उत्पादन को वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा के लिए सुधार की जरूरत
उपराष्ट्रपति एम हामिद अंसारी ने कहा कि भारतीय उत्पादन को वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा के लिए उत्पादकता और निपुणता के मामले में बहुत सुधार करने की जरूरत है। वे टाटा लिमिटेड के चेयरमैन एन चंद्रशेखरन को एएमएमए-जेआरडी टाटा कार्पोरेट लीडरशिप पुरस्कार प्रदान करने के बाद उपस्थिति जनों को संबोधित कर रहे थे।
उप राष्ट्रपति ने कहा कि हमारी कंपनियों को व्यापार क्षमताओं को विकसित करने से पहले मूल्य श्रृंखला के शीर्ष पर प्रतिस्पर्धा करने के लिए अपने आपको सुसज्जित करना है। लाभदायक विकास के लिए हमें लाभांश के लिए प्रयास करना होगा यह तभी अर्जित होगा जब हम उत्पादों का लक्ष्य रखें। इसके लिए उच्च गुणवत्ता वाले डिजाइन, इंजीनियरिंग और विनिर्माण की जरूरत है।
उप राष्ट्रपति ने कहा कि हमारी कंपनियों को भविष्य में करोबार परिदृश्यों का सृजन करने और इंजीनियरिंग के अवरोधों को दूर करने में सक्षम होना चाहिए। इससे पहले उप राष्ट्रपति ने जोखिम निवारण, ऋण की लत और अनुसंधान विकास व्यय कम करने सहित कॉर्पोरेट क्षेत्र की अंतर्निहित कमजोरियों का उल्लेख किया।
उप राष्ट्रपति ने कहा कि हमारे कॉरपोरेट क्षेत्र को निवेश करना है और अनुसंधान तथा नवाचार में भारी निवेश करना है। उन्होंने आगे कहा कि केवल उद्योगों को प्रोत्साहन देना हमारे अभिनव विकास के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता है। हमें नवाचार और उद्यमशीलता को प्रोत्साहित करने के लिए आवश्यक 'संस्कृति और व्यवहार' की शिक्षा की दिशा में काम करना चाहिए।
उप राष्ट्रपति ने कहा कि कुछ साल पहले, दो प्रबंधन गुरुओं ने यह कहा था कि एक जटिल और गतिशील वैश्विक प्रतिस्पर्धा के माहौल में अनुकूल क्षमता अस्तित्व और विकास की कुंजी है और भारतीय व्यवसाय को अपने आपको त्वरित विकास का मार्ग तभी प्राप्त होगा जब वे सोचना और उसके अनुकूल काम करना सीख जाएंगे।
वैश्विक विकास के लगातार चल रहे कम स्तरों, उत्पादन प्रौद्योगिकियों में हो रहे तेज़ी से बदलाव और उपभोक्ताओं के संदर्भों के मद्देनजर भारतीय कॉरपोरेट सेक्टर के सामने यह चुनौती है कि मंदी के दौर में अपने विकास को कैसे कायम रखें। क्योंकि एक तेजी से विकसित तकनीकी परिदृश्य में प्रतिस्पर्धा करते हुए ये संरक्षणवादी शासन को जन्म देती हैं।
यह चिंता का मामला है कि कई भारतीय कंपनियां इस प्रतिस्पर्धी और प्रतिबंधात्मक परिदृश्य के अनुकूल होने के लिए इसे अपनाने में कठिनाई अनुभव कर रही हैं। उप राष्ट्रपति ने कहा कि मुझे कुछ कठोर सच्चाइयों का उल्लेख करने की अनुमति दें। कई भारतीय कंपनियों के लिए, प्रतिस्पर्धा एक नई घटना है। भारतीय व्यवसायों में परंपरागत रूप से जोखिम का रुख रहा है।
कुछ महत्वपूर्ण उदाहरणों को छोड़कर ज्यादातर भारतीय कंपनियों को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में पर्याप्त आधारभूत और अनुभव की कमी है, क्योंकि घरेलू कारोबारी माहौल में गहन अंतर-फर्म प्रतिद्वन्दता नहीं है। इसके अतिरिक्त, लंबे समय तक सरकारी संरक्षण ने उन्हें वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी लड़ाइयों के लिए बेपरवाह अनुभव करने और अधूरी तैयारी के लिए छोड़ दिया है।
भारतीय कंपनियों के आंतरिक माहौल में बदलाव की एक वास्तविक आवश्यकता है जो प्रतिस्पर्धी सोच और व्यवहार को बढ़ावा दे सकती है। हमारे कॉर्पोरेट की इन अंतर्निहित कमजोरियों को पिछले कुछ सालों में धीमे अंतर्राष्ट्रीय विकास और भारतीय फर्मों की तथाकथित 'ऋण-लत' से जोड़ा जाता है। चूंकि आर्थिक मंदी का संकेत स्पष्ट हो गया, इक्विटी बाजार में निवेश स्थिर हो गया, लेकिन कॉर्पोरेट इंडिया ने ऋण जुटाना जारी रखा है।
2009-2014 के मध्य भारतीय कॉर्पोरेट क्षेत्र ने अपना कुल ऋण 20 लाख करोड़ से बढ़ाकर 41 लाख करोड़ कर दिया है। मौटे तौर पर यह 690 बिलियन डॉलर है। सीएमआईई प्रोवैस डाटाबेस में 18000 से अधिक कंपनियों के सर्वेक्षण में यह पता चला है कि पिछले 4 वर्षों में जबकि सकल राजस्व में 77 प्रतिशत की बढोत्तरी हुई लेकिन उनका ऋण दोगुना हो गया है और ब्याज भुगतान 146 प्रतिशत बढ़ गया तथा कुल लाभ में 32 प्रतिशत गिरावट आयी।
भारत को वैश्विक रूप से अपने सेवा क्षेत्र के लिए जाना जाता है जिसका भारत के सकल घरेलू उत्पाद में 60 प्रतिशत का योगदान है। जबकि इसका रोजगार जुटाने में केवल 15 प्रतिशत योगदान है। भारत जैसे बड़े और घनी आबादी वाले देश में बड़ी संख्या में रोजगार और समृद्धि सुनिश्चित करने के लिए उत्पादन का सकल घरेलू उत्पाद में महत्वपूर्ण हिस्सा होने की जरूरत है।
हमारे देश में घरेलू खपत बढ़ रही है जिससे विदेशी बाजारों में तेज और गहरी पहुंच बनने से विकास की गति बढ़ाने में मदद मिलेगी। लाभदायक विकास के लिए हमें लाभांश के लिए प्रयत्न करना चाहिए और यह तभी होगा अगर हम उत्पादों का लक्ष्य रखें जिसके लिए उच्च गुणवत्ता डिजाइन, इंजीनियरिंग और उत्पादन की जरूरत पड़ती है।
भारतीय उत्पादन को वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा के लिए उत्पादकता और कुशलता के रूप में बहुत सुधार करने की जरूरत है। एशियाई उत्पादकता संगठन (एपीओ) के उत्पादकता डाटा बेस 2014 के अनुसार देश में औसत कुल कारक उत्पादकता टीएफपी जो 2000-2005 तक दो प्रतिशत थी 2005-2010 में बढ़कर 4.7 प्रतिशत हो गयी लेकिन यह अगले दो वर्षों में गिरकर 0.9 प्रतिशत पर आ गयी।
2010-2012 में टीपीएफ ने भारत की जीडीपी प्रगति में 11 प्रतिशत योगदान किया। तुलनात्मक रूप से चीन की जीडीपी विकास में यह हिस्सा 26 प्रतिशत था। उप राष्ट्रपति ने कहा कि वर्तमान में अधिकांश भारतीय कंपनियां अपने घटक या गैर-ब्रांडेड उत्पाद बेचकर वैश्विक मूल्य श्रृंखला में निचले स्तर पर हैं।
यह सच सेवा क्षेत्र में भी हमारी कंपनियों के लिए देखने को मिलता है। हमारी कंपनियों को व्यापार क्षमता विकसित करने से पहले मूल्य श्रृंखला के शीर्ष पर मुकाबला करने के लिए अपने आपको सुसज्जित करना होगा। मेक इन इंडिया विजन को इसे ठीक करना होगा।
विश्व स्तर पर बड़े उत्पादकों के साथ प्रतिस्पर्धा करने के लिए दिखावा लागत लाभ पर्याप्त नहीं हो सकता है।घरेलू बाजार के अपेक्षित आकार को छोड़ दें तो हमारी कंपनियां उस स्तर को प्राप्त करने में समर्थ नहीं होगी जो उनके प्रतियोगियों ने पूर्वी एशिया में अपने अनेक उत्पादों के लिए स्थापित कर रखा है।
लाभ के स्तर के साथ-साथ लागत लाभ और मजबूत सरकारी सहायता अभी भी हमें बढ़ती हुई श्रम लागत के बावजूद अधिकांश उत्पादों के लिए उनके मूल्यों पर प्रतिस्पर्धा करने के लिए चुनौती पेश कर रही है। इसके अलावा उत्पादन के बदलते स्वरूप--3-डी प्रिटिंग, रोबोटिक्स और आटोमेशन भारतीय कंपनियों के सामने नई चुनौतियां पेश कर रहे हैं।

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