Thursday, 13 April 2017

देश के 91 प्रमुख जलाशयों में एक प्रतिशत की कमी

                 देश के 91 प्रमुख जलाशयों में 48.42 बीसीएम (अरब घन मीटर) जल का संग्रहण आंका गया। यह इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 31 प्रतिशत है। 6 अप्रैल, 2017 को समाप्त हुए सप्ताह के दौरान यह 32 प्रतिशत था।  यह पिछले वर्ष की इसी अवधि के कुल संग्रहण का 132 प्रतिशत तथा पिछले दस वर्षों के औसत जल संग्रहण का 106 प्रतिशत है।

            इन 91 जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता 157.799 बीसीएम है, जो समग्र रूप से देश की अनुमानित कुल जल संग्रहण क्षमता 253.388 बीसीएम का लगभग 62 प्रतिशत है। इन 91 जलाशयों में से 37 जलाशय ऐसे हैं जो 60 मेगावाट से अधिक की स्थापित क्षमता के साथ पनबिजली संबंधी लाभ देते हैं। उत्तरी क्षेत्र में हिमाचल प्रदेश, पंजाब तथा राजस्थान आते हैं। इस क्षेत्र में 18.01 बीसीएम की कुल संग्रहण क्षमता वाले छह जलाशय हैं, जो केन्द्रीय जल आयोग (सीडब्यूसी) की निगरानी में हैं। इन जलाशयों में कुल उपलब्ध संग्रहण 4.23 बीसीएम है, जो इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 23 प्रतिशत है। पिछले वर्ष की इसी अवधि में इन जलाशयों की संग्रहण स्थिति 23 प्रतिशत थी। पिछले दस वर्षों का औसत संग्रहण इसी अवधि में इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 30 प्रतिशत था। इस तरह पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में चालू वर्ष में संग्रहण बराबर है। यह पिछले दस वर्षों की इसी अवधि के दौरान रहे औसत संग्रहण से कमतर है।

                पूर्वी क्षेत्र में झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल एवं त्रिपुरा आते हैं। इस क्षेत्र में 18.83 बीसीएम की कुल संग्रहण क्षमता वाले 15 जलाशय हैं, जो सीडब्ल्यूसी की निगरानी में आते हैं। इन जलाशयों में कुल उपलब्ध संग्रहण 9.21 बीसीएम है, जो इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 49 प्रतिशत है। पिछले वर्ष की इसी अवधि में इन जलाशयों की संग्रहण स्थिति 34 प्रतिशत थी। पिछले दस वर्षों का औसत संग्रहण इसी अवधि में इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 35 प्रतिशत था। इस तरह पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में चालू वर्ष में संग्रहण बेहतर है। यह पिछले दस वर्षों की इसी अवधि के दौरान रहे औसत संग्रहण से भी बेहतर है। 

             पश्चिमी क्षेत्र में गुजरात तथा महाराष्ट्र आते हैं। इस क्षेत्र में 27.07 बीसीएम की कुल संग्रहण क्षमता वाले 27 जलाशय हैं, जो सीडब्ल्यूसी की निगरानी में हैं। इन जलाशयों में कुल उपलब्ध संग्रहण 10.59 बीसीएम है, जो इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता 39 प्रतिशत है। पिछले वर्ष की इसी अवधि में इन जलाशयों की संग्रहण स्थिति 20 प्रतिशत थी। पिछले दस वर्षों का औसत संग्रहण इसी अवधि में इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 38 प्रतिशत था। इस तरह पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में चालू वर्ष में संग्रहण बेहतर है। यह पिछले दस वर्षों की इसी अवधि के दौरान रहे औसत संग्रहण से भी बेहतर है। 

            मध्य क्षेत्र में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश तथा छत्तीसगढ़ आते हैं। इस क्षेत्र में 42.30 बीसीएम की कुल संग्रहण क्षमता वाले 12 जलाशय हैं, जो सीडब्ल्यूसी की निगरानी में हैं। इन जलाशयों में कुल उपलब्धक संग्रहण 18.16 बीसीएम है, जो इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 43 प्रतिशत है। पिछले वर्ष की इसी अवधि में इन जलाशयों की संग्रहण स्थिति 31 प्रतिशत थी। पिछले दस वर्षों का औसत संग्रहण इसी अवधि में इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 27 प्रतिशत था। इस तरह पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में चालू वर्ष में संग्रहण बेहतर है। यह पिछले दस वर्षों की इसी अवधि के दौरान रहे औसत संग्रहण से भी बेहतर है। 

              दक्षिणी क्षेत्र में आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, एपी एवं टीजी (दोनों राज्यों में दो संयुक्त परियोजनाएं), कर्नाटक, केरल एवं तमिलनाडु आते हैं। इस क्षेत्र में 51.59 बीसीएम की कुल संग्रहण क्षमता वाले 31 जलाशय हैं, जो सीडब्ल्यूसी की निगरानी में हैं। इन जलाशयों में कुल उपलब्ध संग्रहण 6.23 बीसीएम है, जो इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 12 प्रतिशत है। पिछले वर्ष की इसी अवधि में इन जलाशयों की संग्रहण स्थिति 15 प्रतिशत थी। पिछले दस वर्षों का औसत संग्रहण इसी अवधि में इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 23 प्रतिशत था। इस तरह चालू वर्ष में संग्रहण पिछले वर्ष की इसी अवधि में हुए संग्रहण से कमतर है। यह पिछले दस वर्षों की इसी अवधि के दौरान रहे औसत संग्रहण से भी कमतर है।

          पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में जिन राज्यों में जल संग्रहण बेहतर है उनमें पंजाब, राजस्थान, झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, गुजरात, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, एपी एवं टीजी (दोनों राज्यों में दो संयुक्त परियोजनाएं) तेलंगाना शामिल हैं। पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में कम भंडारण होने वाले राज्य हिमाचल प्रदेश, त्रिपुरा, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु हैं।

भारत व फ्रांस के बीच रेलवे सहयोग

              रेल मंत्री सुरेश प्रभाकर प्रभु ने फ्रांस के परिवहन, समुद्री मामलों और मत्स्य पालन मंत्री एलेन विडालीज के साथ मुलाकात की। इस दौरान एलेन विडालीज के साथ एक शिष्टमंडल भी मौजूद था।

             इस अवसर पर दोनों पक्षों ने आपसी विचार-विमर्श किया। दोनों पक्षों ने फ्रेंच नेशनल रेलवे और भारतीय रेलवे (आईआर) के बीच लंबे समय से चली आ रही तकनीकी सहयोग को याद किया। रेलवे के क्षेत्र में अपने सहयोग को और मजबूत करने की प्रतिबद्धता जाहिर की। भारत व फ्रांस ने 2013 में भारत के रेल मंत्रालय और फ्रेंच नेशनल रेलवे (एसएनसीएफ) के बीच हस्ताक्षरित ज्ञापन समझौते के तहत इस सहयोग को विकसित करने की प्रतिबद्ध जताई।

               इस द्विपक्षीय बैठक में दोनों देशों ने आपसी सहयोग को और मजबूत करने तथा आगे बढ़ाने पर जोर दिया। भारत में 66600 किलोमीटर रेलवे और 7000 से अधिक स्टेशन हैं। विशेष प्राथमिकता क्षेत्र सुरक्षा गति में सुधार लाने, स्टेशनों की मरम्मत और सुधार, यात्री सुविधाएं, माल ढुलाई और नेटवर्क का विस्तार करने पर केंद्रित हैं। फ़्रांस में रेलवे नेटवर्क 30 000 किमी लंबा है, 2000 किलोमीटर से अधिक हाई स्पीड ट्रैक और लगभग 3000 स्टेशन हैं। हाई स्पीड नेटवर्क का अभी भी विस्तार किया जा रहा है। फ़्रांस में सुरक्षा और सुविधाओं में सुधार निश्चित रूप से चिंता का विषय बना हुआ है। 

             इस संदर्भ में, दोनों नेताओं ने आम चुनौतियों का सामना करने के लिए नियमित अनुभव साझा करने पर सहमति व्यक्त की। दोनों पक्ष इस बात पर सहमत हुए कि पारस्परिक सहयोग और विशेषज्ञता का आदान-प्रदान करके दोनों देशों के हितधारकों को लाभ होगा। दोनों देशों के बीच यह सहयोग विशेष रूप से हाई स्पीड और सेमी- हाई स्पीड रेल; वर्तमान संचालन और बुनियादी ढांचे का आधुनिकीकरण; स्टेशन नवीकरण और संचालन; उपनगरीय गाड़ियां; सुरक्षा प्रणालियां, संचालन और सुरक्षा क्षेत्रों पर केंद्रित रहेगा । 

              सेमी हाई स्पीड के लिए, दोनों पक्षों ने 2015 में और दिल्ली और चंडीगढ़ (244 किमी) के बीच मौजूदा रेल मार्ग में सुधार कर यात्री ट्रेन की गति को 200 किलोमीटर प्रति घंटे करने के लिए तकनीकी और कार्यकारी अध्ययन करने का निर्णय लिया था। इस अध्ययन के सितंबर -2017 तक पूरा होने की संभावना है। जब दोनों पक्षों के बीच सहयोगात्मक कार्यक्रम होगा तो उस समय संबंधित संस्थाओं सहित सरकारी संस्थाओं, एजेंसियों और कंपनियों, वैज्ञानिकों और तकनीकी अनुसंधान निकायों और निजी कंपनियों को सहयोग में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया जाएगा।