेकअप के सामान, क्रीम, क्लीनजिंग मिल्क और टोनर में भी माइक्रोप्लास्टिक मौजूद होता है। घर के सीवेज सिस्टम से बहता हुआ यह माइक्रोप्लास्टिक नदियों और सागरों तक पहुंचता है। 
   विशेषज्ञों की मानें तो मछलियों में....पानी में घुला माइक्रोप्लास्टिक मछलियों के पेट तक पहुंचता है। मछलियों के साथ ही दूसरे सी खाने में भी माइक्रोप्लास्टिक मिल रहा है। खबर है कि 2017 की एक रिपोर्ट के मुताबिक इंडोनेशिया और कैलिफोर्निया की 25 फीसदी समुद्री मछलियों में प्लास्टिक मिला। आहार चक्र के जरिए यह इंसान तक पहुंचता है।
   विशेषज्ञों की मानें तो नमक में.... दुनिया में ज्यादातर नमक की सप्लाई समुद्री पानी से होती है। समुद्रों में बुरी तरह प्लास्टिक घुल चुका है। हर साल 1.2 करोड़ टन प्लास्टिक महासागरों तक पहुंच रहा है। नमक के साथ यह माइक्रोप्लास्टिक हर किसी की रसोई तक पहुंचता है।
    विशेषज्ञों की मानें तो पीने के पानी में.... दुनिया भर में नल के जरिए सप्लाई होने वाले पीने के पानी के 80 फीसदी नमूनों में माइक्रोप्लास्टिक मिला है। वैज्ञानिकों के मुताबिक नल के पानी में प्लास्टिक का इस कदर मिलना बताता है कि प्लास्टिक हर जगह घुस चुका है। खबर है कि इसी पानी का इस्तेमाल खाना बनाने और मवेशियों की प्यास बुझाने के लिए भी किया जाता है।
   विशेषज्ञों की मानें तो कपड़ों में.... सिथेंटिक टेक्सटाइल से बने कपड़ों को जब भी धोया जाता है, तब उनसे काफी ज्यादा माइक्रोप्लास्टिक निकलता है। रिसर्च में पता चला है कि छह किलोग्राम कपड़ों को धोने पर 7,00,000 से ज्यादा माइक्रोप्लास्टिक फाइबर निकलते हैं। महासागरों में 35 फीसदी माइक्रोप्लास्टिक सिथेंटिक टेक्साटाइल से ही पहुंचता है।
   विशेषज्ञों की मानें तो शहद में भी... पानी और जलीय जीवों के साथ ही वैज्ञानिकों को शहद जैसी चीजों में भी माइक्रोप्लास्टिक मिला है। हाल ही यूरोपीय संघ के प्लास्टिक के खिलाफ बनाई गई रणनीति में यह बात साफ कही गई कि शहद में माइक्रोप्लास्टिक की अच्छी खासी मात्रा मौजूद है।
   विशेषज्ञों की मानें तो टायर बने मुसीबत.... पर्यावरण में सबसे ज्यादा माइक्रोप्लास्टिक टायरों के जरिये घुलता है। सड़क पर घिसते टायर बहुत ही बारीक माइक्रोप्लास्टिक छोड़ते हैं। पानी और हवा के संपर्क में आते ही यह हर जगह पहुंच जाता है।

Friday, 5 October 2018

अब बिना ड्राइवर के चलेंगी फ्रांस की ट्रेनें !

   फ्रांस में अब ड्राइवर लेस ट्रेनें चलेंगी। जी हां, फ्रांस इस दिशा में तेजी से काम कर रहा है। क्या आप जानते हैं कि पेरिस की मेट्रो ट्रेनें बिना ड्राइवर के चलती हैं? अब फ्रांस पूरे रेल नेटवर्क को ड्राइवर फ्री करने जा रहा है। अगले दशक में पश्चिमी यूरोप का रेल नेटवर्क भी पूरी तरह ड्राइवरलेस हो सकता है।

   फ्रांस की सरकारी रेलवे कंपनी एसएनसीएफ ने लंबी दूरी की यात्री व मालगाड़ियों को चालक रहित बनाने का एलान किया है। कंपनी का कहना है कि 2023 तक रेल नेटवर्क को ड्राइवर फ्री बना दिया जाएगा।
  इसके लिए 5.7 करोड़ यूरो का बजट तय किया गया है। पहले चरण में खुद चलने वाली मालगाड़ियों को उतारा जाएगा. इस प्रोजेक्ट में विमान निर्माता कंपनी एयरबस और जापानी इलेक्ट्रॉनिक कंपनी हिटाची भी शामिल हैं। 
  खबर है कि दूसरे चरण में पैसेंजर ट्रेनों को ड्राइवरलेस बनाया जाएगा। यह प्रोजेक्ट बमबार्डियर, बॉश और थालिस जैसी कंपनियों के साथ चलेगा। एसएनसीएफ के मुताबिक पूरे प्रोजेक्ट को लेकर जर्मनी की रेलवे कंपनी डॉयचे बान से भी बातचीत की जा रही है। इस बातचीत के जरिए पूरे यूरोप में चालक रहित ट्रेनों का नेटवर्क तैयार करने के लिए जरूरी मानकों पर चर्चा हो रही है।
  खबर है कि पूरी तरह स्वचालित ट्रेनों के प्रोजेक्ट के डायरेक्टर लुक लारोशे के मुताबिक, "इंसान और तकनीक से जुड़े मुद्दों पर ध्यान दिया जा रहा है। हमारे पार्टनर तमाम क्षेत्रों से आते हैं और उनके साथ सामूहिक बुद्धि और दक्षता के जरिए हम आगे बढ़ेंगे."।
  जर्मनी कंपनी बॉश की फ्रांसीसी शाखा बॉश फ्रांस के प्रेसिडेंट हाइको कारी ने भी प्रोजेक्ट की पुष्टि की है, "मोबिलिटी के क्षेत्र में अच्छे समाधानों का नेतृत्व करने वाला बॉश ग्रुप इस समूह का हिस्सा बनकर काफी खुश है, हम अपना योगदान देंगे, तकनीक की बदौलत हम स्वचालित ट्रेनों के नए और अहम चरण में दाखिल हो रहे हैं."।
   एसएनसीएफ का दावा है कि ड्राइवर रहित ट्रेनों से पूरे रेल नेटवर्क को फायदा होगा. कंपनी के मुताबिक इस सिस्टम से ट्रेनें समय से चलेंगी, रेलवे ट्रैफिक ज्यादा स्मार्ट बनेगा और ईंधन की खपत भी कम होगी। ड्राइवरों के शिफ्ट में काम करने की वजह से यूरोप के रेल नेटवर्क को कई बार देरी का सामना करना पड़ता है।
   फ्रांसीसी रेलवे कंपनी के पास इस वक्त 17,000 ट्रेनें हैं। इनका इस्तेमाल हर दिन 40 लाख यात्री करते हैं. लेकिन एसएनसीएफ को हर साल तीन अरब यूरो का घाटा हो रहा है। 2017 और 2018 में 1,48,000 कर्मचारियों वाली कंपनी ने कई बार हड़तालों का सामना किया।
   खबर है कि बदलावों को फ्रांस सरकार की हरी झंडी मिली हुई है। फ्रांस के वित्त मंत्री ब्रुनो ले मैर पहले ही कह चुके हैं, "तीस साल तक हमने एसएनसीएफ को जरूरी बदलावों से बचाए रखा और इन्हीं तीस बरसों में हमने इसकी सेवाओं को लगातार खराब होते देखा हम इस तरह नहीं चल सकते। हम दीवार से टकराने जा रहे हैं."। इस वक्त फ्रांस की सरकार एसएनसीएफ को हर साल 14 अरब यूरो की सब्सिडी देती है। नई योजना के मुताबिक 2020 में पहली सेमी ऑटोमैटिक ट्रेन चलेगी और तीन साल बाद पूरी तरह स्वचालित ट्रेनें चलने लगेंगी।

Tuesday, 2 October 2018

नशा : भारत छोड़ो, अब बर्दास्त नहीं

  नई दिल्ली। नशा मुक्त भारत का संकल्प...। जी हां, गायत्री परिवार के सदस्यों ने भारत को नशा मुक्त करने-कराने के संकल्प के साथ मंगलवार को नई दिल्ली के जंतर-मंतर, पार्लियामेंट स्ट्रीट पर संकल्पित आवाज बुलंद की।

   नशा मुक्त भारत की कल्पना लेकर मंगलवार को नशा भारत छोड़ो अभियान का देश व्यापी अभियान प्रारम्भ किया गया। खास यह कि देश के 400 जिलों में मंगलवार को 600 स्थानों पर व्यसन मुक्त भारत के लिए जनजागरण अभियान के तहत कार्यक्रम आयोजित किये गये।