Friday, 28 April 2017

डाकघरों को ब्रॉडबैंड सेवाओं के लिए त्रिपक्षीय समझौता

       ग्रामीण क्षेत्रों में डाकघरों को भारत-नेट की ब्रॉडबैंड संपर्कता प्रदान करने के लिए आज बीबीएनएल, डाक विभाग और बीएसएनएल के बीच एक त्रिपक्षीय समझौता-दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए गए। 

     संचार मंत्री मनोज सिन्हा की अध्यक्षता में किया जाने वाला यह समझौता-दस्तावेज अपनी तरह का पहला त्रिपक्षीय समझौता है, जिसके तहत ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग 1.3 लाख डाकघरों और 25 हजार छोटे डाक घरों को हाई-स्पीड इंटरनेट सेवा प्रदान की जाएगी, ताकि ग्रामीण आबादी को लाभ हो। इस अवसर पर मनोज सिन्हा ने कहा कि लगभग एक लाख ग्रामीण पंचायतों को संपर्कता प्रदान करने का पहला चरण पूरा होने वाला है। 

        शेष डेढ़ लाख ग्राम पंचायतों को 100 एमबीपीएस ब्राडबैंड संपर्कता का काम दिसंबर, 2018 तक पूरा कर लिया जाएगा। मंत्री ने कहा कि भारत–नेट प्रधानमंत्री के डिजिटल इंडिया के दृष्टिकोण को पूरा करने के लिए 9 स्तंभों में से एक है। मनोज सिन्हा ने कहा कि भारत-नेट और आज होने वाले समझौते में नागरिक सुविधाओं के प्रावधान पर बल दिया गया है।

            बीएसएनएल सेवा प्रदाता है जो ब्रॉडबैंड सेवाएं प्रदान करेगा। बुनियादी ढांचा तैयार करने और संचालन खर्च डाक विभाग वहन करेगा। चूंकि भारत-नेट राष्ट्रीय नेट वर्क है, इसलिए बीबीएनएल इस पूरे संचालन का समन्वय करेगा। अन्य सरकारी विभागों के साथ भविष्य में समझौता दस्तावेज किये जाने का प्रस्ताव है।

हरियाणा को ‘अमृत’ के तहत 2565 करोड़

             केन्‍द्रीय शहरी विकास एवं आवास तथा शहरी गरीबी उन्‍मूलन (एचयूपीए) और सूचना एवं प्रसारण मंत्री एम.वेंकैया नायडू ने कहा कि नये भारत के निर्माण के लिए त्‍वरित एवं सर्वांगीण तथा समावेशी विकास हमारा उद्देश्‍य है। 

           मंत्री शहरी विकास एवं आवास तथा शहरी गरीबी उन्‍मूलन मंत्रालय से संबंधित योजनाओं की प्रगति पर समीक्षा बैठक आयोजित करने के बाद चंडीगढ़ में एक संवाददाता सम्‍मेलन को संबोधित कर रहे थे। उन्‍होंने कहा कि देश में अपेक्षाओं एवं विकास का एक नया परिदृश्‍य उभर कर सामने आ रहा है। नायडू ने यह भी कहा कि यह सरकार प्रदर्शन, प्रतिस्‍पर्धा एवं सुधारों को प्रोत्‍साहित कर रही है, जो देश को नई ऊंचाइयों पर ले जाएगा।

           नायडू ने कहा कि विचार-विमर्श के दौरान क्रियान्‍वयन, उपलब्धियों, प्रभावशीलता, समस्‍याओं से ग्रस्‍त क्षेत्रों और इन समस्‍याओं का हल ढूंढ़ने पर ध्‍यान केन्द्रित किया गया। उन्‍होंने कहा कि हरियाणा ने 8.97 लाख मकानों के लिए मांग रखी है और मंत्रालय ने राज्‍य से इस सूची को अंतिम रूप देने को कहा है। मंत्री ने कहा कि केन्‍द्र द्वारा आवास क्षेत्र में 6.5 प्रतिशत की ब्‍याज सब्सिडी दी जा रही है। नायडू ने ‘अमृत’ के साथ-साथ शहरी विकास मंत्रालय के अन्‍य प्रमुख कार्यक्रमों का उल्‍लेख करते हुए कहा कि सरकार ने एकल खिड़की मंजूरी की अवधारणा अपनाई है, ताकि योजनाओं पर अमल तेजी से हो सके और उनकी राह में कोई अवरोध न रहे।

                उन्‍होंने कहा कि हरियाणा की सरकार ने यह आश्‍वासन दिया है कि अचल सम्‍पत्ति नियमन अधिनियम (आरईआरए) के तहत नियमों को अधिसूचित करने तथा प्राधिकरण-ट्रिब्‍यूनल की स्‍थापना करने का काम प्रगति पर है। दीनदयाल अन्‍त्‍योदय योजना, राष्‍ट्रीय शहरी आजीविका मिशन (डीएवाई-एनयूएलएम) के तहत राज्‍य में 22 शहरी स्‍थानीय निकायों को कवर किया गया है। 294 शहरी स्‍वयं सहायता समूहों (एसएचजी) को पुनःपूर्ति करने वाली धनराशि मुहैया कराई गई है। 

            आवास एवं शहरी विकास निगम (हुडको) ने हरियाणा में 4448 करोड़ रुपये की कर्ज राशि के साथ आठ योजनाओं को मंजूरी दी है। नायडू ने बताया कि राज्‍य में ‘अमृत’ के तहत 2565 करोड़ रुपये की राशि वाली सभी तीन योजनाओं को मंजूरी दे दी गई है। नायडू ने राष्‍ट्रीय ढांचागत विकास परियोजनाओं पर विचार-विमर्श के दौरान बताया कि स्‍वच्‍छ भारत मिशन के तहत हरियाणा में 11 शहर अब खुले में शौच मुक्‍त (ओडीएफ) हैं।  मंत्री ने यह जानकारी दी कि भारत सरकार ने फरीदाबाद के लिए स्‍मार्ट सिटी मिशन के तहत 96 करोड़ रुपये की अपनी दूसरी किस्‍त जारी कर दी है। नायडू ने हरियाणा में मेट्रो परियोजनाओं विशेषकर नरेला-कुंडली सेक्टर, बदरपुर-एस्कॉर्ट मुजेसर और बदरपुर-महिलपुर से जुड़ी परियोजनाओं की प्रगति की भी समीक्षा की। 

           हरियाणा के मुख्‍यमंत्री मनोहर लाल खट्टर, हरियाणा की स्‍थानीय निकाय मंत्री श्रीमती कविता जैन, शहरी विकास सचिव राजीव गाबा, एचयूपीए सचिव सुश्री नंदिता चटर्जी, हरियाणा के मुख्‍य सचिव डी एस धेसी एवं मंत्रालयों तथा राज्‍य सरकार के अन्‍य वरिष्‍ठ अधिकारियों ने समीक्षा बैठकों में भाग लिया।

देश के 91 प्रमुख जलाशयों के जलस्तर में दो प्रतिशत की कमी

               देश के 91 प्रमुख जलाशयों में 42.658 बीसीएम (अरब घन मीटर) जल का संग्रहण आंका गया। यह इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 27 प्रतिशत है। यह पिछले वर्ष की इसी अवधि के कुल संग्रहण का 125 प्रतिशत तथा पिछले दस वर्षों के औसत जल संग्रहण का 104 प्रतिशत है। 20 अप्रैल को समाप्त हुए सप्ताह के अंत में यह 29 प्रतिशत थी। इन 91 जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता 157.799 बीसीएम है, जो समग्र रूप से देश की अनुमानित कुल जल संग्रहण क्षमता 253.388 बीसीएम का लगभग 62 प्रतिशत है। 

            इन 91 जलाशयों में से 37 जलाशय ऐसे हैं जो 60 मेगावाट से अधिक की स्थापित क्षमता के साथ पनबिजली संबंधी लाभ देते हैं। उत्तरी क्षेत्र में हिमाचल प्रदेश, पंजाब तथा राजस्थान आते हैं। इस क्षेत्र में 18.01 बीसीएम की कुल संग्रहण क्षमता वाले छह जलाशय हैं, जो केन्द्रीय जल आयोग (सीडब्यूसी) की निगरानी में हैं। इन जलाशयों में कुल उपलब्ध संग्रहण 4.72 बीसीएम है, जो इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 26 प्रतिशत है। पिछले वर्ष की इसी अवधि में इन जलाशयों की संग्रहण स्थिति 21 प्रतिशत थी। पिछले दस वर्षों का औसत संग्रहण इसी अवधि में इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 29 प्रतिशत था। 

               इस तरह पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में चालू वर्ष में संग्रहण बेहतर है, लेकिन पिछले दस वर्षों की इसी अवधि के दौरान रहे औसत संग्रहण से यह कमतर है। पूर्वी क्षेत्र में झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल एवं त्रिपुरा आते हैं। इस क्षेत्र में 18.83 बीसीएम की कुल संग्रहण क्षमता वाले 15 जलाशय हैं, जो सीडब्ल्यूसी की निगरानी में हैं। इन जलाशयों में कुल उपलब्ध संग्रहण 8.21 बीसीएम है, जो इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 44 प्रतिशत है। पिछले वर्ष की इसी अवधि में इन जलाशयों की संग्रहण स्थिति 30 प्रतिशत थी। पिछले दस वर्षों का औसत संग्रहण इसी अवधि में इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 29 प्रतिशत था। इस तरह पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में चालू वर्ष में संग्रहण बेहतर है। यह पिछले दस वर्षों की इसी अवधि के दौरान रहे औसत संग्रहण से भी बेहतर है। 

                पश्चिमी क्षेत्र में गुजरात तथा महाराष्ट्र आते हैं। इस क्षेत्र में 27.07 बीसीएम की कुल संग्रहण क्षमता वाले 27 जलाशय हैं, जो सीडब्ल्यूसी की निगरानी में हैं। इन जलाशयों में कुल उपलब्ध संग्रहण 8.91 बीसीएम है, जो इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 33 प्रतिशत है। पिछले वर्ष की इसी अवधि में इन जलाशयों की संग्रहण स्थिति 21 प्रतिशत थी। पिछले दस वर्षों का औसत संग्रहण इसी अवधि में इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 34 प्रतिशत था। इस तरह पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में चालू वर्ष में संग्रहण बेहतर है, लेकिन यह पिछले दस वर्षों की इसी अवधि के दौरान रहे औसत संग्रहण से भी कमतर है। 

             मध्य क्षेत्र में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश तथा छत्तीसगढ़ आते हैं। इस क्षेत्र में 42.30 बीसीएम की कुल संग्रहण क्षमता वाले 12 जलाशय हैं, जो सीडब्ल्यूसी की निगरानी में हैं। इन जलाशयों में कुल उपलब्ध संग्रहण 15.87 बीसीएम है, जो इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 38 प्रतिशत है। पिछले वर्ष की इसी अवधि में इन जलाशयों की संग्रहण स्थिति 28 प्रतिशत थी। पिछले दस वर्षों का औसत संग्रहण इसी अवधि में इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 25 प्रतिशत था। इस तरह पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में चालू वर्ष में संग्रहण बेहतर है। यह पिछले दस वर्षों की इसी अवधि के दौरान रहे औसत संग्रहण से भी बेहतर है।

              दक्षिणी क्षेत्र में आंध्र प्रदेश (एपी), तेलंगाना (टीजी), एपी एवं टीजी (दोनों राज्यों में दो संयुक्त परियोजनाएं), कर्नाटक, केरल एवं तमिलनाडु आते हैं। इस क्षेत्र में 51.59 बीसीएम की कुल संग्रहण क्षमता वाले 31 जलाशय हैं, जो सीडब्ल्यूसी की निगरानी में हैं। इन जलाशयों में कुल उपलब्ध संग्रहण 4.95 बीसीएम है, जो इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 10 प्रतिशत है। पिछले वर्ष की इसी अवधि में इन जलाशयों की संग्रहण स्थिति 14 प्रतिशत थी। पिछले दस वर्षों का औसत संग्रहण इसी अवधि में इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 21 प्रतिशत था। इस तरह चालू वर्ष में संग्रहण पिछले वर्ष की इसी अवधि में हुए संग्रहण से कमतर है। यह पिछले दस वर्षों की इसी अवधि के दौरान रहे औसत संग्रहण से भी कमतर है।

             पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में जिन राज्यों में जल संग्रहण बेहतर है उनमें पंजाब, राजस्थान, झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, गुजरात, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश,  उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना शामिल हैं।

भत्‍तों पर गठित समिति ने रिपोर्ट वित्‍त मंत्री को सौंपी

             वित्‍त सचिव एवं सचिव (व्‍यय) अशोक लवासा की अध्‍यक्षता में भत्‍तों पर गठित समिति ने रिपोर्ट केन्‍द्रीय वित्‍त मंत्री अरुण जेटली को सौंपी, रिपोर्ट को सचिवों की उच्‍चाधिकार प्राप्‍त समिति के समक्ष रखा जाएगा, ताकि कैबिनेट की मंजूरी के लिए उपयुक्‍त प्रस्‍ताव तैयार किया जा सके। 

          सातवें केन्‍द्रीय वेतन आयोग (सीपीसी) द्वारा भत्‍तों पर पेश की गई सिफारिशों पर गौर करने के लिए भारत सरकार के वित्‍त मंत्रालय द्वारा भत्‍तों पर गठित की गई समिति ने अपनी रिपोर्ट केन्‍द्रीय वित्‍त मंत्री अरुण जेटली को सौंप दी। भारत सरकार के वित्‍त मंत्रालय में वित्‍त सचिव एवं सचिव (व्‍यय) अशोक लवासा इस समिति के अध्‍यक्ष थे और गृह, रक्षा, स्‍वास्‍थ्‍य एवं परिवार कल्‍याण, कार्मिक एवं प्रशिक्षण तथा डाक सचिव और रेलवे बोर्ड के चेयरमैन इसके सदस्‍य थे, जबकि संयुक्‍त सचिव (क्रियान्‍वयन प्रकोष्‍ठ) इसके सदस्‍य सचिव थे।

            सातवें वेतन आयोग द्वारा वेतन, पेंशन एवं संबंधित मुद्दों पर पेश की गई सिफारिशों को केन्‍द्रीय मंत्रिमंडल द्वारा 29 जून, 2016 को दी गई मंजूरी को ध्‍यान में रखते हुए यह समिति गठित की गई थी। सातवें वेतन आयोग द्वारा भत्‍तों के ढांचे में व्‍यापक बदलाव लाने की सिफारिश और कर्मचारियों के विभिन्‍न संगठनों की ओर से पेश किये गये अनगिनत ज्ञापनों के साथ-साथ विभिन्‍न मंत्रालयों/विभागों द्वारा व्‍यक्‍त की गई आशंकाओं को ध्‍यान में रखते हुए यह समिति गठित करने का निर्णय लिया गया था। सातवें केन्‍द्रीय वेतन आयोग ने यह सिफारिश की थी कि कुल 196 भत्‍तों में से 52 भत्‍तों को पूरी तरह समाप्‍त कर दिया जाए और 36 भत्‍तों की पृथक पहचान समाप्‍त करते हुए उनका विलय अन्‍य भत्‍तों में कर दिया जाए। 

           सातवें वेतन आयोग द्वारा भत्‍तों पर पेश की गई सिफारिशों को लेकर विभिन्‍न हितधारकों की ओर से प्राप्‍त सभी ज्ञापनों पर समिति ने गौर किया। 70 भत्‍तों के संबंध में ज्ञापन एवं संशोधन के लिए मांग पत्र प्राप्‍त हुए, जिन पर समिति ने विस्‍तार से विचार-विमर्श किया है। ऐसा करते वक्‍त समिति ने राष्‍ट्रीय परिषद की स्‍थायी समिति (कर्मचारी पक्ष) के सभी सदस्‍यों, संयुक्‍त सलाहकार मशीनरी (जेसीएम) तथा रेलवे के विभिन्‍न कर्मचारी संगठनों के प्रतिनिधियों, डाक कर्मचारियों, डॉक्‍टरों, नर्सों और परमाणु ऊर्जा विभाग के प्रतिनिधियों से बातचीत की।

           समिति ने इसके साथ ही रक्षा बलों के प्रतिनिधियों, केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (सीएपीएफ) अर्थात सीआरपीएफ, सीआईएसएफ, बीएसएफ, आईटीबीपी, एसएसबी और असम राइफल्स के महानिदेशकों तथा आईबी एवं एसपीजी के वरिष्‍ठ अधिकारियों के साथ भी चर्चाएं कीं, ताकि उनके विचार जाने जा सकें। जैसा कि रिपोर्ट में बताया गया है, समिति ने कुल मिलाकर 15 बैठकें की थीं और विभिन्‍न ज्ञापनों पर गौर करने में अपर सचिव (व्‍यय विभाग) की अध्‍यक्षता वाले अधिकारियों के समूह ने इसकी सहायता की थी। 

          हितधारकों के साथ व्‍यापक विचार-विमर्श और विभिन्‍न ज्ञापनों पर गौर करने के बाद समिति ने सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों में कुछ विशेष संशोधन करने का सुझाव दिया है, ताकि सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों के पीछे दी गई दलीलों के साथ-साथ अन्‍य प्रशासकीय मजबूरियों के संदर्भ में हितधारकों द्वारा व्‍यक्‍त की गई चिंताएं दूर की जा सकें। ऐसे कुछ भत्‍तों में संशोधन करने का सुझाव दिया गया है, जो सार्वभौमिक तौर पर सभी कर्मचारियों पर लागू होते हैं। 

            इसी तरह ऐसे कुछ अन्‍य भत्‍तों में भी संशोधन करने का सुझाव दिया गया है, जो विशिष्‍ट श्रेणियों के कर्मचारियों जैसे कि रेल कर्मियों, डाक कर्मियों, वैज्ञानिकों, रक्षा क्षेत्र के कर्मियों, डॉक्‍टरों एवं नर्सों इत्‍यादि पर लागू होते हैं।

परंपरागत जल स्रोतों को संवारने की जरूरत

          केन्‍द्रीय जल संसाधन, नदी विकास तथा गंगा संरक्षण मंत्री सुश्री उमा भारती ने कहा कि जल संरक्षण के लिए परंपरागत जल स्रोतों के सार संभाल एवं जीर्णोद्धार समय की जरूरत है। सुश्री भारती ने सागर (मध्‍य प्रदेश) के बांदरी में बुंदेलखंड, सूखा प्रभावित क्षेत्रों के लिए व्‍यापक जल संरक्षण कार्यक्रम का शुभारंभ करते हुए यह विचार व्‍यक्‍त किए।

         समारोह को संबोधित करते हुए जल संसाधन मंत्री ने कहा कि प्राकृतिक एवं परंपरागत जल स्रोतों का संरक्षण एवं संवर्धन किया जाना जरूरी है। ये छोटे छोटे जल स्‍त्रोत पेयजल एवं सिंचाई की बडी जरूरतों को पूरा कर सकते हैं। उन्‍होंने कहा कि विभिन्‍न अध्‍ययनों से यह पता चला है कि जल की बडी परियोजनाओं की तुलना में अपेक्षाकृत छोटी परियोजनाओं से ज्‍यादा लाभ होता है।

             उन्‍होंने बताया कि उनके मंत्रालय ने बुंदेलखंड क्षेत्र में भू-जल के कृत्रिम रिचार्ज के लिए मास्‍टर प्‍लान बनाया है। उत्‍तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में लगभग 1100 परकोलेशन (रिसाव) टैंकों, 14000 छोटे चैक डैम-नाला पुश्‍तों तथा 17000 रिचार्ज शॉफ्ट्स की पहचान की गई है। मध्‍यप्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में लगभग 2000 परकोलेशन टैंको, 55000 छोटे चैक डैम-नाला पुश्‍तों तथा 17000 रिचार्ज शॉफ्ट्स की पहचान की गई है। उन्‍होंने कहा कि भू-जल खोज के हिस्‍से के रूप में उत्‍तरप्रदेश क्षेत्र के बुंदेलखंड के पांच जिलों-बांदा, हमीरपुर, जालौन, चित्रकूट और माहोबा में 234 कुएं बनाये जाने का प्रस्‍ताव है। मध्‍य प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र के छह जिलों में भूजल खोज के लिए 259 कुओं के निर्माण का प्रस्‍ताव है।

            सुश्री भारती ने कहा कि उनके मंत्रालय ने राष्‍ट्रीय भू-जल प्रबंधन सुधार योजना (एनजीएमआईएस) के अंतर्गत कई नई पहल की है। इसका उद्देश्‍य दबाव वाले ब्‍लॉकों में भू-जल की स्थिति में कारगर सुधार करना, गुण और मात्रा दोनों की दृष्टि से संसाधन को सुनिश्चित करना, भू-जल प्रबंधन और संस्‍थागत मजबूती में भागीदारीमूलक दृष्टिकोण अपनाना है। उत्‍तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में 11 हजार 851 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र कवर करने वाले छह जिलों को इस पहल के अंतर्गत रखा गया है और मध्‍य प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र के 8319 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र के पांच जिलों को रखा गया है। 

         सुश्री भारती ने कहा कि मंत्रालय द्वारा सिंचाई अंतर पाटने की योजना (आईएसबीआईजी) तैयार की जा रही है। इसका उद्देश्‍य सीएडीडब्‍ल्‍यूएम कार्य पूरा करना और साथ-साथ सृजित सिंचाई क्षमता (आईपीसी) तथा उपयोग की गई सिंचाई क्षमता (आईपीयू) के बीच खाई को पाटने के लिए नहर नेटवर्क में कमियों को सुधारना, सिंचाई में जल उपयोग क्षमता बढ़ाना और प्रत्‍येक खेत को जल सप्‍लाई सुनिश्चित करना तथा जल उपयोगकर्ता संघों (डब्‍ल्‍यूयूए) को सिंचाई प्रणाली का नियंत्रण और प्रबंधन हस्‍तां‍तरित करना है। 

          उत्‍तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में बेतवा तथा गुरसराय नहर, राजघाट नहर, केन नहर प्रणाली, गुंटा नाला डैम तथा उपरी राजघाट नहर के 17,1030 हेक्‍टेयर को पाटने की योजना का प्रस्‍ताव है। इस योजना से बुंदेलखंड क्षेत्र के झांसी, जालौन, हमीरपुर, ललितपुर, बांदा जिलों को लाभ मिलेगा। मध्‍य प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र की राजघाट नहर परियोजना को 68007 हेक्‍टेयर को पाटने की योजना का प्रस्‍ताव है। इस योजना से टिकमगढ़ और दतिया जिलों को लाभ मिलेगा। जल संसाधन मंत्री ने कहा कि महाराष्‍ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र में आईपीसी तथा आईपीयू के बीच 53365 हेक्‍टेयर को पाटने के लक्ष्‍य के साथ सात योजनाओं का प्रस्‍ताव है।

           इस योजना से औरंगाबाद, लातूर, नांदेड़, परभनी, शोलापुर तथा उस्मानाबाद जिलों को लाभ मिलेगा और इस पर 250 करोड़ रुपये खर्च होंगे। मराठवाड़ा के 3727 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को राष्‍ट्रीय भूजल प्रबंधन सुधार योजना के अंतर्गत लाने का प्रस्‍ताव है। इस पर 380 करोड़ रुपये का अनुमानित खर्चा आएगा। मराठवाड़ा क्षेत्र के 9101 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र की एक्विफर मैपिंग पूरी हो गई है। 7775 वर्ग किलोमीटर का प्रबंधन प्‍लान महाराष्‍ट्र सरकार को सौंपा गया है। सुश्री भारती ने कहा कि ओडिशा के कालाहांडी, बोलंगी, कोरापुट (केबीके) क्षेत्र में पीआईसी तथा आईपीयू के बीच अंतर पाटने के लिए 0.68 लाख हेक्‍टेयर क्षेत्र कवर करने की 9 परियोजनाओं का प्रस्‍ताव है। इससे केबीके क्षेत्र के मलकानगीरी, बोलंगी, नुआपाड़ा, रायगड़, कालाहांडी तथा बारगढ़ जिलों को लाभ मिलेगा। क्षेत्र में 305 कुएं बनाये जाएंगे। 

          पीएमकेएसवाई के अंतर्गत केन्‍द्रीय सहायता उपलब्‍ध कराने के लिए केबीके क्षेत्र के 89 जल निकायों को 32करोड़ रुपये की अनुमानित लागत और 5739 हेक्‍टेयर की संभावित क्षमता को पुनर्जीवित करने के लक्ष्‍य के साथ शामिल किया गया है। ये जल निकाय ओडिशा में 760 जल निकायों के क्‍लस्‍टर का हिस्‍सा हैं। इनके लिए 107करोड़ रुपये की केन्‍द्रीय सहायता जारी की गई है। 99 जारी बड़ी मझौली सिंचाई परियोजना को एआईबी के अंतर्गत चरणबद्ध तरीके से मार्च, 2019 तक पूरा किया जाएगा।

          चार परियोजनाओ-लोअर इन्‍द्र (केबीके), अपर इन्‍द्रावती (केबीके), आरईटी सिंचाई तथा तेलनगिरी से केबीके क्षेत्र को लाभ मिलेगा। इन योजनाओं की अधिकतम सिंचाई क्षमता 1.44 लाख हेक्‍टेयर है। 2016-17 के दौरान एआईबीपी तथा सीएडी योजनाओं के अंतर्गत इन योजनाओं के लिए 233 करोड़ रुपये की राशि जारी की गई।

 

देश में 21 लाख से अधिक एलईडी स्ट्रीट लाइट, 295 मिलियन इकाई बिजली की बचत

            भारत सरकार के राष्ट्रीय स्ट्रीट लाइटिंग कार्यक्रम (एसएलएनपी) के अंतर्गत देश भर में 21 लाख से अधिक पारंपरिक स्ट्रीट लाइट के स्थान पर एलईडी स्ट्रीट लाइट लगाई गई हैं। 

          नई लाइट से सड़कों पर अधिक रोशनी हुई है। निवासियों और वाहन चालकों के बीच सुरक्षा की भावना बढ़ी है। भारत सरकार के विद्युत मंत्रालय के अंतर्गत आने वाली सार्वजनिक ऊर्जा सेवा कंपनी, एनर्जी एफिशिएंसी सर्विसेस लिमिटेड (ईईएसएल) एसएलएनपी की कार्यान्वयन एजेंसी है।   एलईडी स्ट्रीट लाइट लगाने से सालाना 295 मिलियन इकाई किलोवॉट-ऑवर (केडब्ल्यूएच) बिजली की बचत हुई है। 2.3 लाख टन कार्बन डाइआक्साइड का उत्सर्जन कम हुआ है। यह परियोजना 23 राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों में कार्यान्वित की जा रही है। 

          इसके बाद से सड़कों पर रोशनी का स्तर काफी बढ़ा है। राजस्थान, आंध्र प्रदेश, दिल्ली, गुजरात, गोवा में एलईडी लाइट लगाई गई है। ईईएसएल विशेष विरासत लाइटिंग परियोजना भी कार्यान्वित कर रही है, जिसके तहत उत्तर प्रदेश के काशी क्षेत्र में 1000 एलईडी स्ट्रीट लाइट लगाई गई है और इनके अलावा 4000 अतिरिक्त लाइटें लगाई जा रही हैं। भारी मात्रा में लाइट की खरीदी के कारण एलईडी स्ट्रीट लाइट का खरीद मूल्य 135 रुपये प्रतिवॉट से घटकर 80 रुपये प्रति वॉट हो गया है। 

            स्ट्रीट लाइट लगाने का पूरा पूंजी निवेश ईईएसएल करती है इसलिए नगरपालिकाओं से अतिरिक्त बजट आवंटन की आवश्यकता नहीं है। नगरपालिकाएं सात वर्ष की अवधि में बिजली और प्रबंधन की लागत में बचत से जमा की गई राशि से ईईएसएल को भुगतान करती है जिसके कारण एलईडी लाइटें सस्ती और सुलभ हुई है। ईईएलसी परियोजना के संपन्न होने पर सभी राज्यों में सामाजिक लेखा परीक्षा (ऑडिट) भी करती है। 

            ईईएसएल की खरीद बीआईएस के विशेष निर्देशों के अऩुरूप है और तकनीकी दोषों से बचने के लिए इनकी सात साल की वारंटी भी है। ईईएसएल बोली लगाने से लेकर सड़कों पर लाइट लगाने के स्तर तक उत्पादों की गुणवत्ता की उचित जांच करती है। इसके परिणाम स्वरूप देशभर में ईईएसएल द्वारा लगाई गई 21 लाख लाइट में एक प्रतिशत से भी कम तकनीकी खराबी हुई है। 

           प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 5 जनवरी 2015 को 100 शहरों में पारंपरिक स्ट्रीट और घरेलू लाइट के स्थान पर ऊर्जा दक्ष एलईडी लाइट लगाने के लिए इस राष्ट्रीय कार्यक्रम की शुरूआत की थी। सरकार का उद्देश्य राष्ट्रीय स्ट्रीट लाइटिंग कार्यक्रम (एसएलएनपी) के अंतर्गत 1.34 करोड़ स्ट्रीट लाइट के स्थान पर ऊर्जा दक्ष एलईडी लाइट लगाना है। 

ईपीएफ सदस्यों को अब आश्रितों की बीमारी में अग्रिम राशि के लिए केवल स्व घोषणा पत्र

            कर्मचारी भविष्य निधि (ईपीएफ) के सदस्यों को अब अपने सदस्यों-आश्रितों की बीमारी के मामले में अग्रिम राशि लेने के लिए केवल स्व घोषणा पत्र प्रस्तुत करना होगा।

         दिव्यांग सदस्य भी स्व घोषणा पत्र के आधार पर अग्रिम राशि ले सकते हैं। किसी भी सदस्य को अब ईपीएफ योजना-1952 के अनुच्छेद 68-जे या 68-एन के अंतर्गत अग्रिम राशि पाने के लिए चिकित्सा प्रमाण पत्र या अन्य प्रमाण पत्र अथवा दस्तावेज या प्रोफार्मा प्रस्तुत करने की आवश्यकता नहीं होगी। श्रम और रोजगार मंत्रालय ने कर्मचारी भविष्य निधि योजना 1952 के अनुच्छेद 68-जे और 68-एन में संशोधन कर दिया है। यह आधिकारिक राजपत्र में प्रकाशित होने की तिथि से लागू होगा। इसके अनुसार ईपीएफ के सदस्य को अपने सदस्यों-आश्रितों की बीमारी के मामले में ईपीएफ योजना के अंतर्गत अग्रिम राशि पाने के लिए केवल स्व घोषणा पत्र प्रस्तुत करना होगा।

                दिव्यांग सदस्यों के मामले में भी यह लागू होगा। इस प्रावधान को समग्र दावा फार्म में पहले ही शामिल कर दिया गया है। कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) द्वारा अपने ई गवर्नेंस सुधारों के अगले चरण के हिस्से के रूप में की गई पहलों के अनुरूप ही यह प्रयास ईपीएफओ के हितधारकों को कुशलता और पारदर्शी तरीके से सेवाएं उपलब्ध कराने का उद्देश्य से किया जा रहा है। 

             ईपीएफो ने सदस्यों के लिए व्यापक खाता संख्या (यूएएन) लागू कर दी हैं। अब जिन सदस्यों ने यूएएऩ को अपने आधार संख्या और बैंक खाते जोड दिया है वे नियोक्‍ता से सत्‍यापित कराये बिना दावा फार्म सीधे ईपीएफओ में जमा करवा सकते हैं।

विकास के लिए केन्‍द्र व राज्‍यों के बीच समन्‍वय आवश्‍यक

           भारत सरकार के केन्‍द्रीय सूक्ष्‍म, लघु और मझोले उद्यम (एमएसएमई) मंत्री कलराज मिश्र की अध्‍यक्षता में आयोजित की गई।

         भारत सरकार के एमएसएमई राज्‍य मंत्री हरिभाई पारथीभाई चौधरी एवं मंत्रालय के वरिष्‍ठ अधिकारीगण भी इस अवसर पर उपस्थित थे। राज्‍यों-संघ शासित क्षेत्रों की ओर से अंडमान एवं निकोबार दीप समूह के उपराज्‍यपाल प्रो. जगदीश मुखी, गुजरात के मंत्री रोहित भाई पटेल, हरियाणा के मंत्री विपुल गोयल, मणिपुर के मंत्री बिश्‍वजीत सिंह, मिजोरम के मंत्री एच. रोहलुना, ओडिशा के मंत्री जोगेन्‍द्र बेहरा, उत्‍तर प्रदेश के मंत्री सत्‍यदेव पचौरी और उत्‍तराखंड के मंत्री मदन कौशिक ने इस बैठक में भाग लिया। 

           उन्‍होंने अपने-अपने संघ शासित क्षेत्रों-राज्‍यों की ओर से विचार पेश किये। कॉयर बोर्ड के अध्‍यक्ष सी.पी. राधाकृष्‍णन और केवीआईसी के अध्‍यक्ष विनय कुमार सक्‍सेना भी इस अवसर पर मौजूद थे। इस अवसर पर कलराज मिश्र ने कहा कि यह सहकारी संघवाद की भावना पर सरकार द्वारा दिये जा रहे विशेष जोर एवं राज्‍यों-संघ शासित क्षेत्रों के साथ जारी विचार-विमर्श के अनुरूप एक अनूठा प्रयास है। उन्‍होंने कहा कि सूक्ष्‍म, लघु एवं मझोले उद्यम क्षेत्र के समग्र विकास के लिए केन्‍द्र एवं राज्‍यों के बीच समन्‍वय एक आवश्‍यक अवयव है। यह बैठक इस दिशा में एक अच्‍छा प्रयास है। ऐसे अनेक क्षेत्र हैं, जिनमें केन्‍द्र एवं राज्‍यों के प्रयासों के बीच बढि़या तालमेल बैठाने की जरूरत है।

            इस अवसर पर केन्‍द्रीय एमएसएमई राज्‍य मंत्री हरिभाई पारथीभाई चौधरी ने कहा कि यदि केन्‍द्र एवं राज्‍य आपस में तालमेल बैठाकर काम करें, तो भारत दुनिया का विनिर्माण केन्‍द्र (हब) बन सकता है। इससे सभी हितधारक लाभान्वित हो सकते हैं। उन्‍होंने रोजगार उपलब्‍ध कराने के लिए एमएसएसई क्षेत्र की व्‍यापक संभावनाओं पर विशेष जोर दिया। उन्‍होंने यह भी कहा कि वर्तमान सरकार चाहती है कि ज्‍यादा से ज्‍यादा लोग स्‍वरोजगार को अपनाएं, ताकि रोजगार तलाशने वालों की संख्‍या कम हो सके। राज्‍यों के उप राज्‍यपाल एवं मंत्रियों ने अपने यहां मौजूद समस्‍याओं का उल्‍लेख किया और मूल्‍यवान सुझाव दिए। 

            भारत सरकार ने एमएसएमई पर विशेष ध्‍यान दिया है। वित्‍त वर्ष 2017-18 के बजट में इस मंत्रालय के लिए आवंटन को वित्‍त वर्ष 2016-17 की तुलना में एक ही बार में 87 फीसदी बढ़ा दिया गया है। प्रधानमंत्री ने भी 31 दिसंबर, 2016 को राष्‍ट्र के नाम अपने संबोधन में एमएसएमई को दी जा रही सुविधाओं का उल्‍लेख किया। उल्‍लेखनीय है कि मुख्‍यत: एमएसएमई द्वारा ही रोजगार के अवसर उपलब्‍ध कराए जाते हैं। 

           कुछ राज्‍यों जैसे कि पश्चिम बंगाल, ओडिशा, आंध्र प्रदेश और राजस्‍थान ने अपने यहां एमएसएमई नीतियां तैयार की हैं। इस बैठक में एक बार फिर सभी राज्‍यों से यह आग्रह किया गया कि वे अपने यहां एमएसएमई नीति तैयार करें, ताकि एमएसएमई को बढ़ावा दिया जा सके।