सामाजिक-आर्थिक, गणना की लागत 4893.60 करोड़, गरीबों की बेहतरी का मार्ग
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में आर्थिक मामलों पर कैबिनेट समिति (सीसीईए) ने सामाजिक-आर्थिक और जातिगत जनगणना 2011 (एसईसीसी 2011) की लागत में संशोधन करने संबंधी ग्रामीण विकास विभाग के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है।
इसमें सामाजिक-आर्थिक और जातिगत जनगणना 2011 की लागत को संशोधित करके 4893.60 करोड़ रुपये कर दिया गया है, जबकि इससे पहले स्वीकृत अनुमानित व्यय 3543.29 करोड़ रुपये था, जो सरकार द्वारा अनुमोदित 4000 करोड़ रुपये की सांकेतिक लागत के भीतर था। तय अवधि एवं लागत में बढ़ोतरी और इसके परिणामस्वरूप केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों के कंसोर्टियम के लिए प्रति-रिकॉर्ड लागत की ऊपरी सीमा में संशोधन को मंजूरी दे दी गई है।
सामाजिक-आर्थिक और जातिगत जनगणना-2011 परियोजना 31 मार्च, 2016 को पूरी हो चुकी है। इसके तहत तय धनराशि का परिव्यय पहले ही हो चुका है और परियोजना ने अपने सभी लक्ष्य प्राप्त कर लिए हैं। सरकार समाज के गरीब और अधिकार विहीन वर्ग की सहायता के लिए देश के ग्रामीण और शहरी इलाकों में गरीबी उन्मूलन और कल्याणकारी कार्यक्रमों पर भारी मात्रा में धनराशि खर्च कर रही है।
एसईसीसी ने गरीबों के लिए बेहतरी का मार्ग प्रशस्त किया है और गरीब परिवारों की स्थिति सुधारने के लिए साक्ष्य आधारित नियोजित हस्तक्षेप किया है। एसईसीसी के आंकड़ों की उपलब्धता से पहले, पात्र लाभान्वितों की सही पहचान करना एक प्रमुख चुनौती था। गरीबी रेखा से नीचे की सूची में पक्षपात के आरोपों के कारण सबसे गरीब को शामिल करने की प्रक्रिया प्रभावित हो रही थी। एसईसीसी के आंकड़े परिवारों द्वारा दी गई जानकारी पर आधारित हैं साथ ही परिवारों को यह अवसर प्रदान किया गया है कि वे एसईसीसी के एकत्र और प्रकाशित आंकड़ों के बारे में दावों और आपत्तियों को उठाएं।
अत: एसईसीसी के आंकड़े ग्रामीण विकास और अन्य विभागों द्वारा चलाई जा रही विभिन्न योजनाओं के अंतर्गत लाभान्वितों की पहचान करने और प्राथमिकता का आधार तय करने के लिए परिवारों द्वारा दी गई जानकारी की एक प्रामाणिक सूची प्रदान करते हैं।
परिवारों का क्रम त्रिस्तरीय प्रक्रिया के जरिए तय किया गया है। इसमें गरीब-नहीं परिवार, गरीब परिवारों में सबसे गरीब के लिए पांच स्वत: शामिल मानदंड और गरीब परिवारों की पहचान करने के लिए सात आपद मानदंडों को शामिल किया गया है। सरकार ने गरीब की पहचान करने के लिए राज्यों को दीन दयाल अंत्योदय योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण आदि के अंतर्गत एसईसीसी आंकड़े और परिवारों की टीआईएन संख्या प्रक्रिया का इस्तेमाल करने की सलाह दी है।
एसईसीसी-2011 के इस्तेमाल से लाभान्वित के चयन में पारदर्शिता आई है और डीबीटी के साथ उसकी संरचित व्यापकता का शासन और जवाबदेही पर अधिकतम प्रभाव पड़ा है।

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