पहुंच से दूर स्वास्थ्य सुविधाएं
खबर है कि हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञों ने पाया है कि स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में भी भारतीय महिलाएं भेदभाव की शिकार हैं।
रूढ़िवादी सोच के चलते महिलाएं कई बार अपनी स्वास्थ्य समस्याओं के बारे में बता तक नहीं पातीं। खबरों की मानें तो अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), भारतीय सांख्यिकीय संस्थान, प्रधानमंत्री आर्थिक सलाहकार परिषद और हार्वर्ड विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक संयुक्त अध्ययन में पाया गया है कि भारत में लैंगिक आधार पर भेदभाव की वजह से महिलाओं के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ रहा है।
खबरों की मानें तो शोधकर्ताओं ने 2016 में जनवरी से लेकर दिसंबर तक एम्स में इलाज कराने आए 23,77,028 मरीजों के रिकॉर्ड का अध्ययन किया। अध्ययन में पाया गया कि सिर्फ 33 प्रतिशत महिलाओं को ही स्वास्थ्य सेवा मिल पाती है। वहीं, पुरुषों में यह दर 67 प्रतिशत है।
एम्स एशिया का तीसरा सबसे बड़ा अस्पताल है। यहां उच्च स्तर की इलाज की सुविधा उपलब्ध है। खबरों की मानें तो हर साल यहां 20 लाख से ज्याद मरीजों का इलाज होता है। यहां आने वाले मरीजों में से 90 प्रतिशत चार राज्य बिहार, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और दिल्ली के होते हैं। इन चारों राज्यों की कुल आबादी 39 करोड़ से ज्यादा है।
खबरों की मानें तो शोध से यह पता चला कि महिला की प्रजनन आयु यह निर्धारित करने में बड़ी भूमिका निभाती है कि वह इलाज के लिए डॉक्टर तक पहुंच सकती है या नहीं। 31 से 44 वर्ष की उम्र की महिलाओं को लैंगिक भेदभाव का सामना कम करना पड़ता है। इस उम्र के दायरे में 1.5 पुरुष मरीज प्रति महिला मरीज का आंकड़ा मिला है। वहीं 45 से 59 वर्ष की महिलाओं में लैंगिग भेदभाव की दर 1.4 पुरुष मरीज प्रति महिला मरीज है। 18 साल उम्र तक की महिलाओं के साथ लैंगिक भेदभाव बढ़कर 1.9 पुरुष मरीज प्रति महिला और 19 से 30 साल की उम्र वाली महिलाओं के साथ यह बढ़कर 2.02 पुरुष मरीज प्रति महिला हो जाता है। 2016 में 60 वर्ष से ऊपर की उम्र की बात करें तो यह दर एक महिला मरीज के मुकाबले 1.7 पुरुष मरीज रही।
खबरों की मानें तो अध्ययन से यह भी पता चला कि राजधानी दिल्ली से मरीज के रहने के स्थान की दूरी की वजह से भी इलाज में लैंगिक भेदभाव बढ़ता है। दिल्ली के मुकाबले बिहार और पूर्वांचल (उत्तर प्रदेश) से काफी कम संख्या में महिलाएं इलाज करवाने आईं। 2016 में बिहार से एम्स में इलाज करवाने आए पुरुषों की संख्या 2 लाख से ज्याद रही, वहीं महिलाओं की संख्या 84,926 दर्ज की गई। दिल्ली में यह लैंगिक असमानता कम दिखी। यहां 6 लाख 60 हजार पुरुष मरीजों के मुकाबले महिलाओं की संख्या 4 लाख 80 हजार रही।
एम्स एशिया का तीसरा सबसे बड़ा अस्पताल है। यहां उच्च स्तर की इलाज की सुविधा उपलब्ध है। खबरों की मानें तो हर साल यहां 20 लाख से ज्याद मरीजों का इलाज होता है। यहां आने वाले मरीजों में से 90 प्रतिशत चार राज्य बिहार, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और दिल्ली के होते हैं। इन चारों राज्यों की कुल आबादी 39 करोड़ से ज्यादा है।
खबरों की मानें तो शोध से यह पता चला कि महिला की प्रजनन आयु यह निर्धारित करने में बड़ी भूमिका निभाती है कि वह इलाज के लिए डॉक्टर तक पहुंच सकती है या नहीं। 31 से 44 वर्ष की उम्र की महिलाओं को लैंगिक भेदभाव का सामना कम करना पड़ता है। इस उम्र के दायरे में 1.5 पुरुष मरीज प्रति महिला मरीज का आंकड़ा मिला है। वहीं 45 से 59 वर्ष की महिलाओं में लैंगिग भेदभाव की दर 1.4 पुरुष मरीज प्रति महिला मरीज है। 18 साल उम्र तक की महिलाओं के साथ लैंगिक भेदभाव बढ़कर 1.9 पुरुष मरीज प्रति महिला और 19 से 30 साल की उम्र वाली महिलाओं के साथ यह बढ़कर 2.02 पुरुष मरीज प्रति महिला हो जाता है। 2016 में 60 वर्ष से ऊपर की उम्र की बात करें तो यह दर एक महिला मरीज के मुकाबले 1.7 पुरुष मरीज रही।
खबरों की मानें तो अध्ययन से यह भी पता चला कि राजधानी दिल्ली से मरीज के रहने के स्थान की दूरी की वजह से भी इलाज में लैंगिक भेदभाव बढ़ता है। दिल्ली के मुकाबले बिहार और पूर्वांचल (उत्तर प्रदेश) से काफी कम संख्या में महिलाएं इलाज करवाने आईं। 2016 में बिहार से एम्स में इलाज करवाने आए पुरुषों की संख्या 2 लाख से ज्याद रही, वहीं महिलाओं की संख्या 84,926 दर्ज की गई। दिल्ली में यह लैंगिक असमानता कम दिखी। यहां 6 लाख 60 हजार पुरुष मरीजों के मुकाबले महिलाओं की संख्या 4 लाख 80 हजार रही।

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