भारत सहिष्णुता की भूमि : राष्ट्रपति
राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कहा कि भारत सहिष्णुता की भूमि है। वे पश्चिम बंगाल के कोलकाता में भारतीय प्रबंधन संस्थान के 52 वें दीक्षांत समारोह को संबोधित कर रहे थे।
उन्होंने कहा कि उन्हें देश के अग्रणी प्रबंधन शिक्षण संस्थान के 52 वें दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए हर्ष हो रहा है। उन्हें यह देख कर भी खुशी है कि परिसर ने अपना विशेष आकर्षण को बनाए रखा है। इसके साथ ही सुविधाओं को बढ़ाने और बुनियादी संरचना को और सुदृढ़ करने का काम चल रहा है। आईआईएम की स्थापना 14 नवंबर ,1961 को पंडित जवाहर लाल नेहरू के विजन को आकार देने के लिए किया गया था।
आईआईटी और आईआईएम की अभिकल्पना पंडित नेहरू द्वारा इंजीनियरिंग और प्रबंधन की शिक्षा में उत्कृष्ट राष्ट्रीय संस्थान के रूप में उच्च क्षमता के मानव पूंजी बनाने के लिए की गई थी। इन वर्षों के दौरान आईआईएम कोलकाता उत्कृष्टता के इस मार्ग पर चलने का प्रयास किया है। उन्होंने कहा कि हमारे देश के संस्थानों का माहौल शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार से हिंसा रहित होना चाहिए। भारत के लोगों को बहस करने वाला कहा जा सकता है लेकिन उन्हें कभी भी असहिष्णु नहीं कहा जा सकता। प्रचीन भारत में नालंदा, विक्रमशिला और तक्षशिला जैसे उच्च शिक्षा के संस्थान थे जो सही मायने विश्व सभ्यता के विचार एवं अभिकल्पना के संगम थे।
राष्ट्रपति ने गांधी जी का उदाहरण देते हुए कहा, मैंने नहीं चाहता कि मेरा घर चारों ओर दीवारों से घिरा हो और खिड़कियां भरीं हुई हैं। मैं चाहता हूं कि दुनिया की सभी संस्कृतियां मेरे घर में यथासंभव मुक्त रूप से विचरण करें लेकिन मैं किसी के द्वारा अपने पैर के उखाड़ दिए जाने को स्वीकार नहीं करूंगा। उन्होंने कहा कि अगर हमारे पैर मजबूती से जमीन पर हैं तो , हमारे पैर कोई भी बाहरी विचार उखाड़ नहीं सकता। भारत सहिष्णुता की धरती है।
हम अपनाते हैं, स्वीकर करते हैं ओर अपने में समावेश कर लेते हैं लेकिन कभी भी किसी को खारिज नहीं करते। आइए बहस को होने दीजिए, असहमति और विरोधाभास के बावजूद कभी असहिष्णु न हों। राष्ट्रपति ने कहा कि उन्होंने हमेशा इस पर बल दिया है कि हमारे देश के उच्चतर शैक्षणिक संस्थान वैश्विक रैंकिंग में हमेशा स्थान प्राप्त करें। उन्हें इस बात की खुशी है कि इस मामले में कई संस्थानों को उनका उचित स्थान मिला है।

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