Tuesday, 7 March 2017

गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का लक्ष्‍य

            केन्‍द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने नई दिल्‍ली में शैक्षिक प्रशासन में नवाचार के लिए राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार प्रदान किये।

             पुरस्‍कार राष्‍ट्रीय शै‍क्षिक योजना और प्रशासन विश्‍वविद्यालय (एनयूईपीए) द्वारा स्‍थापित किए गए हैं। इस अवसर पर मंत्री ने कहा कि सभी के लिये गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये शिक्षा अधिकारियों को एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में कार्य करना होगा। इस अवसर पर पूरे भारत से लगभग 150 जिलों और विकास खंड स्‍तरों के शिक्षा अधिकारी तथा विश्‍वविद्यालय के शिक्षक उपस्थित थे। जावड़ेकर ने सभी पुरस्‍कार विजेताओं और प्रमाण-पत्र धारकों को उनकी बेहतरीन नवाचारों के लिए बधाई दी। मंत्री ने कहा कि छात्रों की भलाई के लिए नवाचार प्रक्रिया जारी रहनी चाहिए। इसमें अभिवावकों सहित शिक्षा क्षेत्र से जुड़े व्‍यक्तियों की सक्रिय भागीदारी होनी चाहिए।

             मंत्री ने कहा कि नवाचार एक जीवन पर्यत्‍न प्रक्रिया है। इससे हमेशा बेहतर परिणाम आते हैं। इस संबंध में उन्‍होंने भारतीय विज्ञान संस्‍थान (आईआईएससी) बेंगलुरु की उपलब्धि का हवाला दिया। जिसने हाल की में दुनिया के सबसे बेहतर छोटे विश्‍वविद्यालयों की सूचि में आठवां स्‍थान प्राप्‍त किया है। मंत्री ने कहा कि शिक्षा का उद्देश्‍य हमारी प्रणाली में एक बेहतर इंसान को लाना है। ऐसा करने के लिए हमें एक स्‍वयंसेवक की भूमिका निभानी पड़ेगी। जावड़ेकर ने शिक्षा प्रणाली सुधार के लिए शिक्षकों और प्रधानाध्‍यापकों में गुणवत्तापूर्ण नेतृत्व को बढ़ाने की जरूरत पर बल दिया। 

                मंत्री ने कहा कि सरकार ने प्रधानाध्‍यापकों के लिए एक अलग कैडर रखने का निर्णय लिया है ताकि 40-45 वर्ष की आयु में शिक्षक से प्रधानाध्‍यापक बनने वाला व्‍यक्ति अगले 15-20 सालों के लिए खुद को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने के लिए समर्पित कर सके। मंत्री ने आईसीटीसी की गतिविधियों की सराहना की जो सींखने के अनुभवों और जवाबदेही का भी अध्‍ययन कराती है। 

                उन्होंने शिक्षकों की गुणवत्ता को सुधार करने की आवश्‍यकता पर भी बल दिया। जावड़ेकर ने घोषणा की कि भविष्‍य में क्षेत्रीय स्‍तरों के साथ-साथ राष्‍ट्रीय स्‍तर पर भी ‘नवाचार सम्‍मेलनों’ का भी आयोजन किया जायेगा जहां शिक्षक, अभिभावक, गैर-सरकारी संगठन, संबंधित विभाग तथा संबंधित हितधारक भी नवाचार में भाग ले सकेंगे।

             मंत्री ने बेहतर शिक्षा के लिए सामूहिक भागीदारी पर जोर दिया। उन्‍होंने कहा कि हमें इस विषय के बारे में एक गंभीर संदेश देना होगा। मंत्री ने कहा कि हमें एक टीम के रूप में कार्य करना होगा जो सुधारने के लिए प्रेरित करे। जावड़ेकर ने कहा कि वह शिक्षक की शिक्षा प्रणाली में सुधार करने जा रहे हैं।

                 मंत्री ने कहा कि शिक्षकों से आग्रह किया कि छात्रों की जिज्ञासु भावना को न मारे क्‍योंकि हर छात्र के पास एक अलग रचनात्‍मकता होती है। उन्‍होंने कहा कि शिक्षकों को अपने छात्रों को एक दिलचस्‍प तरीके से शिक्षित करने की आवश्‍यकता है। सभी को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने के लिए सबको प्रधानमंत्री जी के लक्ष्‍य ‘सबका साथ सबका विकास’ के तहत कार्य करना होगा।  

कृषि की जेनेटिक शुद्धता के लिए अब डीएनए

             कृषि, सहकारिता एवं किसान कल्याण विभाग (एसी एंड एफडब्ल्यू) तथा भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के बीच खरीफ-पूर्व विमर्श का आयोजन पिछले सप्ताह राजधानी में किया गया। 

          विमर्श की अध्यक्षता एसी एंड एफडब्ल्यू के सचिव और सह-अध्यक्षता कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (डीएआरई) के सचिव ने की थी। विमर्श में एसी एंड एफडब्ल्यू, पशुपालन, डेरी एवं मत्स्य पालन तथा आईसीएआर/ डीएआरई के वरिष्ठ अधिकारी भी सम्मिलित हुए। खरीफ-पूर्व विमर्श का उद्देश्य उभरते हुए अनुसंधान योग्य क्षेत्रों की संयुक्त पहचान और रणनीति बनाना है, ताकि योजनाओं और कार्यक्रमों का बेहतर कार्यान्वयन हो सके। 

             मंत्रालय के पास अनुसंधान और प्रौद्योगिकी/कृषि प्रबंधन जैसे महत्वपूर्ण और समकालीन मुद्दों की पहचान के लिए एक बेहतरीन संस्थागत प्रणाली मौजूद है। इसकी शुरूआत क्षेत्रीय सम्मेलन से होती है जिसमें जनवरी माह में कृषि संबंधी सूचनाएं एकत्र होती हैं। इसके मद्देनज़र एसी एंड एफडब्ल्यू/ पशुपालन, डेरी एवं मत्स्य पालन के विभागीय प्रमुख राज्य प्रतिनिधियों के साथ बैठक करते हैं। महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा करते हैं। इस चर्चा को आगे मंत्रालय स्तर पर ले जाया जाता है। एसी एंड एफडब्ल्यू के सचिव की अध्यक्षता में होने वाले विमर्श में प्रस्तुत किया जाता है।

              खरीफ-पूर्व विमर्श के दौरान चर्चा होने वाले विषयों और सुझावों को भावी खरीफ अभियान 2017 राष्ट्रीय सम्मेलन में राज्य प्रतिनिधियों के सामने पेश किया जाएगा। इसके आयोजन की तिथि 25-26 अप्रैल, 2017 है। इसके अलावा सभी अनुसंधान योग्य मुद्दों को आईसीएआर के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा। विमर्श के दौरान फसल, बीज, पौधों का संरक्षण, बागवानी, खेती का मशीनीकरण एवं प्रौद्योगिकी, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन, राष्ट्रीय कृषि विकास योजना, एकीकृत पोषण प्रबंधन जैसे विषयों पर संयुक्त रूप से विचार किया गया।  2011 के बाद आईसीएआर द्वारा जारी फसलों की विभिन्न किस्मों को भारत भर में प्रोत्साहित करना ताकि अन्य किस्में भी उपलब्ध हो सके। 

              राज्य सरकारों से आग्रह किया गया कि 2011 के बाद जारी होने वाली अऩुमोदित किस्मों के बीजों को अपने-अपने राज्यों में तैयार रखें। गुण और जेनेटिक शुद्धता तय करने के लिए जारी होने वाली किस्मों की डीएनए पहचान का ब्यौरा तैयार किया जाए।  डीएसी एंड एफडब्ल्यू सचिव ने आदेश दिया की जिप्सम आपूर्ति के विभिन्न स्रोतों की पहचान की जाए ताकि तिलहन और दलहन की उत्पादकता बढ़ाने के लिए जिप्सम उपलब्ध रहे। इसके अलावा जमीन की गड़बड़ियों का उपचार भी किया जाए। डीएआरई के सचिव ने मूंगफली, सूरजमुखी और केस्टर की ट्रांसजैनिक किस्मों के विकास पर बल दिया, ताकि कीटाणुओं और रोगों से बचाव हो सके। 

              विभिन्न मुद्दों पर चर्चा के अलावा देशभर में गन्ने की खेती के लिए डीएसी एंड एफडब्ल्यू के सचिव ने ड्रिप सिंचाई प्रौद्योगिकी को अपनाने पर जोर दिया। उन्होंने इस संबंध में महाराष्ट्र सरकार द्वारा बनाए गए कानून का भी उल्लेख किया। विमर्श में संयुक्त रूप से फैसला किया गया कि नई दिल्ली स्थित आईएआरआई में शहर की जांच करने के लिए एक समेकित प्रयोगशाला बनायी जाए ताकि शहद उत्पादन को बढ़ावा देना आसान हो सके।  दोनों सचिवों ने इस बात सहमति व्यक्त की कि उचित प्रौद्योगिकीयों के जरिए किसान समुदाय की समस्याओं को हल किया जाए।

             विमर्श में हिस्सा लेने वाले सभी सदस्यों की राय थी कि मंत्रालय के तीनों विभागों के बीच नजदीकी समन्वय और सहयोग होना चाहिए ताकि खाद्य और पोषण सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके और कृषि क्षेत्र का विकास हो सके। अध्यक्ष ने 2022 तक किसानों की आय दोगुना करने संबंधी प्रधानमंत्री के दृष्टिकोण के अनुपालन के लिए मिलकर काम करने की आवश्यकता पर जोर दिया।

जल संरक्षण में महिलाओं की भागीदारी, गांवों में जल क्रांति

                 जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्री सुश्री उमा भारती ने घोषणा की है कि जल संरक्षण के क्षेत्र में देश भर के अग्रणी गांवों को जल क्रांति अभियान के तहत प्रचारित किया जायेगा।

          सुश्री भारती ने नई दिल्‍ली में जल क्रांति अभियान पर आयोजित एक राष्‍ट्रीय सम्‍मेलन को संबोधित करते हुए यह घोषणा की। सुश्री भारती ने कहा कि मंत्रालय के अधिकारियों एवं गैर सरकारी संगठनों की एक समिति देश भर के ऐसे गांवों की पहचान करेगी। मंत्रालय के अधिकारी एवं वे स्‍वयं ऐसे गांवों का दौरा करेंगी। इसके बाद ऐसे गांवों को प्रचारित किया जायेगा एवं वहां हुए उल्‍लेखनीय कार्यों से देश के अन्‍य भागों के गांवों के लोगों को भी रूबरू कराया जायेगा। ताकि वे लोग अपने अपने गांवों में जाकर जल संरक्षण के लिए कार्य करने को प्रेरित हो सकें। 

               सुश्री भारती ने कहा कि सभी लोगों को मिलकर गांवों और शहरों में जल संरक्षण की अलख जगाने की जरूरत है। उन्‍होंने कहा कि शहरों के प्रदूषित जल का शुद्धिकरण कर किस प्रकार बेहतर इस्‍तेमाल किया जाये, इसके बारे में भी विचार किया जाना जरूरी है। उन्‍होंने जल संरक्षण में महिलाओं के भूमिका का जिक्र करते हुए कहा कि जल क्रांति अभियान एवं जल उपभोक्‍ता संगठनों में महिलाओं की भागीदारी बढाए जाने की जरूरत है। सम्‍मेलन को संबोधित करते हुए जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण राज्‍य मंत्री सजीव बालियान ने कहा कि जल क्रांति अभियान के तहत चयनित जल ग्राम आदर्श गांव के रूप में स्‍थापित हों, इसके लिए प्रयास किये जाने की जरूरत है। 

               उन्‍होंने कहा कि एक सफल गांव बाकी गांवों के लिए प्रेरणा बन सकता है। सम्‍मेलन में जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय के सचिव अमरजीत सिंह ने कहा कि वर्ष 2050 तक देश में आज पैदा होने वाले अन्‍न से लगभग दुगुने अन्‍न की जरूरत होगी। लेकिन देश में पानी सीमित है। हो सकता है उपलब्‍ध जल में से भी कुछ भाग औद्योगिक ईकाइयों को देना पडे। इसलिए जल का बेहतर से बेहतर उपयोग करते हुए अपनी उपज को दुगुना करना किसान के समाने एक बड़ी चुनौती है। देश भर के विभिन्‍न हितधारक समूहों जैसे किसान, पंचायत सदस्‍य, अधिकारी, गैर सरकारी संगठन के प्रतिनिधियों और छात्रों सहित 700 प्रतिभागियों ने  इस एक दिवसीय सम्‍मेलन में भाग लिया।

                    उल्‍लेखनीय है कि जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्री सुश्री उमा भारती ने देशभर में एक समग्र एकीकृत दृष्टिकोण के माध्‍यम से सभी हितधाकरों को शामिल कर जन आंदोलन द्वारा जल संरक्षण और प्रबंधन को संघटित करने के लिए 05 जून, 2015 को जल क्रांति अभियान का शुभारंभ किया था। जल क्रांति अभियान का मुख्‍य  उद्देश्‍य ‘ सहभागी सिंचाई प्रबंधन के लिए पंचायती राज संस्‍थाओं और स्‍थानीय इकाइयों सहित  जमीनी स्‍तर पर सभी हितधारकों की भागीदारी को सुदृढ़ करना है। जल क्रांति के चार घटक हैं। 

              इनमें जल ग्राम योजना, मॉडल कमांड क्षेत्र का विकास , प्रदूषण को रोकना  और जन जागरूकता पैदा करना शामिल है। ग्राम जल योजना के तहत देश भर के प्रत्‍येक जिले के जल संकट से प्रभावित दो गांवों का चयन कर उनके लिए समग्र जल सुरक्षा योजना को सूत्रबद्ध करना है। 828 ऐसे गांवों की पहचान करने का लक्ष्‍य है। अब तक 726 गांवों की पहचान कर ली गई है, साथ ही 180 गांवों के लिए समेकित जल सुरक्षा योजना तैयार कर ली गई है। इनमें से 61 योजनाओं को मंजूरी दे दी गई है।

देश के प्रमुख जलाशयों में तीन प्रतिशत की कमी

             देश के 91 प्रमुख जलाशयों में 64.55 बीसीएम (अरब घन मीटर) जल का संग्रहण आंका गया। यह इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 44 प्रतिशत है। यह पिछले वर्ष की इसीअवधि के कुल संग्रहण का 132 प्रतिशत तथा पिछले दस वर्षों के औसत जल संग्रहण का 102 प्रतिशत है।

               इन 91 जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता 157.799 बीसीएम है, जो समग्र रूप से देश की अनुमानित कुल जल संग्रहण क्षमता 253.388 बीसीएम का लगभग 62 प्रतिशत है। इन 91 जलाशयों में से 37 जलाशय ऐसे हैंजो 60 मेगावाट से अधिक की स्थापित क्षमता के साथ पनबिजली संबंधी लाभ देते हैं। उत्तरी क्षेत्र में हिमाचल प्रदेश, पंजाब तथा राजस्थान आते हैं। इस क्षेत्र में 18.01 बीसीएम की कुल संग्रहण क्षमता वाले छह जलाशय हैं, जो केन्द्रीय जल आयोग (सीडब्यूसी) की निगरानी में हैं। इन जलाशयों में कुल उपलब्ध संग्रहण 5.18 बीसीएम है, जो इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 29 प्रतिशत है।

               पिछले वर्ष की इसी अवधि में इन जलाशयों की संग्रहण स्थिति 31 प्रतिशत थी। पिछले दस वर्षों का औसत संग्रहण इसी अवधि में इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 36 प्रतिशत था। इस तरह पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में चालू वर्ष में संग्रहण कम है। यह पिछले दस वर्षों की इसी अवधि के दौरान रहे औसत संग्रहण से भी कम है।
 

                पूर्वी क्षेत्र में झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल एवं त्रिपुरा आते हैं। इस क्षेत्र में 18.83 बीसीएम की कुल संग्रहण क्षमता वाले 15 जलाशय हैं, जो सीडब्ल्यूसी की निगरानी में हैं। इन जलाशयों में कुल उपलब्धक संग्रहण 11.93 बीसीएम है, जो इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का  63 प्रतिशत है। पिछले वर्ष की इसी अवधि में इन जलाशयों की संग्रहण स्थिति 46 प्रतिशत थी। पिछले दस वर्षों का औसत संग्रहण इसी अवधि में इन जलाशयों की कुलसंग्रहण क्षमता का 48  प्रतिशत था। इस तरह पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में चालू वर्ष में संग्रहण बेहतर है। यह पिछले दस वर्षों की इसी अवधि के दौरान रहे औसत संग्रहण से भी बेहतर है।
 

               पश्चिमी क्षेत्र में गुजरात तथा महाराष्ट्र आते हैं। इस क्षेत्र में 27.07 बीसीएम की कुल संग्रहण क्षमता वाले 27 जलाशय हैं, जो सीडब्ल्यूसी की निगरानी में हैं। इन जलाशयों में कुल उपलब्ध संग्रहण 14.64 बीसीएम है, जो इनजलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 54 प्रतिशत है। पिछले वर्ष की इसी अवधि में इन जलाशयों की संग्रहण स्थिति 28 प्रतिशत थी। पिछले दस वर्षों का औसत संग्रहण इसी अवधि में इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 50 प्रतिशत था। इस तरह पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में चालू वर्ष में संग्रहण बेहतर है। यह पिछले दस वर्षों की इसी अवधि के दौरान रहे औसत संग्रहण से भी बेहतर है।
 

            मध्य क्षेत्र में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश तथा छत्तीसगढ़ आते हैं। इस क्षेत्र में 42.30 बीसीएम की कुल संग्रहण क्षमता वाले 12 जलाशय हैं, जो सीडब्ल्यूसी की निगरानी में हैं। इन जलाशयों में कुल उपलब्ध संग्रहण 22.64 बीसीएम है, जो इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 55 प्रतिशत है। पिछले वर्ष की इसी अवधि में इन जलाशयों की संग्रहण स्थिति 38 प्रतिशत थी। पिछले दस वर्षों का औसत संग्रहण इसी अवधि में इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 37 प्रतिशत था। इस तरह पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में चालू वर्ष में संग्रहण बेहतर है। यह पिछले दस वर्षों की इसी अवधि के दौरान रहे औसत संग्रहण से भी बेहतर है।
 

             दक्षिणी क्षेत्र में आंध्र प्रदेश (एपी), तेलंगाना (टीजी), एपी एवं टीजी (दोनों राज्यों में दो संयुक्त परियोजनाएं), कर्नाटक, केरल एवं तमिलनाडु आते हैं। इस क्षेत्र में 51.59 बीसीएम की कुल संग्रहण क्षमता वाले 31 जलाशय हैं, जोसीडब्ल्यूसी की निगरानी में हैं। इन जलाशयों में कुल उपलब्ध संग्रहण 10.16 बीसीएम है, जो इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 20 प्रतिशत है। पिछले वर्ष की इसी अवधि में इन जलाशयों की संग्रहण स्थिति 22 प्रतिशत थी। पिछले दस वर्षों का औसत संग्रहण इसी अवधि में इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 36 प्रतिशत था। इस तरह चालू वर्ष में संग्रहण पिछले वर्ष की इसी अवधि में हुए संग्रहण से कम है। यह पिछले दस वर्षों की इसी अवधि के दौरान रहे औसत संग्रहण से कम है।
 

               पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में जिन राज्यों में जल संग्रहण बेहतर है उनमें पंजाब, राजस्थान, झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, गुजरात, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश,  मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, एपी एवं टीजी (दोनों राज्यों में दो संयुक्त परियोजनाएं) और तेलंगाना शामिल हैं। इसी अवधि के लिए पिछले साल की तुलना में कम भंडारण होने वाले राज्य, हिमाचल प्रदेश, त्रिपुरा, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु हैं।

खानपान में महिलाओं को 33 प्रतिशत उप-कोटा

            रेल मंत्री सुरेश प्रभाकर प्रभु ने अभी हाल में नई खानपान नीति 2017 की शुरूआत की थी, जिसमें कई नए पक्षों को शामिल किया गया। 

            इनमें महिलाओं के लिए विशेष प्रावधान भी किए गए। इस नीति के तहत प्रत्येक आरक्षित जलपान इकाईयों में महिलाओं को 33 प्रतिशत का उप-कोटा दिया जाएगा ताकि महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण को बढ़ावा मिल सके। यह निर्णय रेल बजट 2016-17 की घोषणाओं के भी अनुरूप है।  सभी श्रेणी के स्टेशनों पर लघु जलपान इकाईयों के प्रत्येक वर्ग के आवंटन के मद्देनजर महिलाओं को 33 प्रतिशत उप-कोटा प्रदान किया जा रहा है। इससे ए1, ए, बी और सी श्रेणी के स्टेशनों में महिलाओं को कम से कम 8 प्रतिशत स्टॉल प्रत्येक वर्ग में प्राप्त होंगे। 

             इसी प्रकार डी, ई और एफ श्रेणी के स्टेशनों पर कम से कम 17 प्रतिशत प्राप्त होंगे। भारतीय रेल में लगभग 8 हजार लघु जलपान इकाईयां हैं। इस प्रावधान के तहत रेल विभाग सुनिश्चित करेगा कि महिलाओं की भागीदारी किसी भी तरह कम न हो पाए। 

जवाहरलाल नेहरू विश्‍वविद्यालय को ‘सर्वश्रेष्‍ठ विश्‍वविद्यालय’,’अनुसंधान’,के लिए पुरस्‍कार

           राष्‍ट्रपति भवन में आयोजित नवाचार उत्‍सव के तीसरे दिन आयोजित समारोह में राष्‍ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा वर्ष 2017 के लिए आगंतुक पुरस्‍कार प्रदान करने के साथ ही यह उत्‍सव संपन्‍न हो गया।

          राष्‍ट्रपति ने ‘सर्वश्रेष्‍ठ विश्‍वविद्यालय’ का आगंतुक पुरस्‍कार नई दिल्‍ली के जवाहरलाल नेहरू विश्‍वविद्यालय को प्रदान किया। ‘नवाचार’ के लिए यह पुरस्‍कार प्‍लास्टिक के कचरे से कम पैमाने पर सीधे एलपीजी तैयार करने का रियेक्‍टर विकसित करने के लिए हिमाचल प्रदेश के केंद्रीय विश्‍वविद्यालय के स्‍कूल ऑफ अर्थ एंड एनवायरमेंट साइंसेज, पर्यावरण विभाग के डॉ. दीपक पंत को प्रदान किया गया। ‘अनुसंधान’ के लिए आगंतुक पुरस्‍कार संयुक्‍त रूप से बनारस हिन्‍दू विश्‍वविद्यालय के चिकित्‍सा विज्ञान संस्‍थान, चिकित्‍सा विभाग के डॉ. श्‍याम सुन्‍दर और तेजपुर विश्‍वविद्यालय के रसायन विज्ञान विभाग के प्रो. निरंजन करक को प्रदान किया गया। 

            डॉ. श्‍याम सुन्‍दर को भारतीय कालाजार की जांच और इलाज के क्षेत्र में योगदान के लिए और प्रो. निरंजन करक को स्‍व-सफाई, स्‍व-चिकित्‍सा और जैव संगत स्‍मार्ट टिकाऊ सामग्री के रूप में जैव अवक्रमणीय हाइपर ब्रांच पोलिमर नैनो कम्‍पोजिट्स पर आधारित नवीकरणीय संसाधन विकसित करने के लिए यह पुरस्‍कार प्रदान किया गया। प्रत्‍येक श्रेणी के विजेताओं का चयन करने के लिए सभी विश्‍वविद्यालयों से ऑन लाइन आवेदन आमंत्रित किये गये थे। 

             राष्‍ट्रपति सचिवालय में सचिव श्रीमती ओमिता पॉल की अध्‍यक्षता में गठित चयन समिति ने आवेदनों की जांच कर पुरस्‍कारों के लिए विजेताओं का चयन किया। इस समिति में उच्‍च शिक्षा विभाग तथा विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव, विश्‍वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के अध्‍यक्ष, राष्‍ट्रीय नवाचार फाउंडेशन के उपाध्‍यक्ष तथा वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) के महानिदेशक शामिल थे। 

            इस अवसर पर राष्‍ट्रपति ने कहा कि अनुसंधान गतिविधियां हमारे देश की विकास संबंधी चुनौतियों के अनुरूप होनी चाहिए। हमारे देश के विश्‍वविद्यालयों के प्रतिभावान लोगों को स्‍वच्‍छता, शहरी परिवहन, अपशिष्‍ट निपटान, स्‍वच्‍छ नदी प्रणाली, स्‍वास्‍थ्‍य देखभाल और सूखा रोधी खेती जैसे क्षेत्रों की समस्‍याओं के समाधान के लिए कार्य करना चाहिए। उन्‍हें अपने ज्ञान का इस्‍तेमाल नवाचार के उत्‍पाद तैयार करने के लिए करना चाहिए, ताकि इसका सीधा लाभ आम जनता को हो।

भूजल में आर्सेनिक एवं प्रदूषण से निपटने के लिए जनआंदोलन

             केन्‍द्रीय जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्री सुश्री उमा भारती ने कहा है कि गंगा बेसिन में आर्सेनिक की समस्‍या से करोडों लोग प्रभावित हो रहे हैं। 

           इस समस्‍या के बारे में लोगों को जागरूक करने के लिए एकसमग्र आंदोलन चलाए जाने की जरूरत है। नई दिल्‍ली में केंद्रीय भूमि जल बोर्ड की ओर से ‘गंगा बेसिन के भूजल में आर्सेनिक की समस्या एवं निराकरण’ विषय पर आयोजित कार्याशाला का उदघाटन करते हुए उन्‍होंने कहा कि भूजल में आर्सेनिक की समस्‍या सेनिपटने के लिए इस कार्यशाला की रिपोर्ट आने के बाद मंत्रालय एक व्‍यापक कार्ययोजना तैयार करेगा। जिसमें राज्‍य सरकारों एवं गैर सरकारी संगठनों का भी सहयोग लिया जायेगा। 

               विकास में जनभागिदारी के महत्‍व पर जोर डालते हुए उन्‍होंने कहा कि भूजल में आर्सेनिक एवं अन्‍य प्रदूषण से निपटने के लिए भी जनआंदोलन खडा करना पडेगा। इसी प्रकार जल के सदुपयोग को भी जन आंदोलन बनाये जाने की जरूरत है। सुश्री भारती ने कहा कि उन्‍होंने भी ऐसे कई गांव देखे हैं जहां जल संरक्षण के क्षेत्र में महत्‍वपूर्ण कार्य हुआ है। सुश्री भारती ने कहा कि ग्रामीण भारत को पीने के पानी की जरूरतों को पूरा करने में 85ऽ के आसपास योगदान भूजल का है। भारत सरकार की योजनाओं में भूजल संसाधनों की स्थिरता एक बडा एजेंडा है। क्योंकि बदलती जीवन शैली और बढ़ती जनसंख्या के साथ पानी की मांग भी बढ़ रही है। भूजल संसाधनों का संरक्षण करने और उन्हें बचाने की अत्यन्त जरूरत है। 

             सुश्री भारती ने कहा कि भूजल संसाधनों से संबंधित समस्याओं में से एक प्रमुख समस्या पानी की गुणवत्ता की है। भूजल में आर्सेनिक की मौजूदगी जहर के समान है। यह मानव स्वास्थ्य के‍ लिए गंभीर खतरा बना हुआ है। उन्‍होंने कहा कि केन्द्रीय भूमि जल बोर्ड और जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय द्वारा गंगा बेसिन में कृत्रिम पुनर्भरण और वर्षा जल संचयन को बढ़ावा देने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं, जिससे भूजल की गुणवत्ता में सुधार लाने में मदद मिलेगी। केन्‍द्रीय जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्री ने विश्वविद्यालयों, आईआईटी और अनुसंधान संस्थानों में काम कर रहे भूजल विशेषज्ञों से आह़वान किया कि वे भी अपने महत्‍वपूर्ण सुझाव दें, ताकि मंत्रालय को इससमस्‍या के समाधान के लिए भविष्य की रणनीति बनाने में सहायता मिल सके। 

                  कार्यशाला के उदघाटन सत्र में केन्‍द्रीय जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण राज्‍य मंत्री संजीव बालियान ने कहा कि भूजल में आर्सेनिक की समस्‍या से देश की 50 फीसदी जनता जूझ रही है। उन्‍होंने कहा कि इससमस्‍या से निपटने के लिए सभी विभागों को एक सामूहिक सोच बनानी पडेगी। मिलकर कार्य करना होगा। मंत्रालय के सचिव डॉ अमरजीत सिंह ने इस अवसर पर कहा कि गंगा नदी से ही सर्वोधिक जल मिल रहा है। यही नदी आर्सेनिक से ज्‍यादा प्रदूषित है। 

            इस समस्‍या के निजात पाने के लिए राज्‍यों में टास्‍क फोर्स बनाकर कार्य किया जायेगा। उल्‍लेखनीय है कि इस एक दिवसीय इस कार्यशाला में देशभर के विभिन्‍न राज्‍यों एवं संस्‍थानों से  आए 300 से ज्‍यादा प्रतिनिधियों ने भाग लिया। कार्यशाला के लिए 23 प्रपत्र चुने गए जिसमें से सात प्रपत्रों पर विशेषज्ञों एवंभूजल वैज्ञानिकों के बीच विस्‍त़त चर्चा हुई।

राष्ट्रपति का घाना के राष्ट्रीय दिवस के अवसर पर संदेश

            राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने घाना गणराज्य के राष्ट्रीय दिवस के अवसर पर वहां की सरकार और लोगों को बधाई तथा शुभकामनाएं दी हैं। 

           राष्ट्रपति मुखर्जी ने घाना गणराज्य के राष्ट्रपति महामहिम नाना अडो दंकवा अकुफो-अडो को भेजे अपने संदेश में कहा है, ‘मुझे भारत सरकार, यहां के लोगों और अपनी तरफ से घाना गणराज्य की सरकार, आपको और वहां के लोगों को आपके देश के राष्ट्रीय दिवस के अवसर पर बधाई देते हुए अत्‍याधिक प्रसन्‍नता हो रही है। भारत और घाना के बीच लम्‍बे समय से मित्रतापूर्ण संबंध और सुदृढ़ सहयोग है।

             मुझे विश्‍वास है कि आने वाले समय में हमारे बीच बहुआयामी संबंध और सुदृढ़ होंगे। महामहिम इस अवसर पर मैं आपके स्वास्थ्य और कल्‍याण के साथ ही घाना गणराज्य के मित्रवत लोगों की तरक्की और समृद्धि की शुभकामनाएं देता हूं।