कैशलेस पंचायत एक बड़ी चुनौती
कांग्रेस को भाजपा का शुक्रगुजार होना चाहिए ! जी हां, यह कहा जाए तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी क्योंकि देश में 'कम्प्युटराईजेशन" देश के पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी की देन है। हालांकि 'कम्प्युटराईजेशन" का वामदलों ने पुरजोर विरोध किया था। तर्क था कि देश में कम्प्यूटराईजेशन से बड़ी तादाद में कर्मचारी बेरोजगार होंगे लेकिन हालात एकदम उलट दिखे। कम्प्युटराईजेशन से वर्किंग आसान हो गयी।
करीब डेढ़ दशक पहले देश में ई-गर्वनेंस की व्यवस्था लागू करने की नीति बनी। हालांकि ई-गर्वनेंस शत-प्रतिशत लागू होना अभी काफी मुश्किल दिख रहा है क्योंकि सिस्टम बनाना भारत सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती है। लिहाजा कांग्रेस को सिर्फ विरोध के लिए विरोध की रीति-नीति से बचना चाहिए। कारण 'जीरो कैश ट्रांजेक्शन" भी तो कहीं न कहीं पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी के 'कम्प्युटरीकरण" का हिस्सा है। हालांकि 'जीरो कैश ट्रांजेक्शन" सिस्टम लागू करना भारत सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती है।
इसका बड़ा कारण देश के ग्रामीण इलाकों में अभी तक ई-गर्वनेंस का सिस्टम नहीं बन सका। वैसे देखें तो देश के हजारों गांव-गिरांव-मजरा-खेरा-खिवार अभी तक विद्युतीकरण से काफी दूर है लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि विकास की रफ्तार को विराम दे दिया जाए। वहीं गौरतलब है कि देश की पंचायती राज व्यवस्था व ग्रामीण विकास व्यवस्था को भारत सरकार नकद रहित बनाने के लिए दृृृढसंकल्पित दिख रही है। भारत सरकार के केन्द्रीय पंचायती राज एवं ग्रामीण विकास मंत्रालय ने बकायदा देश के सरपंचों से आह्वान किया है कि नकद रहित व्यवस्था को बनायें। इससे पारदर्शिता, ईमानदारी व सुशासन को बल मिलेगा तो वहीं भ्रष्टाचार पर अंकुश लगेगा। पंचायतों को जोखिम लेने का संकल्प लेना चाहिए क्योंकि इसमें चुनौतियां भी कम नहीं होगी।
भ्रष्टाचार पर अंकुुश लगेगा तो वहीं विकास को रफ्तार मिलेगी। भारत सरकार ने पंचायतों को भरोसा दिलाया भी कि विकास की रफ्तार पहले से कहीं अधिक तेज हुई है क्योंकि भाजपा की केन्द्र सरकार ने अब तक 14 वें वित्त आयोग की सिफारिश के आधार पर पंचायतों को दो लाख करोड़ की धनराशि जारी की गयी है जबकि 13 वें वित्त आयोग के मुताबिक पांच वर्ष में केवल पैंसठ हजार करोड़ की धनराशि पंचायतों को दी गयी थी। इस तरह से देखा जाये तो पंचायतों को आर्थिक भरोसा दिलाया कि विकास तो हम ही कराएंगे। हालांकि भारत सरकार के सामने ग्रामीण इलाकों में नकद रहित व्यवस्था बनाने में चुनौतियां कम नहीं हैं क्योंकि ग्रामीण इलाकों में कम्प्युटरीकरण से लेकर विद्युतीकरण एक बड़ी समस्या है।
सिस्टम को संचालित करने के लिए इंजीनियर्स एवं प्रशिक्षित कर्मचारियों की बड़ी तादाद में आवश्यकता होगी क्योंकि इनके अभाव में सिस्टम को ब्रोक लगना लाजिमी होगा। सामान्यत: पंचायतों-स्थानीय निकाय के सामने ऑनलाइन सम्पत्ति कर भुगतान, पानी-बिजली के बिल का भुगतान, व्यावसायिक कर, लाईसेंस शुल्क, ऑनलाइन बुकिंग, जन्म एवं मृत्यु प्रमाण पत्र, दुकानों का पंजीकरण, लाईसेंस का नवीनीकरण एवं धन का हस्तानान्तरण आदि कार्य हैं। शहरी विकास मंत्रालय ने स्थानीय निकाय के लिए नकदी रहित लेन-देन के लिए ई-भुगतान का सिस्टम लागू किया। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि देश के असंख्य स्थानीय निकाय ई-गर्वनेंस के तहत अपने उत्तरदायित्व का पहले से ही निर्वहन कर रहे हैं। फिर भी सरकार की मानें तो देश के 4041 शहरी एवं कस्बाई निकाय-पंचायते सिस्टम से जुड़ जाएगीं। इससे देश की करीब चालीस करोड़ आबादी लाभान्वित होगी।
यह शहरी व कस्बाई आबादी का करीब 75 फीसद हिस्सा होगी। नकदी रहित लेन-देन वाले सिस्टम को लागू करने के लिए एक ओर भारत सरकार प्रतिबद्ध है तो वहीं 'बाबुओं का कॉकस" लागू न होने देने की तीन तिकडम से खुद को अलग नहीं कर पायेगा क्योंकि 'असल कमाई" तो वेतन के अतिरिक्त होती है। भ्रष्टाचार का यह संजाल दफ्तर से लेकर अनन्त क्षेत्र तक फैला रहता है। लिहाजा 'बाबुओं के कॉकस" के साथ ही माफियाओं की एक 'लॉबी" भी इसे सहज लागू नहीं होने देगी। चुनौतियां भले ही हों लेकिन असम्भव कुछ भी नहीं। गौरतलब हैं कि दुनिया के कई देश हैं, जो कैशलेस ट्रांजेक्शन पर आ चुके हैं। देश में सिस्टम बनाने में वक्त लग सकता है लेकिन 'कैशलेस ट्रांजेक्शन सिस्टम" से इंकार नहीं किया जा सकता।

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